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वैष्णव तेज का समर्पण — श्रीराम और परशुराम का अद्भुत सामना
राजा दशरथ के पुत्र श्रीरामचन्द्र अपने पिता की प्रतिष्ठा और मर्यादा का ध्यान रखते हुए अब तक शांत खड़े थे। उनके नेत्रों में धैर्य था, मुख पर विनम्रता, और हृदय में गंभीरता। वे जानते थे कि सामने खड़े हैं जमदग्निनन्दन परशुराम — महातपस्वी, ब्राह्मणश्रेष्ठ और क्षत्रिय-विनाशक। इसलिए वे संकोचवश मौन थे। किंतु जब परशुराम के कठोर वचन बार-बार उनके पराक्रम को ललकारने लगे, तब रघुनन्दन का मौन टूट गया। उनके शांत नेत्रों में अब तेज चमक उठा, किंतु स्वर में अभी भी विनय का माधुर्य था।
उन्होंने आदरपूर्वक कहा कि भृगुनन्दन! आपने अपने पिता के वध का प्रतिशोध लेने के लिए क्षत्रियों का संहार किया—यह बात जगत में प्रसिद्ध है। हमने भी आपके उस महान पराक्रम को सुना है और वीर पुरुषों के लिए यह उचित ही माना है कि वे अपने वैर का प्रतिकार करें। श्रीराम की वाणी में सम्मान था, पर भीतर से उनका क्षत्रिय तेज जाग उठा था। उन्होंने आगे कहा कि वे क्षत्रिय धर्म से युक्त हैं, फिर भी ब्राह्मण को पूज्य मानकर अब तक मौन रहे। किंतु उन्हें असमर्थ समझकर तिरस्कार करना उचित नहीं। अब समय आ गया है कि उनका पराक्रम स्वयं सामने प्रकट हो।
यह कहते ही श्रीराम का स्वर बदल गया। उनकी भुजाएँ दृढ़ हो उठीं। उन्होंने क्रोध को संयमित रखते हुए परशुराम के हाथ से वह दिव्य धनुष और बाण ले लिया। उसी क्षण मानो एक अदृश्य प्रकाश-रेखा परशुराम से निकलकर श्रीराम में समा गई—वैष्णवी शक्ति अपने वास्तविक अधिष्ठान में लौट आई। वातावरण में एक अद्भुत कम्पन फैल गया। सभी उपस्थित लोग स्तब्ध रह गये।
श्रीराम ने उस धनुष को सहजता से चढ़ाया। प्रत्यंचा तनते ही आकाश में गर्जना-सी हुई। उन्होंने उस पर बाण चढ़ाया और परशुराम की ओर दृष्टि उठाई। उनका तेज अब सूर्य के समान प्रखर था। उन्होंने गंभीर स्वर में कहा कि ब्राह्मण होने के कारण वे पूज्य हैं और विश्वामित्र से उनका सम्बन्ध भी है, इसलिए वे इस प्राणहर बाण को उनके शरीर पर नहीं छोड़ सकते। किंतु यह दिव्य वैष्णव बाण निष्फल भी नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि या तो वे उनकी गमनशक्ति नष्ट कर दें या तप से अर्जित पुण्यलोकों को भस्म कर दें—क्योंकि यह बाण लक्ष्य भेद किए बिना लौटता नहीं।
जैसे ही श्रीराम उस धनुष के साथ खड़े हुए, तीनों लोकों में हलचल मच गई। देवता, ऋषि और ब्रह्माजी तक उस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए आ पहुँचे। गन्धर्वों की वीणाएँ थम गईं, अप्सराएँ विस्मय से ठिठक गईं, सिद्ध, चारण, किन्नर, यक्ष, नाग—सभी उस दिव्य क्षण के साक्षी बनने के लिए एकत्र हो गये। सबकी दृष्टि श्रीराम पर टिक गई। उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो स्वयं भगवान विष्णु पृथ्वी पर खड़े हों।
उधर परशुराम का तेज जैसे धीरे-धीरे विलीन हो चुका था। वे अब शांत, गंभीर और कुछ जड़वत् से प्रतीत हो रहे थे। उनके मुख पर आश्चर्य, विस्मय और आत्मबोध की छाया थी। उन्होंने कमलनयन श्रीराम की ओर देखा और धीमे स्वर में बोले कि पूर्वकाल में उन्होंने पृथ्वी को कश्यप ऋषि को दान दिया था। तब कश्यप ने उन्हें आदेश दिया था कि वे उनके राज्य में न रहें। उसी आज्ञा का पालन करते हुए वे कभी रात में पृथ्वी पर निवास नहीं करते। उन्होंने निवेदन किया कि उनकी गमनशक्ति नष्ट न की जाए, क्योंकि वे मन के समान वेग से अभी महेन्द्र पर्वत चले जाएंगे।
