Best Historical and Knowledgeable Content here... Know More.

  • +91 8005792734

    Contact Us

  • amita2903.aa@gmail.com

    Support Email

  • Jhunjhunu, Rajasthan

    Address

लक्ष्मण का क्रोध और श्रीराम की धर्ममयी सीख

(97)

🌿लक्ष्मण का क्रोध और श्रीराम की धर्ममयी सीख

चित्रकूट के शांत और सुंदर वन में उस समय वातावरण अचानक बदल गया था। दूर से भरत की विशाल सेना के आने की आहट सुनकर लक्ष्मण के मन में अनेक प्रकार की आशंकाएँ उठने लगी थीं। उन्हें लगा कि भरत शायद श्रीराम को वापस ले जाने या उनसे राज्य के लिए संघर्ष करने नहीं, बल्कि कोई दूसरा उद्देश्य लेकर आए हैं। क्रोध और चिंता के कारण लक्ष्मण का विवेक जैसे ढक गया था। वे अत्यन्त उत्तेजित होकर युद्ध के लिए तैयार होने लगे।

श्रीराम ने जब अपने प्रिय छोटे भाई लक्ष्मण को इस प्रकार क्रोध में देखा, तो उन्हें बहुत दुःख हुआ। उन्होंने बड़े प्रेम और शान्त भाव से लक्ष्मण को समझाना शुरू किया।

श्रीराम बोले, “लक्ष्मण! भरत स्वयं यहाँ आ गए हैं। वे अत्यन्त शक्तिशाली और उत्साही हैं, लेकिन वे हमारे अपने भाई हैं। जब वे हमसे मिलने स्वयं यहाँ आए हैं, तब हमें धनुष, तलवार या ढाल उठाने की क्या आवश्यकता है?”

श्रीराम की वाणी में न क्रोध था, न शिकायत—केवल प्रेम और धैर्य था। वे लक्ष्मण को समझाना चाहते थे कि अपने ही भाई के विरुद्ध युद्ध करने का विचार भी उचित नहीं है।

फिर श्रीराम ने गंभीर होकर कहा, “लक्ष्मण! मैंने पिता के सत्य की रक्षा करने की प्रतिज्ञा की है। यदि मैं उसी प्रतिज्ञा को भूलकर भरत से युद्ध करूँ, उन्हें मार दूँ और उनका राज्य छीन लूँ, तो संसार मेरे बारे में क्या कहेगा? ऐसी बदनामी से प्राप्त राज्य का मैं क्या करूँगा?”

उनके मन में राज्य का कोई लोभ नहीं था। उनके लिए पिता का वचन और धर्म सबसे बड़ा था।

उन्होंने आगे कहा, “अपने ही भाई-बन्धुओं या मित्रों का विनाश करके जो धन या राज्य प्राप्त हो, वह मेरे लिए विष मिले हुए भोजन के समान है। जिस प्रकार कोई बुद्धिमान व्यक्ति विष मिला भोजन नहीं खाता, उसी प्रकार मैं भी अपने प्रियजनों को दुख देकर प्राप्त होने वाले राज्य को कभी स्वीकार नहीं करूँगा।”

श्रीराम के इन शब्दों में उनके हृदय की विशालता दिखाई दे रही थी। वे राज्य से अधिक अपने परिवार के प्रेम को महत्व देते थे।

उन्होंने लक्ष्मण से कहा, “मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि धर्म, अर्थ, काम और पूरी पृथ्वी का राज्य भी मैं अपने लिए नहीं, बल्कि तुम भाइयों के सुख और कल्याण के लिए चाहता हूँ।”

फिर उन्होंने अपने धनुष को छूकर मानो अपने कथन की शपथ लेते हुए कहा, “मैं राज्य इसलिए चाहता हूँ कि मेरे भाई सुखी रहें। मेरे लिए भाइयों का साथ और उनका सुख ही सबसे बड़ा धन है।”

