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दैवी गुणों से मुक्ति और आसुरी प्रवृत्तियों से पतन
श्रीभगवानुवाच
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥१॥
भावार्थ :
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—मनुष्य के भीतर निर्भयता, मन की शुद्धता, आत्मज्ञान प्राप्त करने के मार्ग में दृढ़ निष्ठा, उचित पात्र को श्रद्धापूर्वक दान देना, इन्द्रियों पर संयम रखना, यज्ञादि श्रेष्ठ कर्म करना, शास्त्रों का अध्ययन करना, तप का पालन करना और मन-वचन-कर्म में सरलता रखना—ये सभी दैवी गुण हैं। ऐसे गुण मनुष्य के जीवन को सत्य, संयम और आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाते हैं।
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥२॥
भावार्थ :
मन, वाणी और कर्म से किसी को कष्ट न पहुँचाना अहिंसा है। सत्य बोलना, किसी के अपकार करने पर भी अनावश्यक क्रोध न करना, अपने कर्मों के अहंकार को छोड़ देना, मन को शांत रखना और दूसरों की निंदा से दूर रहना भी दैवी गुण हैं। सभी प्राणियों के प्रति करुणा, विषयों के प्रति अनावश्यक लालसा का अभाव, विनम्रता, अनुचित कार्यों से लज्जा और व्यर्थ की चंचलता से बचना भी श्रेष्ठ मनुष्य के लक्षण हैं।
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥३॥
भावार्थ :
श्रेष्ठता की ओर ले जाने वाला आत्मबल, दूसरों की भूलों को क्षमा करने की भावना, कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखना, बाहरी और आंतरिक पवित्रता, किसी के प्रति शत्रुता न रखना तथा अपने गुणों और सम्मान का घमंड न करना—ये सभी दैवी सम्पदा के लक्षण हैं। ऐसे गुणों से युक्त व्यक्ति विनम्र, संयमी और कल्याणकारी जीवन जीता है।
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्॥४॥
भावार्थ :
हे पार्थ! दूसरों को दिखाने के लिए धर्म या सद्गुणों का प्रदर्शन करना, घमंड करना, अपने सामर्थ्य और उपलब्धियों का अभिमान रखना, शीघ्र क्रोधित होना, कठोर वाणी बोलना और सत्य को समझने के प्रति अज्ञान में रहना—ये आसुरी प्रवृत्ति के प्रमुख लक्षण हैं।
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव॥५॥
भावार्थ :
दैवी गुण मनुष्य को बंधनों से मुक्त करके परम कल्याण और मुक्ति की ओर ले जाते हैं, जबकि आसुरी गुण उसे मोह, कर्मबंधन और अधोगति में बाँधते हैं। इसलिए हे अर्जुन! तुम्हें किसी प्रकार का शोक नहीं करना चाहिए, क्योंकि तुम्हारे भीतर दैवी गुणों की प्रधानता है।
आसुरी स्वभाव और उसके पतनकारी परिणाम
द्वौ भूतसर्गौ लोकऽस्मिन्दैव आसुर एव च।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ में शृणु॥६॥
भावार्थ :
हे अर्जुन! संसार में मनुष्यों की प्रवृत्तियाँ मुख्यतः दो प्रकार की मानी गई हैं—दैवी और आसुरी। दैवी गुणों का विस्तार से वर्णन पहले किया जा चुका है। अब मैं तुम्हें आसुरी स्वभाव वाले लोगों की प्रवृत्तियों और उनके आचरण के बारे में विस्तार से बताता हूँ।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥७॥
भावार्थ :
आसुरी स्वभाव वाले लोग यह समझने में असमर्थ रहते हैं कि कौन-सा कर्म करना उचित है और किन कर्मों से दूर रहना चाहिए। इसलिए उनके जीवन में न बाहरी और आंतरिक पवित्रता रहती है, न श्रेष्ठ आचरण और न सत्य के प्रति निष्ठा। उनके निर्णय प्रायः स्वार्थ और इच्छाओं से संचालित होते हैं।
