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शुनःशेप की पुकार और विश्वामित्र का कठोर धर्मसंकल्प
दोपहर का समय था। सूर्य आकाश के मध्य में स्थिर होकर तपन बिखेर रहा था। महाराज अम्बरीष का रथ धीरे-धीरे पुष्कर तीर्थ के निकट आकर रुका। लंबी यात्रा से थके हुए घोड़े हाँफ रहे थे और सैनिक भी विश्राम की इच्छा कर रहे थे। राजा ने वहीं विश्राम का आदेश दिया। शांत पुष्कर तीर्थ के चारों ओर तपस्वियों के आश्रम थे, हवा में वेद-मंत्रों की ध्वनि और तपस्या की गंभीरता व्याप्त थी।
इसी बीच शुनःशेप, जो राजा के साथ आया था, भीतर से अत्यंत व्याकुल हो उठा। उसका मन भय और असहायता से भर गया। वह धीरे-धीरे ज्येष्ठ पुष्कर की ओर बढ़ा, जहाँ अनेक ऋषि तपस्या कर रहे थे। वहाँ उसने अपने मामा विश्वामित्र को देखा। उन्हें देखते ही उसके हृदय में दबी हुई वेदना उमड़ पड़ी। भूख, प्यास और थकान से उसका शरीर काँप रहा था। वह दौड़कर विश्वामित्र के पास पहुँचा और उनकी गोद में गिर पड़ा। उसके चेहरे पर गहरी उदासी छा गई थी, आँखों में आँसू भर आए थे।
कंपित स्वर में उसने कहा कि वह अब पूर्णतः असहाय है। न माता उसकी रक्षा कर सकी, न पिता; भाइयों से भी उसे सहारा नहीं मिला। वह बोला कि अब उसके लिए कोई नहीं बचा, केवल वही उसके आश्रय हैं। उसने विनती की कि वे धर्म के मार्ग से उसकी रक्षा करें। उसकी आवाज में भय भी था और विश्वास भी। उसने कहा कि राजा अम्बरीष का यज्ञ भी सफल हो जाए और वह स्वयं भी इस विपत्ति से मुक्त होकर दीर्घायु प्राप्त करे, तपस्या करे और अंत में स्वर्गलोक को प्राप्त हो—ऐसी कृपा वे करें। उसने विश्वामित्र से प्रार्थना की कि जैसे पिता अपने पुत्र को संकट से बचाता है, वैसे ही वे उसे इस भयानक परिस्थिति से बचाएँ।
उसकी करुण पुकार सुनकर विश्वामित्र का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने उसे स्नेहपूर्वक उठाया, सांत्वना दी और आश्वासन दिया कि वह निराश न हो। फिर उन्होंने अपने पुत्रों को बुलाया। उनके स्वर में गंभीरता और आदेश दोनों थे। उन्होंने कहा कि पिता पुत्रों को केवल स्नेह के लिए नहीं, बल्कि धर्म और परलोक हित की पूर्ति के लिए जन्म देते हैं, और अब वही समय आ गया है। उन्होंने समझाया कि यह बालक उनकी शरण में आया है और उसकी रक्षा करना आवश्यक है। यदि उनके पुत्र अपने जीवन का त्याग कर यज्ञ-पशु बन जाएँ, तो शुनःशेप बच जाएगा, राजा का यज्ञ भी पूर्ण हो जाएगा, देवता भी तृप्त होंगे और उनकी आज्ञा का पालन भी हो जाएगा।
परंतु विश्वामित्र के पुत्रों के हृदय में यह बात स्वीकार्य नहीं हुई। उनमें अहंकार और विरोध की भावना जाग उठी। उन्होंने कठोर शब्दों में कहा कि अपने अनेक पुत्रों को छोड़कर किसी दूसरे के एक पुत्र की रक्षा करना उचित नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि जहाँ अपने पुत्रों की रक्षा करना आवश्यक हो, वहाँ दूसरे के पुत्र के लिए अपने प्राण देना अनुचित है। उनके शब्दों में असम्मान झलक रहा था। उन्होंने अपने पिता के आदेश को तुच्छ मान लिया।
उनकी यह अवज्ञा सुनकर विश्वामित्र के नेत्र क्रोध से लाल हो उठे। उनका तपोबल मानो प्रज्वलित हो गया। उन्होंने कठोर स्वर में कहा कि उनके पुत्रों ने धर्मविरुद्ध और निंदनीय बात कही है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि उनकी आज्ञा का उल्लंघन करना गंभीर अपराध है। क्रोध में उन्होंने उन्हें शाप दे दिया कि वे सब वसिष्ठ के पुत्रों की भाँति नीच जातियों में जन्म लेंगे और लंबे समय तक पृथ्वी पर कुत्ते का मांस खाने वाली जातियों में रहेंगे। यह शाप सुनते ही वातावरण भय से भर गया।
इसके बाद विश्वामित्र ने अपना ध्यान फिर शुनःशेप की ओर लगाया। उन्होंने उसे शांत किया और कहा कि वह न डरे। उन्होंने उसे एक उपाय बताया। उन्होंने कहा कि जब यज्ञ में उसे पवित्र कुश के पाश से बाँधा जाए, लाल पुष्पों की माला पहनाई जाए और लाल चन्दन लगाया जाए, तब वह यूप के समीप खड़ा होकर इन्द्र और विष्णु की स्तुति करे। उन्होंने उसे दो दिव्य गाथाएँ सिखाईं और कहा कि इनका श्रद्धापूर्वक गान करने से वह संकट से मुक्त हो जाएगा।
शुनःशेप ने ध्यानपूर्वक वे गाथाएँ ग्रहण कीं। उसके मन में अब भय के स्थान पर आशा जाग उठी। वह तुरंत राजा अम्बरीष के पास गया और विनम्रता से कहा कि अब वे शीघ्र यज्ञ के लिए चलें। राजा उसके आत्मविश्वास को देखकर प्रसन्न हुए और बिना विलंब किए यज्ञशाला की ओर चल पड़े।
यज्ञशाला में सब तैयारियाँ की गईं। ऋत्विजों की अनुमति लेकर शुनःशेप को पवित्र कुश के पाश से बाँधा गया। उसे लाल वस्त्र पहनाए गए, पुष्पों की माला पहनाई गई और यूप से बाँध दिया गया। वह बालक बँधा हुआ खड़ा था, पर उसके चेहरे पर भय नहीं था—केवल श्रद्धा और विश्वास था। उसने मधुर और स्पष्ट स्वर में इन्द्र और उपेन्द्र की स्तुति आरम्भ की। उसकी वाणी में भक्ति थी, करुणा थी और आत्मसमर्पण था।
उसकी स्तुति सुनकर सहस्र नेत्रधारी इन्द्र प्रसन्न हो उठे। उन्होंने प्रकट होकर शुनःशेप को दीर्घायु का वरदान दिया। उसी क्षण यज्ञ पूर्ण हो गया और राजा अम्बरीष को भी उत्तम फल प्राप्त हुआ। वातावरण में प्रसन्नता फैल गई। शुनःशेप का जीवन बच गया, और राजा का यज्ञ भी सफल हुआ।
इसके बाद विश्वामित्र पुनः पुष्कर में लौटे। उन्होंने अपने मन को स्थिर किया और पहले से भी अधिक कठोर तपस्या में लीन हो गए। एक हज़ार वर्षों तक वे तप की अग्नि में स्वयं को तपाते रहे। उनके भीतर करुणा, क्रोध, धर्म और संकल्प—सब एक साथ जल रहे थे, और उनकी तपस्या की ज्योति दूर-दूर तक प्रकाश फैला रही थी।