श्रीराम ने लक्ष्मण को यह भी समझाया कि समुद्र से घिरी हुई पूरी पृथ्वी का राज्य प्राप्त करना उनके लिए असंभव नहीं है। लेकिन यदि वह राज्य अधर्म के रास्ते से मिले, तो वे उसे स्वीकार नहीं करेंगे। वे तो अधर्म से प्राप्त होने वाले इन्द्र के पद को भी स्वीकार करना उचित नहीं समझते।

इसके बाद श्रीराम की वाणी और भी भावुक हो गई। उन्होंने कहा, “लक्ष्मण! यदि भरत, तुम और शत्रुघ्न मेरे साथ न हों, तो ऐसा कौन-सा सुख है जिसे मैं सुख मानूँ? तुम सबके बिना मिलने वाला सुख मेरे लिए कोई अर्थ नहीं रखता।”

उनकी आँखों में अपने भाइयों के प्रति गहरा प्रेम था। उन्होंने लक्ष्मण को बताया कि भरत उनके लिए केवल छोटे भाई नहीं, बल्कि अत्यन्त प्रिय हैं—इतने प्रिय कि उन्हें अपने प्राणों से भी बढ़कर मानते हैं।

श्रीराम ने भरत के आने का कारण भी प्रेमपूर्वक समझाया। उन्होंने कहा, “मुझे विश्वास है कि जब भरत अयोध्या पहुँचे होंगे और उन्होंने सुना होगा कि मैं तुम्हारे और जानकी के साथ जटा और वल्कल धारण करके वन में चला आया हूँ, तो उनका हृदय दुःख से भर गया होगा। वे अपने कुल के धर्म और भाई के प्रति अपने प्रेम को याद करके हमसे मिलने चले आए होंगे। उनके आने का इससे अच्छा और कोई कारण मैं नहीं समझ सकता।”

श्रीराम को विश्वास था कि भरत के मन में उनके प्रति कोई बुराई नहीं हो सकती।

उन्होंने आगे कहा, “भरत माता कैकेयी से भी नाराज़ होंगे। वे उन्हें कठोर बातें कहकर और पिता को प्रसन्न करके मेरे पास आए होंगे। उनका उद्देश्य मुझे राज्य सौंपना ही होगा।”

श्रीराम के मन में भरत के प्रति इतना विश्वास था कि वे उनकी नीयत पर जरा भी संदेह नहीं कर रहे थे।

उन्होंने लक्ष्मण से पूछा, “भरत ने आखिर तुम्हारे साथ ऐसा कौन-सा बुरा व्यवहार किया है कि आज तुम्हें उनसे इतना भय लग रहा है? उन्होंने कब तुम्हारे साथ ऐसा कुछ किया है जिससे तुम्हें उनके बारे में ऐसी आशंका करनी पड़े?”

फिर श्रीराम ने लक्ष्मण को बहुत स्पष्ट चेतावनी दी, लेकिन उसमें भी भाई के प्रति प्रेम था। उन्होंने कहा, “जब भरत हमारे पास आएँ तो उनसे कोई कठोर या अप्रिय बात मत कहना। यदि तुमने उनसे कोई प्रतिकूल बात कही, तो मुझे ऐसा लगेगा जैसे वह बात तुमने मुझसे ही कही है।”

श्रीराम अपने भाइयों के बीच किसी प्रकार का कटुता या विवाद नहीं चाहते थे।

उन्होंने आगे कहा, “लक्ष्मण! संसार में कितनी ही बड़ी विपत्ति क्यों न आ जाए, कोई पुत्र अपने पिता की हत्या कैसे कर सकता है? और कोई भाई अपने प्राणों के समान प्रिय भाई को कैसे मार सकता है?”

