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श्रवण कुमार का अंतिम विदा — अंधे माता-पिता का हृदयविदारक विलाप

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श्रवण कुमार का अंतिम विदा — अंधे माता-पिता का हृदयविदारक विलाप

 

रात का अंधकार वन में गहराता जा रहा था। चारों ओर एक भयावह सन्नाटा पसरा हुआ था, मानो स्वयं प्रकृति भी किसी अनिष्ट की साक्षी बनकर स्तब्ध खड़ी हो। राजा दशरथ का हृदय अपराधबोध से जल रहा था। उनके हाथों अनजाने में एक ऐसा पाप हो गया था, जिसकी भरपाई संसार की कोई शक्ति नहीं कर सकती थी।

काँपते हुए कदमों से वे उस अंधे वृद्ध दम्पति को सहारा देकर उस स्थान पर ले आए, जहाँ उनका इकलौता पुत्र श्रवण कुमार धरती पर निश्चेष्ट पड़ा था। उसके शरीर से बहा हुआ रक्त मिट्टी में मिल चुका था। उसके वस्त्र और मृगचर्म इधर-उधर बिखरे पड़े थे। जिस पुत्र के स्पर्श से उन वृद्ध माता-पिता का जीवन चलता था, आज वही पुत्र मृत्यु की गोद में सोया हुआ था।

जब वृद्ध माता-पिता ने अपने पुत्र के निर्जीव शरीर को छुआ, तो उनका हृदय जैसे एक ही क्षण में टूट गया। वे घबराकर उसके पास झुक गए और फिर उसके शरीर पर गिर पड़े। उनकी आँखें तो पहले ही अंधकार में डूबी थीं, पर आज उनके जीवन का अंतिम प्रकाश भी बुझ चुका था।

वृद्ध पिता ने काँपते हुए हाथों से पुत्र के मुख को सहलाया। उनके स्वर में करुणा, प्रेम और असहायता का ऐसा मिश्रण था कि पत्थर भी पिघल जाए।

“बेटा, आज क्या बात है? तुम रोज़ की तरह मेरे चरण स्पर्श क्यों नहीं करते? तुम मुझसे बात क्यों नहीं कर रहे? धरती पर इस तरह क्यों लेटे हो? क्या तुम हमसे नाराज़ हो गए हो?”

कुछ क्षण प्रतीक्षा करने के बाद भी जब कोई उत्तर नहीं मिला, तो उनका हृदय और अधिक तड़प उठा।

“यदि मैं तुम्हें प्रिय नहीं हूँ, तो अपनी माँ की ओर तो देखो। वह तुम्हारे बिना एक क्षण भी नहीं रह सकती। उसके हृदय से लग जाओ, उसे सांत्वना दे दो। बेटा, एक बार तो बोलो…”

वन की निस्तब्धता में केवल उनका विलाप गूँज रहा था।

उन्हें वे रातें याद आने लगीं जब श्रवण मधुर स्वर में वेदों, शास्त्रों और पुराणों का पाठ करता था। उसकी वाणी सुनकर उनका मन प्रसन्न हो जाता था।

“अब रात के समय मैं किसके मुख से वे मधुर शास्त्रचर्चाएँ सुनूँगा? कौन मुझे धर्म और ज्ञान की बातें सुनाकर मेरा मन बहलाएगा?”

पिता की स्मृतियाँ एक-एक करके उमड़ने लगीं।

“अब कौन स्नान करके, संध्या-वंदन और अग्निहोत्र पूर्ण करके मेरे पास बैठेगा? जब मैं दुःखी होता था, तो कौन मेरे आँसू पोंछकर मुझे धैर्य देता था? अब कौन मेरी सेवा करेगा?”

वृद्ध पिता का गला भर आया।

“मैं तो बूढ़ा और असहाय हूँ। अपने लिए भोजन भी नहीं जुटा सकता। अब कौन वन से कंद, मूल और फल लाकर मुझे अतिथि के समान प्रेम से खिलाएगा?”

फिर उन्होंने अपनी पत्नी की ओर देखा। वह पुत्र के शरीर से लिपटकर रो रही थी।

“तुम्हारी यह माँ अंधी है, वृद्ध है, दीन है। उसका पूरा संसार तुम ही थे। अब मैं स्वयं अंधा होकर इसका पालन-पोषण कैसे करूँगा?”

