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राजा के बिना अयोध्या — शोक, अराजकता और भविष्य की चिंता
महाराज दशरथ के स्वर्गवास के बाद अयोध्या पर मानो दुःख का ऐसा अंधकार छा गया था, जिसका अंत दिखाई नहीं देता था। पूरी रात नगर में किसी घर से हँसी की आवाज़ नहीं आई। महलों से लेकर साधारण झोपड़ियों तक केवल सिसकियाँ और विलाप सुनाई दे रहे थे। हर व्यक्ति की आँखें आँसुओं से भरी थीं। लोगों के गले दुःख से इतने रुंध गए थे कि वे एक-दूसरे से ठीक से बात भी नहीं कर पा रहे थे। ऐसा लगता था मानो समय भी इस पीड़ा के आगे ठहर गया हो। वह एक ही रात सभी को सौ वर्षों जितनी लंबी और असहनीय प्रतीत हो रही थी।
जैसे-तैसे वह दुःखभरी रात समाप्त हुई। सूर्य तो उदित हो गया, परन्तु उसकी किरणें भी अयोध्या के चेहरे पर मुस्कान नहीं ला सकीं। नगर के ऊपर शोक का बादल अब भी वैसा ही छाया हुआ था। राजमहल में उस दिन कोई उत्सव नहीं था, कोई राजसी ध्वनि नहीं थी। वहाँ केवल गंभीरता और चिंता का वातावरण था।
प्रातःकाल राज्य के प्रमुख ब्राह्मण, महर्षि वसिष्ठ, महर्षि वामदेव, महर्षि मार्कण्डेय, महर्षि कश्यप, महर्षि गौतम, महर्षि कात्यायन, महर्षि जाबालि और अन्य विद्वान पुरोहित तथा मंत्री एकत्र हुए। सभी के चेहरे पर गहरी उदासी थी। वे जानते थे कि केवल एक राजा की मृत्यु ही नहीं हुई थी, बल्कि पूरे राज्य का आधार डगमगा गया था।
सभा में कुछ क्षणों तक गहरा मौन छाया रहा। फिर एक वृद्ध ऋषि ने भारी स्वर में कहा, “यह रात हमने जैसे-तैसे काटी है। पुत्र-वियोग के दुःख में महाराज दशरथ हमें छोड़कर स्वर्ग चले गए। ऐसा लग रहा था मानो एक रात नहीं, सौ वर्षों का दुःख हमने सहा हो।”
दूसरे मंत्री ने आँसू पोंछते हुए कहा, “हमारे महाराज नहीं रहे। राम वन में हैं। उनके साथ धर्मनिष्ठ लक्ष्मण भी चले गए। भरत और शत्रुघ्न दूर केकय देश में अपने नाना के यहाँ हैं। आज अयोध्या का सिंहासन रिक्त है।”
यह विचार आते ही सभा का वातावरण और अधिक गंभीर हो गया। सभी जानते थे कि सिंहासन का खाली रहना केवल राजपरिवार की समस्या नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए संकट था।
महर्षियों ने कहा, “राजा केवल राजमहल का स्वामी नहीं होता, वह सम्पूर्ण राज्य की आत्मा होता है। यदि राज्य बिना राजा के अधिक समय तक रहा, तो धीरे-धीरे व्यवस्था समाप्त हो जाएगी और अराजकता फैल जाएगी।”
उन्होंने समझाना प्रारम्भ किया कि जिस देश का कोई राजा नहीं होता, वहाँ केवल राजमहल ही सूना नहीं होता, बल्कि प्रकृति भी जैसे अपना संतुलन खो देती है। ऐसा लगता है मानो बादल भी धरती पर बरसना नहीं चाहते। खेत सूखने लगते हैं, किसान उत्साह खो देते हैं और भविष्य के प्रति उनका विश्वास डगमगा जाता है।
उन्होंने कहा, “जब शासन का भय और संरक्षण दोनों समाप्त हो जाते हैं, तब परिवारों की मर्यादा भी टूटने लगती है। पुत्र पिता की बात नहीं मानता, पत्नी पति के प्रति समर्पित नहीं रहती और समाज का अनुशासन धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।”