यह कहते हुए श्रीराम ने लक्ष्मण के मन में उठ रहे युद्ध के विचार को पूरी तरह शांत करने का प्रयास किया।

फिर उन्होंने थोड़ा मुस्कुराते हुए कहा, “यदि तुम्हें लगता है कि यह सब राज्य के लिए हो रहा है, तो मैं भरत से कह दूँगा कि वे अपना राज्य तुम्हें दे दें।”

श्रीराम को पूरा विश्वास था कि भरत उनके किसी भी आदेश को प्रेमपूर्वक स्वीकार करेंगे। उन्होंने कहा, “मैं यदि भरत से कहूँगा कि वे राज्य लक्ष्मण को दे दें, तो वे बिना किसी विरोध के मेरी बात मान लेंगे।”

श्रीराम के इन प्रेमपूर्ण और धर्मयुक्त शब्दों का लक्ष्मण पर गहरा प्रभाव पड़ा। उन्हें अपनी भूल का अनुभव होने लगा। उनका क्रोध समाप्त हो गया और वे अत्यन्त लज्जित हो गए। ऐसा लग रहा था मानो वे अपनी ही लज्जा में सिकुड़कर रह गए हों। उन्हें समझ आ गया कि उन्होंने अपने प्रिय भाई भरत के बारे में बिना किसी प्रमाण के गलत आशंका कर ली थी।

लज्जा से भरे लक्ष्मण ने श्रीराम से कहा, “भैया! अब मुझे लगता है कि जो सेना दिखाई दे रही है, उसमें हमारे पिता महाराज दशरथ स्वयं ही आपसे मिलने आए होंगे।”

श्रीराम ने भी लक्ष्मण की बात को स्वीकार करते हुए कहा, “हाँ, मुझे भी ऐसा ही लगता है। संभव है कि हमारे महाबली पिता ही हमसे मिलने आए हों।”

श्रीराम के मन में एक और आशा जागी। उन्होंने सोचा कि शायद पिता उन्हें वनवास के कष्ट में देखकर अब वापस अयोध्या ले जाने के लिए आए हों।

उन्होंने कहा, “हो सकता है कि पिताजी ने यह सोचकर कि हम अभी सुख और राजसी जीवन जीने के योग्य हैं, वनवास के कष्ट को देखकर अपना निर्णय बदल दिया हो और वे हम दोनों को वापस घर ले जाने आए हों।”

श्रीराम को यह विचार सुखद लगा। उन्हें लगा कि शायद पिता सीता को भी वन से अपने साथ लेकर अयोध्या लौटेंगे। उन्होंने प्रेम से कहा कि उनके पिता रघुकुल के गौरव महाराज दशरथ, वन में उनके साथ कष्ट सह रही सीता को भी देखकर उन्हें अपने साथ घर वापस ले जाएँगे।

इसी बीच श्रीराम की दृष्टि दूर दिखाई दे रहे घोड़ों पर पड़ी। उन्होंने लक्ष्मण को बताया कि वे वही तेजस्वी और सुंदर घोड़े हैं जो अच्छे घोड़ों के श्रेष्ठ वंश से उत्पन्न हुए हैं। उनकी गति वायु के समान तेज है और वे राजकीय सेना के योग्य हैं।

फिर श्रीराम की दृष्टि एक विशाल हाथी पर पड़ी। उन्होंने पहचान लिया कि वह शत्रुंजय नामक वृद्ध गजराज है, जो महाराज दशरथ की सवारी में रहता था। वह सेना के आगे-आगे अपनी विशाल देह के साथ धीरे-धीरे झूमता हुआ चल रहा था।

लेकिन तभी श्रीराम की दृष्टि एक ऐसी चीज खोजने लगी जिससे उनके मन का संशय दूर हो सके। उन्होंने कहा, “लक्ष्मण! यह तो वही हाथी है, लेकिन इसके ऊपर पिताजी का प्रसिद्ध दिव्य सफेद छत्र दिखाई नहीं दे रहा। इससे मेरे मन में फिर शंका उत्पन्न हो रही है।”

अब श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा, “लक्ष्मण! अब मेरी बात मानो। पेड़ से नीचे उतर आओ।”

