Best Historical and Knowledgeable Content here... Know More.

  • +91 8005792734

    Contact Us

  • amita2903.aa@gmail.com

    Support Email

  • Jhunjhunu, Rajasthan

    Address

वनपथ की अटल संगिनी — सीता का प्रेम, साहस और संकल्प

(27)

वनपथ की अटल संगिनी — सीता का प्रेम, साहस और संकल्प

अयोध्या का राजमहल उस दिन जैसे शोक में डूब गया था। स्वर्ण से चमकते महल, सुगंधित पुष्पों से सजे प्रांगण और मधुर संगीत से गूँजने वाले कक्ष—सब कुछ वैसा ही था, पर वातावरण बदल चुका था। हर ओर मौन पसरा था। कारण था—अयोध्या के प्राण, धर्म और मर्यादा के प्रतीक श्रीराम का वनवास।

राजमहल के भीतर एक कक्ष में श्रीराम शांत भाव से बैठे थे। उनके मुख पर वही दिव्य धैर्य था, किंतु भीतर हृदय में वेदना की लहरें उठ रही थीं। पिता की आज्ञा उनके लिए सर्वोच्च धर्म थी, इसलिए वे बिना किसी शिकायत के चौदह वर्षों के वनवास के लिए तैयार हो चुके थे। पर एक चिंता उन्हें भीतर-ही-भीतर व्याकुल कर रही थी—सीता।

वे नहीं चाहते थे कि राजमहलों में पली, कोमल हृदय जनकनन्दिनी वन के दुःख सहें। इसलिए वे बार-बार उन्हें समझा रहे थे।

“वन का मार्ग अत्यंत कठिन है,” श्रीराम ने धीमे स्वर में कहा।
“वहाँ न सुखद शय्या होगी, न स्वादिष्ट भोजन, न राजसी सुख। काँटों से भरे पथ होंगे, हिंसक पशु होंगे, कठोर ऋतुएँ होंगी। तुमने कभी ऐसे जीवन का अनुभव नहीं किया है, सीते।”

वे आगे बोले—
“तुम अयोध्या में रहो। माता-पिता की सेवा करो। यही उचित होगा।”

श्रीराम की बातें सुनकर सीता कुछ क्षण मौन रहीं। उनके नेत्रों में प्रेम था, पर साथ ही एक गहरी पीड़ा भी। फिर उनके अधरों पर हल्की मुस्कान आई—ऐसी मुस्कान, जिसमें कोमलता भी थी और स्वाभिमान भी।

उन्होंने शांत किंतु दृढ़ स्वर में कहा—
“आर्यपुत्र! आप मुझे इतना दुर्बल कैसे समझ सकते हैं? आपकी बातें सुनकर मुझे आश्चर्य होता है।”

उनकी आँखों में तेज चमक उठा।

“आप वीरों में श्रेष्ठ हैं, अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञाता हैं। फिर आपके मुख से ऐसी दुर्बलता भरी बातें कैसे शोभा देती हैं? यह तो क्षत्रिय के योग्य नहीं।”

फिर उन्होंने अत्यंत गंभीर स्वर में जीवन का सत्य कहा—
“पिता, माता, भाई, पुत्र—सभी अपने-अपने भाग्य का फल भोगते हैं। किंतु पत्नी का भाग्य केवल अपने पति से जुड़ा होता है। जहाँ पति जाता है, वहीं पत्नी का धर्म और जीवन होता है। इसलिए यदि आपको वनवास मिला है, तो समझ लीजिए कि उसी क्षण मुझे भी वन जाने की आज्ञा मिल चुकी है।”

कक्ष में गहरा मौन छा गया।

सीता आगे बोलीं—
“स्त्री के लिए इस लोक और परलोक में पति ही सबसे बड़ा आश्रय होता है। माता-पिता, मित्र, यहाँ तक कि अपना शरीर भी सदा साथ नहीं रहता; पर पति ही उसका सच्चा सहारा होता है।”

अब उनकी वाणी में करुणा और प्रेम दोनों उमड़ पड़े।

“यदि आप आज वन जा रहे हैं,” उन्होंने कहा, “तो मैं आपके आगे-आगे चलूँगी। मार्ग के कुश और काँटे मेरे पैरों को घायल कर सकते हैं, पर वे मुझे रोक नहीं पाएँगे।”

फिर उन्होंने अत्यंत मार्मिक उपमा दी—

“हे वीर! जैसे कोई पथिक दुर्गम और जलहीन मार्ग में पीने से बचे हुए जल को भी बहुत सँभालकर अपने साथ रखता है, क्योंकि वह आगे जीवन का सहारा बन सकता है, वैसे ही आप भी मुझे निःशंक होकर अपने साथ ले चलिए। मैं आपके लिए बोझ नहीं बनूँगी, बल्कि आपकी सहचरी बनूँगी। मुझसे ऐसा कौन-सा अपराध हुआ है कि आप मुझे यहाँ छोड़ देना चाहते हैं?”

