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(26)
वनगमन का वज्रप्रहार — सीता के सम्मुख श्रीराम का हृदयविदारक सत्य
अयोध्या का राजमहल उस दिन बाहर से जितना उत्सवमय दिखाई दे रहा था, भीतर से उतना ही अशुभ संकेतों से भरा हुआ था। महलों में सुगन्धित धूप जल रही थी, राजमार्गों पर सजावट हो चुकी थी, और नगर के लोग यह मानकर प्रसन्न थे कि आज उनके प्रिय राम युवराज बनेंगे। परन्तु भाग्य ने कुछ और ही लिख रखा था।
माता कौसल्या अपने प्रिय पुत्र श्रीराम को आशीर्वाद देकर विदा कर चुकी थीं। काँपते हाथों से उन्होंने स्वस्तिवाचन किया था, मानो उनके हृदय को पहले ही किसी अनिष्ट की आहट मिल चुकी हो। श्रीराम ने माता के चरणों में सिर झुकाया। उनके मुख पर वही विनम्रता थी, वही तेज था, किन्तु भीतर एक भयंकर तूफ़ान उमड़ रहा था। वे धीरे-धीरे महल से बाहर निकले और वन की ओर जाने के लिये कदम बढ़ाने लगे।
जब वे राजमार्ग से गुजर रहे थे, तब वहाँ अपार भीड़ एकत्र थी। लोग उन्हें देखकर अभिभूत हो रहे थे। श्रीराम के तेज, उनके सौम्य स्वरूप और उनके सद्गुणों ने सदैव अयोध्या के लोगों के हृदयों को जीत रखा था। किन्तु आज उन्हें देखकर लोगों का मन विचलित हो उठा। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि जिस राम के राज्याभिषेक की तैयारी हो रही थी, उनके मुख पर यह उदासी क्यों है। ऐसा लग रहा था मानो स्वयं धर्म ही मौन होकर नगर से विदा ले रहा हो।
उधर राजमहल के अन्तःपुर में जनकनन्दिनी सीता प्रसन्नचित्त बैठी थीं। उन्हें अभी तक इस अनर्थ का कोई समाचार नहीं मिला था। उनके मन में केवल एक ही सुखद विचार था—आज उनके स्वामी का युवराज पद पर अभिषेक होगा। वे तपस्विनी थीं, धर्म और मर्यादा को भलीभाँति जानती थीं। उन्होंने स्नान कर देवताओं की पूजा की, मंगल सामग्री सजायी और अपने प्रिय पति की प्रतीक्षा करने लगीं।
उनके मन में अनेक मधुर कल्पनाएँ उठ रही थीं। वे सोच रही थीं कि आज अयोध्या का प्रत्येक व्यक्ति उल्लास से भर जाएगा। आज राम के मस्तक पर राजमुकुट सुशोभित होगा। आज महाराज दशरथ का सबसे बड़ा स्वप्न पूर्ण होगा।
इतने में श्रीराम महल में प्रवेश करते हैं।
किन्तु यह वही राम नहीं थे जिन्हें देखकर हृदय उल्लास से भर उठे। उनका मुख झुका हुआ था। उनके चरणों में वह उत्साह नहीं था जो अभिषेक के अवसर पर होना चाहिए था। वे मौन थे, अत्यन्त मौन। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उनके हृदय से समस्त प्रसन्नता छीन ली हो।
सीता ने जैसे ही उन्हें देखा, वे तुरन्त अपने आसन से उठ खड़ी हुईं। पहले तो उनके चेहरे पर हर्ष की आभा थी, किन्तु अगले ही क्षण वह आभा भय में बदल गयी। उन्होंने देखा—राम का मुख मलिन है, शरीर पर पसीना है, आँखों में गहन वेदना छिपी हुई है।
उनका हृदय काँप उठा।
वे व्याकुल होकर श्रीराम के समीप आयीं और उन्हें एकटक देखने लगीं। वे समझ गयीं कि कोई भयंकर घटना घट चुकी है।
श्रीराम ने सीता को देखा। इतने समय से वे अपने शोक को भीतर दबाये हुए थे, किन्तु अब वह वेदना रोकना असम्भव हो गया। उनके नेत्र भर आये। वे स्वयं को संयत रखने का प्रयास कर रहे थे, परन्तु उनके मुख की उदासी सब कुछ कह रही थी।
सीता का कंठ भर आया। अत्यन्त दुःख और आशंका से काँपती हुई वे बोलीं—
“प्रभो! यह आपकी कैसी अवस्था है? आज तो वह पवित्र पुष्य नक्षत्र है, जिसे आपके राज्याभिषेक के लिये चुना गया था। आज तो आपको प्रसन्न होना चाहिए था। फिर आपके मुख पर यह गहन उदासी क्यों है?”
वे एक-एक बात को देखकर विचलित होती जा रही थीं।
उन्होंने कहा—
“आज आपके सिर पर वह श्वेत राजछत्र क्यों नहीं सुशोभित हो रहा, जो पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान चमकता है? आपके दोनों ओर वे चँवर क्यों नहीं डुलाये जा रहे जो राजलक्ष्मी के प्रतीक हैं?”
“आज वे सूत, मागध और वन्दीजन कहाँ हैं जो आपके गुणों का गान करते थे? वे ब्राह्मण कहाँ हैं जो तीर्थों के पवित्र जल, मधु और दधि से आपका अभिषेक करने वाले थे?”
