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वनगमन का आग्रह — सीता की अटूट निष्ठा और प्रेम का महासंकल्प

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वनगमन का आग्रह — सीता की अटूट निष्ठा और प्रेम का महासंकल्प


अयोध्या के राजमहल में उस समय एक ऐसा क्षण उपस्थित था, जिसने प्रेम, त्याग और पतिव्रत धर्म की मर्यादा को सदा-सदा के लिए अमर कर दिया। श्रीराम वनवास जाने का निश्चय कर चुके थे। उन्होंने मन में यह ठान लिया था कि वे अकेले ही वन को जाएंगे, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि उनकी प्रिय सीता वन के कठोर दुःख सहें।

जब श्रीराम ने अत्यन्त शांत स्वर में वन के भयानक कष्टों का वर्णन किया—घने अंधकारमय जंगल, हिंसक पशु, काँटों से भरे मार्ग, वर्षा की कठोरता, तपती धूप और भूख-प्यास का दुःख—तब वे भीतर ही भीतर टूट रहे थे। उनके प्रत्येक शब्द में सीता के प्रति अथाह प्रेम और चिंता छिपी थी। वे चाहते थे कि उनकी प्रिय पत्नी राजमहल में सुरक्षित रहें।

परंतु जैसे ही सीता ने यह सब सुना, उनका हृदय वेदना से भर उठा। उनके नेत्रों से अश्रुओं की धारा बहने लगी। वे कुछ क्षण मौन रहीं, मानो अपने भीतर उमड़ते भावों को सँभाल रही हों। फिर धीरे-धीरे काँपते स्वर में बोलीं—

“प्राणनाथ! आप जिन बातों को वन का दुःख कह रहे हैं, वे सब आपके साथ रहने पर मेरे लिए सुख बन जाएँगी। आपके प्रेम का साथ हो तो काँटे भी फूल जैसे लगेंगे। जिस स्थान पर आप हैं, वही मेरे लिए स्वर्ग है।”

सीता का स्वर अब दृढ़ हो चुका था। उन्होंने श्रीराम की आँखों में देखते हुए कहा—

“वन के सिंह, हाथी, व्याघ्र और अन्य हिंसक जीव आपका तेज देखकर भयभीत हो जाएँगे। ऐसा दिव्य रूप उन्होंने पहले कभी नहीं देखा होगा। जब संसार आपसे भय करता है, तब वे पशु आपका क्या बिगाड़ सकेंगे?”

यह केवल विश्वास नहीं था; यह अपने पति के सामर्थ्य और दिव्यता पर अटल श्रद्धा थी।

फिर उनका स्वर अचानक करुणा से भर उठा—

“नाथ! यदि आप मुझे छोड़कर चले गए, तो मैं जीवित नहीं रह सकूँगी। आपके वियोग में मेरा जीवन ही समाप्त हो जाएगा। मैं आपके बिना इस राजमहल में एक क्षण भी नहीं रह सकती।”

सीता की आँखों में अब भय नहीं, केवल प्रेम था। वे बोलीं—

“आपके रहते स्वयं देवराज इन्द्र भी मेरा अपमान नहीं कर सकते। जब आप मेरे रक्षक हैं, तब मुझे किसी भी संकट का भय नहीं।”

फिर वे धीरे-धीरे अपने जीवन के उन प्रसंगों को स्मरण करने लगीं, जिन्हें वे अब तक अपने हृदय में संजोए थीं।

उन्होंने बताया कि बचपन में, मिथिला में रहते समय, अनेक विद्वान ब्राह्मणों ने उनकी हस्तरेखा देखकर कहा था कि उनके जीवन में वनवास अवश्य आएगा। एक शांत साध्वी ने भी उनकी माता के सामने यही भविष्यवाणी की थी। तभी से सीता के मन में यह भाव बस गया था कि एक दिन उन्हें वन का जीवन अवश्य जीना पड़ेगा।

वे बोलीं—

“मैं बचपन से ही इस भाग्य के लिए स्वयं को तैयार करती रही हूँ। अब जब वह समय आ गया है, तो मैं पीछे कैसे हट सकती हूँ? यदि मैं आपके साथ वन नहीं गई, तो वे सभी वचन असत्य हो जाएँगे।”