सभा में बैठे सभी लोग ध्यानपूर्वक सुन रहे थे। महर्षियों ने आगे कहा, “राजा के बिना किसी का धन सुरक्षित नहीं रहता। लोग हर समय भय में जीते हैं। जो वस्तु आज अपनी है, कल किसी और की हो सकती है। जब सुरक्षा ही समाप्त हो जाए, तब सत्य और विश्वास भी समाप्त होने लगते हैं।”
उन्होंने राज्य की समृद्धि का चित्र सामने रखते हुए कहा, “जहाँ सुशासन नहीं होता, वहाँ कोई नया भवन नहीं बनवाता। उद्यान सूने हो जाते हैं। धर्मशालाएँ, मंदिर और जनकल्याण के कार्य रुक जाते हैं। क्योंकि लोगों को भविष्य पर भरोसा ही नहीं रहता।”
धर्म की स्थिति का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा, “जब राज्य असुरक्षित हो जाता है, तब बड़े-बड़े यज्ञ भी बंद हो जाते हैं। विद्वान ब्राह्मण यज्ञ करने से डरते हैं। यदि कोई यज्ञ प्रारम्भ भी करे, तो धनी लोग खुलकर दान देने का साहस नहीं करते। उन्हें भय रहता है कि कहीं उनका धन लूट न लिया जाए।”
उन्होंने समाज के सांस्कृतिक जीवन की ओर संकेत करते हुए कहा, “जहाँ राजा नहीं होता, वहाँ उत्सव समाप्त हो जाते हैं। नर्तक और कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन नहीं कर पाते। संगीत मौन हो जाता है। नगर की जीवंतता समाप्त हो जाती है।”
सभा में बैठे एक वृद्ध मंत्री ने कहा, “जब न्याय देने वाला राजा नहीं होता, तब निर्दोष को न्याय नहीं मिलता और अपराधी निर्भय होकर घूमते हैं। व्यापारी व्यापार करने से डरते हैं। कथावाचक भी कथा सुनाने का उत्साह खो देते हैं, क्योंकि लोगों के मन दुःख और भय से भरे रहते हैं।”
उन्होंने आगे कहा, “ऐसे राज्य में युवतियाँ संध्या समय बागों में घूमने नहीं जातीं। माता-पिता हर समय उनकी सुरक्षा को लेकर भयभीत रहते हैं।”
“धनवान लोग अपने घरों के द्वार बंद करके भी चैन से नहीं सो सकते। किसान और गोपालक अपनी मेहनत की कमाई को लेकर चिंतित रहते हैं। किसी को यह विश्वास नहीं रहता कि अगली सुबह उसका सब कुछ सुरक्षित मिलेगा।”
उन्होंने कल्पना की कि यदि अराजकता फैल गई, तो कोई परिवार वन-विहार के लिए नहीं जाएगा, कोई राजसी शोभायात्रा नहीं निकलेगी, हाथियों की घंटियाँ नहीं बजेंगी, रथों की गड़गड़ाहट सुनाई नहीं देगी और धनुर्धर योद्धाओं के अभ्यास की टंकार भी मौन हो जाएगी।
दूर-दूर तक व्यापार करने वाले व्यापारी भी अपने सामान के साथ यात्रा करने का साहस नहीं करेंगे। उन्हें हर कदम पर डाकुओं और लुटेरों का भय रहेगा।
महर्षियों ने कहा, “यहाँ तक कि तपस्वी मुनि भी निर्भय होकर वन में विचरण नहीं कर सकेंगे। क्योंकि जब समाज असुरक्षित हो जाता है, तब साधु-संतों का भी सम्मान और संरक्षण समाप्त हो जाता है।”
