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श्रीबदरीपति (नर-नारायण) अवतार

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श्रीबदरीपति (नर-नारायण) अवतार — तप, करुणा और दिव्य विजय की अद्भुत गाथा

यह कथा केवल एक अवतार की नहीं, बल्कि तप की शक्ति, अहंकार के विनाश और भगवान की असीम करुणा की कथा है। इसमें हमें यह भी देखने को मिलता है कि भगवान अपने भक्तों और धर्म की रक्षा के लिए किस प्रकार युग-युग में विभिन्न रूप धारण करते हैं।

 

धर्म और मूर्ति के घर जन्मे दिव्य तपस्वी

जब संसार में लोगों को आत्मतत्त्व का ज्ञान देने की आवश्यकता हुई, तब दक्षप्रजापति की कन्या मूर्ति के गर्भ से भगवान ने दो दिव्य रूपों में अवतार लिया—नर और नारायण

ये कोई साधारण ऋषि नहीं थे। ये स्वयं भगवान के अवतार थे, जो मनुष्यों को यह सिखाने आए थे कि कर्म करते हुए भी कर्मबंधन से कैसे मुक्त हुआ जा सकता है।

उन्होंने लोगों को ऐसा भगवदाराधनरूप कर्म सिखाया जो मनुष्य को संसार के बंधनों से छुड़ाकर नैष्कर्म्य अवस्था अर्थात् कर्मफल से पूर्णतः मुक्त स्थिति तक पहुँचा देता है।

केवल उपदेश ही नहीं दिया, बल्कि स्वयं भी उसका पालन किया। वे हिमालय की गोद में स्थित पवित्र बदरिकाश्रम में घोर तप और साधना में लीन रहने लगे।

 

इन्द्र का भय

स्वर्गलोक में बैठे देवराज इन्द्र ने जब नर-नारायण के तप का प्रभाव देखा तो उनके मन में भय उत्पन्न हो गया।

इन्द्र का स्वभाव था कि जब भी कोई महान तपस्वी कठोर तप करता, उन्हें अपना स्वर्गसिंहासन डोलता हुआ प्रतीत होता।

उन्होंने सोचा—

“यदि इनका तप और बढ़ गया तो कहीं मेरा पद ही न छिन जाए!”

यह विचार आते ही इन्द्र चिंतित हो उठे।

उन्होंने तुरंत कामदेव को बुलाया और कहा कि किसी भी प्रकार नर-नारायण की तपस्या भंग करनी होगी।

 

कामदेव का आक्रमण

कामदेव अपने पूरे दल-बल के साथ निकल पड़ा।

उसके साथ थीं स्वर्ग की सबसे सुंदर अप्सराएँ।

वसन्त ऋतु को भी साथ ले लिया गया, ताकि चारों ओर प्रेम और आकर्षण का वातावरण बन जाए।

मन्द-मन्द सुगन्धित मलय पवन बहने लगी।

चारों ओर फूलों की सुगंध फैल गई।

अप्सराओं की मोहक मुस्कानें और कटाक्ष ऐसे थे मानो प्रेम के तीक्ष्ण बाण हों।

कामदेव को अपने सामर्थ्य पर अत्यधिक गर्व था।

उसे विश्वास था कि संसार में कोई भी उसके प्रभाव से बच नहीं सकता।

लेकिन वह यह नहीं जानता था कि जिनके सामने वह खड़ा है, वे स्वयं जगत के स्वामी हैं।

 

भगवान की अद्भुत प्रतिक्रिया

जब कामदेव और उसके साथी नर-नारायण के आश्रम पहुँचे, तब भगवान ने उनकी सारी चाल समझ ली।

किन्तु आश्चर्य की बात यह थी कि उन्हें तनिक भी क्रोध नहीं आया।

न कोई भय।

न कोई विचलन।

न कोई आश्चर्य।

उनका तप वैसे ही अचल रहा जैसे पर्वत पर बहती हवा का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

तब करुणामूर्ति भगवान नारायण मुस्कराए।

उन्होंने भय से काँपते हुए कामदेव, मलय पवन और अप्सराओं को स्नेहपूर्वक संबोधित करते हुए कहा—

“हे मदन! हे मन्दमलय मारुत! हे देवांगनाओ! डरो मत। हमारा आतिथ्य स्वीकार करो। उसे ग्रहण किये बिना ही जाकर हमारा आश्रम सूना मत करो।”

यह सुनकर सब स्तब्ध रह गए।

वे सोच रहे थे कि भगवान क्रोधित होंगे, शाप देंगे या उन्हें दण्डित करेंगे।

लेकिन यहाँ तो उनका स्वागत किया जा रहा था।

भगवान की यह करुणा देखकर सभी लज्जा से सिर झुकाकर खड़े रह गए।

 

देवताओं का गर्व चूर हो गया

भगवान ने उनकी लज्जा दूर करने के लिए अपनी योगमाया से ऐसी असंख्य दिव्य रमणियाँ प्रकट कर दीं, जिनका सौन्दर्य वर्णन से परे था।

वे अद्भुत वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित थीं।

उनकी छटा ऐसी थी मानो स्वयं लक्ष्मीजी अनेक रूप धारण करके वहाँ उपस्थित हो गई हों।

उनकी दिव्य सुगन्ध वातावरण में फैल गई।

अप्सराएँ, जो अपने सौन्दर्य पर गर्व करती थीं, उनके सामने फीकी पड़ गईं।

कामदेव, जो अपने आकर्षण पर अभिमान करता था, स्वयं विस्मित रह गया।

देवताओं की कान्ति मानो लुप्त हो गई।

उनका अहंकार टूट चुका था।

अब उन्हें समझ में आ गया कि भगवान के सामने उनकी सारी शक्तियाँ तुच्छ हैं।

 