सीता के शब्दों में अद्भुत धैर्य था। वे केवल भावुक होकर आग्रह नहीं कर रही थीं, बल्कि धर्म और भाग्य—दोनों का स्मरण करा रही थीं।

उन्होंने आगे कहा—

“वन का दुःख उन्हीं को दुःख देता है, जिनका मन और इन्द्रियाँ वश में नहीं होतीं। आपके साथ रहकर मेरे लिए हर कठिनाई सरल हो जाएगी।”

उनकी आँखों में अब एक अलौकिक तेज झलकने लगा था।

“स्वामी! मैं पहले भी कई बार आपसे वन में साथ रहने की इच्छा प्रकट कर चुकी हूँ। आप मुझे अनुमति भी दे चुके हैं। अब आप अपने वचन से पीछे क्यों हट रहे हैं?”

सीता के इन शब्दों में शिकायत नहीं, बल्कि अधिकार से भरा प्रेम था।

फिर वे अत्यन्त विनम्र होकर बोलीं—

“आप मेरे स्वामी हैं। आपके पीछे-पीछे वन में चलना ही मेरा धर्म है। स्त्री के लिए उसका पति ही सबसे बड़ा देवता होता है। आपके साथ रहने से ही इस लोक और परलोक—दोनों में मेरा कल्याण होगा।”

इसके बाद उन्होंने विवाह के पवित्र बंधन का स्मरण कराया—

“जब पिता कन्या का हाथ जल से संकल्प करके किसी पुरुष को सौंपते हैं, तब वह स्त्री इस लोक ही नहीं, परलोक में भी उसी की पत्नी रहती है। मैं आपकी धर्मपत्नी हूँ। फिर आप मुझे अपने से अलग कैसे कर सकते हैं?”

अब सीता का हृदय पूरी तरह उमड़ पड़ा था।

वे बोलीं—

“मैं आपके सुख-दुःख में समान रूप से साथ देने वाली हूँ। चाहे सुख मिले या दुःख, मैं दोनों में समान रहूँगी। मैं आपके चरणों की सेविका हूँ। मुझे अपने साथ ले चलिए।”

उनकी आँखों से अश्रु निरंतर बह रहे थे। उनके शब्दों में ऐसा दर्द था कि मानो स्वयं प्रेम रो रहा हो।

फिर अचानक उनका स्वर टूट गया। वे व्याकुल होकर बोलीं—

“यदि आप मुझे अपने साथ नहीं ले जाएंगे, तो मैं जीवित नहीं रहूँगी। मैं विष पी लूँगी, अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगी या जल में डूबकर अपने प्राण त्याग दूँगी।”

यह कोई आवेशपूर्ण धमकी नहीं थी; यह उस स्त्री की वेदना थी, जिसके लिए पति ही जीवन का आधार था।

सीता बार-बार विनती करती रहीं। उनके आँसू धरती को भिगो रहे थे। पूरा वातावरण करुणा से भर गया था। परंतु श्रीराम अभी भी उन्हें वन ले जाने की अनुमति नहीं दे रहे थे। वे जानते थे कि वन का जीवन कितना कठोर है, और वे अपनी प्रिय सीता को किसी भी प्रकार के दुःख से बचाना चाहते थे।

जब बार-बार अस्वीकार सुनकर सीता निराश हो गईं, तब उनके नेत्रों से गरम आँसू झरने लगे। मिथिला की राजकुमारी, जनकनन्दिनी सीता, उस समय अत्यन्त दुःखी और चिंतित दिखाई दे रही थीं।

उनकी यह अवस्था देखकर श्रीराम का हृदय भी द्रवित हो उठा। वे मन को संयमित करके उन्हें समझाने लगे। वे अनेक प्रकार से सीता को वन जाने के विचार से रोकने का प्रयत्न करने लगे, परंतु वे भी भीतर से जान चुके थे कि यह केवल एक स्त्री का आग्रह नहीं, बल्कि उसके प्रेम, धर्म और अटूट निष्ठा का महासंकल्प है।

उस क्षण राजमहल में केवल दो व्यक्ति नहीं खड़े थे—वहाँ प्रेम और त्याग स्वयं एक-दूसरे के सामने खड़े थे।