+91 8005792734
Contact Us
Contact Us
amita2903.aa@gmail.com
Support Email
Jhunjhunu, Rajasthan
Address
संसाररूपी अश्वत्थ वृक्ष का स्वरूप और परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग
ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥१॥
भावार्थ :
श्रीभगवान् कहते हैं—हे अर्जुन! यह संसार एक ऐसे विशाल अश्वत्थ वृक्ष के समान है जिसकी जड़ ऊपर और शाखाएँ नीचे की ओर फैली हुई हैं। इसके पत्तों को वेदों के मंत्रों के समान बताया गया है। जो व्यक्ति इस संसार-वृक्ष के वास्तविक स्वरूप और उसकी व्यवस्था को समझ लेता है, वही वेदों के ज्ञान का सच्चा ज्ञाता है।
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा
गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि
कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥२॥
भावार्थ :
इस संसार-वृक्ष की शाखाएँ ऊपर और नीचे सभी दिशाओं में फैली हुई हैं। प्रकृति के तीनों गुण—सत्त्व, रज और तम—इन शाखाओं को विकसित करते हैं। इन्द्रियों के विषय इनके कोमल अंकुरों के समान हैं। मनुष्य के कर्म और उनकी इच्छाएँ इस वृक्ष की जड़ों को और मजबूत करती हैं तथा मनुष्य को कर्मों के बंधन में बाँध देती हैं।
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल-
मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा॥३॥
भावार्थ :
इस संसार-वृक्ष का वास्तविक स्वरूप सामान्य दृष्टि से समझ पाना कठिन है। इसका निश्चित आदि, अंत या स्थायी आधार दिखाई नहीं देता। इसकी जड़ें अत्यन्त गहरी हैं और मनुष्य को कर्म तथा आसक्ति से बाँधती रहती हैं। इसलिए दृढ़ वैराग्य और आसक्ति-रहित दृष्टि के द्वारा इस संसार-बन्धन को काटना आवश्यक है।
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥४॥
भावार्थ :
संसार के प्रति आसक्ति का त्याग करने के बाद मनुष्य को उस परम सत्य की खोज करनी चाहिए, जिसे प्राप्त करने के बाद जीव फिर इस संसार के जन्म-मरण के चक्र में वापस नहीं आता। उस आदि पुरुष परमात्मा की शरण ग्रहण करनी चाहिए, जिनसे इस अनादि संसार की समस्त प्रवृत्ति आरम्भ हुई है।
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा-
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञै-
र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥५॥
भावार्थ :
जो मनुष्य अहंकार और मोह से मुक्त हो जाता है, सांसारिक आसक्ति पर विजय प्राप्त कर लेता है और निरन्तर आत्मचिन्तन में लगा रहता है, उसके भीतर सांसारिक इच्छाएँ धीरे-धीरे समाप्त हो जाती हैं। जो सुख-दुःख जैसे द्वन्द्वों से ऊपर उठकर स्थिर बुद्धि प्राप्त कर लेता है, वही ज्ञानी व्यक्ति उस अविनाशी परम पद को प्राप्त करता है।
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥६॥
भावार्थ :
वह परम धाम सांसारिक प्रकाश के साधनों से प्रकाशित होने वाला स्थान नहीं है। वहाँ पहुँचने के लिए सूर्य, चन्द्रमा या अग्नि के प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि वह स्वयं परम प्रकाश का स्वरूप है। उस परम धाम को प्राप्त करने के बाद जीव फिर संसार में लौटकर जन्म-मरण के बंधन में नहीं पड़ता।
जीवात्मा का स्वरूप और शरीर के साथ उसका संबंध
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥७॥
भावार्थ :
श्रीभगवान् बताते हैं कि संसार में रहने वाला प्रत्येक जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है। शरीर धारण करने पर यह जीव मन सहित पाँचों इन्द्रियों के माध्यम से प्रकृति के संपर्क में आता है और उसके प्रभावों का अनुभव करता है।
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्॥८॥
भावार्थ :
जब जीवात्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर को धारण करती है, तब वह अपने साथ मन और इन्द्रियों से जुड़े संस्कारों को भी ले जाती है। यह प्रक्रिया उसी प्रकार समझी जा सकती है जैसे वायु किसी स्थान से सुगंध को अपने साथ लेकर दूसरे स्थान तक पहुँचाती है।
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते॥९॥
भावार्थ :
जीवात्मा शरीर में रहकर कान, आँख, त्वचा, जीभ और नाक जैसी पाँचों इन्द्रियों तथा मन के माध्यम से संसार के विभिन्न विषयों का अनुभव करती है। इन्हीं साधनों द्वारा वह सुनने, देखने, स्पर्श करने, स्वाद लेने और गंध पहचानने जैसे अनुभव प्राप्त करती है।
