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अथ नवमोऽध्याय
अध्याय 9 — राजविद्या राजगुह्य योग
परम गोपनीय ज्ञान और ईश्वर के विराट् स्वरूप का रहस्य
श्रीभगवानुवाच
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥१॥
भावार्थ :
श्रीभगवान् कहते हैं—हे अर्जुन! तुम्हारे मन में मेरे प्रति किसी प्रकार का दोषभाव नहीं है, इसलिए मैं तुम्हें ऐसा अत्यंत गूढ़ ज्ञान बताऊँगा, जिसमें केवल सिद्धान्त ही नहीं, बल्कि उसके वास्तविक अनुभव का मार्ग भी सम्मिलित है। इस ज्ञान को सही रूप से समझ लेने पर मनुष्य दुःख, अज्ञान और संसार के बंधनों से मुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ता है।
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्॥२॥
भावार्थ :
यह ज्ञान सभी विद्याओं में श्रेष्ठ है और सभी रहस्यों में सबसे गहन है। यह मनुष्य के भीतर पवित्रता उत्पन्न करता है और धर्म के अनुरूप जीवन जीने का मार्ग दिखाता है। इसकी विशेषता यह है कि इसे केवल पढ़ना ही नहीं, बल्कि साधना और अनुभव के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से समझा जा सकता है। इसका अभ्यास सरल है और इससे प्राप्त होने वाला सत्य कभी नष्ट नहीं होता।
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥३॥
भावार्थ :
हे अर्जुन! जो लोग इस आध्यात्मिक मार्ग पर श्रद्धा नहीं रखते और इसके सत्य को स्वीकार करने का प्रयास नहीं करते, वे परमात्मा की प्राप्ति से दूर रह जाते हैं। परिणामस्वरूप वे जन्म और मृत्यु के निरंतर चलने वाले संसार-चक्र में ही भटकते रहते हैं।
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्वस्थितः॥४॥
भावार्थ :
भगवान् कहते हैं—मैं अपने अव्यक्त स्वरूप से पूरे संसार में व्याप्त हूँ। संसार के सभी प्राणी मेरी सत्ता पर आश्रित हैं और मेरे ही अस्तित्व से उनका जीवन संभव है। फिर भी मेरा परम स्वरूप किसी एक प्राणी या वस्तु तक सीमित नहीं है और न ही मैं सांसारिक रूप में उनमें बँधा हुआ हूँ।
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः॥५॥
भावार्थ :
भगवान् अपनी अद्भुत ईश्वरीय शक्ति का रहस्य बताते हुए कहते हैं कि वास्तव में समस्त प्राणी जिस परम सत्ता पर निर्भर दिखाई देते हैं, वह सत्ता स्वयं किसी सीमित स्थान में बँधी नहीं है। वही सबका पालन करती है, सबकी उत्पत्ति का आधार है और फिर भी स्वयं किसी प्राणी के भीतर सीमित होकर नहीं रहती। यही परमात्मा की दिव्य योगशक्ति का रहस्य है।
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥६॥
भावार्थ :
जैसे वायु निरंतर आकाश में रहती है, उसी प्रकार संसार के सभी जीव परमात्मा की सत्ता में स्थित हैं। वायु पूरे आकाश में घूमती रहती है, फिर भी आकाश उससे बँधता नहीं; उसी तरह सभी प्राणी परमात्मा पर आश्रित हैं, पर परमात्मा उनके सीमित रूपों से बँधा नहीं है।
सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और पुनः लय का रहस्य
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥७॥
भावार्थ :
हे अर्जुन! एक कल्प के समाप्त होने पर संसार के सभी प्राणी मेरी प्रकृति में विलीन हो जाते हैं। जब नए कल्प का आरंभ होता है, तब वही जीव और सृष्टि फिर से प्रकट होते हैं। इस प्रकार सृष्टि का प्रकट होना और प्रकृति में लीन होना निरंतर चलता रहता है।
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥८॥
भावार्थ :
