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“विश्वामित्र की महिमा और शतानन्द का हृदयस्पर्शी स्वागत”
जनकपुरी के उस पवित्र वातावरण में एक अत्यंत भावुक और अद्भुत दृश्य उपस्थित था। महर्षि विश्वामित्र की बुद्धिमत्तापूर्ण और दिव्य वाणी को सुनते ही महातेजस्वी ऋषि शतानन्द के हृदय में अपार भावनाएँ उमड़ पड़ीं। उनके शरीर में रोमांच छा गया। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो उनकी आत्मा उस दिव्य वार्ता से पुलकित हो उठी हो। वे महान ऋषि गौतम के ज्येष्ठ पुत्र थे और कठोर तपस्या के कारण उनके शरीर से तेज और दिव्यता झलक रही थी।
जब उनकी दृष्टि पहली बार श्रीराम और लक्ष्मण पर पड़ी, तो वे क्षण भर के लिए स्तब्ध रह गये। उनके हृदय में एक साथ आश्चर्य, श्रद्धा और आनंद की लहर उठी। वे सोचने लगे—“ये वही दिव्य राजकुमार हैं जिनके दर्शन की महिमा पूरे जगत में गायी जाती है।”
दोनों राजकुमारों को विनम्रता और शान्ति से बैठे देखकर शतानन्द के मन में अनेक भावनाएँ जाग उठीं। वे धीरे-धीरे महर्षि विश्वामित्र के समीप आए और अत्यंत विनम्रता से बोले—
“हे मुनिश्रेष्ठ! मेरी माता अहल्या अनेक वर्षों से तपस्या कर रही थीं। उनका जीवन कठिन तप और प्रतीक्षा में बीत रहा था। क्या आपने इन दिव्य राजकुमार श्रीराम को उनका दर्शन कराया?”
उनकी आँखों में एक पुत्र का प्रेम और चिंता स्पष्ट झलक रही थी। वे आगे बोले—
“क्या मेरी तेजस्विनी माता ने वन में उपलब्ध फल-फूल आदि से भगवान श्रीराम का पूजन किया? क्या उन्होंने उस परम पूजनीय पुरुष का सम्मान करने का सौभाग्य पाया?”
यह कहते-कहते शतानन्द का स्वर और भी गंभीर हो गया। उनके मन में वर्षों से दबी हुई पीड़ा और जिज्ञासा उमड़ आई—
“हे महातेजस्वी मुनि! क्या आपने श्रीराम को वह प्राचीन घटना सुनाई थी, जब देवराज इन्द्र ने छल-कपट करके मेरी माता के साथ अन्याय किया था?”
उनकी आँखों में करुणा और उम्मीद एक साथ झलक रही थी। वे आगे बोले—
“हे कुशिकनन्दन! क्या श्रीराम के दर्शन और उनके दिव्य स्पर्श के प्रभाव से मेरी माता उस भयानक शाप से मुक्त हो गयीं? क्या वे पुनः मेरे पिता महर्षि गौतम से जा मिलीं?”
फिर उन्होंने एक और भावुक प्रश्न किया—
“क्या मेरे पूज्य पिता ने श्रीराम का विधिपूर्वक पूजन किया? क्या उन महात्मा की पूजा स्वीकार करके श्रीराम यहाँ तक पधारे हैं? और क्या यहाँ आकर श्रीराम ने मेरे पूज्य पिता का शांत मन से अभिवादन किया?”
