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(23)
लक्ष्मण का ज्वालामुखी क्रोध और श्रीराम की अटल धर्मनिष्ठा
अयोध्या का राजमहल उस समय गहन विषाद में डूबा हुआ था। कुछ ही क्षण पहले तक जहाँ उत्सव की तैयारी थी, वहीं अब हर दिशा में मौन, पीड़ा और असमंजस छा गया था। दीपों से सजी हुई गलियाँ जैसे बुझ-सी गयी थीं। राजभवन के भीतर उपस्थित सेवक, मंत्री और रानियाँ भी भय और दुःख से काँप रहे थे।
जब श्रीराम ने शांत स्वर में यह कहा कि वे पिता की आज्ञा का पालन करते हुए वन को प्रस्थान करेंगे, तब उनके समीप खड़े लक्ष्मण के हृदय में मानो तूफान उठ खड़ा हुआ। वे सिर झुकाकर कुछ देर तक मौन रहे। उनके भीतर दो भाव एक साथ संघर्ष कर रहे थे—एक ओर भाई के राज्याभिषेक में बाधा आने का तीव्र दुःख, और दूसरी ओर श्रीराम की अद्भुत धर्मनिष्ठा को देखकर उत्पन्न सम्मान और गर्व।
कुछ ही क्षणों में उनका मौन भयंकर क्रोध में बदल गया। उनकी भौंहें तन गयीं। उन्होंने लंबी और उग्र साँस ली। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो किसी पर्वत की गुफा में बैठा हुआ एक महान सर्प क्रोध से फुँकार भर रहा हो। उनका मुख क्रोधित सिंह के समान भयानक और तेजस्वी दिखाई देने लगा। उनकी आँखों में अग्नि दहक रही थी। वे बार-बार अपनी गर्दन घुमाते, दाहिने हाथ को हिलाते और टेढ़ी दृष्टि से श्रीराम की ओर देखते रहे।
अंततः उनका धैर्य टूट गया।
वे वेदना और क्रोध से काँपते स्वर में बोले—
“भैया! आप क्यों इस प्रकार दैव और धर्म का नाम लेकर अपने अधिकार का त्याग कर रहे हैं? आप यह सोच रहे हैं कि यदि पिता की आज्ञा का पालन नहीं किया गया तो धर्म नष्ट हो जाएगा, लोग अनुशासनहीन हो जाएँगे और संसार में अधर्म फैल जाएगा। परन्तु यह विचार उचित नहीं है। यह तो केवल भ्रम है।”
लक्ष्मण की आवाज़ अब और कठोर हो गयी।
“आप जैसे पराक्रमी क्षत्रिय के मुख से दैव की इतनी प्रशंसा शोभा नहीं देती। दैव का सहारा तो वे लोग लेते हैं जिनमें पुरुषार्थ नहीं होता। जो वीर होते हैं, वे अपने बल और साहस से परिस्थिति बदल देते हैं। संसार में आदर उन्हीं को मिलता है जो अपने कर्म से भाग्य को भी झुका दें।”
उनके नेत्र क्रोध से लाल हो उठे।
“क्या आपको उन दोनों पर संदेह नहीं होता? संसार में अनेक लोग धर्म का ढोंग करके दूसरों को ठगते हैं। कैकेयी और पिता महाराज ने भी यही किया है। यदि यह वरदान वास्तव में सत्य और धर्मपूर्ण था, तो इसका निर्णय पहले क्यों नहीं हुआ? आपके अभिषेक की सारी तैयारियाँ होने के बाद ही यह षड्यंत्र क्यों रचा गया?”
लक्ष्मण का हृदय अपने ज्येष्ठ भ्राता के अपमान को सहन नहीं कर पा रहा था।
“जब गुण, शौर्य और धर्म में आप सबसे श्रेष्ठ हैं, तब किसी और का राज्याभिषेक होना लोकविरुद्ध है। मैं इसे किसी भी प्रकार स्वीकार नहीं कर सकता। यदि इस विरोध के कारण मुझसे कोई अपराध हो, तो उसके लिए आप मुझे क्षमा करें।”
वे आगे बोले—
“जिस धर्म को मानकर आप अपने अधिकार का त्याग कर रहे हैं, मैं उसे धर्म नहीं मानता। जो धर्म अन्याय का साथ दे, जो सत्य और योग्य व्यक्ति को दुःख दे, वह धर्म नहीं—अधर्म है।”
लक्ष्मण का क्रोध अब ज्वालामुखी बन चुका था।
“आप सब कुछ करने में समर्थ होते हुए भी उस पिता की आज्ञा कैसे स्वीकार कर सकते हैं जो कैकेयी के वश में होकर अन्यायपूर्ण निर्णय दे रहे हैं? यह सब छल है। आपके राज्याभिषेक में बाधा डालने के लिए कपटपूर्वक वरदान का बहाना बनाया गया है। फिर भी आप इसे धर्म समझ रहे हैं—यही बात मेरे हृदय को सबसे अधिक पीड़ा देती है।”
उन्होंने गहरी साँस ली और बोले—
“जो लोग सदा पुत्र का अहित चाहें, वे माता-पिता कहलाने योग्य नहीं हैं। उनके मनोरथ को पूर्ण करने का विचार भी मन में लाना उचित नहीं।”
अब लक्ष्मण सीधे दैववाद पर प्रहार करने लगे।
“कायर लोग दैव का सहारा लेते हैं। वीर पुरुष कभी भाग्य की पूजा नहीं करते। जो पुरुष अपने पुरुषार्थ से दैव को पराजित कर सकता है, वह बाधा आने पर बैठ नहीं जाता।”
उनकी आँखों में चुनौती चमक उठी।
“आज संसार देखेगा कि दैव बड़ा है या पुरुषार्थ! आज यह निर्णय हो जाएगा कि भाग्य अधिक बलवान है या मनुष्य का साहस।”
वे और भी प्रचंड स्वर में बोले—
“जिन लोगों ने आज दैव के नाम पर आपका राज्याभिषेक रुकते देखा है, वे ही लोग आज मेरे पुरुषार्थ से दैव का पराभव भी देखेंगे।”
उनका शरीर क्रोध से काँप रहा था।
“जिस प्रकार मदमत्त हाथी अंकुश और बंधन तोड़ देता है, उसी प्रकार मैं भी इस दैव नामक बाधा को अपने बल से कुचल दूँगा।”
अब लक्ष्मण की वाणी में युद्ध की गर्जना थी।
“तीनों लोकों के देवता भी आपके राज्याभिषेक को नहीं रोक सकते, फिर केवल पिता की तो बात ही क्या है!”
