+91 8005792734
Contact Us
Contact Us
amita2903.aa@gmail.com
Support Email
Jhunjhunu, Rajasthan
Address
(67)
शिवधनुष का दिव्य रहस्य और श्रीराम का अलौकिक पराक्रम
जनकसभा का विशाल प्रांगण राजाओं, ऋषियों और वीरों से भरा हुआ था। वातावरण में उत्सुकता और गंभीरता का अद्भुत संगम था। सबकी दृष्टि उस दिव्य धनुष पर थी, जिसकी महिमा सुन-सुनकर असंख्य राजाओं के मन में चुनौती और आश्चर्य दोनों जागते थे। तभी राजा जनक की बात सुनकर महर्षि विश्वामित्र शांत, किंतु दृढ़ स्वर में बोले—“राजन्! आप श्रीराम को अपना वह धनुष दिखाइये।” उनके शब्दों में साधारण आग्रह नहीं, बल्कि एक दिव्य संकेत छिपा हुआ था, मानो उन्हें पहले से ही भविष्य का ज्ञान हो।
महर्षि की आज्ञा पाकर राजा जनक ने अपने मंत्रियों को आदेश दिया कि उस चन्दन और पुष्पमालाओं से सुसज्जित दिव्य धनुष को सभा में लाया जाए। मंत्री तुरंत नगर की ओर चले। कुछ ही देर बाद नगर से बाहर एक अद्भुत दृश्य दिखाई देने लगा। आठ पहियों वाले विशाल लोहे के संदूक में वह शिवधनुष रखा गया था। वह संदूक इतना विशाल और भारी थी कि पाँच हजार बलवान, दृढ़ शरीर वाले वीर पुरुष उसे किसी तरह ठेलते हुए आगे बढ़ा रहे थे। उनके माथे पर पसीना था, साँसें तेज चल रही थीं, और फिर भी वह संदूक मानो पर्वत के समान अचल लग रही थी।
जब वह लोहे की संदूक सभा के मध्य लाकर रखी गई, तो मंत्रियों ने आदरपूर्वक राजा जनक से कहा—“राजन्! मिथिलापति! यह वही श्रेष्ठ धनुष है, जिसे सभी राजाओं ने सम्मान दिया है। यदि आप इन दोनों राजकुमारों को दिखाना चाहते हैं, तो कृपया इन्हें दिखाइये।” उनके शब्दों में उस धनुष की महिमा और भय दोनों झलक रहे थे।
राजा जनक ने विनम्र भाव से हाथ जोड़कर महर्षि विश्वामित्र तथा श्रीराम और लक्ष्मण की ओर देखा। उनकी आँखों में गर्व भी था और चिंता भी। वे बोले—“हे ब्रह्मन्! यही वह दिव्य धनुष है, जिसका हमारे जनकवंश के राजाओं ने सदैव पूजन किया है। जिन महापराक्रमी राजाओं ने इसे उठाने का प्रयत्न किया, वे भी असफल होकर केवल इसका सम्मान करके लौट गये। देवता, असुर, राक्षस, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर और महानाग—कोई भी इसे चढ़ा नहीं सका। इस धनुष को खींचना, प्रत्यंचा चढ़ाना, इस पर बाण चढ़ाना या इसे हिलाना—यह सब मनुष्यों के लिए असंभव-सा है। फिर भी यह धनुष यहाँ लाया गया है। यदि आपकी आज्ञा हो, तो आप इन दोनों राजकुमारों को इसे दिखाइये।”
राजा जनक के शब्दों में वर्षों की प्रतीक्षा और संकल्प की गंभीरता थी। महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम की ओर देखकर प्रेमपूर्वक कहा—“वत्स राम! इस धनुष को देखो।” यह सुनते ही सभा में एकदम सन्नाटा छा गया। सबकी आँखें श्रीराम पर टिक गईं।
