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॥अथ षष्टोऽध्यायः॥
अध्याय ६ — आत्मसंयमयोग
कर्मयोग, संन्यास और योगारूढ़ पुरुष की स्थिति
श्रीभगवानुवाच
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥१॥
भावार्थ :
जो व्यक्ति अपने कर्मों के परिणाम की चिंता या अपेक्षा किए बिना अपने कर्तव्य का पालन करता है, वही वास्तविक अर्थ में संन्यासी और योगी है। केवल अग्नि का त्याग कर देना या कर्म करना छोड़ देना संन्यास अथवा योग नहीं है।
यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।
न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन॥२॥
भावार्थ :
हे अर्जुन! जिसे लोग संन्यास कहते हैं, उसी को योग भी समझो। जब तक मनुष्य अपने स्वार्थपूर्ण संकल्पों और इच्छाओं का त्याग नहीं करता, तब तक वह सच्चा योगी नहीं बन सकता।
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥३॥
भावार्थ :
जो साधक योग की अवस्था प्राप्त करना चाहता है, उसके लिए निष्काम भाव से कर्म करना साधना का प्रमुख साधन है। परंतु जब वह योग में स्थिर हो जाता है, तब मन की शांति, इच्छाओं का क्षय और आंतरिक संयम उसकी आगे की साधना का आधार बनते हैं।
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥४॥
भावार्थ :
जब मनुष्य न तो इंद्रियों के विषयों में आसक्त रहता है और न ही अपने कर्मों में स्वार्थपूर्ण आसक्ति रखता है, तथा सभी व्यक्तिगत संकल्पों का त्याग कर देता है, तब उसे योग में स्थित अर्थात् योगारूढ़ कहा जाता है।
आत्मोन्नति का मार्ग और समभाव वाले योगी के गुण
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥५॥
भावार्थ :
मनुष्य को अपने ही प्रयास से स्वयं को ऊँचा उठाना चाहिए और अपने विचारों तथा कर्मों के कारण स्वयं को नीचे नहीं गिराना चाहिए। संयमित मनुष्य का मन उसका सहायक बनता है, जबकि असंयमित मन उसके लिए बाधा और शत्रु के समान बन जाता है।
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥६॥
भावार्थ :
जिसने अपने मन, इंद्रियों और शरीर को आत्मसंयम द्वारा वश में कर लिया है, उसके लिए उसका अंतःकरण मित्र के समान कार्य करता है। लेकिन जो अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं रख पाता, उसके लिए वही अंतःकरण शत्रु जैसा व्यवहार करता है।
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥७॥
भावार्थ :
जिस व्यक्ति ने अपने मन को जीत लिया है और जिसका अंतःकरण शांत हो चुका है, वह सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख, सम्मान-अपमान जैसी परिस्थितियों में भी संतुलित रहता है। ऐसे स्थिर मन वाले साधक में परमात्मा का ज्ञान दृढ़ता से स्थापित रहता है।
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः॥८॥
भावार्थ :
जो योगी आत्मज्ञान और उसके अनुभव से संतुष्ट है, जिसका मन परिस्थितियों से विचलित नहीं होता और जिसने अपनी इंद्रियों को वश में कर लिया है, वह योगयुक्त कहलाता है। उसके लिए मिट्टी, पत्थर और सोना समान महत्व रखते हैं।
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥९॥
भावार्थ :
जो व्यक्ति हितैषी, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, विरोधी और संबंधियों के प्रति समान दृष्टि रखता है तथा अच्छे और बुरे आचरण वाले लोगों को भी समभाव से देखता है, उसकी बुद्धि विशेष रूप से संतुलित और श्रेष्ठ मानी जाती है।
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥१०॥
भावार्थ :
योगी को एकांत और शांत स्थान में रहकर निरंतर आत्मचिंतन तथा परमात्मा के ध्यान में मन लगाना चाहिए। उसे अपने मन और इंद्रियों को संयमित रखना चाहिए तथा अनावश्यक आशाओं और संग्रह की भावना से मुक्त रहना चाहिए।
योगाभ्यास के लिए आसन और ध्यान की विधि
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्॥११॥
भावार्थ :
योगाभ्यास के लिए स्वच्छ स्थान पर ऐसा स्थिर आसन तैयार करना चाहिए जो न बहुत ऊँचा हो और न बहुत नीचा। उस आसन पर परंपरानुसार कुश, मृगछाला और वस्त्र का क्रम रखा गया हो।
