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राम-पादुकाओं की छत्रछाया में भरत का त्याग
अयोध्या में सब कुछ जैसे अचानक बदल गया था। महाराज दशरथ स्वर्ग सिधार चुके थे और श्रीराम वनवास के लिए जा चुके थे। राजमहल में उत्सव और वैभव का स्थान शोक और निस्तब्धता ने ले लिया था। ऐसी परिस्थिति में भरत का हृदय अत्यंत व्यथित था। उन्हें राज्य, राजसिंहासन या सुख-सुविधाओं में तनिक भी रुचि नहीं थी। उनके मन में केवल अपने प्रिय बड़े भाई श्रीराम के प्रति प्रेम, श्रद्धा और उनके दर्शन की तीव्र इच्छा थी।
भरत ने अपनी माताओं को अयोध्या में ही रहने दिया और स्वयं नन्दिग्राम जाने का निश्चय किया। उन्होंने गुरुजनों के सामने विनम्र होकर कहा कि वे उनकी आज्ञा लेकर नन्दिग्राम जाना चाहते हैं। वहाँ वे श्रीराम के बिना मिलने वाले इस दुःख को सहते हुए उनके लौटने की प्रतीक्षा करेंगे। उनके मन में यह बात पूरी तरह स्पष्ट थी कि अयोध्या के वास्तविक राजा श्रीराम ही हैं।
भरत ने अत्यंत दुःख के साथ अपने पिता और भाई की स्थिति को याद किया। एक ओर महाराज दशरथ इस संसार से विदा हो चुके थे और दूसरी ओर उनके पूजनीय भाई श्रीराम वन में रह रहे थे। भरत को अपने जीवन में किसी भी प्रकार का सुख दिखाई नहीं दे रहा था। फिर भी उनके मन में अपने कर्तव्य के प्रति दृढ़ता थी। वे जानते थे कि उन्हें श्रीराम की प्रतीक्षा करनी है और उनके राज्य की रक्षा करनी है।
भरत की ये बातें सुनकर गुरु वसिष्ठ और वहाँ उपस्थित मन्त्री तथा पुरोहित अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने भरत की प्रशंसा करते हुए कहा कि भाई के प्रति ऐसा प्रेम और समर्पण वास्तव में बहुत महान है। भरत सदैव श्रीराम के दर्शन के लिए व्याकुल रहते थे और उनके हित के बारे में ही सोचते थे। उनका जीवन स्वार्थ से नहीं, बल्कि प्रेम, धर्म और कर्तव्य से प्रेरित था। इसलिए उनके विचारों का समर्थन न करना किसी के लिए भी कठिन था।
गुरुजनों के स्नेहपूर्ण और उत्साह बढ़ाने वाले शब्द सुनकर भरत ने सारथि को आदेश दिया कि उनका रथ तैयार किया जाए। इसके बाद वे अपनी सभी माताओं के पास गए। उनके सामने विनम्रतापूर्वक अपनी यात्रा की अनुमति माँगी। माताओं से विदा लेते समय वातावरण भावुक हो उठा होगा—एक ओर पुत्र के जाने का दुःख था और दूसरी ओर भरत के मन में श्रीराम से मिलने की तीव्र आकांक्षा।
आज्ञा प्राप्त करके भरत अपने छोटे भाई शत्रुघ्न के साथ रथ पर सवार हुए। दोनों भाइयों के मन में श्रीराम के प्रति अपार प्रेम था। उनके साथ मन्त्री और पुरोहित भी चल पड़े। आगे-आगे गुरु वसिष्ठ तथा अन्य गुरुजन और ब्राह्मण चल रहे थे। सभी लोग अयोध्या से पूर्व दिशा की ओर बढ़ते हुए उस मार्ग पर चल पड़े, जो नन्दिग्राम की ओर जाता था।
भरत के प्रस्थान का समाचार और उनकी यात्रा का उद्देश्य सुनकर अयोध्या की सेना भी उनके पीछे चल पड़ी। हाथी, घोड़े और रथों से सजी विशाल सेना बिना किसी विशेष आदेश के ही उनके साथ हो गई। नगर के अनेक लोग भी भरत के पीछे चल पड़े। ऐसा लग रहा था मानो पूरी अयोध्या अपने प्रिय राजकुमार के साथ नन्दिग्राम जा रही हो।