श्रीराम के आदेश को सुनकर लक्ष्मण का क्रोध पूरी तरह शांत हो चुका था। वे तुरंत शाल वृक्ष से नीचे उतर आए और हाथ जोड़कर श्रीराम के सामने विनम्रता से खड़े हो गए।

उधर दूसरी ओर भरत भी अत्यन्त सावधानी और प्रेम के साथ आगे बढ़ रहे थे। उन्होंने अपनी सेना को आदेश दिया कि कोई भी सैनिक ऐसी कोई हरकत न करे जिससे श्रीराम या उनके साथ रहने वाले तपस्वियों को किसी प्रकार की परेशानी हो।

भरत का उद्देश्य युद्ध करना नहीं था। वे अपने प्रिय बड़े भाई श्रीराम से मिलने आए थे। इसलिए उन्होंने सेना को पर्वत के नीचे ही रुकने का आदेश दिया।

उनकी विशाल सेना में असंख्य हाथी, घोड़े और मनुष्य थे। पूरी सेना चित्रकूट पर्वत के आसपास लगभग डेढ़ योजन अर्थात् छह कोस तक के क्षेत्र में फैलकर ठहर गई। दूर-दूर तक सेना के शिविर दिखाई दे रहे थे और चित्रकूट का शांत वन अचानक इतने लोगों की उपस्थिति से भर उठा था।

लेकिन इस विशाल सेना की भव्यता के पीछे भरत के हृदय में कोई अहंकार नहीं था। वे जानते थे कि वे रघुकुल के बड़े भाई श्रीराम से मिलने जा रहे हैं। इसलिए उन्होंने अपने गर्व को त्याग दिया था और धर्म को सबसे आगे रखा था।

भरत अपने साथ इतनी बड़ी सेना इसलिए लाए थे कि वे श्रीराम को सम्मानपूर्वक वापस अयोध्या ले जाने का प्रयास कर सकें और उन्हें प्रसन्न कर सकें। उनके हृदय में भाई के प्रति अपार प्रेम था।

इस प्रकार चित्रकूट में एक ओर श्रीराम अपने छोटे भाई लक्ष्मण को प्रेम और धर्म का पाठ समझाकर उनके क्रोध को शांत कर रहे थे, तो दूसरी ओर भरत अपनी विशाल सेना के साथ अहंकाररहित होकर अपने प्रिय बड़े भाई के दर्शन की प्रतीक्षा कर रहे थे। वातावरण में एक ओर मिलन की उत्कंठा थी और दूसरी ओर आने वाले भावुक भाई-भाई के मिलन की आहट।

 

प्रश्न–उत्तर

प्रश्न 1. लक्ष्मण भरत के आने पर क्रोधित क्यों हो गए थे?
उत्तर: भरत की विशाल सेना को देखकर लक्ष्मण को आशंका हुई कि वे श्रीराम से युद्ध करने या उनका राज्य लेने आए हैं।

प्रश्न 2. श्रीराम ने लक्ष्मण को युद्ध के लिए तैयार होने से क्यों रोका?
उत्तर: श्रीराम ने समझाया कि भरत उनके भाई हैं और स्वयं मिलने आए हैं, इसलिए उनके विरुद्ध धनुष-तलवार उठाना अनुचित होगा।

प्रश्न 3. श्रीराम ने अपने बन्धु-बान्धवों को मारकर प्राप्त धन की तुलना किससे की?
उत्तर: श्रीराम ने अपने बन्धु-बान्धवों को मारकर प्राप्त धन की तुलना विष मिले भोजन से की, जिसे बुद्धिमान व्यक्ति कभी स्वीकार नहीं करता।

प्रश्न 4. श्रीराम राज्य किसके लिए चाहते थे?
उत्तर: श्रीराम धर्म, अर्थ, काम और पृथ्वी का राज्य अपने भाइयों के सुख, कल्याण और समृद्धि के लिए चाहते थे।

