Best Historical and Knowledgeable Content here... Know More.

  • +91 8005792734

    Contact Us

  • amita2903.aa@gmail.com

    Support Email

  • Jhunjhunu, Rajasthan

    Address

वनपथ की वेदना — श्रीराम का कोसल से विदा होना

(49)

वनपथ की वेदना — श्रीराम का कोसल से विदा होना

अयोध्या को पीछे छोड़े हुए श्रीराम, सीता और लक्ष्मण आगे बढ़ते जा रहे थे। रात्रि का अंधकार अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था। चारों ओर निस्तब्धता थी, पर श्रीराम के हृदय में भावनाओं का एक अथाह समुद्र उमड़ रहा था। वे बार-बार अपने पिता महाराज दशरथ की आज्ञा को स्मरण कर रहे थे। यही स्मरण उन्हें दृढ़ बनाए हुए था।

राज्य, वैभव, सिंहासन और समस्त सुख पीछे छूट चुके थे, परंतु पिता का वचन उनके लिए सबसे बड़ा धर्म था। उसी धर्म का पालन करते हुए वे रात्रि के शेष भाग में भी निरंतर आगे बढ़ते रहे। उनके रथ के पहिए अंधकार को चीरते हुए वनपथ पर दौड़ रहे थे, मानो धर्म स्वयं आगे बढ़ रहा हो।

धीरे-धीरे रात समाप्त हुई। पूर्व दिशा में अरुणिमा फैलने लगी। पक्षियों का मधुर कलरव सुनाई देने लगा। प्रभात होते ही श्रीराम ने नित्यकर्म और संध्योपासना की। वनवास का जीवन प्रारंभ हो चुका था, पर उनके नियम और मर्यादा में कोई परिवर्तन नहीं आया। प्रार्थना के पश्चात वे पुनः यात्रा पर निकल पड़े।

मार्ग में अनेक जनपद, गाँव और वन आते रहे। खेतों में किसानों द्वारा जोती गई भूमि दिखाई देती थी। कहीं हरे-भरे वृक्षों पर फूल खिले थे, कहीं सुगंधित उपवन थे। प्रकृति का सौंदर्य मन को मोह लेने वाला था।

रथ को खींचने वाले घोड़े अत्यंत तीव्र गति से दौड़ रहे थे, परंतु श्रीराम, सीता और लक्ष्मण उन मनोरम दृश्यों को देखते हुए इतने तल्लीन थे कि उन्हें रथ की गति धीमी प्रतीत होती थी। ऐसा लगता था मानो प्रकृति स्वयं उन्हें अपने सौंदर्य से सांत्वना दे रही हो।

लेकिन जहाँ भी वे पहुँचते, वहाँ के लोगों के मुख से केवल एक ही चर्चा सुनाई देती—

“हाय! महाराज दशरथ ने यह क्या कर दिया?”

गाँवों के स्त्री-पुरुष, वृद्ध और बालक सभी दुःखी थे। वे राजा दशरथ की निंदा नहीं, बल्कि उनके दुर्भाग्य पर विलाप कर रहे थे कि वे मोह और वचनबद्धता के ऐसे जाल में फँस गए कि अपने प्रिय पुत्र को वन भेजना पड़ा।

कुछ लोग कैकेयी के विषय में कटु वचन कह रहे थे—

“धर्म की मर्यादा को छोड़ देने वाली कैकेयी कितनी कठोर हृदया है! उसे तनिक भी दया नहीं आई। उसने ऐसे धर्मात्मा, दयालु और जितेन्द्रिय राम को वन भेज दिया।”

लोगों की आँखों में आँसू थे। उन्हें यह सोचकर पीड़ा होती थी कि जिस राम ने कभी किसी का अहित नहीं किया, वही आज वनवास का कष्ट भोग रहे हैं।

कई स्त्रियाँ सीता को स्मरण करके रो पड़ती थीं।

“जनकनंदिनी सीता, जिन्होंने जीवन में केवल सुख ही देखा है, वे वन के कष्ट कैसे सहेंगी? काँटों भरे मार्ग, कठोर भूमि, वन्य पशुओं की गर्जना—इन सबके बीच वह कोमल राजकुमारी कैसे रहेगी?”

कुछ लोग आश्चर्य से कहते—

“क्या महाराज दशरथ अपने पुत्र से इतना भी प्रेम नहीं करते कि निर्दोष राम को वन भेज दिया?”

