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(64)
रम्भा का प्रलोभन और विश्वामित्र का अटल संकल्प
देवताओं के स्वर्गलोक में उस समय एक गंभीर चिंता छाई हुई थी। महर्षि विश्वामित्र की कठोर तपस्या दिन-प्रतिदिन प्रचंड होती जा रही थी। उनके तपोबल से देवराज इन्द्र का सिंहासन डोलने लगा था। इन्द्र जानते थे कि यदि यह तपस्या पूर्ण हो गई, तो विश्वामित्र ब्रह्मर्षि पद प्राप्त कर लेंगे और देवताओं की सत्ता पर प्रभाव पड़ेगा।
इन्द्र ने एक उपाय सोचा। उन्होंने स्वर्ग की अत्यंत रूपवती अप्सरा रम्भा को बुलाया। रम्भा विनम्र भाव से हाथ जोड़कर खड़ी हुई। इन्द्र ने उसे गंभीर स्वर में कहा—
“रम्भे! देवताओं का एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य सामने है। इसे तुम्हें ही पूरा करना होगा। तुम जाकर महर्षि विश्वामित्र को अपने रूप, नृत्य और मधुर वाणी से इस प्रकार मोहित कर दो कि उनका मन तपस्या से विचलित हो जाए।”
इन्द्र का यह आदेश सुनकर रम्भा का मुख फीका पड़ गया। उसके मन में भय की लहर दौड़ गई। उसने काँपते हुए स्वर में कहा—
“देवेश्वर! आप जानते हैं, महर्षि विश्वामित्र अत्यंत तेजस्वी और क्रोधी हैं। यदि उन्हें मेरे प्रयास का पता चल गया, तो वे मुझे भयंकर शाप दे देंगे। मैं उनके क्रोध से बहुत भयभीत हूँ। कृपा करके मुझपर दया करें।”
रम्भा भय से थर-थर काँप रही थी। उसके हाथ जुड़े हुए थे, आँखों में चिंता स्पष्ट दिखाई दे रही थी। इन्द्र ने उसे आश्वासन देते हुए कहा—
“भद्रे! तुम चिंता मत करो। वैशाख का महीना है—वन-उपवन नवपल्लवों से सज चुके हैं, मंद सुगंधित पवन बह रही है, कोयल मधुर स्वर में गा रही है। कामदेव भी तुम्हारी सहायता करेगा, और मैं स्वयं भी तुम्हारे साथ रहूँगा। तुम अपने रूप, भाव और मधुर कला से विश्वामित्र की तपस्या भंग कर दो।”
इन्द्र के इन शब्दों ने रम्भा को कुछ साहस दिया। उसने अपने सौंदर्य को और निखारा—उसकी चाल मृदुल हो गई, आँखों में मोहक भाव झलकने लगे, और स्वर में मधुरता भर गई। वह धीरे-धीरे उस वन की ओर बढ़ी जहाँ महर्षि विश्वामित्र गहन तप में लीन थे।
वन में शांति छाई हुई थी। महर्षि स्थिर भाव से तपस्या कर रहे थे। तभी वातावरण में कोयल की मधुर काकली गूँज उठी। मंद पवन फूलों की सुगंध लेकर बहने लगी। रम्भा ने मधुर गीत गाना शुरू किया। उसकी आवाज़ मानो वन की निस्तब्धता को मोह लेने लगी।
विश्वामित्र ने वह मधुर ध्वनि सुनी। उन्होंने धीरे से नेत्र खोले और उस दिशा में देखा। सामने अद्वितीय सौंदर्य से युक्त रम्भा खड़ी थी। उसके रूप, गीत और अचानक उपस्थित होने से मुनि के मन में तुरंत संदेह उत्पन्न हुआ।
उन्होंने मन ही मन विचार किया—“यह सब संयोग नहीं हो सकता। अवश्य ही इन्द्र का कोई षड्यंत्र है।”
ज्यों ही उन्हें यह समझ आया, उनका चेहरा क्रोध से लाल हो उठा। उनकी तपस्या को भंग करने का प्रयास उन्हें अत्यंत अनुचित लगा। उन्होंने क्रोधित होकर रम्भा से कहा—
“दुर्भाग्यवती! मैं काम और क्रोध पर विजय पाने के लिए तप कर रहा हूँ, और तू मुझे मोहित करने आई है। तेरे इस अपराध के कारण तू दस हजार वर्षों तक पत्थर की प्रतिमा बनकर खड़ी रहेगी।”
रम्भा भय से स्तब्ध रह गई। मुनि का क्रोध शांत नहीं हुआ। उन्होंने आगे कहा—
“जब शाप की अवधि पूरी होगी, तब एक महान तेजस्वी ब्राह्मण—वसिष्ठ—तेरा उद्धार करेंगे।”
इतना कहते ही रम्भा तुरंत पत्थर की प्रतिमा बन गई। उसका सुंदर, जीवंत रूप जड़ हो गया। यह दृश्य देखकर कामदेव और इन्द्र तुरंत वहाँ से अदृश्य हो गए।
लेकिन शाप देने के बाद विश्वामित्र का हृदय शांत नहीं हुआ। उन्होंने सोचा—“मैं क्रोध पर विजय पाने निकला था, परंतु क्रोध ने ही मेरी तपस्या नष्ट कर दी। अभी मेरी इन्द्रियाँ पूर्णतः वश में नहीं हैं।”
यह विचार आते ही वे भीतर से व्यथित हो उठे। उन्हें लगा कि उनका सारा तप व्यर्थ हो गया। तब उन्होंने मन में दृढ़ संकल्प लिया—अब वे न क्रोध करेंगे, न किसी से बोलेंगे। वे अपनी इन्द्रियों को पूर्णतः जीतेंगे।
उन्होंने निश्चय किया कि चाहे सौ वर्ष तक श्वास रोकना पड़े, चाहे शरीर सूख जाए, वे तपस्या नहीं छोड़ेंगे। उन्होंने ठान लिया कि जब तक ब्राह्मणत्व प्राप्त न हो जाए, तब तक वे बिना खाए-पीए, बिना हिले-डुले खड़े रहकर कठोर तप करेंगे।
इस दृढ़ संकल्प के साथ महर्षि विश्वामित्र ने पुनः तपस्या की दीक्षा ग्रहण की। उनका निश्चय इतना कठोर था कि उसकी तुलना संसार में कहीं नहीं थी। अब वे पहले से भी अधिक अटल होकर तप में लीन हो गए—क्रोध से तप का नाश हुआ था, पर उसी अनुभव ने उनके संकल्प को और भी दृढ़ बना दिया।
वन फिर शांत हो गया… पर इस बार उस शांति के भीतर एक ऐसा संकल्प जल रहा था, जो अंततः विश्वामित्र को ब्रह्मर्षि बनने की ओर ले जाने वाला था।