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्॥८॥
भावार्थ :
आसुरी दृष्टि वाले लोग संसार को सत्य और किसी उच्च व्यवस्था पर आधारित नहीं मानते। वे कहते हैं कि जगत् का कोई वास्तविक आधार या परम नियंता नहीं है और यह केवल भौतिक कारणों तथा इच्छाओं के कारण अस्तित्व में आया है। ऐसी दृष्टि मनुष्य को जीवन के आध्यात्मिक उद्देश्य से दूर कर देती है।
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः॥९॥
भावार्थ :
ऐसी विकृत सोच को सत्य मानकर चलने वाले लोग धीरे-धीरे विवेक और आत्मिक मूल्यों से दूर हो जाते हैं। उनकी बुद्धि संकुचित हो जाती है और वे कठोर तथा विनाशकारी कर्म करने लगते हैं। ऐसे लोग अपने साथ-साथ समाज और संसार के लिए भी हानिकारक बन जाते हैं।
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः॥१०॥
भावार्थ :
असीम इच्छाओं में फँसे हुए, दिखावे, अहंकार और घमंड से भरे लोग अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए गलत विचारों और अनुचित सिद्धांतों को अपना लेते हैं। मोह के कारण वे अपने गलत आचरण को भी सही समझने लगते हैं और अशुद्ध तथा अनुचित जीवन-पद्धति में आगे बढ़ते रहते हैं।
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥११॥
भावार्थ :
ऐसे लोग जीवनभर असंख्य चिंताओं से घिरे रहते हैं। उनका ध्यान मुख्यतः इच्छाओं और भौतिक सुखों को प्राप्त करने में लगा रहता है। वे यह मान लेते हैं कि संसार में मिलने वाला सुख और इन्द्रिय-भोग ही जीवन का अंतिम उद्देश्य है, इसलिए उनकी इच्छाएँ कभी समाप्त नहीं होतीं।
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्॥
भावार्थ :
असंख्य आशाओं और इच्छाओं के बंधन में फँसे हुए ऐसे लोग कामना और क्रोध के वश में रहते हैं। अपनी इच्छाओं और भोगों को पूरा करने के लिए वे उचित-अनुचित का विचार छोड़कर अन्यायपूर्ण तरीकों से धन और साधनों को इकट्ठा करने का प्रयास करते हैं।
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥१३॥
भावार्थ :
आसुरी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति सोचता है—आज मैंने अपनी एक इच्छा पूरी कर ली है और अब अगली इच्छा भी पूरी कर लूँगा। मेरे पास इतना धन और साधन पहले से है और भविष्य में इससे भी अधिक धन मेरे पास आ जाएगा। इस प्रकार उसका मन निरंतर संग्रह और इच्छाओं में उलझा रहता है।
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी॥१४॥
भावार्थ :
वह अहंकारपूर्वक सोचता है कि मैंने अपने एक शत्रु को पराजित कर दिया है और आगे दूसरे शत्रुओं को भी हरा दूँगा। वह स्वयं को सबसे शक्तिशाली, सफल और सुखी मानता है तथा अपने ऐश्वर्य और सामर्थ्य को ही सर्वोच्च समझने लगता है।
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥१५॥
भावार्थ :
वह स्वयं को अत्यंत धनवान, प्रतिष्ठित और बड़े परिवार वाला समझकर घमंड करता है और सोचता है कि मेरे समान दूसरा कौन है। वह यज्ञ, दान और मनोरंजन की बातें भी करता है, लेकिन उसके पीछे आत्मशुद्धि नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा और अहंकार की भावना अधिक होती है।
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ॥१६॥
भावार्थ :
अनेक इच्छाओं और भ्रमों से विचलित उनका मन मोह के जाल में फँस जाता है। वे विषय-भोगों में अत्यधिक आसक्त होकर विवेक खो देते हैं और अपने कर्मों के कारण दुखद तथा अधोगति वाले जीवन की ओर बढ़ते जाते हैं।