उन्होंने समझाया कि अराजकता केवल धन का ही नाश नहीं करती, बल्कि मनुष्य की आशाओं का भी अंत कर देती है। जो वस्तु प्राप्त नहीं हुई, उसे कोई प्राप्त नहीं कर सकता और जो प्राप्त है, उसकी रक्षा भी संभव नहीं रहती। सेना का साहस भी टूट जाता है और शत्रु राज्य पर आसानी से आक्रमण कर सकते हैं।
विद्वानों ने कहा, “जहाँ राजा नहीं होता, वहाँ विद्वान भी खुले मन से शास्त्रों की चर्चा नहीं कर पाते। धर्म के कार्य रुक जाते हैं। देवताओं की पूजा भी केवल औपचारिक रह जाती है।”
उन्होंने दुखी स्वर में कहा, “राजकुमारों का तेज भी राजा के संरक्षण में ही शोभा पाता है। जैसे वसंत में वृक्ष खिलते हैं, वैसे ही योग्य राजकुमार सुशासन में चमकते हैं।”
फिर उन्होंने एक अत्यन्त मार्मिक उपमा दी—“जिस प्रकार जल के बिना नदी केवल सूखी भूमि बन जाती है, घास के बिना वन उजाड़ लगता है और ग्वालों के बिना गौएँ असहाय हो जाती हैं, उसी प्रकार राजा के बिना राज्य भी अपनी सारी शोभा खो देता है।”
उन्होंने आगे कहा, “ध्वज देखकर रथ का पता चलता है, धुएँ से अग्नि का ज्ञान होता है। उसी प्रकार राजा ही पूरे राज्य की पहचान होता है। उसके बिना राज्य केवल भवनों का समूह रह जाता है, राष्ट्र नहीं।”
सभा में बैठे सभी मंत्री गम्भीर हो गए। महर्षियों ने कहा, “यदि राजा न रहे, तो लोग एक-दूसरे पर टूट पड़ते हैं। जैसे बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियों को निगल जाती हैं, वैसे ही बलवान दुर्बलों का शोषण करने लगते हैं।”
उन्होंने चेतावनी दी कि धर्म और शास्त्रों की मर्यादा भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी। जो लोग पहले राजदण्ड के भय से अधर्म करने से डरते थे, वे अब निर्भय होकर समाज में अपना प्रभाव फैलाने लगेंगे।
फिर महर्षि वसिष्ठ की ओर देखकर सभी ने एक स्वर में कहा, “राजा केवल शासन करने वाला व्यक्ति नहीं होता। वही सत्य का रक्षक है, वही धर्म का आधार है, वही प्रजा के लिए माता-पिता के समान होता है। उसमें यम का न्याय, कुबेर का वैभव, इन्द्र का संरक्षण और वरुण का अनुशासन—चारों गुण समाहित होते हैं।”
सभा में उपस्थित सभी लोगों ने हाथ जोड़कर महर्षि वसिष्ठ से निवेदन किया, “गुरुदेव! जैसे समुद्र अपनी मर्यादा कभी नहीं छोड़ता, वैसे ही हमने भी सदैव आपकी आज्ञा का पालन किया है। आज अयोध्या बिना राजा के वन के समान हो गई है। अब आप ही इक्ष्वाकु वंश के किसी योग्य राजकुमार को सिंहासन पर बैठाइए, ताकि धर्म, न्याय और व्यवस्था पुनः स्थापित हो सके।”
महर्षि वसिष्ठ ने पूरी सभा की ओर देखा। सभी की आँखों में एक ही प्रश्न था—“क्या अयोध्या फिर से अपने स्वर्णिम वैभव को प्राप्त कर सकेगी?”
उस दिन राजसभा में केवल एक नए राजा की नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के भविष्य की चिंता की जा रही थी। अयोध्या समझ चुकी थी कि एक धर्मात्मा राजा केवल सिंहासन पर बैठा हुआ व्यक्ति नहीं होता, वह सम्पूर्ण राज्य की आत्मा, उसकी मर्यादा और उसके अस्तित्व का आधार होता है