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राज्याभिषेक की प्रतीक्षा — प्रेम, श्रद्धा और उल्लास की कहानी
अयोध्या नगरी उस समय केवल एक नगर नहीं थी, बल्कि भावनाओं का सजीव सागर बन चुकी थी। हर दिशा में एक ही चर्चा थी—अगले दिन प्रभु श्रीराम का राज्याभिषेक होने वाला है। यह समाचार जैसे ही फैला, हर हृदय में आनंद, गर्व और प्रेम की लहरें उमड़ने लगीं।
उधर, राजमहल में महाराज दशरथ अपने प्रिय पुत्र श्रीराम को अभिषेक के संबंध में आवश्यक बातें बता चुके थे। उनके चेहरे पर संतोष था, पर साथ ही एक पिता का स्नेह भी झलक रहा था। इसके बाद उन्होंने अपने परम विश्वसनीय और पूजनीय गुरु, महर्षि वसिष्ठ को बुलवाया।
गंभीर किन्तु स्नेहपूर्ण स्वर में उन्होंने कहा—
“हे तपस्वी! आप श्रीराम के पास जाइए और उन्हें नियमपूर्वक उपवास-व्रत की दीक्षा दीजिए, ताकि उनका राज्याभिषेक बिना किसी विघ्न के पूर्ण हो और उनका कल्याण हो।”
महर्षि वसिष्ठ ने शांत मुस्कान के साथ “तथास्तु” कहा। वे जानते थे कि यह केवल एक राजकुमार का अभिषेक नहीं, बल्कि धर्म और मर्यादा के युग का आरंभ है। वे तुरंत ही एक भव्य, सुशोभित रथ पर आरूढ़ हुए, जो विशेष रूप से ब्राह्मणों के योग्य था, और श्रीराम के महल की ओर प्रस्थान किया।
जब वे श्रीराम के महल के समीप पहुँचे, तो वह भवन मानो स्वर्ग का अंश प्रतीत हो रहा था—श्वेत बादलों की भाँति उज्ज्वल, शांत और दिव्य। महर्षि वसिष्ठ ने बिना किसी बाधा के उस महल की तीनों ड्योढ़ियाँ पार कीं, और भीतर प्रवेश किया।
उधर, जैसे ही श्रीराम को ज्ञात हुआ कि गुरुदेव पधारे हैं, वे अत्यंत उत्साह और विनम्रता के साथ तुरंत बाहर दौड़े। उनके मन में गुरु के प्रति अपार श्रद्धा थी। वे शीघ्रता से रथ के पास पहुँचे और स्वयं अपने हाथों से वसिष्ठजी को रथ से नीचे उतारा।
यह दृश्य देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो विनय और श्रद्धा स्वयं मूर्त रूप धारण कर खड़े हों।
महर्षि वसिष्ठ ने स्नेहपूर्वक “वत्स!” कहकर श्रीराम को पुकारा। उनकी वाणी में प्रेम और आशीर्वाद दोनों थे। उन्होंने कहा—
“हे राम! तुम्हारे पिता तुमसे अत्यंत प्रसन्न हैं। वे तुम्हें राज्य सौंपने जा रहे हैं। अतः आज की रात तुम अपनी पत्नी सीता के साथ उपवास-व्रत का पालन करो।”
फिर उन्होंने आगे कहा—
“जैसे प्राचीन समय में नहुष ने ययाति का अभिषेक किया था, उसी प्रकार तुम्हारे पिता महाराज दशरथ कल प्रातः तुम्हारा युवराज के रूप में अभिषेक करेंगे।”
उनकी वाणी सुनकर वातावरण और भी पवित्र हो उठा। तत्पश्चात उन्होंने विधिपूर्वक मंत्रोच्चारण करते हुए श्रीराम और सीता को उपवास-व्रत की दीक्षा दी। यह केवल एक अनुष्ठान नहीं था—यह धर्म, संयम और उत्तरदायित्व की ओर एक गंभीर कदम था।
श्रीराम ने भी अत्यंत श्रद्धा और आदर के साथ अपने गुरु का पूजन किया। उनके व्यवहार में विनम्रता और कृतज्ञता स्पष्ट झलक रही थी।
श्रीराम से अनुमति लेकर वसिष्ठजी वहाँ से विदा हुए।
श्रीराम कुछ समय तक अपने प्रिय मित्रों और सुहृदों के साथ बैठे रहे। वहाँ उपस्थित सभी लोग उनके मधुर वचनों और शांत स्वभाव से प्रसन्न हो रहे थे। फिर सबकी अनुमति लेकर वे पुनः अपने महल के भीतर चले गए।
