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शुनःशेप का करुण संकल्प और तपस्वियों की अग्नि-परीक्षा

 

वन का वातावरण गम्भीर और मौन था। यज्ञ की समाप्ति के बाद अनेक वनवासी ऋषि अपने-अपने आश्रमों की ओर लौट रहे थे। उस समय महातेजस्वी विश्वामित्र उन सबको जाते हुए देख रहे थे। उनके मुख पर शांति थी, पर भीतर एक हलचल चल रही थी। उन्होंने गहरी सांस लेकर ऋषियों से कहा कि इस दक्षिण दिशा में रहना अब कठिन हो गया है। उनकी तपस्या में बार-बार विघ्न पड़ रहे हैं, और साधना का उद्देश्य ही बाधित हो रहा है। उन्होंने निश्चय किया कि अब वे किसी दूसरी दिशा में जाकर अपनी तपस्या को आगे बढ़ाएँगे।

 

विश्वामित्र ने पश्चिम दिशा का स्मरण किया—वह पवित्र स्थान जहाँ ब्रह्माजी के तीन पुष्कर स्थित थे। उन्होंने कहा कि वही स्थान तपस्या के लिए अत्यंत अनुकूल है, शांत है, और साधकों के लिए सुखद भी। यह कहकर वे वहाँ से चल पड़े। पुष्कर पहुँचकर उन्होंने फल-मूल का अल्प आहार ग्रहण किया और अत्यंत कठोर, दुर्जेय तपस्या में लीन हो गए। उनकी तपस्या की अग्नि मानो आकाश तक उठ रही थी।

 

उधर अयोध्या में महाराज अम्बरीष एक महान् यज्ञ की तैयारी कर रहे थे। पूरा राज्य उत्सव के रंग में रंगा हुआ था। वेद-मंत्रों की ध्वनि गूंज रही थी, ब्राह्मणों का सत्कार हो रहा था, और यज्ञ के लिए सब आवश्यक सामग्री एकत्र की जा रही थी। लेकिन देवताओं के स्वामी इन्द्र को यह यज्ञ असहज लगा। उन्होंने सोचा कि यह यज्ञ पूर्ण हुआ तो राजा का तेज और बढ़ जाएगा। उसी चिंता से उन्होंने यज्ञ के लिए लाए गए पशु को चुपके से चुरा लिया।

 

जब यज्ञ का समय निकट आया और यज्ञ-पशु नहीं मिला, तो सब ओर चिंता फैल गई। पुरोहित ने गंभीर स्वर में राजा से कहा कि यह अनिष्ट संकेत है। उन्होंने बताया कि यज्ञ-पशु का खो जाना राजा की बड़ी त्रुटि मानी जाती है और इससे अनेक दोष उत्पन्न होते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यज्ञ आरम्भ होने से पहले उस पशु को खोजकर लाना आवश्यक है, अन्यथा उसके स्थान पर किसी मनुष्य को पशु के रूप में लाना होगा—यही इस पाप का प्रायश्चित्त है।

 

राजा अम्बरीष धर्मनिष्ठ थे। उन्होंने निश्चय किया कि वे किसी भी प्रकार यज्ञ को अधूरा नहीं रहने देंगे। उन्होंने हजारों गौओं के मूल्य पर किसी पुरुष को खरीदने का निर्णय लिया। वे अपने रथ पर बैठकर देश-देशांतर में घूमने लगे। नगर, वन, आश्रम—जहाँ भी संभव था, उन्होंने खोज की; पर कोई भी व्यक्ति इस कठिन कार्य के लिए तैयार नहीं हुआ।

 

अंततः वे भृगुतुंग पर्वत पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने महर्षि ऋचीक को देखा, जो अपनी पत्नी और पुत्रों के साथ शांत भाव से बैठे थे। राजा ने विनम्रतापूर्वक प्रणाम किया और उनका कुशल समाचार पूछा। फिर उन्होंने अपनी आवश्यकता बताते हुए निवेदन किया कि यदि वे एक लाख गौएँ लेकर अपने किसी एक पुत्र को उन्हें दे दें, तो उनका यज्ञ पूर्ण हो सकेगा।

 

ऋचीक मुनि यह सुनकर गंभीर हो गए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे अपने ज्येष्ठ पुत्र को किसी भी परिस्थिति में नहीं दे सकते। उसी समय उनकी पत्नी ने भी भावुक होकर कहा कि उनका सबसे छोटा पुत्र शुक्र उन्हें अत्यंत प्रिय है, इसलिए वे उसे भी नहीं देंगी। उन्होंने कहा कि सामान्यतः ज्येष्ठ पुत्र पिता को प्रिय होता है और सबसे छोटा पुत्र माता के हृदय के निकट होता है, इसलिए वे अपने कनिष्ठ पुत्र की रक्षा अवश्य करेंगी।

 

उनके शब्दों से वातावरण में भारी मौन छा गया। तभी बीच में बैठा मझला पुत्र शुनःशेप शांत भाव से उठ खड़ा हुआ। उसके चेहरे पर न भय था, न असमंजस—केवल एक गहरी गंभीरता थी। उसने विनम्र स्वर में कहा कि पिता ने बड़े पुत्र को अयोग्य बताया है और माता ने छोटे को। इसलिए दोनों की दृष्टि में मझला पुत्र ही उपयुक्त ठहरता है। उसने स्वयं को देने का प्रस्ताव रखा और कहा कि राजा उसे अपने साथ ले जाएँ।

 

उस क्षण सब स्तब्ध रह गए। माता की आँखें भर आईं, पिता मौन हो गए, और राजा अम्बरीष के मन में आश्चर्य और संतोष दोनों उत्पन्न हुए। उन्होंने अत्यंत प्रसन्न होकर एक करोड़ स्वर्णमुद्राएँ, रत्नों के ढेर और एक लाख गौएँ देकर शुनःशेप को स्वीकार किया।

 

राजा ने शुनःशेप को अपने रथ पर बैठाया। रथ तेजी से आगे बढ़ने लगा। पहियों की गति के साथ मानो एक बालक का जीवन भी एक अज्ञात दिशा में जा रहा था। पीछे रह गए माता-पिता की आँखों में आँसू थे, और आगे बढ़ते रथ में बैठा शुनःशेप शांत, गंभीर और नियति को स्वीकार करने के भाव में लीन था। उस यात्रा में करुणा, धर्म और त्याग—तीनों साथ चल रहे थे।