शतानन्द की ये बातें सुनकर महर्षि विश्वामित्र के चेहरे पर एक मधुर मुस्कान फैल गयी। वे वाणी के अत्यंत कुशल ज्ञाता थे। उन्होंने शांत और सौम्य स्वर में उत्तर दिया—
“हे मुनिश्रेष्ठ! मैंने केवल अपना कर्तव्य निभाया है। मैंने कोई विशेष कार्य नहीं किया। श्रीराम के दिव्य प्रभाव से तुम्हारी माता अहल्या शाप से मुक्त होकर उसी प्रकार महर्षि गौतम से जा मिली हैं, जैसे रेणुका अपने पति जमदग्नि से मिली थीं।”
यह सुनते ही शतानन्द के हृदय में अपार आनंद भर गया। उनकी आँखों में प्रसन्नता के आँसू चमक उठे। उन्होंने तुरंत श्रीराम की ओर मुड़कर अत्यंत श्रद्धा और प्रेम से कहा—
“हे नरश्रेष्ठ! आपका यहाँ स्वागत है। रघुनन्दन! आज मेरा जीवन धन्य हो गया कि आप स्वयं महान महर्षि विश्वामित्र के साथ यहाँ तक पधारे।”
फिर वे भावविभोर होकर विश्वामित्र की महिमा का वर्णन करने लगे—
“इन महर्षि के कर्म अद्भुत हैं। इनकी तपस्या इतनी महान है कि इन्होंने ब्रह्मर्षि पद प्राप्त कर लिया है। इनका तेज असीम है। मैं इनके स्वरूप को भली-भाँति जानता हूँ। ये सम्पूर्ण जगत के परम हितैषी हैं।”
वे आगे बोले—
“हे श्रीराम! इस पृथ्वी पर आपसे अधिक भाग्यशाली कोई नहीं है, क्योंकि आपके रक्षक स्वयं महातपस्वी कुशिकनन्दन विश्वामित्र हैं। जिनकी तपस्या और शक्ति की सीमा नहीं है।”
अब शतानन्द बड़े उत्साह से बोले—
“मैं आपको महात्मा कौशिक के बल और उनके महान जीवन का सच्चा इतिहास सुनाता हूँ। कृपया ध्यानपूर्वक सुनिये।”
वे बताने लगे कि महर्षि विश्वामित्र पहले एक महान और धर्मात्मा राजा थे। उन्होंने अनेक वर्षों तक इस पृथ्वी पर न्याय और धर्म के साथ शासन किया। वे विद्वान थे, धर्म को जानने वाले थे और अपनी प्रजा के कल्याण में सदा लगे रहते थे।
फिर उन्होंने उनके महान वंश का वर्णन किया—
प्राचीन काल में कुश नाम के एक महान राजा हुए, जो प्रजापति के पुत्र थे। उनके बलवान पुत्र का नाम कुशनाभ था, जो अत्यंत धर्मात्मा और प्रसिद्ध राजा थे। कुशनाभ के पुत्र गाधि हुए और उन्हीं गाधि के तेजस्वी पुत्र थे महर्षि विश्वामित्र।
शतानन्द ने बताया कि राजा विश्वामित्र ने हजारों वर्षों तक पृथ्वी पर राज्य किया और उसका पालन-पोषण किया।
एक दिन उन्होंने अपनी विशाल सेना को एकत्र किया और एक अक्षौहिणी सेना के साथ पृथ्वी का भ्रमण करने लगे। वे अनेक नगरों, राज्यों, नदियों और विशाल पर्वतों को पार करते हुए आगे बढ़ते रहे।
इसी यात्रा के दौरान वे एक अद्भुत और पवित्र स्थान पर पहुँचे—वह था महान ऋषि वसिष्ठ का आश्रम।
उस आश्रम का दृश्य अत्यंत मनोहर और दिव्य था। चारों ओर सुगंधित फूल, हरी-भरी लताएँ और विशाल वृक्ष उस स्थान को स्वर्ग जैसा बना रहे थे। अनेक प्रकार के मृग और वन्य पशु वहाँ निडर होकर घूम रहे थे। सिद्ध, चारण और अनेक दिव्य प्राणी उस आश्रम में निवास करते थे।
देवता, दानव, गन्धर्व और किन्नर भी उस स्थान की शोभा बढ़ाते थे। चारों ओर शान्ति और पवित्रता का वातावरण था। असंख्य ब्राह्मण, ब्रह्मर्षि और देवर्षि वहाँ तपस्या और साधना में लीन रहते थे।
कुछ महात्मा केवल जल पीकर जीवन बिताते थे, तो कुछ केवल वायु पर ही निर्भर रहते थे। कई ऋषि फल-मूल खाकर रहते थे, तो कुछ सूखे पत्तों से ही अपनी भूख मिटाते थे।
उन सबने अपने मन और इन्द्रियों को पूरी तरह वश में कर लिया था। वे राग-द्वेष से मुक्त होकर निरंतर जप, तप और यज्ञ-हवन में लगे रहते थे।
वालखिल्य और वैखानस जैसे महान तपस्वी उस आश्रम की शोभा बढ़ा रहे थे। उस स्थान का वातावरण इतना पवित्र और दिव्य था कि वह आश्रम मानो पृथ्वी पर स्थित दूसरा ब्रह्मलोक प्रतीत होता था।
जब महाबली और विजयी राजा विश्वामित्र ने उस अद्भुत आश्रम का दर्शन किया, तो वे भी उसके तेज, शान्ति और आध्यात्मिक शक्ति से अत्यंत प्रभावित हो गये।
वह क्षण उनके जीवन की एक नई दिशा की शुरुआत बनने वाला था—एक ऐसा मोड़, जहाँ से एक महान राजा का जीवन धीरे-धीरे एक महान ऋषि बनने की ओर अग्रसर होने लगा।