लेकिन इस विशाल यात्रा के बीच भरत के मन में किसी विजय या राज्य प्राप्ति का उत्साह नहीं था। उनके हृदय में केवल श्रीराम की स्मृति थी। वे अपने मस्तक पर श्रीराम की पवित्र चरणपादुकाएँ धारण किए हुए थे। यही चरणपादुकाएँ उनके लिए श्रीराम की जीवित उपस्थिति का प्रतीक थीं। वे उन्हें अत्यंत श्रद्धा और प्रेम से लेकर नन्दिग्राम की ओर तेजी से बढ़ रहे थे।
नन्दिग्राम पहुँचते ही भरत तुरंत रथ से उतर पड़े। उन्होंने गुरुजनों के सामने अत्यंत विनम्रता से कहा कि श्रीराम ने यह राज्य उन्हें केवल धरोहर के रूप में सौंपा है। वे स्वयं इस राज्य के स्वामी नहीं हैं। उनके लिए श्रीराम की सुवर्ण से विभूषित चरणपादुकाएँ ही राज्य की वास्तविक स्वामिनी हैं। उन्हीं के माध्यम से राज्य के सभी लोगों का कल्याण और पालन-पोषण होगा।
भरत ने सिर झुकाकर उन चरणपादुकाओं को अत्यंत श्रद्धा के साथ उस धरोहररूपी राज्य को समर्पित किया। उनके हृदय में श्रीराम के प्रति इतना गहरा सम्मान था कि वे उन पादुकाओं को केवल जूते नहीं, बल्कि श्रीराम के साक्षात् चरण मानते थे। इसके बाद उन्होंने वहाँ उपस्थित मन्त्रियों, सेनापतियों और प्रजा से कहा कि इन पवित्र चरणपादुकाओं के ऊपर राजकीय छत्र धारण किया जाए।
भरत का विश्वास था कि श्रीराम की चरणपादुकाओं के माध्यम से ही राज्य में धर्म की स्थापना होगी। उन्होंने कहा कि श्रीराम ने प्रेमपूर्वक यह राज्य उनके पास धरोहर के रूप में रखा है। इसलिए उनका कर्तव्य है कि श्रीराम के लौटने तक वे इस राज्य की पूरी निष्ठा से रक्षा करें।
भरत के मन में एक सुंदर और पवित्र संकल्प था। उन्होंने सोचा कि जिस दिन श्रीराम वनवास पूरा करके लौटेंगे, उसी दिन वे इन चरणपादुकाओं को फिर से श्रीराम के चरणों में पहुँचा देंगे। वे स्वयं उन चरणों का दर्शन करेंगे, जिन्हें देखने के लिए उनका हृदय इतने दिनों से व्याकुल था।
भरत को राज्य अपने पास रखना ही नहीं था। वे तो श्रीराम के लौटते ही पूरा राज्य उनके चरणों में समर्पित कर देना चाहते थे। उन्होंने मन ही मन निश्चय किया कि श्रीराम के आते ही वे उनसे मिलेंगे, उनका स्वागत करेंगे और राज्य उन्हें सौंपकर स्वयं उनकी आज्ञा का पालन करते हुए उनकी सेवा में लग जाएँगे। उन्हें ऐसा लगता था कि राज्य का भारी उत्तरदायित्व उनके कंधों से उतर जाएगा और उनका मन हल्का हो जाएगा।
भरत के लिए अयोध्या का राज्य, स्वयं अयोध्या और श्रीराम की चरणपादुकाएँ—सब कुछ श्रीराम की ही धरोहर था। वे इन सबको श्रीराम की सेवा में समर्पित करके अपने मन को पाप और दुःख से मुक्त करना चाहते थे। उनके मन में राज्य पाने की कोई इच्छा नहीं थी। उलटे, श्रीराम के राज्याभिषेक की कल्पना मात्र से उन्हें अपार प्रसन्नता होती थी।
भरत ने सोचा कि जिस दिन श्रीराम अयोध्या के सिंहासन पर बैठेंगे और पूरी प्रजा आनंद से भर जाएगी, उस दिन उन्हें राज्य पाने से भी कहीं अधिक खुशी मिलेगी। उन्हें ऐसा लगेगा कि उन्होंने संसार का सबसे बड़ा सुख प्राप्त कर लिया है। श्रीराम का यश बढ़ना ही उनके लिए अपना यश था और श्रीराम की प्रसन्नता ही उनकी सबसे बड़ी प्रसन्नता थी।
