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शोक और पश्चाताप — कौसल्या और दशरथ के अश्रुओं की रात

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शोक और पश्चाताप — कौसल्या और दशरथ के अश्रुओं की रात

अयोध्या का राजमहल उस रात किसी श्मशान की नीरवता में डूबा हुआ था। विशाल प्रांगण, जहाँ कभी उत्सवों की गूँज सुनाई देती थी, आज शोक की मौन चादर ओढ़े खड़े थे। दीपक जल रहे थे, पर उनका प्रकाश भी मानो दुःख के अंधकार को दूर नहीं कर पा रहा था।

महारानी कौसल्या के कठोर और पीड़ाभरे वचन सुनकर महाराज दशरथ का हृदय भीतर तक टूट चुका था। वे पहले ही राम-वियोग की अग्नि में जल रहे थे, और अब पत्नी के कटु शब्दों ने उस पीड़ा को और भी असहनीय बना दिया था।

शोक और चिंता के बोझ तले उनकी चेतना मानो डगमगा गई। उनकी इन्द्रियाँ शिथिल पड़ गईं और वे कुछ समय के लिए मूर्च्छित हो गए। बहुत देर बाद जब उन्हें होश आया, तो उन्होंने गहरी और तप्त साँसें लीं। उनकी आँखें धीरे-धीरे खुलीं और उन्होंने अपने पास बैठी कौसल्या को देखा।

किन्तु होश में आने के बाद भी उनके मन को शांति नहीं मिली। वे फिर से चिंता के अथाह सागर में डूब गए। उनके हृदय में एक पुरानी स्मृति जाग उठी—वर्षों पहले अनजाने में किया गया एक ऐसा अपराध, जिसने आज उनके जीवन को दुःख के इस भयंकर मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था।

राम का वियोग और उस पुराने अपराध का पश्चाताप—ये दोनों अग्नियाँ उनके हृदय को एक साथ जला रही थीं। उनका शरीर काँप रहा था, मुख झुका हुआ था और आँखों से निरंतर आँसू बह रहे थे।

राजा दशरथ ने काँपते हुए हाथ जोड़ लिए। वे अब केवल अयोध्या के महाराज नहीं थे, बल्कि अपने अपराधबोध और पुत्र-वियोग से टूटे हुए एक असहाय पिता थे।

करुण स्वर में उन्होंने कहा, “कौसल्ये! मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ, मुझ पर क्रोधित मत हो। देखो, मैंने तुम्हारे सामने हाथ जोड़ दिए हैं। तुम तो सदैव सब पर दया करने वाली हो। तुम दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझती हो, फिर आज मेरे प्रति इतनी कठोर क्यों हो गई हो?”

उन्होंने भर्राए हुए स्वर में आगे कहा, “धर्म का मार्ग जानने वाली स्त्रियों के लिए पति, चाहे गुणवान हो या गुणहीन, देवता के समान होता है। तुम सदैव धर्मपरायण रही हो। तुम संसार में उचित और अनुचित का भेद जानती हो।”

उनकी आँखों से आँसू टपकने लगे।

“मैं जानता हूँ कि तुम राम के वियोग में दुःखी हो, लेकिन यह भी समझो कि मैं भी उसी पीड़ा से टूट चुका हूँ। इसलिए मुझसे ऐसे कठोर वचन मत कहो।”

राजा दशरथ की यह करुण पुकार सुनकर कौसल्या का क्रोध पिघलने लगा। उनका हृदय ग्लानि से भर उठा। उनकी आँखों से आँसू ऐसे बहने लगे, जैसे वर्षा के दिनों में छत की नालियों से जलधारा बहती है।

उन्हें लगा कि शोक ने उन्हें अपने धर्म और मर्यादा से भटका दिया था।

वे तुरंत उठीं, दशरथ के जुड़े हुए हाथों को अपने मस्तक से लगाया और काँपते हुए स्वर में बोलीं, “स्वामी! यह आप क्या कर रहे हैं? आपके सामने तो मुझे ही हाथ जोड़कर खड़ा होना चाहिए। यदि आप मुझसे ही याचना करेंगे, तो मैं यह अपमान कैसे सह पाऊँगी?”

वे भूमि पर झुक गईं और दशरथ के चरणों में सिर रखकर बोलीं, “यदि मुझसे कोई अपराध हुआ है, तो मैं क्षमा की अधिकारी हूँ, दंड की नहीं।”

कौसल्या की वाणी में अब पश्चाताप था।

“स्त्री के लिए उसका पति इस लोक और परलोक—दोनों में सबसे बड़ा सहारा होता है। जिस स्त्री को उसका बुद्धिमान पति स्वयं मनाए, वह अपने आचरण पर लज्जित हो जाती है।”

उन्होंने आँसू पोंछते हुए कहा, “मैं जानती हूँ कि आप धर्मज्ञ हैं, सत्यवादी हैं। मैंने जो कटु वचन कहे, वे मेरे हृदय की वास्तविक भावना नहीं थे। वे तो पुत्र-वियोग की असहनीय वेदना से निकल पड़े।”

वे कुछ क्षण रुकीं और फिर बोलीं, “शोक मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। यह धैर्य को नष्ट कर देता है। यह ज्ञान और विवेक को ढँक देता है। यह व्यक्ति से उसकी सोचने-समझने की शक्ति छीन लेता है।”

उन्होंने गहरी साँस ली।

“शत्रु के प्रहार को सहना सरल है, लेकिन भाग्य से मिला हुआ थोड़ा-सा शोक भी सहना अत्यंत कठिन होता है।”

कौसल्या की आँखें दूर कहीं खो गईं।

“राम को वन गए आज पाँच रातें बीत चुकी हैं। मैं हर दिन, हर पहर, हर क्षण उनकी प्रतीक्षा करती हूँ। मेरे लिए ये पाँच रातें पाँच वर्षों के समान बीती हैं।”

उन्होंने अपने हृदय पर हाथ रखा।

“मैं जितना राम का स्मरण करती हूँ, मेरा शोक उतना ही बढ़ता जाता है। जैसे अनगिनत नदियों का जल समुद्र को और अधिक विशाल बना देता है, वैसे ही राम की स्मृतियाँ मेरे दुःख को बढ़ाती जा रही हैं।”

धीरे-धीरे दिन ढलने लगा। सूर्य की किरणें मद्धिम पड़ गईं और अयोध्या पर रात्रि उतर आई।

कौसल्या के मधुर और पश्चाताप से भरे शब्दों ने राजा दशरथ के हृदय को कुछ शांति दी। उनके मन में एक ओर पत्नी के स्नेह की अनुभूति थी, तो दूसरी ओर राम-वियोग का अथाह दुःख।

हर्ष और शोक की इन दो विपरीत धाराओं के बीच झूलते हुए, अंततः थके हुए महाराज दशरथ की आँखें बंद हो गईं।

किन्तु वह नींद विश्राम की नहीं थी; वह एक ऐसे पिता की थकी हुई चेतना थी, जो अपने प्रिय पुत्र के वियोग और अपने ही कर्मों के पश्चाताप से धीरे-धीरे टूट रहा था।