मैं अपनी प्रकृति को आधार बनाकर बार-बार सम्पूर्ण प्राणी-जगत् को प्रकट करता हूँ। जीव अपने पूर्व कर्मों और प्रकृति के प्रभावों से बँधे होने के कारण इस सृष्टि-व्यवस्था में अपने-आप ही प्रवाहित होते रहते हैं। इस प्रकार संसार का निर्माण एक निश्चित व्यवस्था के अनुसार बार-बार होता है।
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु॥९॥
भावार्थ :
हे अर्जुन! यद्यपि सृष्टि की यह पूरी व्यवस्था मेरे द्वारा संचालित होती है, फिर भी उसके कार्य मुझे बाँध नहीं सकते। इसका कारण यह है कि मैं उन कर्मों में किसी व्यक्तिगत स्वार्थ या आसक्ति से जुड़ा हुआ नहीं हूँ। जैसे कोई साक्षी घटनाओं को देखता है पर उनसे बँधता नहीं, वैसे ही परमात्मा कर्मों के बीच रहते हुए भी उनसे निर्लिप्त रहता है।
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरं।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥१०॥
भावार्थ :
हे अर्जुन! मेरी अध्यक्षता और उपस्थिति में प्रकृति इस सम्पूर्ण चर-अचर संसार को उत्पन्न करती है। संसार की उत्पत्ति, परिवर्तन और उसके निरंतर चलते रहने के पीछे परमात्मा की सत्ता ही मूल आधार है। इसी व्यवस्था के कारण जगत् का चक्र निरंतर चलता रहता है।
परमात्मा के मानवीय रूप को न समझने वाले और दिव्य प्रकृति के भक्त
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥११॥
भावार्थ :
जो लोग भगवान् के वास्तविक स्वरूप को नहीं समझते, वे उनके मनुष्य रूप को देखकर उन्हें सामान्य मनुष्य मान लेते हैं। वे यह नहीं पहचान पाते कि मानव रूप में दिखाई देने वाली यह सत्ता वास्तव में सम्पूर्ण प्राणियों की परम नियामक और ईश्वरस्वरूप है। बाहरी रूप को देखकर परम सत्य को सीमित मान लेना अज्ञान का परिणाम है।
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥१२॥
भावार्थ :
जिन लोगों का जीवन अज्ञान, स्वार्थ और अहंकार से संचालित होता है, उनकी इच्छाएँ और कर्म अंततः उन्हें वास्तविक शांति नहीं दे पाते। उनका ज्ञान भी उन्हें सत्य तक नहीं ले जाता, क्योंकि उनका मन मोह और भ्रम से घिरा रहता है। ऐसी प्रवृत्तियाँ मनुष्य को आसुरी और विनाशकारी जीवन-पद्धति की ओर ले जाती हैं।
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥१३॥
भावार्थ :
इसके विपरीत, जिन महान् व्यक्तियों ने अपने जीवन में दैवी गुणों को अपनाया है, वे परमात्मा को समस्त प्राणियों का आदि कारण और अविनाशी सत्य समझते हैं। इसलिए उनका मन अनेक सांसारिक आकर्षणों में भटकने के बजाय परमात्मा की ओर स्थिर रहता है और वे समर्पित भाव से उनकी उपासना करते हैं।
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढ़व्रताः।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥१४॥
भावार्थ :
ऐसे भक्त निरंतर भगवान् के नाम, गुण और महिमा का स्मरण करते हैं। वे अपने जीवन को ईश्वर-प्राप्ति की दिशा में लगाने का दृढ़ संकल्प रखते हैं। प्रेमपूर्वक भगवान् को प्रणाम करते हुए और मन को उनसे जोड़कर वे निरंतर उनकी उपासना करते हैं।
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ते यजन्तो मामुपासते।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्॥१५॥
भावार्थ :
कुछ साधक ज्ञान के माध्यम से परमात्मा की उपासना करते हैं और उन्हें अपने तथा परम सत्य के बीच एकत्व के रूप में अनुभव करना चाहते हैं। कुछ अन्य उन्हें अपने से अलग मानकर भक्ति करते हैं। अनेक प्रकार की साधनाओं के बावजूद उनका लक्ष्य उसी सर्वव्यापक परमेश्वर की उपासना करना है, जो सम्पूर्ण विश्व में अनेक रूपों से प्रकट है।
