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श्रीमद्भगवद्गीता(अध्याय-18), मोक्षसन्न्यासयोग

श्रीमद्भगवद्गीता(अध्याय-18)

 

अथाष्टादशोऽध्यायः

मोक्षसन्न्यासयोग

☆ ☆ ☆ ☆ ☆ ☆ ☆ 

 

1. संन्यास और त्याग का वास्तविक अर्थ

अर्जुन उवाच

सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्‌।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन॥१॥

भावार्थ :

अर्जुन ने कहा—हे महाबाहु श्रीकृष्ण! हे इन्द्रियों के स्वामी! मैं संन्यास और त्याग के वास्तविक अर्थ को अलग-अलग समझना चाहता हूँ। कृपया मुझे इनके बीच का अंतर स्पष्ट करके बताइए।

 

श्रीभगवानुवाच

काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥२॥

भावार्थ :

श्रीभगवान ने कहा—विद्वान लोग इच्छित फल प्राप्त करने के उद्देश्य से किए जाने वाले कर्मों को छोड़ने को संन्यास कहते हैं। वहीं विवेकशील व्यक्ति सभी कर्मों के फल की इच्छा और आसक्ति का त्याग करने को त्याग मानते हैं।

 

त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे॥३॥

भावार्थ :

कुछ विचारक मानते हैं कि कर्मों में दोष होने के कारण उनका त्याग कर देना चाहिए। इसके विपरीत, दूसरे विद्वानों का कहना है कि यज्ञ, दान और तप जैसे कल्याणकारी कर्तव्यों को कभी नहीं छोड़ना चाहिए।

 

निश्चयं शृणु में तत्र त्यागे भरतसत्तम।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥४॥

भावार्थ :

हे अर्जुन! अब त्याग के विषय में मेरा निश्चित मत सुनो। मनुष्य के स्वभाव और गुणों के अनुसार त्याग तीन प्रकार का होता है—सात्त्विक, राजस और तामस।


यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्‌।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्‌॥५॥

भावार्थ :

यज्ञ, दान और तप का त्याग नहीं करना चाहिए, बल्कि इन्हें अपने कर्तव्य के रूप में अवश्य करना चाहिए। ये कर्म मनुष्य के अंतःकरण को शुद्ध करते हैं और उसे श्रेष्ठ जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं।

 

एतान्यपि तु कर्माणि सङ्‍गं त्यक्त्वा फलानि च।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्‌॥६॥

भावार्थ :

हे पार्थ! मेरा दृढ़ मत है कि यज्ञ, दान, तप और अन्य आवश्यक कर्तव्यों को आसक्ति तथा फल की लालसा छोड़कर करना चाहिए। कर्म करते समय मनुष्य का उद्देश्य कर्तव्यपालन और लोककल्याण होना चाहिए, न कि केवल अपना लाभ।

 

नियतस्य तु सन्न्यासः कर्मणो नोपपद्यते।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥७॥

भावार्थ :

अपने निर्धारित कर्तव्यों को छोड़ देना उचित नहीं है। जो व्यक्ति अज्ञान या भ्रम के कारण अपने कर्तव्य से पीछे हट जाता है, उसके इस प्रकार के त्याग को तामस त्याग कहा जाता है।

 

दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्‌।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥८॥

भावार्थ :

जो व्यक्ति किसी कार्य को कठिन या कष्टदायक समझकर केवल शारीरिक परेशानी के डर से अपना कर्तव्य छोड़ देता है, उसका त्याग राजस कहलाता है। ऐसा व्यक्ति सच्चे त्याग से मिलने वाली आंतरिक शांति और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त नहीं कर पाता।

 

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।
सङ्‍गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥९॥

भावार्थ :

हे अर्जुन! जो व्यक्ति किसी कर्म को अपना कर्तव्य समझकर करता है और उसमें आसक्ति तथा फल की इच्छा नहीं रखता, उसका त्याग सात्त्विक कहलाता है। यही कर्म करते हुए भी मन को निर्मल रखने का श्रेष्ठ मार्ग है।

 

न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥१०॥

भावार्थ :

सच्चा त्यागी न तो कठिन या अप्रिय कर्मों से घृणा करता है और न ही सुखद कर्मों में अत्यधिक आसक्त होता है। वह विवेकशील, संशयरहित और संतुलित बुद्धि वाला होता है तथा परिस्थितियों के अनुसार अपने कर्तव्य का पालन करता है।

 

न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥११॥

भावार्थ :