इस प्रकार श्रीराम के वियोग में दुःखी भरत नन्दिग्राम में रहने लगे। वे राजमहल के सुखों से दूर हो गए। उन्होंने राजसी वस्त्र और सुविधाएँ त्याग दीं तथा वल्कल वस्त्र धारण करके और जटाएँ रखकर मुनि के समान जीवन बिताने का निश्चय किया। उनके पास राज्य था, सेना थी और राजकीय अधिकार थे, फिर भी उनका जीवन किसी तपस्वी जैसा सरल और त्यागपूर्ण था।
भरत का एक ही लक्ष्य था—श्रीराम की आज्ञा का पालन करना और उनकी प्रतीक्षा करना। उन्होंने श्रीराम की चरणपादुकाओं को राज्य के सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर दिया और स्वयं उनके सेवक के रूप में रहने लगे। उनके मन में हर क्षण यही आशा रहती थी कि कब श्रीराम वनवास पूरा करके वापस आएँगे और कब उन्हें अपने प्रिय भाई के दर्शन होंगे।
राज्य का कोई भी कार्य भरत अपने नाम से नहीं करते थे। वे प्रत्येक कार्य पहले श्रीराम की चरणपादुकाओं को समर्पित करते और फिर उसी के अनुसार निर्णय लेते। राजकीय सम्मान भी उन्हीं पादुकाओं को दिया जाता। भरत स्वयं उनके ऊपर छत्र लगाते और चँवर डुलाते थे। इससे स्पष्ट होता है कि उनके लिए श्रीराम ही राजा थे और वे स्वयं केवल उनके प्रतिनिधि तथा सेवक थे।
जब भी राज्य में कोई नया कार्य सामने आता या कोई बहुमूल्य उपहार आता, भरत उसे पहले श्रीराम की चरणपादुकाओं के सामने प्रस्तुत करते। उसके बाद ही वे उसका उचित प्रबन्ध करते। इस प्रकार नन्दिग्राम में रहते हुए भरत ने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण श्रीराम को समर्पित कर दिया।
भरत के पास राजसत्ता थी, लेकिन उनके मन में उसका अहंकार नहीं था। उनके पास वैभव था, लेकिन उन्होंने उसका सुख नहीं लिया। उनके पास सिंहासन था, लेकिन वे स्वयं सिंहासन पर नहीं बैठे। उनके लिए श्रीराम का प्रेम ही सबसे बड़ा धन था और श्रीराम की आज्ञा ही सबसे बड़ा धर्म।
नन्दिग्राम का यह जीवन भरत के त्याग, भाई-प्रेम, कर्तव्यनिष्ठा और विनम्रता का अद्भुत उदाहरण बन गया। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि सच्चा प्रेम अधिकार माँगता नहीं, बल्कि प्रिय व्यक्ति के अधिकार की रक्षा करता है। भरत ने राज्य को अपना अधिकार न मानकर श्रीराम की धरोहर माना और तब तक उसकी रक्षा की, जब तक उसके वास्तविक स्वामी श्रीराम लौटकर नहीं आ गए।
प्रश्न–उत्तर
प्रश्न 1. भरत ने नन्दिग्राम जाने का निश्चय क्यों किया?
उत्तर: भरत श्रीराम के बिना अयोध्या में रहना नहीं चाहते थे। वे नन्दिग्राम जाकर श्रीराम की प्रतीक्षा करते हुए उनके राज्य की रक्षा करना चाहते थे।
प्रश्न 2. भरत अयोध्या के वास्तविक राजा किसे मानते थे?
उत्तर: भरत श्रीराम को अयोध्या का वास्तविक राजा मानते थे। वे स्वयं को केवल उनके सेवक और राज्य की धरोहर के रक्षक के रूप में देखते थे।
प्रश्न 3. गुरु वसिष्ठ ने भरत के विचारों की प्रशंसा क्यों की?
उत्तर: गुरु वसिष्ठ ने भरत की भ्रातृभक्ति, श्रीराम के प्रति प्रेम, हितसाधन और धर्म के श्रेष्ठ मार्ग पर चलने के कारण उनके विचारों की प्रशंसा की।
प्रश्न 4. भरत नन्दिग्राम जाते समय अपने साथ क्या लेकर गए?
