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रामायण की महिमा और पापी व्याध कलिक की कथा
एक दिन महर्षि नारदजी अनेक ऋषि-मुनियों के बीच बैठे थे। सब लोग शांत होकर उनके उपदेश सुन रहे थे। तब नारदजी बोले—
“हे महर्षियो! अब मैं तुम्हें उस विशेष समय के बारे में बताता हूँ, जब रामायण का पाठ और श्रवण करने से बहुत अधिक पुण्य मिलता है। वह समय है चैत्र मास। इस मास में रामायण सुनने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसके जीवन के दुःख दूर हो जाते हैं।”
नारदजी ने आगे कहा कि रामायण केवल ब्राह्मणों के लिए नहीं है। स्त्री, शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय—सभी के लिए यह समान रूप से फल देने वाली है। इससे धन, सुख, अच्छे स्वप्न, भोग और अंत में मोक्ष तक की प्राप्ति होती है। इसलिए हर व्यक्ति को इसे श्रद्धा से सुनना चाहिए।
फिर नारदजी ने कहा—
“इस सत्य को समझाने के लिए मैं तुम्हें एक पुरानी कथा सुनाता हूँ। यह कथा इतनी पवित्र है कि इसे सुनने मात्र से पापी भी मुक्त हो सकता है।”
कलिक नाम का भयानक व्याध
बहुत पुराने समय की बात है। कलिक नाम का एक व्याध (शिकारी) रहता था। वह अत्यंत क्रूर और पापी था। परायी स्त्री और पराये धन को लूटना ही उसका जीवन बन गया था। दूसरों की निंदा करना, जीव-जन्तुओं को मारना और लोगों को दुःख देना उसके लिए सामान्य बात थी।
उसने अनेक ब्राह्मणों और हजारों गायों की हत्या कर दी थी। यहाँ तक कि देवताओं के धन को भी चुराने में उसे कोई डर नहीं लगता था। उसके पाप इतने अधिक थे कि उन्हें गिनना असंभव था। जहाँ वह जाता, वहाँ भय फैल जाता था।
एक बार वह सौवीर नगर पहुँचा। यह नगर बहुत सुंदर और समृद्ध था। चारों ओर स्वच्छ सरोवर थे, बाज़ारों में चमकती दुकानें थीं और सुंदर वस्त्र-आभूषणों से सजी स्त्रियाँ नगर की शोभा बढ़ा रही थीं। यह नगर किसी स्वर्ग से कम नहीं लगता था।
भगवान श्रीराम का मंदिर
नगर के एक सुंदर उपवन में भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर था। मंदिर के शिखर पर सोने के कलश चमक रहे थे। जब कलिक ने मंदिर को देखा, तो उसके मन में लोभ जाग उठा।
उसने सोचा—
“इस मंदिर में बहुत सारा सोना है। रात को चोरी करूँगा और अमीर बन जाऊँगा।”
रात होने पर वह चोरी के इरादे से मंदिर में घुस गया।
उत्तङ्क मुनि से सामना
मंदिर के भीतर एक शांत और तेजस्वी मुनि ध्यान में बैठे थे। वे थे महर्षि उत्तङ्क। वे तपस्या की मूर्ति थे—सरल, दयालु और निष्काम। वे किसी से कुछ नहीं चाहते थे और सदा भगवान का स्मरण करते रहते थे।
कलिक ने उन्हें देखा और मन में सोचा—
“यह मुनि मेरी चोरी में बाधा बनेगा।”
आधी रात होने पर जब कलिक मंदिर से देवता का धन लेकर निकलने लगा, तो उसने अचानक उत्तङ्क मुनि पर आक्रमण कर दिया। उसने उनके सीने पर पैर रखा, गला पकड़ा और तलवार उठा ली।
साधु का उपदेश
तब भी उत्तङ्क मुनि शांत रहे। उन्होंने करुण स्वर में कहा—
“हे मनुष्य! तुम मुझे व्यर्थ ही मारना चाहते हो। मैंने तुम्हारा कोई अपराध नहीं किया। सज्जन लोग निर्दोष को नहीं मारते।”
उन्होंने आगे कहा—
“सच्चे साधु अपमान सहकर भी क्षमा रखते हैं। जो क्षमा करता है, वही भगवान विष्णु को प्रिय होता है। जैसे चंदन का वृक्ष काटने वाले कुल्हाड़े को भी सुगंध देता है, वैसे ही साधु अपने शत्रु से भी वैर नहीं रखते।”
फिर उन्होंने संसार की सच्चाई समझाई—
“यह धन, पत्नी, पुत्र और घर सदा साथ नहीं रहते। पाप करके कमाया धन किसी काम का नहीं, क्योंकि पाप का फल मनुष्य को अकेले ही भोगना पड़ता है।”
कलिक का हृदय परिवर्तन
उत्तङ्क मुनि की बातें सुनकर कलिक का हृदय काँप उठा। उसके हाथ से तलवार गिर गई। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। वह हाथ जोड़कर बोला—
“प्रभो! मैंने जीवन भर पाप ही किये हैं। अब समझ में आ रहा है कि मेरा जीवन व्यर्थ चला गया। मेरा उद्धार कैसे होगा? मैं किसकी शरण जाऊँ?”
रामायण का उपाय
उत्तङ्क मुनि ने दया से कहा—
“हे व्याध! तुम भाग्यशाली हो कि तुम्हारे मन में पश्चात्ताप आया।
चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में श्रद्धा से रामायण की नवाह कथा सुनो। केवल उसके श्रवण से ही सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।”
जैसे ही कलिक ने यह सुना, रामायण की महिमा से उसके सभी पाप नष्ट हो गये। उसी क्षण उसने देह त्याग दी।
मोक्ष की प्राप्ति
थोड़ी ही देर में आकाश से एक दिव्य विमान उतरा। कलिक उसमें बैठकर स्वर्गलोक को चला गया। जाते-जाते उसने कहा—
“हे मुनिवर! आपकी कृपा से मेरा उद्धार हो गया। कृपया मेरे अपराधों को क्षमा करें।”
फूलों की वर्षा हुई और वह भगवान विष्णु के परम धाम को प्राप्त हुआ।
कथा का संदेश
नारदजी ने कथा समाप्त करते हुए कहा—
“इसलिए हे ऋषियों! चैत्र मास में रामायण की नवाह कथा अवश्य सुननी चाहिए। रामायण सभी ऋतुओं में कल्याण करने वाली है। जो श्रद्धा से इसे सुनता या पढ़ता है, उसकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और अंत में उसे मोक्ष प्राप्त होता है।”