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विश्वामित्र की तपस्या, मेनका का मोह और पुनः जागी आत्मज्वाला

 

वन का वातावरण शांत था। समय मानो थम गया था। महातपस्वी विश्वामित्र अपनी घोर तपस्या में लीन थे। एक-एक क्षण उनके लिए संकल्प की अग्नि में तपने जैसा था। हजार वर्षों की दीर्घ तपस्या पूर्ण होने पर उन्होंने व्रत की समाप्ति का स्नान किया। उनके शरीर पर तप का तेज झलक रहा था और मन में स्थिरता का समुद्र उमड़ रहा था। उसी समय आकाशमार्ग से समस्त देवता उनके सामने उपस्थित हुए। वे विश्वामित्र को उनकी तपस्या का फल देने के लिए आए थे।

 

देवताओं के मध्य स्वयं ब्रह्माजी प्रकट हुए। उनके मुख पर संतोष की मधुर मुस्कान थी। उन्होंने स्नेहभरी वाणी में कहा— “मुने! तुम्हारा कल्याण हो। अपने शुभ कर्मों और कठोर तप के प्रभाव से तुम अब ऋषि हो गए हो।”

यह सुनकर वातावरण में दिव्यता भर गई। परन्तु यह सम्मान प्राप्त होते ही ब्रह्माजी स्वर्ग को लौट गए। विश्वामित्र ने भी इस उपलब्धि को अंतिम लक्ष्य नहीं माना। उनके भीतर अभी और ऊँचाई छूने की तीव्र आकांक्षा थी। वे पुनः उसी दृढ़ता से तपस्या में लग गए।

 

बहुत समय बीत गया। एक दिन पुष्कर का पावन क्षेत्र अद्भुत सौन्दर्य से भर उठा। वहाँ स्वर्ग की परम सुन्दरी अप्सरा मेनका आई। उसने स्नान की तैयारी की। जब वह जल में उतरी तो उसका रूप ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो काले मेघों में बिजली चमक उठी हो। उसकी चाल, उसका सौंदर्य, उसका लावण्य—सब कुछ मन को मोह लेने वाला था।

 

तभी विश्वामित्र की दृष्टि उस पर पड़ी। तपस्या से तपे हुए मन में एक क्षण के लिए हलचल हुई। उनका मन डगमगा गया। तप की कठोरता पर काम का हल्का-सा स्पर्श भी भारी पड़ गया। वे उसके सौन्दर्य में बंध गए। मोहग्रस्त होकर उन्होंने मेनका से मधुर स्वर में कहा—

“अप्सरा! तुम्हारा स्वागत है। मेरे आश्रम में निवास करो। मैं काम के वश हो रहा हूँ। मुझ पर कृपा करो।”

 

मेनका, जो देवताओं के संकेत पर ही वहाँ आई थी, विनम्रता से वहीं रहने लगी। धीरे-धीरे आश्रम का वातावरण बदल गया। तप की कठोरता के स्थान पर कोमलता आ गई। समय का प्रवाह बिना आहट के बहता रहा। विश्वामित्र को लगा जैसे कुछ ही क्षण बीते हों, परन्तु देखते-देखते दस वर्ष बीत गए। वे दस वर्ष उनके जीवन से ऐसे निकल गए मानो एक दिन-रात ही बीता हो।

 

एक दिन अचानक उनके भीतर चेतना जागी। वे चौंक उठे। उन्हें अपनी तपस्या का स्मरण हुआ। उनके हृदय में ग्लानि भर गई। वे लज्जित हो गए। उनकी आँखों में पश्चात्ताप उतर आया। मन में विचार उठा— “यह सब देवताओं की योजना थी। उन्होंने मेरी तपस्या को भंग करने के लिए यह उपाय किया। मैं मोह में इतना डूब गया कि दस वर्ष कब बीत गए, पता ही नहीं चला। मेरी तपस्या का यह कितना बड़ा विघ्न था!”

