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लव–कुश : रामायण के प्रथम गायक और रामकथा का दिव्य उद्घोष

भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटकर धर्मपूर्वक राज्य संचालन आरम्भ करने के पश्चात्, एक महान् और दिव्य काव्य की रचना का कार्य सम्पन्न हुआ। महर्षि वाल्मीकि ने श्रीराम के सम्पूर्ण जीवनचरित्र को आधार बनाकर आर्ष रामायण महाकाव्य की रचना की।

इस महाकाव्य में—

चौबीस हजार श्लोक,

पाँच सौ सर्ग, तथा

उत्तरकाण्ड सहित सात काण्ड का समावेश किया गया।

यह ग्रंथ केवल कथा नहीं, बल्कि धर्म, त्याग, करुणा और आदर्श जीवन का शाश्वत संदेश है।

गुरुकुल में जन्म

माता सीता, महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में निवास कर रही थीं। वहीं वाल्मीकि गुरुकुल में ही माता सीता ने जुड़वा पुत्रों को जन्म दिया। ये दोनों बालक थे—लव और कुश। उनका जन्म किसी राजमहल में नहीं, बल्कि तप, साधना और वैदिक संस्कारों से युक्त गुरुकुल में हुआ। इसीलिए उनके जीवन की नींव बचपन से ही— धर्म, संयम, ब्रह्मचर्य और गुरुसेवा पर आधारित रही।

आश्रम में पालन–पोषण और शिक्षा

लव और कुश बाल्यकाल से ही वाल्मीकि आश्रम में रहे। महर्षि वाल्मीकि उनके—

पालनकर्ता भी थे

गुरु भी थे और

मार्गदर्शक भी

 

दोनों भ्राता—

वेदों के अध्ययन में निपुण

अद्भुत स्मरणशक्ति वाले

मधुर स्वर से युक्त और

मुनियों के समान आचरण वाले थे।

उनका रूप, तेज और लक्षण ऐसे थे कि वे श्रीराम के ही समान प्रतीत होते थे, मानो श्रीराम का ही प्रतिबिम्ब हों।

योग्य शिष्यों की खोज

रामायण की रचना पूर्ण होने पर महर्षि वाल्मीकि ने विचार किया— “यह महाकाव्य अत्यन्त गूढ़, रसयुक्त और भावप्रधान है। इसे ऐसा कौन गाए, जो इसके भाव, स्वर और अर्थ को शुद्ध रूप से लोक में पहुँचा सके?”

इसी समय आश्रम में निवास करने वाले उनके दो शिष्य, मुनिवेषधारी, विनयशील और तेजस्वी बालक लव और कुश उनके सामने उपस्थित थे।

वे आश्रम के नियमों का पालन करते हुए ब्रह्मचर्य, संयम और तपस्या में रत रहते थे। उनका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि वे श्रीराम के ही समान प्रतीत होते थे, मानो श्रीराम की ही प्रतिच्छाया हों।

रामायण का अध्ययन

महर्षि वाल्मीकि ने उन्हें योग्य जानकर सीता-राम के चरित्र से युक्त सम्पूर्ण रामायण का अध्ययन कराया। यह वही रामायण थी जिसे पौलस्त्यवध अथवा दशाननवध भी कहा गया है।

लव–कुश ने रामायण को—

शब्दशः कंठस्थ किया

उसके गूढ़ अर्थ को समझा और

उसे संगीत के साथ प्रस्तुत करने की विधि भी सीखी

संगीतयुक्त रामायणगान

रामायण केवल पढ़ी नहीं गई, बल्कि—

षड्ज आदि सात स्वरों

द्रुत, मध्य और विलम्बित लय तथा

वीणा के संग गाने योग्य बनाई गई।

लव–कुश गान्धर्व विद्या के ज्ञाता बन गए। उनका गान शृंगार, करुण, वीर, रौद्र, हास्य आदि सभी रसों से युक्त होता था।

आश्रम और मुनिमण्डली में गान

जब भी आश्रम में ऋषि, ब्राह्मण और साधुओं का समागम होता, लव–कुश वहीं बैठकर रामायण का गान करते। उनका गान सुनकर—

मुनियों की आँखों से आँसू बहने लगते

मन भाव-विभोर हो उठता और

रामकथा सजीव प्रतीत होती

मुनिगण कहते— “ऐसा लगता है मानो यह कथा अभी-अभी घट रही हो।”

प्रसन्न होकर मुनियों ने उन्हें—

कमण्डलु

वल्कल वस्त्र

मृगचर्म

यज्ञोपवीत

आसन

कौपीन और

अनेक आशीर्वाद प्रदान किए।

अयोध्या में रामदरबार में गान

समय के साथ लव–कुश की कीर्ति फैल गई। एक अवसर पर वे अयोध्या में रामायण का गान करते हुए पहुँचे, जहाँ भगवान श्रीराम की दृष्टि उन पर पड़ी। श्रीराम ने उन्हें आदरपूर्वक राजसभा में आमंत्रित किया।

स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान होकर उन्होंने अपने भाइयों से कहा— “ये दोनों कुमार मुनि होकर भी राजोचित लक्षणों से युक्त हैं। इनका गान अत्यन्त मधुर और अर्थपूर्ण है। तुम सब ध्यानपूर्वक इसे सुनो।”

राम के सामने रामकथा

आज्ञा पाकर लव–कुश ने वीणा के साथ रामायण का गान आरम्भ किया। उनका उच्चारण इतना शुद्ध और स्पष्ट था कि—

श्लोक सुनते ही अर्थ समझ में आ जाता

सभा में बैठे सभी लोग रोमाञ्चित हो उठते और

स्वयं श्रीराम भी कथा सुनते-सुनते तन्मय हो गए

 

भावार्थ / संदेश

यह कथा हमें सिखाती है कि—

लव–कुश वाल्मीकि गुरुकुल में जन्मे, पले–बढ़े जुड़वा पुत्र थे।

वे माता सीता की संतान और श्रीराम के जीवन की जीवंत कथा थे।

वे गुरु आश्रम में रहकर संस्कार प्राप्त करने वाले आदर्श शिष्य थे।

रामायण आश्रम परंपरा से लोक तक पहुँची।

वाल्मीकि रामायण आदिकाव्य है, जो समस्त भारतीय साहित्य की आधारशिला है।

सच्ची विद्या जन्म, स्थान या वैभव से नहीं, विनय, तप, संस्कार और गुरु कृपा से मिलती है