उस समय श्रीराम का महल मानो आनंद का केंद्र बन गया था। वहाँ स्त्री-पुरुष हर्ष से भरे हुए थे, और वातावरण में उल्लास गूँज रहा था। वह दृश्य ऐसा लग रहा था जैसे खिले हुए कमलों से युक्त एक सुंदर सरोवर हो, जिसमें पक्षियों का मधुर कलरव वातावरण को और भी मधुर बना रहा हो।
उधर, महर्षि वसिष्ठ जब महल से बाहर निकले, तो उन्होंने देखा कि अयोध्या की सड़कों पर अपार भीड़ उमड़ी हुई है। हर कोई उत्सुक था—बस एक ही इच्छा थी, श्रीराम का राज्याभिषेक देखने की।
सड़कों पर जनसमूह ऐसे भरा हुआ था जैसे समुद्र की लहरें एक-दूसरे से टकरा रही हों। लोगों के हर्ष और जयघोष से उत्पन्न ध्वनि समुद्र की गर्जना जैसी प्रतीत हो रही थी।
पूरी अयोध्या सजी हुई थी। घर-घर पर ऊँचे-ऊँचे ध्वज फहरा रहे थे। सड़कों को साफ करके उन पर जल का छिड़काव किया गया था, जिससे वातावरण और भी शीतल और पवित्र हो गया था।
स्त्रियाँ, पुरुष और बच्चे—सभी के हृदय में एक ही कामना थी—
“काश! सूर्योदय जल्दी हो जाए, और हम अपने प्रिय राम का अभिषेक देख सकें।”
यह उत्सव केवल एक राजकीय कार्यक्रम नहीं था, बल्कि प्रत्येक नागरिक के हृदय का उत्सव बन चुका था। हर व्यक्ति इस अवसर को अपने जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य मान रहा था।
महर्षि वसिष्ठ उस भीड़ को धीरे-धीरे एक ओर करते हुए राजमहल की ओर बढ़े। उनकी उपस्थिति मात्र से लोग मार्ग देने लगे।
राजमहल पहुँचकर वे ऊपर चढ़े और महाराज दशरथ से मिले। उनका मिलन ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे देवगुरु बृहस्पति स्वयं इंद्र से मिलने आए हों।
महाराज दशरथ उन्हें देखते ही अपने सिंहासन से उठ खड़े हुए। उनकी आँखों में उत्सुकता थी। उन्होंने पूछा—
“हे मुने! क्या आपने मेरा कार्य पूर्ण कर दिया?”
वसिष्ठजी ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
“हाँ, सब कुछ विधिपूर्वक सम्पन्न हो गया है।”
यह सुनकर महाराज के चेहरे पर संतोष और प्रसन्नता की चमक आ गई। वहाँ उपस्थित सभी सभासद भी सम्मानपूर्वक अपने स्थान से उठ खड़े हुए और वसिष्ठजी का आदर किया।
इसके बाद, गुरु की आज्ञा लेकर महाराज दशरथ ने सभा को विदा किया और स्वयं अपने अंतःपुर की ओर चले गए। उनका प्रवेश ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कोई सिंह पर्वत की गुफा में प्रवेश कर रहा हो—गंभीर, प्रभावशाली और शांत।
राजमहल के भीतर का दृश्य भी अद्भुत था—सुंदर वस्त्रों से सजी स्त्रियाँ, उज्ज्वल वातावरण, और चारों ओर सौंदर्य की छटा बिखरी हुई थी।
उस मनोहर महल में प्रवेश करते हुए महाराज दशरथ ऐसे लग रहे थे जैसे चंद्रमा तारों से भरे आकाश में प्रवेश कर रहा हो—शांत, उज्ज्वल और मनोहर।
इस प्रकार, वह रात केवल एक रात्रि नहीं थी—वह एक युग के परिवर्तन की पूर्वरात्रि थी, जहाँ हर हृदय में आशा, प्रेम और उत्सव की ज्योति प्रज्वलित हो रही थी।
अगली सुबह केवल सूर्योदय नहीं लाने वाली थी—वह धर्म, मर्यादा और आदर्श शासन का स्वर्णिम प्रभात लेकर आने वाली थी। 🌅