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वल्कल-वेष में राम — अयोध्या का टूटता हृदय
अयोध्या का राजमहल उस दिन किसी उत्सव का स्थान नहीं था। जिन प्रांगणों में प्रतिदिन वीणाओंकी मधुर ध्वनि गूँजती थी, जहाँ सुगन्धित पुष्पोंकी वर्षा होती थी, जहाँ राजसी वैभव अपनी पूर्ण शोभा बिखेरता था, वहीं आज एक अजीब-सा सन्नाटा पसरा हुआ था। महलकी दीवारें तक मानो शोकसे भारी हो उठी थीं। रानियोंकी आँखें आँसुओंसे भरी थीं और सेवक-सेविकाएँ काँपते हृदयसे एक-दूसरेका मुख देख रही थीं। कारण था—अयोध्याके प्राण, महाराज दशरथके हृदयके टुकड़े, श्रीरामका वनगमन।
जब श्रीराम तपस्वियोंके समान वल्कल-वस्त्र धारण किये राजसभा में पहुँचे, तब वह दृश्य ऐसा था जिसे देखकर पत्थरका हृदय भी पिघल जाता। जिन रामको दशरथने सदा रत्नजटित राजसी वस्त्रोंमें देखा था, जिनके लिये उन्होंने राज्याभिषेकके स्वप्न सजाये थे, वही राम आज वृक्षकी छाल धारण किये विनम्र भावसे पिताके सामने खड़े थे। उनका मुख तेजस्वी था, किन्तु उस तेजमें आज त्याग और वैराग्यकी अद्भुत आभा भी जुड़ गयी थी।
राजा दशरथने जैसे ही अपने प्रिय पुत्रको उस रूपमें देखा, उनका हृदय काँप उठा। उन्हें लगा मानो किसीने उनके प्राणोंको भीतरसे चीर दिया हो। उनकी आँखोंके आगे अंधकार छा गया और वे स्त्रियोंसहित मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े। कौसल्या विलाप करने लगीं, सुमित्राका चेहरा पीड़ासे भर उठा और महलमें उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति रो पड़ा। ऐसा लग रहा था मानो सम्पूर्ण अयोध्या एक ही क्षणमें अनाथ हो गयी हो।
कुछ समय बाद जब दशरथको होश आया, तब भी उनकी आँखें पूरी तरह खुल नहीं पा रही थीं। वे रामकी ओर देखना चाहते थे, किन्तु जैसे ही दृष्टि उनके वल्कल-वेषपर पड़ती, उनका कलेजा फटने लगता। वे बोलना चाहते थे, पर शब्द गलेमें अटक जाते। सामने वही पुत्र खड़ा था, जिसके बाल्यकालकी प्रत्येक स्मृति उनके हृदयमें अंकित थी। उन्हें याद आने लगा—कैसे छोटे राम उनके कंधोंपर खेलते थे, कैसे उनकी हँसीसे पूरा महल खिल उठता था। और आज वही पुत्र वनके कठोर जीवनके लिये तैयार खड़ा था।
दशरथकी पीड़ा अब शब्दोंमें फूटने लगी। आँसू बहाते हुए वे बोले—“निश्चय ही मैंने पूर्वजन्ममें कोई भयंकर पाप किया होगा। शायद मैंने गौओंको उनके बछड़ोंसे अलग किया होगा, या किसी निरीह प्राणीको कष्ट पहुँचाया होगा। तभी आज मुझे यह असहनीय दुःख सहना पड़ रहा है।”
उनकी आवाज टूट रही थी। वे बार-बार रामको देखते और फिर सिर झुका लेते। उन्हें आश्चर्य हो रहा था कि इतना बड़ा दुःख मिलनेपर भी उनके प्राण क्यों नहीं निकल रहे। वे व्याकुल होकर कह उठे—“समय पूरा हुए बिना मृत्यु नहीं आती, तभी तो कैकेयीके इस कठोर आघातके बाद भी मैं जीवित हूँ।”
फिर उनकी दृष्टि रामके वस्त्रोंपर गयी। वृक्षकी छालसे बने वे वल्कल उनके लिये किसी शूलसे कम न थे। वे रो पड़े—“ओह! मेरा तेजस्वी पुत्र, जो राजमुकुट धारण करने योग्य था, आज तपस्वियोंका वेश पहने मेरे सामने खड़ा है। फिर भी मेरे प्राण नहीं निकलते!”