सम्पूर्ण विश्व में भगवान् की व्यापक सत्ता
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्॥१६॥
भावार्थ :
भगवान् बताते हैं कि यज्ञ से जुड़ी प्रत्येक पवित्र वस्तु और प्रत्येक आवश्यक तत्व में उनकी ही सत्ता विद्यमान है। यज्ञ की विधि, उसमें प्रयुक्त सामग्री, मन्त्र, अग्नि और उसमें अर्पित की जाने वाली आहुति—इन सबका मूल आधार वही परमात्मा हैं। अर्थात् उपासना के प्रत्येक अंग के पीछे उसी एक परम सत्ता का अस्तित्व है।
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः।
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च॥१७॥
भावार्थ :
भगवान् कहते हैं कि इस सम्पूर्ण जगत् के पिता, माता, पालन करने वाले और मूल पूर्वज भी वही हैं। जिसे जानना चाहिए, जो पवित्र है और जो आध्यात्मिक ज्ञान का आधार है, वह भी वही परम सत्य है। वेदों में व्यक्त ज्ञान और पवित्र ॐकार में भी उसी परम सत्ता का प्रकाश है।
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥१८॥
भावार्थ :
परमात्मा ही मनुष्य की अंतिम प्राप्ति का लक्ष्य हैं और वही सम्पूर्ण जगत् का पालन करने वाले हैं। वे सबके स्वामी और कर्मों के साक्षी हैं। जीवों को आश्रय देने वाले, संकट में शरण देने वाले और बिना किसी स्वार्थ के हित करने वाले भी वही हैं। सृष्टि का आरंभ, उसका आधार, उसका लय और उसके पीछे रहने वाला अविनाशी कारण भी वही परम सत्ता है।
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥१९॥
भावार्थ :
भगवान् बताते हैं कि प्रकृति की विभिन्न शक्तियों के पीछे भी उनकी ही सत्ता कार्य करती है। सूर्य की ऊष्मा, जल का चक्र और वर्षा की व्यवस्था उसी परम शक्ति से संचालित है। जीवन देने वाला अमृत और जीवन का अंत करने वाली मृत्यु—दोनों उसी व्यापक सत्ता के अधीन हैं। जो प्रकट रूप में सत्य है और जो अप्रकट है, दोनों में परमात्मा की सत्ता विद्यमान है।
सकाम उपासना और निष्काम भक्ति के परिणाम
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा-
यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक-
मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्॥२०॥
भावार्थ :
जो लोग वेदों में बताए गए कर्मकाण्डों का पालन करके यज्ञ करते हैं और स्वर्ग की इच्छा रखते हैं, वे अपने पुण्य के बल पर स्वर्गलोक को प्राप्त कर सकते हैं। वहाँ उन्हें अपने पुण्यों के अनुसार दिव्य सुख और भोग प्राप्त होते हैं। परंतु यह प्राप्ति उनकी इच्छा और पुण्यकर्म के फल से जुड़ी होती है।
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं-
क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना-
गतागतं कामकामा लभन्ते॥२१॥
भावार्थ :
स्वर्ग में प्राप्त सुख स्थायी नहीं होते। जब पुण्यकर्म का फल समाप्त हो जाता है, तब उन जीवों को फिर से पृथ्वी के संसार में लौटना पड़ता है। इस प्रकार जो लोग मुख्य रूप से सांसारिक या स्वर्गीय सुखों की इच्छा से कर्म करते हैं, वे जन्म और मृत्यु के चक्र से स्थायी रूप से मुक्त नहीं हो पाते।
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥२२॥
भावार्थ :
जो भक्त किसी अन्य आश्रय की इच्छा किए बिना निरंतर परमात्मा का स्मरण और उपासना करते हैं तथा अपना मन पूरी तरह भगवान् में लगा देते हैं, उनके जीवन में आवश्यक आध्यात्मिक साधनों और उनकी रक्षा का भार स्वयं भगवान् संभालते हैं। अर्थात् जो भक्त पूर्ण विश्वास से भगवान् पर आश्रित होता है, उसके योग और क्षेम की चिंता भगवान् स्वयं करते हैं।