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥१२॥
भावार्थ :
उस आसन पर बैठकर मन को एकाग्र करना चाहिए और इंद्रियों की गतिविधियों को संयमित रखना चाहिए। इस प्रकार किया गया योगाभ्यास अंतःकरण को शुद्ध करने और मन को स्थिर बनाने में सहायक होता है।
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥१३॥
भावार्थ :
ध्यान के समय शरीर, सिर और गर्दन को सीधा और स्थिर रखना चाहिए। दृष्टि को नासिका के अग्रभाग की ओर केंद्रित रखते हुए इधर-उधर की वस्तुओं पर ध्यान नहीं देना चाहिए।
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥१४॥
भावार्थ :
योगी को शांत और निर्भय होकर संयमपूर्ण जीवन का पालन करना चाहिए। मन को नियंत्रित करके उसे परमात्मा में केंद्रित करना चाहिए और अपनी साधना का उद्देश्य परमात्मा की प्राप्ति को बनाना चाहिए।
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥१५॥
भावार्थ :
इस प्रकार नियमित और संयमित मन से निरंतर परमात्मा में मन लगाने वाला योगी अंततः ऐसी गहरी शांति प्राप्त करता है जो परम आनंद और आध्यात्मिक संतोष की अवस्था है।
आहार-विहार में संयम और मन की स्थिरता
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥१६॥
भावार्थ :
हे अर्जुन! जो व्यक्ति बहुत अधिक भोजन करता है या बिल्कुल भोजन नहीं करता, उसके लिए योग की साधना संतुलित नहीं रह सकती। इसी प्रकार अत्यधिक सोने या लगातार जागते रहने वाले व्यक्ति के लिए भी योगाभ्यास उचित रूप से सिद्ध नहीं होता।
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥१७॥
भावार्थ :
जो व्यक्ति भोजन, मनोरंजन, दैनिक कार्य, विश्राम, नींद और जागने—सभी में उचित संतुलन रखता है, उसका योगाभ्यास अधिक स्थिर होता है और वह धीरे-धीरे मानसिक दुःखों से मुक्त होने की दिशा में बढ़ता है।
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥१८॥
भावार्थ :
जब साधक का नियंत्रित मन केवल आत्मा में स्थिर हो जाता है और वह सांसारिक इच्छाओं तथा भोगों की लालसा से मुक्त हो जाता है, तब उसकी अवस्था को योगयुक्त कहा जाता है।
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥१९॥
भावार्थ :
जिस प्रकार हवा से सुरक्षित स्थान पर रखा हुआ दीपक स्थिर लौ के साथ जलता रहता है, उसी प्रकार आत्मध्यान में लगा हुआ संयमित योगी का मन भी बाहरी विषयों से विचलित हुए बिना स्थिर रहता है।
ध्यानयोग की गहन अवस्था और परम आनंद
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥२०॥
भावार्थ :
निरंतर योगाभ्यास से जब चित्त की चंचलता शांत हो जाती है और साधक अपने शुद्ध अंतःकरण से आत्मस्वरूप का अनुभव करता है, तब उसे बाहरी वस्तुओं के बजाय अपने भीतर ही गहरा संतोष प्राप्त होता है।
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥२१॥
भावार्थ :
उस अवस्था में साधक ऐसा गहरा आनंद अनुभव करता है जो सामान्य इंद्रिय-विषयों से प्राप्त नहीं होता और जिसे केवल शुद्ध एवं सूक्ष्म बुद्धि द्वारा अनुभव किया जा सकता है। इस अनुभव के बाद उसकी सत्य के प्रति स्थिति दृढ़ रहती है।
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥२२॥
भावार्थ :
परमात्मा की प्राप्ति से मिलने वाला आनंद ऐसा है कि उसे प्राप्त करने के बाद साधक किसी अन्य उपलब्धि को उससे बड़ा नहीं मानता। उस अवस्था में स्थित व्यक्ति बड़े से बड़े दुःख में भी अपनी आंतरिक स्थिरता नहीं खोता।
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥२३॥
भावार्थ :
संसार के दुःखों से होने वाले संबंध से मुक्त होने की अवस्था को योग कहा गया है। इसलिए योग का अभ्यास दृढ़ निश्चय, धैर्य और उत्साह के साथ करना चाहिए तथा कठिनाइयों से निराश नहीं होना चाहिए।
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥२४॥
भावार्थ :
मन में उत्पन्न होने वाली सभी इच्छाओं और कामनाओं को धीरे-धीरे छोड़कर साधक को अपने मन के द्वारा सभी इंद्रियों को उनके विषयों से नियंत्रित करना चाहिए।