उनकी वाणीमें अब वेदना और असहायता एक साथ बह रही थी। वे कैकेयीकी ओर संकेत करते हुए बोले—“उसने वरदानके नामपर छल किया। अपने स्वार्थके लिये उसने पूरे रघुकुलको दुःखमें डुबो दिया।”
इतना कहते-कहते उनका शरीर काँपने लगा। आँखोंसे आँसू निरन्तर बह रहे थे। उनकी इन्द्रियाँ शिथिल पड़ गयीं और वे केवल एक बार “हे राम!” कहकर पुनः मूर्छित हो गये। महलमें हाहाकार मच गया। ऐसा लगा मानो अयोध्याका सूर्य अस्त हो रहा हो।
दो घड़ी बाद जब उन्हें फिर चेतना आयी, तब उन्होंने आँसूभरी आँखोंसे सुमन्त्रको बुलाया। काँपती आवाजमें बोले—“श्रेष्ठ घोड़ोंसे युक्त रथ तैयार करो और मेरे रामको वनकी सीमातक पहुँचा आओ।”
यह कहते समय उनका हृदय भीतरसे टूट रहा था। कौन पिता अपने प्रिय पुत्रको स्वयं वन भेजना चाहता है? किन्तु राजधर्मकी बेड़ियोंने उन्हें विवश कर दिया था। उन्हें लग रहा था मानो संसारमें गुणवान् होनेका यही फल है—जो सबसे श्रेष्ठ होता है, उसीको सबसे अधिक त्याग करना पड़ता है।
सुमन्त्र तुरंत गये और स्वर्णसे अलंकृत रथ तैयार कर लाये। रथ अत्यन्त भव्य था, किन्तु आज उसकी चमक भी शोकके अंधकारमें फीकी लग रही थी। सुमन्त्रने हाथ जोड़कर कहा—“महाराज, श्रीरामके लिये रथ तैयार है।”
दशरथने फिर कोषाध्यक्षको बुलाया और कहा—“सीताके लिये चौदह वर्षोंतक पर्याप्त वस्त्र और आभूषण लाओ।”
उनका हृदय अपनी पुत्रवधूके लिये भी करुणासे भर उठा था। वे जानते थे कि सीता राजमहलोंमें पली हैं, फिर भी बिना किसी शिकायतके वन जानेको तैयार खड़ी हैं। थोड़ी ही देरमें बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण लाये गये। सीताने उन्हें धारण किया। उनका सौन्दर्य ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उगते सूर्यकी प्रभा आकाशको आलोकित कर रही हो। किन्तु उस चमकके भीतर त्यागकी गम्भीर छाया छिपी हुई थी।
तभी माता कौसल्याने सीताको अपने हृदयसे लगा लिया। उन्होंने स्नेहसे उनका मस्तक सूँघा और आँसू रोकते हुए बोलीं—“बेटी, संकटके समय जो स्त्री अपने पतिका सम्मान नहीं करती, उसे संसारमें असती कहा जाता है।”
उनकी वाणी कठोर नहीं थी; वह एक अनुभवी माँका करुण उपदेश था। वे आगे बोलीं—“दुष्टा स्त्रियाँ सुखमें तो पतिका साथ देती हैं, किन्तु विपत्तिके आते ही उसका त्याग कर देती हैं। परन्तु साध्वी स्त्रीके लिये पति ही देवता होता है।”
कौसल्याके शब्दोंमें धर्मकी गम्भीरता थी। वे चाहती थीं कि वनकी कठिनाइयोंमें भी सीताका पतिव्रत अडिग रहे।
सीताने हाथ जोड़ लिये। उनकी आँखोंमें विनम्रता थी, पर भीतर अदम्य निष्ठा जल रही थी। वे बोलीं—“माते, आप मुझे असती स्त्रियोंके समान न समझें। जैसे चन्द्रमासे उसकी प्रभा अलग नहीं हो सकती, वैसे ही मैं श्रीरामसे अलग नहीं हो सकती।”
उनकी आवाज मधुर थी, किन्तु उसमें अटल दृढ़ता थी। वे आगे बोलीं—“जैसे बिना तारकी वीणा नहीं बज सकती और बिना पहियोंका रथ नहीं चल सकता, वैसे ही स्त्री पतिके बिना सुखी नहीं हो सकती।”
फिर उन्होंने अत्यन्त श्रद्धासे कहा—“पिता, भाई और पुत्र सीमित सुख देते हैं, परन्तु पति अपरिमित कल्याणका दाता होता है। पति ही स्त्रीका देवता है।”
सीताके ये वचन सुनकर कौसल्याके नेत्रोंसे आँसू बह निकले। उनमें दुःख भी था और गर्व भी। दुःख इस बातका कि ऐसी महान् पुत्रवधू वन जा रही है, और गर्व इस बातका कि रघुकुलको ऐसी पतिव्रता नारी प्राप्त हुई।
तभी श्रीरामने माता कौसल्याकी ओर देखा। उनके चेहरेपर अद्भुत शान्ति थी। वे बोले—“माँ, पिताजीकी ओर दुःखसे मत देखो। चौदह वर्ष शीघ्र बीत जायेंगे। एक दिन मैं सीता और लक्ष्मणके साथ पुनः लौटूँगा।”
स्वयं वन जानेवाले राम अपने दुःखकी नहीं, माता-पिताके हृदयकी चिंता कर रहे थे। यही उनकी महानता थी।
फिर उन्होंने अपनी अन्य माताओंकी ओर देखा। सबकी आँखें नम थीं। हाथ जोड़कर वे बोले—“यदि साथ रहते हुए मुझसे कभी कोई कठोर वचन निकल गया हो, तो मुझे क्षमा कर दीजिये।”
यह सुनते ही सभी रानियाँ फूट-फूटकर रो पड़ीं। जिस रामने कभी किसीका दिल नहीं दुखाया, वही आज सबसे क्षमा माँग रहे थे। महलमें ऐसा विलाप गूँज उठा जैसे वनमें कुररी पक्षियाँ रो रही हों।
वह राजमहल, जहाँ प्रतिदिन मृदंगों और वीणाओंकी मधुर ध्वनि सुनायी देती थी, आज केवल आर्तनादसे भर गया था। वैभव था, सिंहासन था, सम्पत्ति थी—किन्तु रामके बिना सब शून्य लग रहा था।
और उस शोकके बीच खड़े थे श्रीराम—शांत, धैर्यवान्, धर्मके लिये अपना सर्वस्व त्याग देनेवाले मर्यादा पुरुषोत्तम।