 

वे गहरी साँस लेने लगे। हृदय में पीड़ा थी, आत्मग्लानि थी, और साथ ही दृढ़ संकल्प की नई ज्वाला भी। उनके चेहरे पर कठोरता लौट आई। मेनका ने जब यह परिवर्तन देखा तो वह भय से काँप उठी। वह हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ी हो गई। उसे लगा कि अब मुनि क्रोध करेंगे। परन्तु विश्वामित्र ने उसे मधुर वचनों में विदा कर दिया। उनके भीतर क्रोध नहीं, बल्कि आत्मसंयम का निश्चय जाग चुका था।

 

मेनका चली गई। विश्वामित्र ने उस स्थान को छोड़ दिया और उत्तर दिशा में हिमालय की ओर चल पड़े। वहाँ कौशिकी नदी के तट पर उन्होंने पुनः तपस्या आरम्भ की। इस बार उनका लक्ष्य स्पष्ट था—कामदेव को जीतना, इन्द्रियों पर पूर्ण विजय पाना। उन्होंने अपने मन को कठोर अनुशासन में बाँध दिया।

 

हजार वर्षों तक वे तप में लीन रहे। उनकी तपस्या इतनी प्रचंड थी कि देवताओं के हृदय में भय उत्पन्न होने लगा। वे आपस में विचार करने लगे— “यदि यह तप इसी प्रकार चलता रहा तो विश्वामित्र महान शक्ति प्राप्त कर लेंगे। उन्हें महर्षि पद देना ही उचित होगा।”

 

देवताओं के साथ ब्रह्माजी पुनः उनके पास आए। उन्होंने प्रसन्न होकर कहा—

“वत्स कौशिक! तुम्हारी उग्र तपस्या से मैं अत्यंत संतुष्ट हूँ। मैं तुम्हें महत्ता प्रदान करता हूँ। अब तुम महर्षियों में श्रेष्ठ हो।”

 

विश्वामित्र ने विनम्रता से प्रणाम किया, परन्तु उनके मन का लक्ष्य इससे भी आगे था। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा—

“भगवन्! यदि मुझे ब्रह्मर्षि का पद मिल जाए, तभी मैं स्वयं को पूर्ण जितेन्द्रिय मानूँगा।”

 

ब्रह्माजी ने शांत स्वर में उत्तर दिया—

“अभी तुम पूर्ण जितेन्द्रिय नहीं हुए हो। इसके लिए और प्रयत्न करो।”

यह कहकर वे चले गए।

 

अब विश्वामित्र ने और भी कठोर तपस्या आरम्भ की। वे दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर खड़े रहते। किसी सहारे का उपयोग नहीं करते। केवल वायु का सेवन करते। गर्मियों में पंचाग्नि के बीच बैठते—चारों ओर अग्नि और ऊपर सूर्य की तपन। वर्षा ऋतु में खुले आकाश के नीचे खड़े रहते, और शीतकाल में रात-दिन जल में खड़े होकर तप करते। उनका शरीर तप से क्षीण होता गया, परन्तु मन अटल होता गया।

 

इस प्रकार हजार वर्षों तक उनकी तपस्या चलती रही। उनका तेज बढ़ता गया। उनकी दृढ़ता देखकर देवताओं के मन में पुनः चिंता उत्पन्न हुई। उन्हें भय हुआ कि कहीं विश्वामित्र अपनी तपस्या से ऐसी शक्ति प्राप्त न कर लें, जो स्वर्ग को भी चुनौती दे दे।

 

तब इन्द्र ने मरुद्गणों के साथ विचार किया। अंततः उन्होंने एक नया उपाय सोचा। उन्होंने स्वर्ग की दूसरी सुन्दरी अप्सरा रम्भा को बुलाया। इन्द्र ने उससे ऐसी बात कही, जो उसके लिए लाभकारी थी, परन्तु विश्वामित्र की तपस्या में विघ्न डालने वाली थी…

 

और यहीं से विश्वामित्र की तपस्या की अगली परीक्षा आरम्भ होने वाली थी—जहाँ उनके सामने फिर से मोह, क्रोध और आत्मसंयम की सबसे कठिन चुनौती आने वाली थी।