इन बातों को सुनकर श्रीराम के हृदय में भी वेदना उठती थी, पर उनके मुख पर कोई शिकायत नहीं थी। वे जानते थे कि यह सब उनके भाग्य और धर्मपालन की परीक्षा है। वे शांत भाव से सब सुनते हुए आगे बढ़ते रहे।

धीरे-धीरे वे कोसल राज्य की सीमा से बाहर निकल गए। अब वे अपने जन्मभूमि के अधिकार क्षेत्र को पीछे छोड़ चुके थे। यह क्षण अत्यंत मार्मिक था। मानो पुत्र अपनी माता की गोद से दूर जा रहा हो।

आगे बढ़ते हुए वे वेदश्रुति नामक नदी के तट पर पहुँचे। उसका जल अत्यंत शीतल और निर्मल था। नदी को पार करते समय ऐसा प्रतीत होता था जैसे वह भी अपने पवित्र जल से राम के चरणों को स्पर्श कर धन्य हो रही हो।

इसके बाद वे दक्षिण दिशा की ओर बढ़े, जिस दिशा को महर्षि अगस्त्य की तपस्या ने पवित्र बनाया था।

यात्रा लंबी थी। दिन बीतते गए। आगे चलकर वे गोमती नदी के तट पर पहुँचे। उसका जल शीतल और सुखद था। उसके किनारों पर असंख्य गौएँ विचरण कर रही थीं। वातावरण में शांति और पवित्रता का अनुभव होता था।

गोमती को पार कर वे आगे बढ़े और स्यन्दिका नदी तक पहुँचे। वहाँ मोरों का नृत्य और हंसों का मधुर कलरव वातावरण को आनंदमय बना रहा था। प्रकृति का यह संगीत मानो वनवासियों का स्वागत कर रहा था।

यहीं कहीं से श्रीराम ने सीता को उस समृद्ध भूमि का दर्शन कराया जो कभी राजा मनु ने इक्ष्वाकु को प्रदान की थी। चारों ओर उन्नति, धन-धान्य और सम्पन्नता दिखाई देती थी।

उस भूमि को देखकर श्रीराम के मन में अपने पूर्वजों की स्मृतियाँ जाग उठीं। उन्हें अपना राज्य, अपना परिवार और अपना बचपन याद आने लगा।

भावनाओं से भरे हुए उन्होंने अपने सारथि सुमंत्र को बार-बार संबोधित किया—

“हे सूत! क्या वह दिन फिर आएगा जब मैं लौटकर अपने माता-पिता के दर्शन कर सकूँगा?”

उनकी वाणी मधुर थी, पर उसके भीतर गहरी पीड़ा छिपी थी।

उन्होंने आगे कहा—

“क्या मैं फिर कभी सरयू के किनारे स्थित उन पुष्पित वनों में घूम सकूँगा? क्या मैं फिर अपने प्रिय नगर और अपने परिवार के बीच रह सकूँगा?”

सरयू का नाम लेते ही उनके नेत्रों के सामने अयोध्या की स्मृतियाँ तैर उठीं—बाल्यकाल की क्रीड़ाएँ, भाइयों के साथ बिताए क्षण, गुरुजनों का स्नेह और माता-पिता का प्रेम।

फिर वे राजर्षियों की प्राचीन परंपराओं का स्मरण करते हुए बोले—

“वन में जाकर मृगया करना केवल मनोरंजन नहीं था। यह प्राचीन राजर्षियों की एक मर्यादित क्रीड़ा थी, जिसे हमारे पूर्वज मनुपुत्रों ने अपनाया था।”

इन बातों के माध्यम से वे अपने मन को सांत्वना दे रहे थे। वे अतीत की स्मृतियों में अपने दुःख को कुछ क्षणों के लिए भूलना चाहते थे।

इस प्रकार श्रीराम मार्ग भर सुमंत्र से विभिन्न विषयों पर मधुर वार्तालाप करते रहे। बाहर से वे शांत और धैर्यवान दिखाई देते थे, पर भीतर उनका हृदय माता-पिता, अयोध्या और सरयू की स्मृतियों से बार-बार भर उठता था।

रथ आगे बढ़ता रहा, मार्ग बदलते रहे, नदियाँ पीछे छूटती रहीं; पर श्रीराम के हृदय में अयोध्या की स्मृतियाँ सदा साथ चलती रहीं। वनवास की यात्रा तो प्रारंभ हो चुकी थी, किंतु पुत्र का अपने घर और माता-पिता के प्रति प्रेम कभी पीछे नहीं छूटा।

यह केवल एक यात्रा नहीं थी—यह धर्म, त्याग, आज्ञापालन और करुणा की ऐसी महागाथा थी, जिसमें प्रत्येक कदम पर श्रीराम का दिव्य चरित्र और अधिक उज्ज्वल होकर प्रकट हो रहा था।