शरीर धारण करने वाला मनुष्य सभी कर्मों को पूरी तरह छोड़ नहीं सकता, क्योंकि जीवन चलाने के लिए कुछ न कुछ करना आवश्यक है। इसलिए वास्तव में त्यागी वही है, जो अपने कर्मों के फल के प्रति आसक्ति छोड़कर अपना कर्तव्य निभाता है।

 

अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्‌।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित्‌॥१२॥

भावार्थ :

कर्मों के फल की आसक्ति न छोड़ने वाले लोगों को उनके कर्मों के परिणामस्वरूप सुखद, दुखद या मिले-जुले फल प्राप्त होते हैं। लेकिन जो व्यक्ति फल की लालसा का त्याग करके कर्म करता है, वह उन फलों के बंधन में नहीं पड़ता।

 

2. कर्म के पीछे कार्य करने वाले पाँच कारण

 

पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्‌॥१३॥

भावार्थ :

हे महाबाहु! अब उन पाँच कारणों को समझो, जिनके सहयोग से किसी भी कर्म की सिद्धि होती है। इन कारणों का वर्णन कर्म और उसके परिणामों को समझाने वाले सांख्य दर्शन में किया गया है।

 

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्‌।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्‌॥१४॥

भावार्थ :

किसी भी कार्य के पूरा होने के पाँच कारण हैं—शरीर या कार्य का आधार, कर्म करने वाला व्यक्ति, विभिन्न इंद्रियाँ और साधन, अलग-अलग प्रकार के प्रयास तथा पाँचवाँ कारण दैव अर्थात् परिस्थितियों और पूर्वकृत कर्मों का प्रभाव।

 

शरीरवाङ्‍मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥१५॥

भावार्थ :

मनुष्य शरीर, वाणी और मन के द्वारा जो भी अच्छा या बुरा कार्य करता है, उसके पीछे ये पाँचों कारण किसी न किसी रूप में कार्य करते हैं। इसलिए किसी कर्म को समझते समय उसके सभी सहायक कारणों पर विचार करना चाहिए।

 

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥१६॥

भावार्थ :

कर्म की सिद्धि में अनेक कारणों की भूमिका होने पर भी जो व्यक्ति केवल स्वयं को ही उसका एकमात्र कर्ता मानता है, वह वास्तविकता को नहीं समझता। ऐसी धारणा अधूरी समझ और विवेक की कमी से उत्पन्न होती है।

 

यस्य नाहङ्‍कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥१७॥

भावार्थ :

जिस व्यक्ति में अहंकार और कर्तापन का अभिमान नहीं होता तथा जिसकी बुद्धि स्वार्थ और आसक्ति से प्रभावित नहीं होती, वह कर्मों के बंधन में नहीं पड़ता। इस श्लोक का आशय है कि अहंकाररहित और धर्मबुद्धि से कर्म करने वाले व्यक्ति को कर्म के वास्तविक स्वरूप तथा अपने उत्तरदायित्व को समझना चाहिए; इसे हिंसा या अन्याय की सामान्य अनुमति नहीं मानना चाहिए।

 

ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः॥१८॥

भावार्थ :

किसी कर्म को करने की प्रेरणा के तीन आधार हैं—ज्ञान, जानने योग्य विषय और उसे जानने वाला व्यक्ति। इसी प्रकार कर्म की प्रक्रिया में भी तीन तत्व होते हैं—कार्य करने वाला, कार्य के साधन और स्वयं किया जाने वाला कर्म।

 

3. तीन गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म और कर्ता

 

ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः।
प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि॥१९॥

भावार्थ :

शास्त्रों में ज्ञान, कर्म और कर्ता के तीन-तीन प्रकार बताए गए हैं। इनका स्वरूप सत्त्व, रज और तम नामक तीन गुणों के प्रभाव से निर्धारित होता है। अब इनके भेदों को समझो।

 

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥२०॥

भावार्थ :

जिस ज्ञान के द्वारा व्यक्ति सभी प्राणियों में एक ही अविनाशी परमात्मा का अंश या एकत्व देखता है, जबकि उनके बाहरी रूप अलग-अलग दिखाई देते हैं, वह ज्ञान सात्त्विक है। ऐसा ज्ञान सभी के प्रति समानता, सम्मान और करुणा की भावना उत्पन्न करता है।

 

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्‌।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्‌॥२१॥

भावार्थ :

जिस ज्ञान से व्यक्ति सभी प्राणियों को केवल अलग-अलग रूपों और भिन्नताओं के आधार पर देखता है तथा उनके बीच के अंतर को ही प्रमुख मानता है, वह राजस ज्ञान कहलाता है। इसमें एकत्व की अपेक्षा विविधता पर अधिक ध्यान दिया जाता है।