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥१०॥
भावार्थ :
जीवात्मा शरीर में किस प्रकार रहती है, शरीर छोड़ते समय किस प्रकार जाती है और प्रकृति के गुणों से प्रभावित होकर विषयों का अनुभव किस प्रकार करती है—इन सूक्ष्म प्रक्रियाओं को सामान्य अज्ञानी व्यक्ति समझ नहीं पाता। केवल ज्ञान की दृष्टि प्राप्त करने वाले व्यक्ति ही इस सत्य को पहचान सकते हैं।
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः॥११॥
भावार्थ :
जो योगी निरन्तर साधना, आत्मचिन्तन और मन के संयम का प्रयास करते हैं, वे अपने भीतर स्थित आत्मतत्त्व का अनुभव कर सकते हैं। लेकिन जिनका मन अभी शुद्ध और संयमित नहीं हुआ है, वे प्रयास करने पर भी आत्मा के इस सूक्ष्म स्वरूप को पहचान नहीं पाते।
समस्त जगत् में परमात्मा की शक्ति और उपस्थिति
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्॥१२॥
भावार्थ :
हे अर्जुन! सूर्य में दिखाई देने वाला वह प्रकाश, जिससे पूरा संसार प्रकाशित होता है, चन्द्रमा की ज्योति और अग्नि का तेज—इन सभी में मेरी ही दिव्य शक्ति का प्रकाश समझना चाहिए। संसार में दिखाई देने वाला प्रत्येक प्रकाश उसी परम शक्ति की अभिव्यक्ति है।
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः॥१३॥
भावार्थ :
मैं अपनी शक्ति के द्वारा पृथ्वी में स्थित होकर सभी प्राणियों को धारण करता हूँ। चन्द्रमा के रूप में मैं वनस्पतियों और औषधियों में जीवनदायी रस का पोषण करता हूँ, जिससे संसार के जीवों का जीवन और पोषण सम्भव होता है।
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥१४॥
भावार्थ :
मैं प्रत्येक प्राणी के शरीर में पाचन शक्ति के रूप में उपस्थित हूँ। प्राण और अपान वायु के संतुलन से शरीर द्वारा ग्रहण किए गए चार प्रकार के भोजन को पचाने और उससे शरीर को पोषण देने का कार्य भी मेरी ही शक्ति से होता है।
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो-
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो-
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥१५॥
भावार्थ :
मैं प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित हूँ। स्मरण, ज्ञान और विस्मरण की शक्ति भी मुझसे ही प्राप्त होती है। सभी वेदों का अंतिम उद्देश्य मुझे जानना है। वेदों का मूल तत्त्व भी मैं ही हूँ और उनके वास्तविक ज्ञान को जानने वाला भी मैं ही हूँ।
क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम का वास्तविक स्वरूप
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥१६॥
भावार्थ :
इस संसार में दो प्रकार के तत्त्वों का वर्णन किया गया है—क्षर और अक्षर। जो शरीर और भौतिक रूप परिवर्तन तथा नाश के अधीन हैं, वे क्षर हैं। इनके भीतर स्थित आत्मतत्त्व को अक्षर अर्थात् अविनाशी कहा गया है।
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥१७॥
भावार्थ :
क्षर और अक्षर दोनों से परे एक और सर्वोच्च तत्त्व है, जिसे परमात्मा कहा गया है। वही अविनाशी परमेश्वर तीनों लोकों में व्याप्त होकर सम्पूर्ण जगत् और उसके सभी प्राणियों का पालन करता है।
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥१८॥
भावार्थ :
श्रीभगवान् कहते हैं कि मैं नाशवान क्षर तत्त्व से परे हूँ और अविनाशी अक्षर तत्त्व से भी श्रेष्ठ हूँ। इसी कारण संसार और वेदों में मुझे पुरुषोत्तम अर्थात् सर्वोच्च पुरुष के रूप में जाना जाता है।
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥१९॥
भावार्थ :
हे अर्जुन! जो व्यक्ति मोह और भ्रम से मुक्त होकर मुझे पुरुषोत्तम के रूप में सही अर्थ में पहचान लेता है, वह सम्पूर्ण सत्य को समझने वाला बन जाता है। ऐसा ज्ञानी व्यक्ति अपने मन, बुद्धि और समस्त भावों से मेरी भक्ति करता है।
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत॥२०॥
भावार्थ :
हे निष्पाप अर्जुन! मैंने तुम्हें यह अत्यन्त गहन और रहस्यमय ज्ञान बताया है। जो मनुष्य इस ज्ञान को उसके वास्तविक स्वरूप में समझ लेता है, उसकी बुद्धि परिपक्व हो जाती है और वह अपने जीवन के सर्वोच्च उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल हो जाता है।
____________________________