प्रश्न 5. श्रीराम ने भरत को अपने लिए कितना प्रिय बताया?
उत्तर: श्रीराम ने भरत को अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय बताया और उनके आगमन को प्रेम तथा कुलधर्म से प्रेरित माना।

प्रश्न 6. श्रीराम के अनुसार भरत चित्रकूट क्यों आए थे?
उत्तर: श्रीराम के अनुसार भरत वन में कष्ट सह रहे अपने भाई से मिलने और उन्हें राज्य वापस देने के उद्देश्य से आए थे।

प्रश्न 7. श्रीराम ने लक्ष्मण को भरत से कैसा व्यवहार करने को कहा?
उत्तर: श्रीराम ने लक्ष्मण को भरत से कोई कठोर या अप्रिय बात न कहने और उनके प्रति सम्मान तथा प्रेम बनाए रखने को कहा।

प्रश्न 8. श्रीराम ने पुत्र और भाई के संबंध में क्या कहा?
उत्तर: श्रीराम ने कहा कि बड़ी से बड़ी विपत्ति में भी पुत्र अपने पिता और भाई अपने प्रिय भाई की हत्या नहीं कर सकता।

प्रश्न 9. श्रीराम ने लक्ष्मण को राज्य देने की बात भरत से क्यों कही?
उत्तर: लक्ष्मण को राज्य की चिंता थी, इसलिए श्रीराम ने कहा कि वे भरत से राज्य लक्ष्मण को देने के लिए कहेंगे।

प्रश्न 10. श्रीराम की बातें सुनकर लक्ष्मण की क्या अवस्था हुई?
उत्तर: श्रीराम की धर्मपूर्ण बातें सुनकर लक्ष्मण को अपनी भूल का अनुभव हुआ और वे लज्जित होकर चुप हो गए।

प्रश्न 11. बाद में लक्ष्मण ने सेना को देखकर क्या अनुमान लगाया?
उत्तर: लक्ष्मण ने अनुमान लगाया कि शायद महाराज दशरथ स्वयं श्रीराम और उनसे मिलने के लिए उस सेना के साथ आए हैं।

प्रश्न 12. श्रीराम को सेना देखकर पिता के आने की आशा क्यों हुई?
उत्तर: सेना में पिता के परिचित घोड़े और शत्रुंजय नामक गजराज को देखकर श्रीराम को लगा कि महाराज दशरथ आए होंगे।

प्रश्न 13. श्रीराम को किस बात से संशय हुआ?
उत्तर: श्रीराम ने शत्रुंजय गजराज को तो पहचान लिया, लेकिन उसके ऊपर महाराज दशरथ का प्रसिद्ध दिव्य श्वेतछत्र दिखाई नहीं दिया।

प्रश्न 14. श्रीराम ने लक्ष्मण को अंत में क्या आदेश दिया?
उत्तर: श्रीराम ने लक्ष्मण को शाल वृक्ष से नीचे उतरकर उनके पास आने और उनकी बात मानने का आदेश दिया।

प्रश्न 15. भरत ने अपनी सेना को क्या आदेश दिया?
उत्तर: भरत ने सैनिकों को आदेश दिया कि वे किसी को बाधा न पहुँचाएँ और पर्वत के चारों ओर नीचे ही ठहरकर शांत रहें।

प्रश्न 16. भरत की सेना चित्रकूट के आसपास कैसी दिखाई दे रही थी?
उत्तर: हाथियों, घोड़ों और मनुष्यों से भरी विशाल सेना चित्रकूट के आसपास लगभग डेढ़ योजन भूमि में पड़ाव डाले अत्यन्त भव्य लग रही थी।

प्रश्न 17. भरत अपनी विशाल सेना लेकर भी अहंकाररहित क्यों थे?
उत्तर: भरत का उद्देश्य युद्ध नहीं था। वे धर्म को सर्वोपरि रखकर श्रीराम को प्रसन्न करने और उनसे प्रेमपूर्वक मिलने आए थे।