उर्वशी का प्रादुर्भाव

भगवान ने हँसते हुए उन विनीत देवताओं से कहा—

“इनमेंसे किसी एकको, जो तुम्हारे अनुरूप हो स्वीकार कर लो। वह स्वर्गलोककी भूषण होगी।”

अब देवताओं में अहंकार का नामोनिशान नहीं था।

वे हाथ जोड़कर बोले—

“जो आज्ञा।”

उन्होंने भगवान को प्रणाम किया और उन दिव्य स्त्रियों में से सर्वश्रेष्ठ उर्वशी को साथ लेकर स्वर्गलोक लौट गये।

जब वे इन्द्र के पास पहुँचे, तब इन्द्र को भी समझ में आ गया कि जिन नर-नारायण को वह साधारण तपस्वी समझ रहा था, वे वास्तव में सर्वशक्तिमान भगवान हैं।

 

सहस्रकवची दैत्य की भयंकर कथा

यहाँ कथा का एक और अत्यन्त रोचक और वीरतापूर्ण प्रसंग आता है।

जैमिनीय भारत के अनुसार एक भयंकर दैत्य था—सहस्रकवची

उसने हजारों वर्षों तक सूर्यदेव की कठोर तपस्या की।

सूर्य भगवान प्रसन्न हुए और वर माँगने को कहा।

दैत्य ने अत्यन्त विचित्र वरदान माँगा—

उसके शरीर पर एक हजार कवच हों।

और प्रत्येक कवच तभी टूट सके जब कोई योद्धा उससे लगातार एक हजार वर्ष तक युद्ध करे।

लेकिन वरदान यहीं समाप्त नहीं हुआ।

उसने यह भी माँगा कि जैसे ही कोई योद्धा उसका एक कवच तोड़े, उसी क्षण वह योद्धा मर जाए।

सूर्यदेव ने उसे यह वरदान दे दिया।

अब वह लगभग अजेय बन गया।

देवता, ऋषि और समस्त लोक उसके आतंक से पीड़ित होने लगे।

 

नर-नारायण का महायुद्ध

धर्म की रक्षा के लिए नर और नारायण ने उस दैत्य का सामना किया।

लेकिन समस्या यह थी कि एक कवच तोड़ने के लिए एक हजार वर्षों तक युद्ध करना पड़ता था, और कवच टूटते ही योद्धा मर जाता था।

तब दोनों भाइयों ने एक अद्भुत उपाय किया।

पहले नर युद्ध करते।

वे हजार वर्षों तक लड़ते और एक कवच तोड़ देते।

कवच टूटते ही वे मृतक के समान हो जाते।

तब नारायण अपने दिव्य मन्त्रबल से उन्हें पुनः जीवित कर देते।

फिर नारायण स्वयं हजार वर्षों तक युद्ध करते।

दूसरा कवच टूटता और वे मृतक के समान हो जाते।

तब नर उन्हें जीवित करते।

इस प्रकार दोनों भाई बारी-बारी से लड़ते रहे।

एक कवच टूटता।

एक भाई गिरता।

दूसरा उसे पुनर्जीवित करता।

फिर युद्ध प्रारम्भ हो जाता।

कल्पना कीजिए—यह संघर्ष कुछ दिनों या वर्षों का नहीं था, बल्कि लाखों वर्षों तक चलने वाला दिव्य युद्ध था।

 

अंतिम कवच और दैत्य का पलायन

धीरे-धीरे दैत्य के नौ सौ निन्यानवे कवच टूट गये।

अब केवल एक अंतिम कवच शेष रह गया था।

दैत्य समझ गया कि अब उसका अंत निकट है।

वह भयभीत हो उठा।

जो कभी अहंकार में डूबा हुआ था, अब प्राण बचाने के लिए भाग खड़ा हुआ।

भागते-भागते वह सूर्यदेव में जाकर लीन हो गया।

इस प्रकार उसका तत्काल विनाश नहीं हो सका।

इसके बाद नर-नारायण पुनः बदरिकाश्रम लौट गये और तपस्या में लीन हो गये।

 

द्वापर युग में कथा की पूर्णता

समय बीतता गया।

त्रेता युग भी समाप्त हो गया।

फिर आया द्वापर युग।

वही सहस्रकवची दैत्य पुनर्जन्म लेकर कर्ण बना।

इस जन्म में भी वह जन्म से ही दिव्य कवच और कुण्डल धारण करके पैदा हुआ था।

उधर नर और नारायण भी पुनः अवतरित हुए।

नर बने अर्जुन और नारायण बने श्रीकृष्ण

महाभारत के युद्ध में वही अधूरा कार्य पूर्ण हुआ।

जिस दैत्य का अंत नर-नारायण के समय नहीं हो पाया था, उसका अंत अब कृष्ण और अर्जुन के द्वारा हुआ।

इस प्रकार युगों पहले आरम्भ हुई लीला द्वापर युग में पूर्ण हुई।

 

कथा का संदेश

यह कथा हमें सिखाती है कि तप, भक्ति और भगवान की शरण में स्थित व्यक्ति को कोई भी शक्ति विचलित नहीं कर सकती। कामदेव का गर्व, देवताओं का अभिमान और सहस्रकवची दैत्य का अहंकार—सभी अंततः भगवान की महिमा के सामने नष्ट हो गये। साथ ही यह भी स्पष्ट होता है कि भगवान का न्याय तत्काल दिखाई न दे, परन्तु वह कभी अधूरा नहीं रहता; आवश्यकता पड़ने पर वे युगों बाद भी धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश का कार्य पूर्ण करते हैं।