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वन का भय और प्रेम की अटल प्रतिज्ञा
अयोध्या के राजमहल में उस समय गहरा विषाद छाया हुआ था। महाराज दशरथ के वचन को निभाने के लिए श्रीराम ने चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार कर लिया था। समूची अयोध्या शोक में डूबी हुई थी, परन्तु सबसे अधिक पीड़ा उस हृदय में थी, जो श्रीराम से कभी अलग होने की कल्पना भी नहीं कर सकता था—वह था सीता का हृदय।
जब श्रीराम ने वन जाने की तैयारी आरम्भ की, तब सीता ने दृढ़ स्वर में कहा कि वे भी उनके साथ वन जाएँगी। उनके लिए पति से बढ़कर संसार में कुछ भी नहीं था। वे जानती थीं कि वन में कष्ट होंगे, कठिनाइयाँ होंगी, परन्तु राम के बिना महल का वैभव भी उन्हें श्मशान के समान प्रतीत होता था।
किन्तु धर्म के प्रति अत्यन्त सजग और अपनी पत्नी के सुख-दुःख की चिंता करने वाले श्रीराम के मन में एक गहरी व्याकुलता थी। वे जानते थे कि वन का जीवन राजमहल जैसा सुखद नहीं है। वहाँ न कोमल शय्या होगी, न सुरक्षित महल, न सेवक-सेविकाएँ। वहाँ केवल संघर्ष, तपस्या और कष्ट होंगे। इसी कारण वे सीता को साथ ले जाने का विचार नहीं कर पा रहे थे।
सीता की आँखों में आँसू भरे हुए थे। उनका मुख दुःख से मलिन हो गया था। वे बार-बार विनती कर रही थीं, परन्तु श्रीराम अत्यन्त कोमल किन्तु गंभीर स्वर में उन्हें समझाने लगे।
उन्होंने कहा, “सीते! तुम अत्यन्त श्रेष्ठ कुल में जन्मी हो। तुम्हारा जीवन सदैव धर्म और मर्यादा के पालन में बीता है। इसलिए तुम्हें यहीं रहकर धर्म का पालन करना चाहिए। इससे मेरे मन को भी शांति मिलेगी।”
राम ने अत्यन्त स्नेह के साथ कहा, “तुम्हारा कर्तव्य है कि मेरी बात मानो। तुम अत्यन्त सुकुमारी हो। वन का जीवन साधारण नहीं होता। वहाँ रहने वाले मनुष्यों को अनेक कष्ट सहने पड़ते हैं। मैं तुम्हें वही सब बताना चाहता हूँ, ताकि तुम समझ सको कि वनवास कितना कठिन है।”
फिर उन्होंने वन का भयानक चित्र सीता के सामने उपस्थित करना आरम्भ किया।
उन्होंने कहा, “वन का मार्ग अत्यन्त दुर्गम है। वहाँ सुख नहीं, केवल दुःख ही दुःख है। ऊँचे पर्वतों से गिरते झरनों की गूँज सुनकर पर्वतों की गुफाओं में रहने वाले सिंह भयंकर गर्जना करते हैं। उनकी दहाड़ सुनकर मन भय से काँप उठता है।”
राम की आँखों में चिंता स्पष्ट दिखाई दे रही थी। वे आगे बोले, “वन में मतवाले जंगली पशु निर्भय होकर घूमते हैं। जैसे ही वे किसी मनुष्य को देखते हैं, उस पर चारों ओर से टूट पड़ते हैं। वहाँ हर क्षण प्राणों का भय बना रहता है।”
उन्होंने वन की नदियों का वर्णन करते हुए कहा, “वन की नदियाँ भी सरल नहीं होतीं। उनमें ग्राह और भयानक जलचर रहते हैं। कीचड़ से भरी उन नदियों को पार करना अत्यन्त कठिन होता है। चारों ओर मतवाले हाथी विचरते रहते हैं। वन का प्रत्येक मार्ग संकटों से भरा है।”
