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रामाभिषेक की पूर्वसंध्या — भक्ति, संयम और उत्सव से स्पंदित अयोध्या

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रामाभिषेक की पूर्वसंध्या — भक्ति, संयम और उत्सव से स्पंदित अयोध्या

 

 

पुरोहितजी के चले जाने के बाद राजमहल में एक गहरी शांति छा गई थी। वातावरण में गंभीरता थी, पर उस गंभीरता के भीतर एक अद्भुत पवित्रता भी समाई हुई थी। ऐसे समय में मर्यादा और आत्मसंयम के प्रतीक श्रीराम ने अपने चंचल मन को पूरी तरह वश में रखा। उन्होंने स्नान करके अपने शरीर और आत्मा दोनों को शुद्ध किया और अपनी विशाललोचना, सौम्य एवं तेजस्विनी पत्नी सीता के साथ भगवान् श्रीनारायण की उपासना में लीन हो गए। यह केवल एक पूजा नहीं थी, बल्कि एक भावपूर्ण समर्पण था—जहाँ मन, वचन और कर्म तीनों ईश्वर के चरणों में अर्पित हो चुके थे।

 

इसके बाद श्रीराम ने अत्यंत विनम्रता के साथ हविष्य-पात्र को सिर झुकाकर प्रणाम किया। वह पात्र उनके लिए केवल एक बर्तन नहीं था, बल्कि यज्ञ का पवित्र माध्यम था। उन्होंने प्रज्वलित अग्नि में विधिपूर्वक आहुति दी—हर आहुति में उनकी श्रद्धा, भक्ति और भगवान् शेषशायी नारायण को प्रसन्न करने की भावना स्पष्ट झलक रही थी। अग्नि की लपटें मानो उनके हृदय की आस्था को आकाश तक पहुँचा रही थीं।

 

फिर उन्होंने अपने हृदय के प्रिय मनोरथ—राज्याभिषेक—की सिद्धि के लिए संकल्प लिया। यह संकल्प केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा नहीं थी, बल्कि समस्त प्रजा के कल्याण का संकल्प था। यज्ञ के शेष हविष्य को ग्रहण करते समय भी उन्होंने पूर्ण संयम रखा और मौन धारण कर लिया। इसके बाद वे सीता के साथ भगवान् विष्णु के भव्य मंदिर में गए। वहाँ की दिव्यता, शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा के बीच, वे कुश की कोमल चटाई पर लेटकर भगवान् नारायण का ध्यान करते हुए सो गए—मानो उनकी हर श्वास में केवल ईश्वर का ही स्मरण था।

 

रात धीरे-धीरे बीत रही थी। जब तीन पहर बीत गए और केवल एक पहर शेष रह गया, तब श्रीराम स्वयं उठ बैठे। उनकी आँखों में न तो आलस्य था और न ही चिंता—केवल कर्तव्य का प्रकाश था। उन्होंने तुरंत सेवकों को आदेश दिया कि सभामंडप को भव्य रूप से सजाया जाए, ताकि आने वाला शुभ अवसर पूरी गरिमा के साथ मनाया जा सके।

 

उधर सभामंडप में सूत, मागध और बंदी अपनी मधुर और गूंजती हुई वाणी में स्तुति गा रहे थे। उनकी आवाज़ें वातावरण को मंगलमय बना रही थीं। इन मधुर स्वरों के बीच श्रीराम ने प्रातःकालीन संध्योपासना की। उनकी एकाग्रता इतनी गहरी थी कि मानो संसार की कोई भी वस्तु उन्हें विचलित नहीं कर सकती थी। इसके बाद वे जप में लीन हो गए—हर मंत्र के साथ उनका मन और अधिक पवित्र और स्थिर होता चला गया।

 

तत्पश्चात् श्रीराम ने रेशमी वस्त्र धारण किए। उनका व्यक्तित्व और भी तेजस्वी और दिव्य प्रतीत हो रहा था। उन्होंने सिर झुकाकर भगवान् मधुसूदन को प्रणाम किया और उनका स्तवन किया। यह स्तुति केवल शब्दों का समूह नहीं थी, बल्कि उनके हृदय की गहराइयों से निकली हुई सच्ची भक्ति थी। इसके बाद उन्होंने ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराया, जिससे वातावरण में मंगल और शुभता का संचार हो गया।