महर्षि की आज्ञा पाकर श्रीराम आगे बढ़े। उन्होंने शांत और विनम्र भाव से उस भारी संदूक को खोला। भीतर रखा हुआ शिवधनुष दिव्य आभा बिखेर रहा था। श्रीराम ने उसे ध्यान से देखा और अत्यंत सहज स्वर में कहा—“मैं इस धनुष को हाथ लगाता हूँ और इसे उठाने तथा चढ़ाने का प्रयास करूँगा।” उनके स्वर में न अहंकार था, न चुनौती—केवल सरल निश्चय था।
राजा जनक और महर्षि विश्वामित्र ने एक साथ कहा—“हाँ, ऐसा ही करो।” यह सुनते ही श्रीराम ने आगे बढ़कर धनुष को बीच से पकड़ा। जिस धनुष को हजारों वीर मिलकर भी हिला न सके थे, उसे श्रीराम ने सहजता से, मानो खेल-खेल में उठा लिया। सभा में बैठे लोग विस्मय से स्तब्ध रह गये। उनकी आँखें फैल गईं, श्वास थम-सी गई।
इसके बाद श्रीराम ने बिना किसी प्रयास के उस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा दी। यह दृश्य इतना अद्भुत था कि वहाँ उपस्थित हजारों लोग आश्चर्य से एक-दूसरे को देखने लगे। किसी को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह सब इतना सहज कैसे हो गया।
फिर श्रीराम ने उस धनुष को कान तक खींचा। उसी क्षण अचानक एक भयंकर ध्वनि हुई—मानो आकाश से वज्र गिर पड़ा हो, या कोई विशाल पर्वत बीच से फट गया हो। धनुष बीच से टूट गया। उस भयंकर गर्जना से पूरी सभा काँप उठी। पृथ्वी डोलने लगी, मानो भूकम्प आ गया हो। उस गूँज से चारों ओर भय और विस्मय का वातावरण फैल गया।
धनुष टूटने की उस भीषण ध्वनि से वहाँ उपस्थित लगभग सभी लोग मूर्च्छित होकर गिर पड़े। केवल महर्षि विश्वामित्र, राजा जनक, श्रीराम और लक्ष्मण ही शांत और अडिग खड़े रहे। कुछ समय बाद जब लोगों को चेत हुआ, तो वे भय और आश्चर्य से इधर-उधर देखने लगे।
राजा जनक की आँखों में अब आश्चर्य के साथ-साथ आनंद की चमक थी। उन्होंने हाथ जोड़कर महर्षि विश्वामित्र से कहा—“भगवन्! आज मैंने दशरथनन्दन श्रीराम का अद्भुत पराक्रम अपनी आँखों से देख लिया। महादेव के इस धनुष को चढ़ाना तो अचिन्त्य और अतर्कित घटना है। मेरी पुत्री सीता श्रीराम को पतिरूप में प्राप्त करके जनकवंश की कीर्ति को बढ़ाएगी। मैंने प्रतिज्ञा की थी कि सीता का विवाह उसी वीर से होगा, जो इस धनुष को चढ़ाएगा। आज मेरी वह प्रतिज्ञा सत्य हो गई। सीता मेरे प्राणों से भी बढ़कर है, और मैं उसे श्रीराम को समर्पित करूँगा।”
इसके बाद राजा जनक ने आगे कहा कि यदि अनुमति हो, तो वे अपने मंत्रियों को तुरंत अयोध्या भेजें, ताकि महाराज दशरथ को यह शुभ समाचार दिया जा सके और उन्हें मिथिला बुलाया जा सके। मंत्री शीघ्रता से जाएँ और विनम्र शब्दों में कहें कि आपके दोनों पुत्र विश्वामित्रजी के संरक्षण में सुरक्षित मिथिला पहुँच गए हैं, और अब सीता का विवाह श्रीराम से होने वाला है।
महर्षि विश्वामित्र ने प्रसन्न होकर “तथास्तु” कहा। राजा जनक ने तुरंत अपने मंत्रियों को आदेश दिया। मंत्री रथों पर सवार होकर उत्साह और आनंद के साथ अयोध्या की ओर चल पड़े। मिथिला की सभा में अब आश्चर्य, आनंद और दिव्यता का अद्भुत संगम था—क्योंकि शिवधनुष टूट चुका था, और श्रीराम-सीता विवाह का शुभ संयोग निश्चित हो चुका था।