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श्रीकृष्णावतार — करुणा, प्रेम और धर्मसंस्थापन की दिव्य लीलाएँ

 

जब-जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है, तब-तब भगवान अपने भक्तों की रक्षा और दुष्टों के विनाश के लिए अवतरित होते हैं। “परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्…” इस दिव्य वचन को सत्य करते हुए अखिलरसामृतसिन्धु, षडैश्वर्य से सम्पन्न, सर्वलोकमहेश्वर भगवान श्रीकृष्ण भाद्रपद मास की कृष्णाष्टमी की पावन अर्धरात्रि में कंस के अंधकारमय कारागार में प्रकट हुए। उस समय वातावरण अद्भुत था—चारों ओर दिव्य प्रकाश फैल गया, पहरेदार गहरी निद्रा में सो गये, और माता देवकी तथा वसुदेवजी ने चतुर्भुज नारायण स्वरूप भगवान के दर्शन किए।

 

माता देवकी का हृदय वात्सल्य से भर उठा। उन्होंने करबद्ध होकर प्रार्थना की—“प्रभो! आप अपना यह दिव्य स्वरूप छिपाकर साधारण शिशु बन जाइए, अन्यथा कंस आपको पहचान लेगा।” भक्तवत्सल भगवान ने तुरंत ही अपना चतुर्भुज स्वरूप त्यागकर एक सामान्य बालक का रूप धारण कर लिया।

 

भगवान की आज्ञा पाकर वसुदेवजी ने शिशु को टोकरी में रखा और यमुना पार कर नन्दबाबा के घर पहुँचे। उस समय यमुना जी ने भी मार्ग दिया, शेषनाग ने छत्र बनकर रक्षा की। वसुदेवजी ने बालक को यशोदा माता के पास सुला दिया और बदले में यशोदात्मजा जगदम्बा महामाया को लेकर कारागार लौट आये।

 

गोकुल में नन्दबाबा के घर अपार आनंद छा गया। जातकर्मादि महोत्सव मनाये गये, ढोल-नगाड़े बजे, गोप-गोपियाँ नाच उठीं। किसी को ज्ञात नहीं था कि यह साधारण बालक नहीं, स्वयं जगत के पालनहार हैं।

 

भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाएँ अद्भुत थीं। पालने में झूलते हुए ही उन्होंने लोकबालघ्नी रुधिराशना पिशाचिनी पूतना को उसके दूध के साथ ही प्राणहरण करके मोक्ष दे दिया। छोटे-से बालक ने शकट भंग कर दिया। तृणावर्त का घमंड चूर किया, बकासुर और वत्सासुर का वध किया। धेनुकासुर और प्रलम्बासुर को सपरिवार मारकर गोकुल को भयमुक्त किया।

 

जब गोप दावानल से घिर गये, तब बालक कृष्ण ने उस अग्नि को पीकर सबकी रक्षा की। कालिय नाग के फणों पर नृत्य करके उसके विष का नाश किया। श्रीनन्दबाबा को अजगर से छुड़ाया।

 

गोपियों का प्रेम अलौकिक था। उन्होंने भगवान को पतिरूप से पाने के लिए व्रत किया। भगवान श्रीकृष्ण ने उनके प्रेम से प्रसन्न होकर उन्हें वर दिया। भगवान ने यज्ञ-पत्नियों पर कृपा कर उनके जीवन को धन्य किया।

 

जब इन्द्र के अभिमान का नाश करने का समय आया, तब भगवान ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उँगली पर उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की। तब इन्द्र और कामधेनु ने आकर भगवान का यज्ञाभिषेक किया। शरद ऋतु की चाँदनी रातों में भगवान ने ब्रज-सुन्दरियों के साथ रास-क्रीड़ा की, जिससे प्रेम का दिव्य रहस्य प्रकट हुआ। इसके बाद दुष्ट शंखचूड़ यक्ष, अरिष्ट और केशी का वध किया।

 

कुछ समय बाद अक्रूरजी मथुरा से वृन्दावन आये और भगवान श्रीकृष्ण तथा बलरामजी को मथुरा ले गये। मथुरा पहुँचकर दोनों भाइयों ने नगर की शोभा देखी और कुवलयापीड़ हाथी, मुष्टिक, चाणूर और अंत में कंस का संहार किया। कंस के वध के बाद माता देवकी और पिता वसुदेव को कारागार से मुक्त कराया। राजा उग्रसेन को सिंहासन पर बैठाया।

 

इसके बाद भगवान ने गुरु सान्दीपनि के आश्रम में विद्याध्ययन किया और गुरुदक्षिणा स्वरूप उनके मृत पुत्र को जीवित करके लौटा दिया। मथुरा में रहते हुए उन्होंने उद्धव और बलरामजी के साथ यदुवंशियों का हित किया।

 

जरासंध कई बार विशाल सेनाएँ लेकर आया, किन्तु भगवान ने हर बार उसका पराभव कर पृथ्वी का भार हल्का किया। कालयवन को मुचुकुन्द से भस्म कराया। द्वारकापुरी बसाकर रातों-रात सभी यदुवंशियों को वहाँ पहुँचा दिया। स्वर्ग से कल्पवृक्ष और सुधर्मा सभा ले आये।

 

भगवान ने अनेक शत्रुओं को पराजित किया और श्रीरुक्मिणी का हरण किया। बाणासुर के साथ युद्ध में महादेवजी पर ऐसा बाण छोड़ा कि वे जँभाई लेने लगे और बाणासुर की भुजाएँ काट डालीं। प्राग्ज्योतिषपुर के राजा भौमासुर का वध करके सोलह हजार कन्याओं को स्वीकार किया।

 

शिशुपाल, पौण्ड्रक, शाल्व, दन्तवक्त्र, मुर, पंचजन आदि दैत्यों का वध करके उनके बल-पौरुष का नाश किया। महाभारत युद्ध में पाण्डवों को निमित्त बनाकर पृथ्वी का भारी भार उतार दिया। अंत में ब्राह्मणों के शाप के बहाने उद्दण्ड हो चुके यदुवंश का संहार कराया।

 

श्रीउद्धवजी की जिज्ञासा पर भगवान ने आत्मज्ञान और धर्मनिर्णय का उपदेश दिया। इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण की अनन्त, अद्भुत और अलौकिक लीलाएँ जगत के प्राणियों को पवित्र करने वाली हैं। उनके जीवन की प्रत्येक घटना करुणा, प्रेम, धर्म और पराक्रम का दिव्य संदेश देती है।