 

ब्राह्मणों के पुण्याहवाचन की गंभीर और मधुर ध्वनि, विविध वाद्यों की गूंज के साथ मिलकर पूरे अयोध्या में फैल गई। ऐसा लग रहा था मानो स्वयं देवता इस पवित्र क्षण के साक्षी बन रहे हों। जब अयोध्यावासियों ने यह समाचार सुना कि श्रीराम और सीता ने उपवास-व्रत आरंभ कर दिया है, तो उनके हृदय आनंद से भर उठे। उन्हें यह जानकर गर्व हुआ कि उनका भावी राजा इतना धर्मनिष्ठ और संयमी है।

 

सुबह होते ही जैसे ही श्रीराम के राज्याभिषेक का समाचार फैला, पूरी अयोध्या जाग उठी। हर व्यक्ति अपने-अपने तरीके से इस उत्सव को भव्य बनाने में जुट गया। नगर के विशाल मंदिर, ऊँची अट्टालिकाएँ, चौराहे, गलियाँ—सब कुछ सजने लगा। हर स्थान पर रंग-बिरंगी पताकाएँ लहराने लगीं। दूर से देखने पर ऐसा प्रतीत होता था मानो स्वयं आकाश भी इस उत्सव में भाग ले रहा हो।

 

नगर में नटों, नर्तकों और गायकों के समूहों की मधुर प्रस्तुतियाँ गूंज रही थीं। उनकी कला और संगीत लोगों के मन को आनंदित कर रहे थे। हर गली, हर चौक में केवल एक ही चर्चा थी—श्रीराम का राज्याभिषेक। छोटे-छोटे बालक भी अपने खेल में उसी विषय को लेकर बातें कर रहे थे, मानो यह उत्सव केवल बड़ों का नहीं, बल्कि पूरे नगर का था।

 

राजमार्गों को फूलों से सजाया गया था। हर ओर सुगंधित धूप की खुशबू फैल रही थी, जिससे वातावरण और भी पवित्र और आकर्षक हो गया था। रात के समय प्रकाश की व्यवस्था के लिए विशाल दीपस्तंभ खड़े किए गए थे, जिनकी अनेक शाखाएँ वृक्ष के समान प्रतीत होती थीं। यह सब देखकर ऐसा लगता था मानो अयोध्या स्वयं एक स्वर्गिक नगरी बन गई हो।

 

जब नगर पूरी तरह सज गया, तो लोग चौराहों और सभाओं में समूह बनाकर एकत्र होने लगे। वे आपस में बातचीत करते हुए महाराज दशरथ की प्रशंसा कर रहे थे—उनकी दूरदर्शिता, त्याग और धर्मनिष्ठा का गुणगान कर रहे थे। लोग कह रहे थे—“धन्य हैं ऐसे राजा, जो अपने वृद्धावस्था में अपने योग्य पुत्र को राज्य सौंप रहे हैं।”

 

वे श्रीराम के गुणों का भी वर्णन कर रहे थे—उनकी विनम्रता, धर्मपरायणता, और अपने भाइयों तथा प्रजा के प्रति उनके प्रेम की चर्चा कर रहे थे। सभी के मन में यह विश्वास था कि श्रीराम के राज्य में वे सुरक्षित और सुखी रहेंगे।

 

इस शुभ अवसर का समाचार सुनकर दूर-दूर से जनपदों के लोग भी अयोध्या पहुँचने लगे। नगर में इतनी भीड़ हो गई कि हर ओर जनसमूह ही दिखाई देता था। लोगों का कोलाहल समुद्र की गर्जना के समान प्रतीत हो रहा था—जैसे कोई विशाल उत्सव अपने चरम पर हो।

 

अंततः, अयोध्या उस समय किसी स्वर्गिक नगरी से कम नहीं लग रही थी। हर दिशा से आए लोग, उनका उत्साह, उनकी श्रद्धा—सब मिलकर ऐसा दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे, जो किसी महासागर की लहरों के समान जीवंत और गतिशील था। यह केवल एक राज्याभिषेक की तैयारी नहीं थी, बल्कि धर्म, प्रेम और आदर्शों के राज्य की स्थापना का आरंभ था।