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्॥१७॥
भावार्थ :
अपने आपको ही महान समझने वाले, कठोर अहंकार से भरे और धन तथा प्रतिष्ठा के मद में डूबे हुए लोग धार्मिक कर्म भी केवल दिखावे के लिए करते हैं। उनके यज्ञ या धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धा और शास्त्रीय विधि से अधिक प्रदर्शन तथा प्रतिष्ठा पाने की इच्छा होती है।
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः॥१८॥
भावार्थ :
अहंकार, शक्ति का घमंड, दर्प, कामना और क्रोध से भरे हुए लोग दूसरों के प्रति द्वेष और दोष-दृष्टि रखते हैं। वे अपने और दूसरों के भीतर स्थित परमात्मा के अस्तित्व को भी सम्मान नहीं देते। इस प्रकार उनका अहंकार उन्हें ईश्वर और समस्त प्राणियों से दूर करता जाता है।
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥१९॥
भावार्थ :
जो लोग द्वेष, क्रूरता और पापपूर्ण कर्मों में लगे रहते हैं तथा दूसरों के लिए निरंतर कष्ट का कारण बनते हैं, वे अपने कर्मों के कारण बार-बार निम्न और आसुरी अवस्थाओं को प्राप्त होते हैं। उनके कर्म ही उनकी अधोगति का कारण बनते हैं।
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्॥२०॥
भावार्थ :
हे अर्जुन! आसुरी प्रवृत्तियों में डूबे हुए अज्ञानी लोग अपने कर्मों के कारण बार-बार उसी प्रकार की निम्न अवस्थाओं को प्राप्त होते रहते हैं। वे परमात्मा की प्राप्ति से दूर रह जाते हैं और निरंतर ऐसी गति की ओर बढ़ते हैं जो उन्हें आध्यात्मिक उन्नति से और अधिक दूर कर देती है।
काम, क्रोध और लोभ से बचने तथा शास्त्रसम्मत जीवन अपनाने का संदेश
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥२१॥
भावार्थ :
कामना, क्रोध और लोभ—ये तीन ऐसी प्रवृत्तियाँ हैं जो मनुष्य के विवेक और आत्मिक उन्नति को नष्ट कर देती हैं। अत्यधिक इच्छा मन को अशांत करती है, इच्छा पूरी न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है और लोभ मनुष्य को कभी संतुष्ट नहीं होने देता। इसलिए इन तीनों से स्वयं को बचाना चाहिए।
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्॥२२॥
भावार्थ :
हे अर्जुन! जो मनुष्य काम, क्रोध और लोभ जैसे अंधकारमय बंधनों से स्वयं को मुक्त कर लेता है, वह अपने वास्तविक कल्याण के मार्ग पर चलने लगता है। उसका विवेक शुद्ध होता है, उसके कर्म श्रेष्ठ बनते हैं और वह धीरे-धीरे परम कल्याण तथा आध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़ता है।
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥२३॥
भावार्थ :
जो व्यक्ति शास्त्रों द्वारा बताए गए उचित मार्ग को छोड़कर केवल अपनी इच्छाओं के अनुसार जीवन जीता है, वह स्थायी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। मनमाना आचरण उसे वास्तविक सुख, आत्मिक सिद्धि और परम कल्याण से दूर कर देता है।
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥२४॥
भावार्थ :
इसलिए मनुष्य को यह समझना चाहिए कि क्या करना उचित है और क्या नहीं, इसका निर्णय शास्त्रीय ज्ञान और धर्मसम्मत विवेक के आधार पर करना चाहिए। उचित कर्तव्य को समझकर उसी के अनुसार कर्म करना ही जीवन को सही दिशा देता है और मनुष्य को कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ाता है।
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