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥२५॥
भावार्थ :
धैर्य और विवेक से मन को धीरे-धीरे बाहरी विषयों से हटाकर आत्मा में स्थिर करना चाहिए। इस अभ्यास में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए और मन को परमात्मा के अतिरिक्त अन्य विषयों में भटकने से रोकना चाहिए।
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥२६॥
भावार्थ :
मन स्वभाव से चंचल है और बार-बार विभिन्न विषयों की ओर चला जाता है। जब भी ऐसा हो, साधक को बिना निराश हुए उसे उन विषयों से हटाकर पुनः आत्मा और परमात्मा की ओर लगाना चाहिए।
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्॥२७॥
भावार्थ :
जिस योगी का मन शांत हो चुका है, जिसके भीतर रजोगुण की चंचलता शांत हो गई है और जो पापरहित होकर परम सत्य में स्थित है, उसे गहरा और श्रेष्ठ आध्यात्मिक आनंद प्राप्त होता है।
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥२८॥
भावार्थ :
जो योगी निरंतर आत्मचिंतन और परमात्मा के ध्यान में लगा रहता है तथा जिसके दोष और विकार दूर हो चुके हैं, वह सहज रूप से परमात्मा की अनुभूति से मिलने वाले अनंत आनंद का अनुभव करता है।
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥२९॥
भावार्थ :
योग में स्थित व्यक्ति सभी प्राणियों में एक ही आत्मतत्त्व को देखता है और सभी प्राणियों को उसी व्यापक आत्मतत्त्व से जुड़ा हुआ अनुभव करता है। उसकी दृष्टि में किसी के प्रति मूलभूत भेदभाव नहीं रहता।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥३०॥
भावार्थ :
जो साधक हर प्राणी और हर स्थान में परमात्मा की उपस्थिति को देखता है तथा समस्त जगत को परमात्मा में स्थित समझता है, उसके लिए परमात्मा की अनुभूति निरंतर बनी रहती है और उसका परमात्मा से संबंध दृढ़ रहता है।
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥३१॥
भावार्थ :
जो योगी एकत्व की भावना से सभी प्राणियों में स्थित परमात्मा की उपासना करता है, वह अपने दैनिक जीवन के विभिन्न कार्य करते हुए भी भीतर से परमात्मा से जुड़ा रहता है।
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥३२॥
भावार्थ :
हे अर्जुन! जो व्यक्ति दूसरों के सुख-दुःख को अपने सुख-दुःख की तरह समझता है और सभी प्राणियों के प्रति समान संवेदना रखता है, वह समभाव और आत्मीयता से युक्त योगी माना जाता है।
चंचल मन को वश में करने की चुनौती
अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्॥३३॥
भावार्थ :
अर्जुन कहते हैं कि हे मधुसूदन! आपने जिस समभावयुक्त योग का वर्णन किया है, वह उन्हें कठिन प्रतीत होता है, क्योंकि चंचल मन के कारण उस अवस्था में लंबे समय तक स्थिर रहना उन्हें संभव नहीं लगता।
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥३४॥
भावार्थ :
हे कृष्ण! मन अत्यंत चंचल, शक्तिशाली और अपनी दिशा में खींच ले जाने वाला है। इसलिए अर्जुन कहते हैं कि उसे नियंत्रित करना उन्हें वायु को रोकने जितना कठिन प्रतीत होता है।
श्रीभगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥३५॥
भावार्थ :
श्रीभगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! मन का चंचल और कठिनता से नियंत्रित होना सत्य है, लेकिन निरंतर अभ्यास और वैराग्य के द्वारा उसे धीरे-धीरे वश में किया जा सकता है।
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥३६॥
भावार्थ :
जिस व्यक्ति ने अपने मन को नियंत्रित नहीं किया है, उसके लिए योग की सिद्धि कठिन होती है। लेकिन जो साधक अपने मन को संयमित करके उचित साधनों के साथ निरंतर प्रयास करता है, वह योग को प्राप्त कर सकता है।
योगभ्रष्ट साधक की गति और योग की साधना का फल
अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥३७॥
भावार्थ :
अर्जुन पूछते हैं—हे कृष्ण! यदि कोई व्यक्ति योग में श्रद्धा तो रखता है, लेकिन पूर्ण संयम प्राप्त नहीं कर पाता और उसका मन योग की सिद्धि से पहले ही विचलित हो जाता है, तो उसकी आगे की गति क्या होती है?