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥२३॥
भावार्थ :
हे अर्जुन! जो लोग श्रद्धा के साथ अन्य देवताओं की उपासना करते हैं, उनकी उपासना भी अंततः उसी परम सत्ता की ओर जाती है, क्योंकि सभी देवशक्तियों का मूल आधार परमात्मा ही हैं। लेकिन वे परम सत्य की पूर्ण समझ के बिना उपासना करते हैं, इसलिए उनकी साधना का स्वरूप अभी पूर्ण ज्ञान से युक्त नहीं है।
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते॥२४॥
भावार्थ :
सभी यज्ञों का वास्तविक भोक्ता और स्वामी परमात्मा ही हैं। लेकिन जब उपासक उस परम सत्य को उसके वास्तविक स्वरूप में नहीं पहचानता, तब उसकी साधना का अंतिम उद्देश्य स्पष्ट नहीं हो पाता। इसी कारण वह परम प्राप्ति के बजाय अपने कर्मों के अनुसार मिलने वाले सीमित फलों तक ही रह जाता है।
यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्॥२५॥
भावार्थ :
मनुष्य जिस लक्ष्य को अपना आराध्य बनाकर उपासना करता है, उसकी साधना उसी के अनुरूप फल देती है। देवताओं की उपासना करने वाले देवताओं के लोक को, पितरों की उपासना करने वाले पितृलोक को और अन्य शक्तियों की उपासना करने वाले उन्हीं से संबंधित फल प्राप्त करते हैं। लेकिन जो भक्त परमात्मा को ही अपना सर्वोच्च लक्ष्य मानकर उनकी उपासना करते हैं, वे परमात्मा की प्राप्ति की ओर जाते हैं।
सरल और निष्काम भक्ति की महिमा
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥२६॥
भावार्थ :
भगवान् को भक्ति के लिए बड़े-बड़े साधनों की आवश्यकता नहीं है। यदि कोई भक्त शुद्ध मन और प्रेम से एक पत्ता, फूल, फल या थोड़ा-सा जल भी अर्पित करता है, तो भगवान् उसके पीछे छिपी श्रद्धा और प्रेम को स्वीकार करते हैं। यहाँ वस्तु की कीमत नहीं, बल्कि भक्त के भाव की पवित्रता महत्वपूर्ण है।
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥२७॥
भावार्थ :
हे अर्जुन! जीवन में जो भी कार्य तुम करते हो, जो भोजन करते हो, जो यज्ञ या हवन करते हो, जो दान देते हो और जो तप या साधना करते हो—उन सबको भगवान् को समर्पित भाव से करो। जब मनुष्य अपने प्रत्येक कर्म को ईश्वर को अर्पित कर देता है, तब उसके कर्म केवल व्यक्तिगत स्वार्थ का साधन न रहकर साधना का रूप ले लेते हैं।
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः।
सन्न्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥२८॥
भावार्थ :
जब मनुष्य अपने सभी कर्मों और उनके परिणामों को भगवान् के प्रति समर्पित कर देता है, तब धीरे-धीरे वह कर्मों के शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के बंधनों से ऊपर उठने लगता है। उसका मन समर्पण और त्याग की भावना से शुद्ध होता है और अंततः वह परमात्मा की प्राप्ति के योग्य बनता है।
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥२९॥
भावार्थ :
भगवान् सभी प्राणियों के प्रति समान भाव रखते हैं। उनके लिए कोई स्वभावतः प्रिय या अप्रिय नहीं है। फिर भी जो भक्त प्रेम और श्रद्धा से भगवान् का स्मरण करते हैं, उनके हृदय में भगवान् की अनुभूति अधिक स्पष्ट रूप से प्रकट होती है। भक्ति मनुष्य और परमात्मा के बीच एक गहरा आत्मिक संबंध स्थापित करती है।
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥३०॥
भावार्थ :
यदि कोई व्यक्ति अपने पिछले जीवन में बहुत गलत आचरण करता रहा हो, लेकिन अब पूरे मन से परमात्मा की ओर मुड़कर अनन्य भाव से उनकी भक्ति करने लगे, तो उसके वर्तमान आध्यात्मिक संकल्प को महत्व देना चाहिए। उसकी दिशा बदल चुकी है और उसने परमात्मा को अपना सर्वोच्च लक्ष्य मानने का दृढ़ निश्चय किया है। सच्ची भक्ति मनुष्य के जीवन में परिवर्तन का मार्ग खोल सकती है।