परशुराम ने आगे कहा कि उन्होंने तपस्या से जिन दिव्य लोकों को प्राप्त किया है, उन्हीं को श्रीराम अपने बाण से नष्ट कर दें। उनके स्वर में अब समर्पण था। उन्होंने स्वीकार किया कि जैसे ही श्रीराम ने धनुष चढ़ाया, उन्हें निश्चित हो गया कि सामने कोई साधारण राजकुमार नहीं, बल्कि मधु दैत्य का संहार करने वाले स्वयं भगवान विष्णु खड़े हैं। उन्होंने कहा कि उनके सामने पराजित होना लज्जा की बात नहीं, क्योंकि उन्हें पराजित करने वाले त्रिलोकीनाथ स्वयं श्रीहरि हैं।
परशुराम हाथ जोड़कर बोले कि अब वे बाण छोड़ दें; उसके बाद ही वे महेन्द्र पर्वत की ओर प्रस्थान करेंगे। उनके शब्दों में विनम्रता थी और हृदय में पूर्ण समर्पण।
श्रीराम ने गंभीरता से बाण छोड़ दिया। वह दिव्य बाण आकाश में बिजली की रेखा की भाँति दौड़ा और परशुराम के तप से अर्जित पुण्यलोकों को भस्म कर गया। उसी क्षण परशुराम ने शांत भाव से श्रीराम को प्रणाम किया और तीव्र गति से महेन्द्र पर्वत की ओर प्रस्थान कर गये।
उनके जाते ही वातावरण का अन्धकार मिट गया। दिशाएँ उज्ज्वल हो उठीं। देवताओं ने प्रसन्न होकर जयघोष किया। ऋषियों ने स्तुति की वर्षा कर दी। आकाश पुष्पों से भर गया। सभी ने श्रीराम के अनुपम पराक्रम और दिव्यता का गुणगान किया।
इस प्रकार परशुराम का तेज श्रीराम में समाकर उनका महेन्द्र पर्वत को प्रस्थान हुआ और रघुनन्दन श्रीराम की दिव्यता समस्त जगत् में प्रकट हो गई।
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अपनी समझ परखें
उपर्युक्त कथा के आधार पर निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों में सही उत्तर चुनिए—
प्रश्न 1. श्रीराम प्रारम्भ में परशुराम के सामने मौन क्यों रहे?
A. वे देवताओं की प्रतीक्षा कर रहे थे
B. वे धनुष चलाना नहीं चाहते थे
C. वे पिता की मर्यादा और ब्राह्मण सम्मान के कारण संकोच कर रहे थे
D. वे युद्ध से डर रहे थे
प्रश्न 2. श्रीराम ने परशुराम के किस कर्म की प्रशंसा की?
A. तपस्या करने की
B. पिता के वैर का प्रतिशोध लेने के लिए क्षत्रिय संहार करने की
C. पृथ्वी दान करने की
D. महेन्द्र पर्वत पर जाने की
प्रश्न 3. श्रीराम ने बाण चढ़ाकर परशुराम से क्या कहा?
A. वे उन्हें बन्दी बनाएँगे
B. वे उनके शरीर पर बाण नहीं छोड़ेंगे
C. वे युद्ध करेंगे
D. वे उन्हें दण्ड देंगे
प्रश्न 4. श्रीराम के अनुसार वैष्णव बाण कैसा था?
A. केवल आकाश में चलने वाला
B. बिना लक्ष्य भेदे लौट आने वाला
C. केवल चेतावनी देने वाला
D. कभी निष्फल न जाने वाला
प्रश्न 5. परशुराम का तेज किसमें समा गया?
A. आकाश में
B. देवताओं में
C. पृथ्वी में
D. श्रीराम में
प्रश्न 6. परशुराम ने पृथ्वी किसे दान की थी?
A. विश्वामित्र को
B. भृगु ऋषि को
C. कश्यप ऋषि को
D. वशिष्ठ को
प्रश्न 7. कश्यप की आज्ञा के कारण परशुराम ने कौन-सी प्रतिज्ञा की थी?
A. वे युद्ध नहीं करेंगे
B. वे रात में पृथ्वी पर निवास नहीं करेंगे
C. वे पृथ्वी पर नहीं रहेंगे
D. वे धनुष नहीं उठाएँगे
प्रश्न 8. परशुराम ने श्रीराम को किसका अवतार स्वीकार किया?
A. ब्रह्मा
B. विष्णु
C. शिव
D. इन्द्र
प्रश्न 9. श्रीराम के बाण से क्या नष्ट हुआ?
A. परशुराम का धनुष
B. महेन्द्र पर्वत
C. परशुराम का आश्रम
D. परशुराम के तप से प्राप्त पुण्यलोक
प्रश्न 10. बाण छोड़े जाने के बाद परशुराम कहाँ चले गये?
A. अयोध्या
B. हिमालय
C. मिथिला
D. महेन्द्र पर्वत