“मन्त्री, सेनापति, नगरवासी, सेठ-साहूकार—सब कहाँ हैं? वे सब आपके पीछे चलने को उत्सुक रहते थे, फिर आज यह सन्नाटा क्यों है?”
“आपका स्वर्णमय रथ आगे क्यों नहीं चल रहा? वह विशाल गजराज कहाँ है जो पर्वत के समान प्रतीत होता था? आपका भद्रासन लिये सेवक आगे क्यों नहीं जा रहा?”
सीता की आँखों में आँसू भर आये।
“जब सारी तैयारी पूर्ण हो चुकी थी, तब अचानक यह क्या हो गया? आपके मुख की कान्ति क्यों चली गयी? मैंने आपको कभी ऐसा नहीं देखा…”
उनके शब्द टूटने लगे।
अब वह क्षण आ पहुँचा था जब श्रीराम को वह कठोर सत्य कहना ही था।
उन्होंने अत्यन्त धैर्य से कहा—
“सीते… आज पूज्य पिताजी ने मुझे वन जाने की आज्ञा दी है।”
यह सुनते ही मानो समय थम गया।
सीता स्तब्ध रह गयीं। उनके कानों को विश्वास नहीं हुआ। वे केवल राम का मुख देखती रह गयीं।
श्रीराम ने धीरे-धीरे सम्पूर्ण घटना बतानी आरम्भ की।
उन्होंने कहा—
“बहुत पहले पिता महाराज ने माता कैकेयी को दो वरदान दिये थे। आज जब मेरे राज्याभिषेक की तैयारी हुई, तब माता कैकेयी ने उन्हीं वरदानों की माँग कर ली। पिता धर्म से बँध गये। उन्होंने भरत को युवराज बनाने और मुझे चौदह वर्ष के लिये दण्डकारण्य भेजने का वचन दे दिया।”
यह कहते समय भी श्रीराम के स्वर में न क्रोध था, न शिकायत। केवल धर्म के पालन की दृढ़ता थी।
फिर उन्होंने सीता की ओर देखकर अत्यन्त कोमल स्वर में कहा—
“मैं अब वन को जा रहा हूँ। तुम यहीं रहो। और एक बात सदैव ध्यान रखना—भरत के सामने कभी मेरी प्रशंसा मत करना।”
सीता आश्चर्य से उन्हें देखने लगीं।
श्रीराम बोले—
“समृद्धि और सत्ता मनुष्य के मन को बदल देती है। यदि बार-बार किसी दूसरे की प्रशंसा की जाये तो यह बात राजाओं को अच्छी नहीं लगती। तुम अपनी सखियों के साथ भी भरत के सामने मेरी चर्चा मत करना।”
वे आगे बोले—
“अब भरत ही अयोध्या के राजा होंगे। तुम्हें प्रयत्नपूर्वक उन्हें प्रसन्न रखना होगा।”
राम अपने लिये कुछ नहीं सोच रहे थे। वनवास का दुःख भी उन्हें उतना नहीं व्यथित कर रहा था, जितनी चिन्ता उन्हें पीछे छूट जाने वालों की थी।
उन्होंने कहा—
“मैं आज ही वन चला जाऊँगा। तुम धैर्य रखना। मेरे जाने के बाद व्रत-उपवास करना, प्रातःकाल उठकर देवताओं की पूजा करना और प्रतिदिन पिता महाराज को प्रणाम करना।”
उनका स्वर और अधिक भावुक हो गया—
“माता कौसल्या अब वृद्ध हो चुकी हैं। दुःख ने उन्हें अत्यन्त दुर्बल बना दिया है। तुम उनका विशेष सम्मान करना।”
फिर उन्होंने अपनी अन्य माताओं का स्मरण किया—
“मेरी सभी माताएँ मेरे लिये समान हैं। तुम प्रतिदिन सबके चरण स्पर्श करना।”
राम ने भरत और शत्रुघ्न के विषय में भी कहा—
“वे दोनों मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। तुम उन्हें अपने भाई और पुत्र के समान समझना।”
इसके बाद उन्होंने राजनीति और व्यवहार की गम्भीर शिक्षा दी—
“राजा के प्रतिकूल कोई कार्य मत करना। राजाओं को अनुकूल सेवा प्रिय होती है। जो विरोध करता है, चाहे अपना ही क्यों न हो, राजा उसे त्याग देता है; और जो हितकारी हो, उसे अपना बना लेता है।”
अन्त में वे बोले—
“सीते! तुम धर्म और सत्य में स्थित रहकर यहीं निवास करो। मैं वन चला जाऊँगा। तुम्हारे व्यवहार से किसी को कष्ट न हो—इसका सदैव ध्यान रखना।”
इतना कहकर श्रीराम मौन हो गये।
महल में गहरा सन्नाटा छा गया।
एक ओर धर्म के लिये सब कुछ त्याग देने वाला पति खड़ा था, और दूसरी ओर वह पत्नी, जिसका सम्पूर्ण संसार उसी पति में बसता था।
अभी तक श्रीराम केवल अपने वनवास का समाचार सुना रहे थे…
किन्तु अगले ही क्षण सीता जो उत्तर देने वाली थीं, वह इतिहास में पतिव्रता धर्म का अमर उदाहरण बनने वाला था।