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वचन की विजय और अहंकार की पराजय
वन की निस्तब्ध संध्या में जब विश्वामित्र ने स्नेहिल दृष्टि से श्रीराम की ओर देखा, तब उन्होंने एक प्राचीन कथा का द्वार खोला—एक ऐसी कथा, जिसमें तेज था, तप था, सौन्दर्य था, और साथ ही था धर्म की अग्नि में तपकर निकला अटल चरित्र।
पूर्वकाल में कुश नाम के एक महातपस्वी राजा हुए। वे केवल राजसत्ता के अधिकारी नहीं थे, बल्कि ब्रह्मतेज से आलोकित थे—मानो सृष्टिकर्ता की छाया पृथ्वी पर उतर आई हो। उनके संकल्पों में ऐसी सिद्धि थी कि कोई विघ्न उन्हें छू भी न पाता। धर्म उनके श्वासों में बसता था और सत्पुरुषों का सम्मान उनके स्वभाव का अलंकार था।
विदर्भ की राजकुमारी, उच्च कुल की सौम्य और तेजस्विनी, उनकी अर्धांगिनी बनीं। समय ने उनके आँगन को चार पुत्रों के रूप में सुशोभित किया—कुशाम्ब, कुशनाभ, असूर्तरजस और वसु। चारों पुत्र अपने पिता के समान ही तेजस्वी, सत्यनिष्ठ और धर्मप्रिय थे।
एक दिन राजा कुश ने स्नेह और गंभीरता से अपने पुत्रों से कहा—“पुत्रो! क्षत्रिय का धर्म प्रजा की रक्षा है। प्रजापालन से बढ़कर कोई पुण्य नहीं।” यह केवल उपदेश नहीं था; यह पिता के हृदय का संकल्प था, जो पुत्रों की आत्मा में उतर गया।
पिता की आज्ञा को शीश पर रखकर चारों राजकुमारों ने अपने-अपने नगर बसाए। कुशाम्ब ने कौशाम्बी बसाई, कुशनाभ ने महोदय का निर्माण किया, असूर्तरजस ने धर्मारण्य को बसाया और वसु ने गिरिव्रज को अपनी राजधानी बनाया। गिरिव्रज पर्वतों से घिरी ऐसी शोभा पाती थी मानो प्रकृति स्वयं उसकी रक्षक हो। दक्षिण-पश्चिम से बहती सोन नदी वहाँ आकर सुमागधी नाम से प्रसिद्ध हुई। उसके दोनों तट सस्य-श्यामल थे—हरी फसलों की मालाएँ जैसे धरती ने स्वयं पहन ली हों।
इन्हीं राजर्षि कुशनाभ के भाग्य से एक और अद्भुत अध्याय जुड़ा। अप्सरा घृताची के गर्भ से उनके यहाँ सौ कन्याओं का जन्म हुआ—ऐसी रूपवती कि मानो सौ चन्द्रमाएँ एक साथ उतर आई हों। उनकी हँसी में वीणा की मधुरता थी, उनके नेत्रों में लज्जा और तेज का संगम।
यौवन ने जब उनके सौन्दर्य को छुआ, तो वह सौन्दर्य और भी दैदीप्यमान हो उठा। एक दिन वे सब राजकन्याएँ आभूषणों से सजी, वर्षा ऋतु की विद्युत-रेखाओं सी दमकती हुई, उद्यान में आईं। गान, वादन और नृत्य से वह उद्यान जीवंत हो उठा। वे बादलों के पीछे झलकती तारिकाओं सी लग रही थीं—दिव्य, अलभ्य, अनुपम।
उसी समय वायुदेव ने उन्हें देखा। उनके मन में आकांक्षा जागी। वे प्रकट हुए और बोले—“सुन्दरियो! मुझे स्वीकार करो। मनुष्यत्व क्षणभंगुर है। मेरे साथ आओ, अमर यौवन और देवांगना का पद पाओ।”
क्षणभर को वातावरण थम गया। पर उन कन्याओं के नेत्रों में भय नहीं, दृढ़ता थी। वे विनम्र थीं, पर दुर्बल नहीं। उन्होंने कहा—“देवश्रेष्ठ! आप सर्वज्ञ हैं, प्राणियों के हृदय में वास करते हैं। यदि हमारे मन में आपके प्रति अनुराग नहीं, तो यह प्रस्ताव क्यों? हम राजर्षि कुशनाभ की पुत्रियाँ हैं। हम अपने पिता की आज्ञा के बिना किसी को पति रूप में नहीं चुन सकतीं। पिता ही हमारे लिए परम देवता हैं।”
उनके वचनों में न अहंकार था, न कठोरता—केवल धर्म की अटल रेखा थी।
परन्तु अस्वीकार का आघात वायुदेव के अहं को सह्य न हुआ। क्रोध ने विवेक को ढक लिया। वे उनके शरीरों में प्रविष्ट हुए और उनके अंगों को मोड़ दिया। सौ रूपवती कन्याएँ क्षणभर में कुब्जा हो गईं—उनकी देह विकृत, आकृति संकुचित। सौन्दर्य जो अभी दीप की लौ-सा चमक रहा था, एक झोंके में बुझता-सा प्रतीत हुआ।
वे काँपती हुई, आँसुओं से भीगी, राजमहल लौटीं। उनके कदमों में लज्जा थी, हृदय में पीड़ा, और आँखों में अपमान का नमक।
राजा कुशनाभ ने जब अपनी प्रिय पुत्रियों को उस दशा में देखा, तो उनका हृदय तड़प उठा। वे सन्न रह गए—मानो किसी ने उनकी आत्मा पर प्रहार किया हो। भारी श्वास लेते हुए उन्होंने पूछा—“पुत्रियो! यह किस अधर्मी का कार्य है? किसने तुम्हें इस प्रकार पीड़ित किया?”
उनकी वाणी में क्रोध कम, करुणा अधिक थी। वे उत्तर सुनने को बैठे, पर भीतर ही भीतर एक पिता का हृदय रो रहा था।
यह कथा केवल रूप और विकृति की नहीं, बल्कि धर्म और संयम की है। सौ कन्याओं ने अपना यौवन खो दिया, पर अपना सत्य नहीं। उन्होंने देह की आभा गंवाई, पर आत्मा की ज्योति को अक्षुण्ण रखा। और यही वह क्षण था, जब संसार ने जाना—वचन पर अडिग रहने वाला ही वास्तव में सुन्दर होता है।