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि॥३८॥
भावार्थ :
अर्जुन अपनी शंका व्यक्त करते हैं कि कहीं ऐसा साधक सांसारिक जीवन और योग-साधना—दोनों से वंचित होकर उस कटे हुए बादल के समान तो नष्ट नहीं हो जाता, जिसका कोई स्थायी आधार नहीं रहता।
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते॥३९॥
भावार्थ :
अर्जुन कहते हैं कि हे कृष्ण! मेरे इस संशय का पूर्ण समाधान केवल आप ही कर सकते हैं। इसलिए वे भगवान् से इस विषय में स्पष्ट उत्तर देने का आग्रह करते हैं।
श्रीभगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति॥४०॥
भावार्थ :
श्रीभगवान् आश्वासन देते हैं कि आत्मकल्याण के मार्ग पर किया गया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता। ऐसे साधक का न तो इस संसार में और न ही आगे किसी अवस्था में वास्तविक विनाश होता है; शुभ कर्म करने वाला व्यक्ति दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते॥४१॥
भावार्थ :
योग की साधना अधूरी रह जाने वाला साधक अपने पुण्य के अनुसार श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त करता है और वहाँ लंबे समय तक रहने के बाद ऐसे परिवार में जन्म लेता है जहाँ शुद्ध आचरण और समृद्धि का वातावरण होता है।
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्॥४२॥
भावार्थ :
या फिर वह विवेकी और ज्ञानवान योगियों के परिवार में जन्म प्राप्त करता है। ऐसा जन्म अत्यंत दुर्लभ माना गया है, क्योंकि वहाँ उसे आध्यात्मिक साधना के लिए अनुकूल वातावरण सहज रूप से मिल जाता है।
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन॥४३॥
भावार्थ :
ऐसे जन्म में साधक अपने पिछले जीवन में अर्जित आध्यात्मिक संस्कारों और साधना से जुड़े विवेक को फिर से प्राप्त कर लेता है। उन संस्कारों के प्रभाव से वह परमात्मा की प्राप्ति के लिए पहले से अधिक उत्साह के साथ प्रयास करता है।
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते॥४४॥
भावार्थ :
पिछले अभ्यास का प्रभाव इतना गहरा होता है कि साधक कभी-कभी अपनी इच्छा के बिना भी योग और आध्यात्मिक साधना की ओर आकर्षित होता है। योग का जिज्ञासु व्यक्ति धीरे-धीरे केवल बाहरी कर्मकांडों की सीमाओं से आगे बढ़कर आत्मज्ञान की ओर जाता है।
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो यात परां गतिम्॥४५॥
भावार्थ :
जो योगी निरंतर प्रयास करता है, अपने दोषों को दूर करता है और पूर्व साधना के संस्कारों को आगे बढ़ाता है, वह क्रमशः पूर्णता की ओर पहुँचता है और अंततः परम आध्यात्मिक अवस्था को प्राप्त करता है।
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥४६॥
भावार्थ :
श्रीभगवान् बताते हैं कि योगी केवल तप करने वाले, केवल शास्त्रीय ज्ञान प्राप्त करने वाले अथवा फल की इच्छा से कर्म करने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं है। इसलिए अर्जुन को समग्र योगमार्ग अपनाने की प्रेरणा दी जाती है।
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥४७॥
भावार्थ :
सभी योगियों में वह साधक विशेष रूप से परमात्मा से जुड़ा हुआ माना जाता है जो श्रद्धा के साथ अपने अंतःकरण को परमात्मा में स्थिर करके निरंतर उनकी उपासना करता है। ऐसी भक्ति में योग, श्रद्धा और आत्मसमर्पण का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः॥६॥
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