उनके शब्दों में गहरा समर्पण था।

“महलों में रहना, विमानों में घूमना या स्वर्गीय सुख प्राप्त करना—इन सबका मेरे लिए कोई मूल्य नहीं,” वे बोलीं, “स्त्री के लिए सबसे बड़ा सुख अपने पति के चरणों की छाया में रहना है।”

फिर उन्होंने विनम्रता से कहा—
“मेरे माता-पिता ने मुझे धर्म और कर्तव्य की शिक्षा दी है। मुझे यह समझाने की आवश्यकता नहीं कि पत्नी का कर्तव्य क्या होता है।”

वन का भयावह चित्र भी उनके निश्चय को डिगा नहीं सका।

“सिंहों और व्याघ्रों से भरे उस निर्जन वन में भी मैं आपके साथ सुखपूर्वक रहूँगी,” उन्होंने कहा।
“जैसे पिता के घर में आनंद से रहती थी, वैसे ही वन में भी रहूँगी।”

अब उनके मन में वनवास कोई कष्ट नहीं, बल्कि राम के साथ बिताया जाने वाला पवित्र जीवन बन चुका था।

“मैं तपस्विनी की तरह नियमपूर्वक जीवन बिताऊँगी,” उन्होंने कहा।
“फल-मूल खाकर रहूँगी, आपकी सेवा करूँगी और आपके साथ सुगंधित वनों में विचरूँगी।”

फिर मुस्कराकर बोलीं—
“आप तो वन में अन्य लोगों की भी रक्षा कर सकते हैं, फिर मेरी रक्षा करना आपके लिए कौन-सी कठिन बात है?”

उनकी दृढ़ता अब अटल हो चुकी थी।

“मुझे कोई नहीं रोक सकता,” उन्होंने स्पष्ट कहा।
“मैं हर परिस्थिति के लिए तैयार हूँ। मैं आपको किसी प्रकार का कष्ट नहीं दूँगी। आपके भोजन के बाद जो कुछ बचेगा, उसी से अपना जीवन बिताऊँगी।”

अब उनकी आँखों में एक सुंदर स्वप्न तैरने लगा।

“मैं आपके साथ पर्वतों को देखना चाहती हूँ,” वे बोलीं,
“कमलों से भरे सरोवरों को देखना चाहती हूँ, जहाँ हंस और कारण्डव पक्षी विचरते हों। आपके साथ उन वनों में घूमना ही मेरे लिए स्वर्ग होगा।”

उनकी वाणी मधुर हो उठी।

“आपके चरणों में अनुरक्त रहकर मैं प्रतिदिन उन पवित्र सरोवरों में स्नान करूँगी और आपके साथ वन में विचरूँगी। यही मेरे जीवन का सबसे बड़ा आनंद होगा।”

फिर वे कुछ क्षण रुकीं। उनकी आँखें भीग उठीं।

“यदि आपके साथ रहने का सौभाग्य मिले,” उन्होंने धीमे स्वर में कहा,
“तो सैकड़ों और हजारों वर्षों तक भी मुझे कोई कष्ट अनुभव नहीं होगा। किंतु यदि आप साथ न हों, तो स्वर्ग भी मेरे लिए निरर्थक है।”

उनके शब्दों में ऐसा प्रेम था, जो सांसारिक सीमाओं से परे था।

“आपके बिना स्वर्ग भी मुझे स्वीकार नहीं,” उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा।
“मेरा सम्पूर्ण प्रेम केवल आपको समर्पित है। आपके अतिरिक्त मेरा मन कहीं नहीं जाता। यदि आपसे वियोग हुआ, तो मैं जीवित नहीं रह सकूँगी।”

अब उनके नेत्रों से अश्रुधारा बह निकली।

उन्होंने हाथ जोड़कर कहा—
“प्राणनाथ! मेरी प्रार्थना स्वीकार कीजिए। मुझे अपने साथ ले चलिए। मैं कभी आपके लिए भार नहीं बनूँगी।”

उनकी वाणी में इतनी करुणा, इतना प्रेम और इतना अटल निश्चय था कि वातावरण भी मानो द्रवित हो उठा।

किन्तु धर्मनिष्ठ श्रीराम अभी भी चिंतित थे। वे जानते थे कि वन का जीवन कितना कठोर होता है। इसलिए सीता की इतनी विनती के बाद भी वे तुरंत सहमत नहीं हुए। वे उन्हें रोकने के लिए वन के दुःखों और कष्टों का और भी विस्तार से वर्णन करने लगे।

पर उस दिन अयोध्या के राजमहल में एक सत्य स्पष्ट हो चुका था—

जनकनन्दिनी सीता केवल एक महारानी नहीं थीं।
वे प्रेम की पराकाष्ठा थीं।
वे त्याग की मूर्ति थीं।
वे साहस की ज्योति थीं।
और वे ऐसी अटल पतिव्रता थीं, जिन्होंने निश्चय कर लिया था कि जीवन का प्रत्येक पथ—चाहे वह राजसिंहासन का हो या काँटों से भरे वन का—वे अपने प्रभु श्रीराम के साथ ही चलेंगी।