उनकी आवाज़ टूटने लगी।

“बेटा, अभी मत जाओ। यमराज के घर आज मत जाओ। यदि जाना ही है, तो कल हमारे साथ चलना। हमें अकेला छोड़कर मत जाओ।”

माता-पिता की पीड़ा असहनीय होती जा रही थी।

“हम दोनों पहले ही अनाथ हो चुके हैं। तुम्हारे बिना हमारा जीवन किस काम का? अब हम भी शीघ्र ही तुम्हारे पीछे-पीछे यमलोक की ओर चल पड़ेंगे।”

वृद्ध पिता के हृदय में एक असंभव आशा अभी भी जीवित थी।

“जब मैं यमराज के सामने जाऊँगा, तो उनसे विनती करूँगा कि वे मेरे अपराध को क्षमा कर दें और मेरे पुत्र को वापस लौटा दें। मेरा पुत्र जीवित रहेगा तो हमारे बुढ़ापे का सहारा बनेगा।”

उन्हें विश्वास था कि धर्मराज दयालु हैं।

“वे धर्म के रक्षक हैं, न्यायप्रिय हैं। शायद एक बार इस असहाय पिता की प्रार्थना सुन लें।”

फिर उन्होंने अपने पुत्र के निष्पाप जीवन को स्मरण किया।

“बेटा, तुमने कभी किसी का अहित नहीं किया। तुम निर्दोष थे। तुम्हारा वध एक क्षत्रिय के हाथों हुआ है। इसलिए मेरे सत्य और तपस्या के प्रभाव से तुम्हें वही श्रेष्ठ लोक प्राप्त हों, जो युद्धभूमि में वीरगति पाने वाले शूरवीरों को प्राप्त होते हैं।”

उनकी वाणी अब आशीर्वाद में बदल गई।

“तुम्हें वही लोक मिलें, जिन्हें महान राजा सगर, शैब्य, दिलीप, जनमेजय, नहुष और धुन्धुमार जैसे धर्मात्मा राजाओं ने प्राप्त किया।”

वे आगे बोले—

“जिस परमब्रह्म की प्राप्ति कठोर तपस्या और स्वाध्याय से होती है, वही परम पद तुम्हें भी मिले। भूमिदान करने वाले, यज्ञ करने वाले, एकनिष्ठ जीवन जीने वाले, गौदान करने वाले और गुरु-सेवा में जीवन समर्पित करने वाले पुण्यात्माओं को जो गति मिलती है, वही तुम्हें भी प्राप्त हो।”

पुत्र के प्रति गर्व उनके शब्दों में झलक रहा था।

“हमारे तपस्वी कुल में जन्म लेने वाला कोई भी व्यक्ति कभी अधोगति को प्राप्त नहीं हो सकता। यदि किसी को बुरी गति मिलेगी, तो वह वही होगा जिसने तुम्हें बिना अपराध के मार डाला है।”

यह कहते-कहते वे फिर फूट-फूटकर रोने लगे। उनका विलाप सुनकर वन के पक्षी भी मौन हो गए थे। मानो सम्पूर्ण प्रकृति उस दुःख में सहभागी बन गई हो।

कुछ समय बाद, भारी मन से उन्होंने अपने पुत्र को अंतिम जलांजलि देने की तैयारी की। उनके हाथ काँप रहे थे, पर वे अपने पुत्र के प्रति अंतिम कर्तव्य निभाना चाहते थे।

उसी समय एक अद्भुत चमत्कार हुआ।

श्रवण कुमार के संचित पुण्यों का प्रभाव प्रकट हुआ। उसका शरीर दिव्य तेज से चमकने लगा। क्षणभर में उसने एक दिव्य स्वरूप धारण कर लिया। आकाश से एक सुंदर विमान उतरा, जिसमें देवराज इन्द्र स्वयं उपस्थित थे।

वृद्ध माता-पिता कुछ समझ पाते, उससे पहले श्रवण उनके सामने दिव्य रूप में खड़ा था। उसके चेहरे पर अलौकिक शांति और तेज था।

उसने प्रेम से अपने माता-पिता को संबोधित किया।

“पिताजी, माताजी, शोक मत कीजिए। मैंने आपकी सेवा करके यह महान स्थान प्राप्त किया है। आपकी सेवा ही मेरा सबसे बड़ा धर्म थी। उसी का फल मुझे आज प्राप्त हुआ है।”

उसके शब्द अमृत के समान थे।

“अब आप दोनों भी अधिक समय तक दुःख न सहें। शीघ्र ही मेरे पास आ जाइएगा।”

वृद्ध माता-पिता के आँसू रुक नहीं रहे थे, पर अब उनमें केवल दुःख नहीं था; पुत्र के गौरव और उसकी दिव्य प्राप्ति का संतोष भी था।

श्रवण ने अंतिम बार अपने माता-पिता को प्रणाम किया। फिर वह उस दिव्य विमान पर आरूढ़ हुआ। विमान धीरे-धीरे आकाश की ओर उठने लगा। उसकी दिव्य आभा दूर तक फैल गई।

माता-पिता अपने पुत्र की ओर हाथ फैलाए खड़े रहे, जब तक कि वह दृष्टि से ओझल नहीं हो गया।

उस रात वन में केवल एक पुत्र का शरीर नहीं गया था; उस रात माता-पिता के जीवन का आधार, उनकी आशा, उनका सुख और उनका संसार भी उनसे विदा हो गया था। किंतु अपनी अद्वितीय मातृ-पितृ भक्ति के कारण श्रवण कुमार अमर हो गया। उसका नाम सदियों तक पुत्रधर्म और सेवा के सर्वोच्च आदर्श के रूप में स्मरण किया जाता रहेगा।