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥३१॥
भावार्थ :
ऐसा भक्त धीरे-धीरे अपने आचरण को भी धर्म और सद्गुणों के अनुरूप बना लेता है और स्थायी शांति की ओर बढ़ता है। भगवान् अर्जुन से कहते हैं कि तुम दृढ़ विश्वास के साथ यह बात कह सकते हो कि जो व्यक्ति सच्चे भाव से मेरी शरण में आता है, उसका आध्यात्मिक प्रयास व्यर्थ नहीं जाता।
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥३२॥
भावार्थ :
हे अर्जुन! जो भी व्यक्ति पूरी श्रद्धा से परमात्मा की शरण ग्रहण करता है, वह अपनी सामाजिक स्थिति, जन्म या जीवन की पूर्व परिस्थितियों के कारण परमात्मा की प्राप्ति से वंचित नहीं रहता। भगवान् की भक्ति सभी के लिए खुला मार्ग है। सच्ची शरणागति मनुष्य को परम लक्ष्य की ओर ले जा सकती है।
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥३३॥
भावार्थ :
जब भगवान् की शरण ग्रहण करके साधारण परिस्थितियों में रहने वाला व्यक्ति भी परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है, तब पुण्यशील और भक्तिपूर्ण जीवन जीने वालों के लिए तो यह मार्ग और भी स्वाभाविक है। इसलिए मनुष्य को इस अस्थायी और पूर्ण सुख न देने वाले संसार में रहते हुए अपने जीवन को परमात्मा की भक्ति और साधना में लगाना चाहिए।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण:॥३४॥
भावार्थ :
भगवान् अध्याय के अंत में भक्ति का सरल मार्ग बताते हैं—अपने मन को भगवान् में लगाओ, उनके भक्त बनो, श्रद्धा से उनकी पूजा करो और उन्हें प्रणाम करो। अपने मन और जीवन को परमात्मा के प्रति समर्पित करके यदि मनुष्य उन्हें ही अपना सर्वोच्च लक्ष्य बना लेता है, तो वह अंततः परमात्मा की प्राप्ति की ओर अग्रसर होता है।
अध्याय 9 का सार — भक्ति, समर्पण और परमात्मा की सर्वव्यापकता
इस अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि परमात्मा सम्पूर्ण सृष्टि के मूल आधार हैं और समस्त चर-अचर जगत् उनकी सत्ता पर आश्रित है। वे सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और लय के कारण होते हुए भी अपने स्वरूप से कर्मों में आसक्त नहीं होते।
भगवान् यह भी स्पष्ट करते हैं कि केवल बाहरी कर्म या किसी विशेष फल की इच्छा से की गई उपासना मनुष्य को स्थायी मुक्ति नहीं देती। स्वर्ग जैसे सुख भी पुण्य समाप्त होने पर समाप्त हो जाते हैं। इसके विपरीत, अनन्य और निष्काम भक्ति मनुष्य को परमात्मा के साथ जोड़ती है।
इस अध्याय का विशेष संदेश यह है कि भगवान् को प्राप्त करने के लिए बाहरी वैभव आवश्यक नहीं है। प्रेमपूर्वक अर्पित किया गया छोटा-सा पत्र, पुष्प, फल या जल भी भगवान् स्वीकार करते हैं। जीवन का प्रत्येक कर्म यदि ईश्वर को समर्पित भाव से किया जाए, तो वही कर्म साधना बन जाता है।
अंततः भगवान् मनुष्य को अपने मन, कर्म और जीवन को परमात्मा के प्रति समर्पित करने का मार्ग बताते हैं। इस प्रकार राजविद्या और राजगुह्य का सार यह है कि परमात्मा सर्वत्र हैं, भक्ति सबके लिए सुलभ है और निष्काम समर्पण मनुष्य को परम शांति तथा परम लक्ष्य की ओर ले जाता है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराजगुह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः॥९॥
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