उत्तर: भरत अपने मस्तक पर श्रीराम की पवित्र चरणपादुकाएँ रखकर नन्दिग्राम गए। उनके लिए ये पादुकाएँ श्रीराम के साक्षात् चरणों के समान थीं।
प्रश्न 5. भरत ने श्रीराम की चरणपादुकाओं को राज्य की धरोहर क्यों माना?
उत्तर: भरत जानते थे कि राज्य के वास्तविक स्वामी श्रीराम हैं। इसलिए उन्होंने चरणपादुकाओं को श्रीराम की ओर से मिली धरोहर मानकर राज्य उन्हें समर्पित किया।
प्रश्न 6. भरत ने चरणपादुकाओं के विषय में प्रजा से क्या कहा?
उत्तर: भरत ने प्रजा से कहा कि चरणपादुकाओं को श्रीराम के साक्षात् चरण मानकर उनका सम्मान करें। उन्हीं के माध्यम से राज्य में धर्म स्थापित होगा।
प्रश्न 7. भरत ने श्रीराम के लौटने तक क्या करने का निश्चय किया?
उत्तर: भरत ने निश्चय किया कि श्रीराम के लौटने तक वे उनकी धरोहररूपी राज्य की पूरी निष्ठा से रक्षा करेंगे और उनके आदेश का पालन करेंगे।
प्रश्न 8. श्रीराम के लौटने पर भरत क्या करना चाहते थे?
उत्तर: श्रीराम के लौटने पर भरत उन्हें राज्य सौंपना चाहते थे। वे उनकी आज्ञा मानकर उनकी सेवा में लगना और राजकीय भार से मुक्त होना चाहते थे।
प्रश्न 9. भरत को श्रीराम के राज्याभिषेक से कैसी प्रसन्नता मिलने वाली थी?
उत्तर: भरत को श्रीराम का राज्याभिषेक देखकर राज्य प्राप्त करने से भी अधिक प्रसन्नता होती। श्रीराम का यश और सुख ही उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार था।
प्रश्न 10. नन्दिग्राम में भरत ने किस प्रकार का जीवन बिताया?
उत्तर: भरत ने नन्दिग्राम में राजसी सुखों का त्याग कर वल्कल और जटाएँ धारण कीं। वे मुनिवेष में रहकर श्रीराम की प्रतीक्षा करते रहे।
प्रश्न 11. भरत राज्य का शासन किस प्रकार चलाते थे?
उत्तर: भरत राज्य का प्रत्येक कार्य पहले श्रीराम की चरणपादुकाओं को समर्पित करते थे। इसके बाद मन्त्रियों की सहायता से उसका उचित प्रबन्ध करते थे।
प्रश्न 12. भरत स्वयं चरणपादुकाओं की सेवा किस प्रकार करते थे?
उत्तर: भरत श्रीराम की चरणपादुकाओं को सिंहासन पर प्रतिष्ठित करके उनके ऊपर स्वयं छत्र लगाते और चँवर डुलाते हुए उनकी सेवा करते थे।
प्रश्न 13. भरत के चरित्र की कौन-कौन सी विशेषताएँ इस प्रसंग से प्रकट होती हैं?
उत्तर: इस प्रसंग से भरत की अद्भुत भ्रातृभक्ति, त्याग, विनम्रता, कर्तव्यनिष्ठा, धर्मपरायणता और निःस्वार्थ प्रेम जैसी महान विशेषताएँ प्रकट होती हैं।
प्रश्न 14. भरत के पीछे सेना और अयोध्यावासी क्यों चल पड़े?
उत्तर: भरत के नन्दिग्राम प्रस्थान के समय हाथी, घोड़े और रथों से युक्त सेना तथा अयोध्यावासी भी उनके प्रति प्रेम और सम्मान के कारण साथ चल पड़े।
प्रश्न 15. भरत के लिए श्रीराम की चरणपादुकाएँ क्या महत्व रखती थीं?
उत्तर: भरत के लिए श्रीराम की चरणपादुकाएँ उनके प्रिय भाई के साक्षात् चरणों का प्रतीक थीं। वे उन्हें राजा मानकर प्रत्येक राजकीय कार्य उन्हीं को समर्पित करते थे।