उन्होंने कठोर प्रतिज्ञा की—
“जो लोग आपके वनवास का समर्थन कर रहे हैं, वे स्वयं वर्षों तक वन में छिपे रहने को विवश होंगे। मैं कैकेयी की उस आशा को भी भस्म कर दूँगा जिसमें वह अपने पुत्र को राजा बनते देखना चाहती है।”
लक्ष्मण अब युद्ध के लिए तैयार योद्धा की तरह बोल रहे थे।
“जो भी मेरे सामने खड़ा होगा, उसे मेरा पराक्रम ऐसा दुःख देगा कि दैव भी उसे बचा नहीं सकेगा।”
फिर उन्होंने राजधर्म की बात कही—
“राजाओं की परम्परा यह है कि वृद्धावस्था में पुत्रों को राज्य सौंपकर वे वन जाते हैं। अभी महाराज दशरथ उस अवस्था में नहीं हैं। यदि आपको भय है कि जनता विद्रोह करेगी, तो उस शंका को त्याग दीजिए। मैं आपके राज्य और प्रजा की रक्षा उसी प्रकार करूँगा जैसे समुद्र की मर्यादा को तट संभाले रखता है।”
उन्होंने गर्व से अपनी भुजाओं की ओर देखा।
“ये भुजाएँ केवल आभूषण पहनने के लिए नहीं हैं। यह धनुष केवल सजावट नहीं है। यह तलवार केवल कमर में बाँधने के लिए नहीं है और ये बाण केवल तरकश भरने के लिए नहीं बने। ये सब शत्रुओं के विनाश के लिए हैं।”
लक्ष्मण की आँखों में युद्ध की ज्वाला दहक रही थी।
“जब मैं अपनी तलवार हाथ में लेता हूँ, तब उसकी चमक बिजली के समान कौंधती है। उस समय इन्द्र भी मेरे सामने कुछ नहीं हैं।”
उन्होंने भयावह युद्ध का चित्र उपस्थित कर दिया—
“आज यदि आवश्यकता पड़ी, तो रणभूमि हाथियों, घोड़ों और योद्धाओं के कटे अंगों से भर जाएगी। रक्त से भीगी हुई पृथ्वी पर चलना कठिन हो जाएगा। मेरे बाण शत्रुओं के मर्मस्थानों को भेद देंगे।”
वे अपने धनुष को कसकर पकड़ते हुए बोले—
“जब मैं गोहचर्म के दस्ताने पहनकर युद्धभूमि में उतरूँगा, तब कोई भी योद्धा अपने पराक्रम पर गर्व नहीं कर सकेगा।”
फिर उन्होंने श्रीराम के चरणों की ओर देखकर अत्यन्त विनम्र स्वर में कहा—
“प्रभो! बताइए, आपका कौन-सा शत्रु अभी जीवित रहे? मैं आपके लिए अपने प्राण भी अर्पित कर सकता हूँ। जिस उपाय से यह पृथ्वी आपके अधिकार में आ जाए, वही करने की आज्ञा दीजिए। मैं आपका सेवक हूँ।”
इतना कहकर लक्ष्मण मौन हो गए। उनका शरीर क्रोध से काँप रहा था। आँखों में आँसू थे। हृदय में अपने भाई के लिए अथाह प्रेम और अन्याय के प्रति प्रचंड विद्रोह उमड़ रहा था।
श्रीराम ने अपने छोटे भाई की ओर प्रेम और करुणा से देखा। वे समझ रहे थे कि लक्ष्मण का क्रोध वास्तव में उनके प्रति असीम प्रेम का ही रूप है।
उन्होंने धीरे से आगे बढ़कर लक्ष्मण के आँसू पोंछे।
फिर अत्यन्त शांत, मधुर और दृढ़ स्वर में बोले—
“प्रिय लक्ष्मण, मैं जानता हूँ कि तुम जो कुछ कह रहे हो, वह प्रेम और स्नेह से प्रेरित है। परन्तु मेरे लिए माता-पिता की आज्ञा का पालन ही सर्वोच्च धर्म है। सत्पुरुष सदैव धर्म के मार्ग पर चलते हैं, चाहे उसके लिए कितना ही बड़ा त्याग क्यों न करना पड़े।”
श्रीराम का चेहरा शांत चन्द्रमा के समान उज्ज्वल था। दूसरी ओर लक्ष्मण अग्नि के समान धधक रहे थे।
उस क्षण अयोध्या के राजमहल में दो महान आदर्श साथ खड़े थे—
एक ओर अन्याय के विरुद्ध प्रचंड पुरुषार्थ, और दूसरी ओर धर्म के लिए अटल त्याग।