राम जानते थे कि राजमहल में पली-बढ़ी सीता ने कभी ऐसे कष्टों का अनुभव नहीं किया। इसलिए वे उन्हें समझाते हुए बोले, “वन के रास्ते काँटों और लताओं से भरे होते हैं। वहाँ जल भी आसानी से नहीं मिलता। दिनभर कठिन यात्रा करनी पड़ती है। पैरों में घाव हो जाते हैं, शरीर थककर टूट जाता है।”
उन्होंने अत्यन्त करुण स्वर में कहा, “दिनभर की थकान के बाद भी वहाँ विश्राम के लिए कोई सुखद शय्या नहीं होती। सूखे पत्तों पर भूमि में ही सोना पड़ता है। न मुलायम बिस्तर, न महल की छाया—केवल कठोर धरती।”
राम के हृदय में वेदना थी। वे सीता को दुःख से बचाना चाहते थे। उन्होंने कहा, “वन में मनुष्य को केवल वृक्षों से गिरे हुए फल खाकर संतोष करना पड़ता है। कभी भोजन मिलेगा, कभी नहीं। उपवास करना पड़ेगा। सिर पर जटाओं का भार उठाना होगा और वृक्षों की छाल से बने वल्कल वस्त्र पहनने होंगे।”
वे आगे बोले, “वनवासी का जीवन केवल कठिनाई ही नहीं, कठोर नियमों से भी बँधा होता है। प्रतिदिन देवताओं, पितरों और अतिथियों की पूजा करनी पड़ती है। दिन में तीन बार स्नान करना होता है। स्वयं फूल चुनकर वेदी पर पूजा करनी होती है। जो भोजन जैसा मिल जाए, उसी में संतोष करना पड़ता है।”
वन का भयावह चित्र और भी गहरा होता गया। राम बोले, “वहाँ प्रचण्ड आँधियाँ चलती हैं। घोर अन्धकार छा जाता है। भूख और प्यास मनुष्य को व्याकुल कर देती हैं। चारों ओर विषैले सर्प घूमते रहते हैं। कुछ मार्गों को घेरकर पड़े रहते हैं। पतंगे, बिच्छु, मच्छर और कीड़े हर समय शरीर को कष्ट पहुँचाते हैं।”
उन्होंने कहा, “काँटेदार वृक्षों से भरे उस वन में हर कदम पर पीड़ा है। वहाँ रहने वाले मनुष्य को न केवल शारीरिक कष्ट सहने पड़ते हैं, बल्कि मन को भी तपस्या में स्थिर रखना पड़ता है। क्रोध और लोभ का त्याग करना पड़ता है। जहाँ भय का निवास हो, वहाँ भी निर्भय बने रहना पड़ता है।”
अन्त में राम ने अत्यन्त गंभीर स्वर में कहा, “सीते! मैं बहुत सोच-विचारकर यही समझता हूँ कि वन में रहना अत्यन्त कष्टदायक है। वहाँ तुम्हारा जाना उचित नहीं। मैं नहीं चाहता कि तुम्हें किसी प्रकार का दुःख सहना पड़े।”
इतना कहकर श्रीराम मौन हो गए।
उनके शब्दों में कठोरता नहीं थी; केवल प्रेम और चिंता थी। वे अपनी प्रिय पत्नी को उन असहनीय कष्टों से बचाना चाहते थे, जिनका सामना उन्हें स्वयं करना था।
किन्तु सीता के लिए यह सब सुनना असहनीय था।
उनकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। वे भीतर से टूट रही थीं। जिस राम के साथ वे हर परिस्थिति में रहने का प्रण ले चुकी थीं, वही उन्हें अपने से दूर रहने के लिए कह रहे थे।
उस क्षण सीता का हृदय पीड़ा, प्रेम और दृढ़ निश्चय से भर उठा।
और तब, अत्यन्त दुःखी होकर, उन्होंने श्रीराम को उत्तर देना आरम्भ किया…