 

यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्‌।
अतत्त्वार्थवदल्पंच तत्तामसमुदाहृतम्‌॥२२॥

भावार्थ :

जो ज्ञान किसी एक सीमित विषय या वस्तु को ही संपूर्ण सत्य मान लेता है और तर्क तथा वास्तविक समझ से दूर रहता है, वह तामस ज्ञान है। ऐसा ज्ञान अधूरा, संकीर्ण और वास्तविकता को ठीक से न समझने वाला होता है।

 

नियतं सङ्‍गरहितमरागद्वेषतः कृतम्।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥२३॥

भावार्थ :

जो कर्म निर्धारित कर्तव्य के अनुसार, बिना आसक्ति और राग-द्वेष के किया जाता है तथा जिसके पीछे व्यक्तिगत लाभ पाने की इच्छा नहीं होती, वह सात्त्विक कर्म कहलाता है। इसमें कर्तव्यनिष्ठा और निष्काम भावना को महत्व दिया जाता है।

 

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्‍कारेण वा पुनः।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्‌॥२४॥

भावार्थ :

जो कार्य भोग, लाभ या प्रतिष्ठा पाने की इच्छा से अथवा अहंकार के कारण बहुत अधिक प्रयास और दिखावे के साथ किया जाता है, वह राजस कर्म है। इसमें कर्म से अधिक उसके परिणाम और व्यक्तिगत उपलब्धि पर ध्यान रहता है।

 

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्‌।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥२५॥

भावार्थ :

जो कार्य उसके भविष्य के परिणामों, संभावित हानि, दूसरों को होने वाले नुकसान और अपनी क्षमता पर विचार किए बिना अज्ञानवश शुरू किया जाता है, वह तामस कर्म कहलाता है। इसमें विवेकपूर्ण सोच और परिणामों के प्रति जिम्मेदारी का अभाव रहता है।

 

मुक्तसङ्‍गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥२६॥

भावार्थ :

जो व्यक्ति आसक्ति और अहंकार से मुक्त रहता है, धैर्य तथा उत्साह के साथ काम करता है और सफलता-असफलता में अपना मानसिक संतुलन बनाए रखता है, वह सात्त्विक कर्ता कहलाता है।

 

रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥२७॥

भावार्थ :

जो व्यक्ति कर्मों के फल से अत्यधिक जुड़ा रहता है, लोभ और स्वार्थ से प्रेरित होता है तथा सफलता मिलने पर बहुत प्रसन्न और असफलता पर दुखी हो जाता है, वह राजस कर्ता कहलाता है। उसका व्यवहार प्रायः इच्छाओं और भावनात्मक उतार-चढ़ाव से प्रभावित होता है।

 

अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥२८॥

भावार्थ :

जो व्यक्ति विवेकहीन, आलसी, हठी, छलपूर्ण और दूसरों के काम में बाधा डालने वाला होता है तथा जो निराशा के कारण कार्यों को टालता रहता है, वह तामस कर्ता कहलाता है। उसमें जिम्मेदारी, सक्रियता और समय पर काम पूरा करने की प्रवृत्ति कम होती है।

 

4. बुद्धि और धैर्य के तीन प्रकार

 

बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय॥२९॥

भावार्थ :

हे धनंजय! अब मैं तुम्हें तीन गुणों के आधार पर बुद्धि और धैर्य के अलग-अलग स्वरूप समझाता हूँ। इन्हें ध्यानपूर्वक समझने से सही और गलत निर्णय के बीच अंतर करना सरल हो जाता है।

 

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी॥३०॥

भावार्थ :

हे पार्थ! जो बुद्धि सही और गलत कार्य, कर्तव्य और अकर्तव्य, भय के योग्य और निर्भय रहने योग्य परिस्थितियों तथा बंधन और मुक्ति के अंतर को स्पष्ट रूप से पहचानती है, वह सात्त्विक बुद्धि है।

 

यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥३१॥

भावार्थ :

हे पार्थ! जिस बुद्धि से व्यक्ति धर्म-अधर्म तथा उचित-अनुचित कर्मों के बीच सही अंतर नहीं कर पाता और परिस्थितियों को पूरी तरह समझे बिना निर्णय लेता है, वह राजस बुद्धि कहलाती है।

 

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥३२॥

भावार्थ :

हे अर्जुन! जिस बुद्धि पर अज्ञान का गहरा प्रभाव होता है और जो अधर्म को धर्म तथा गलत को सही समझ बैठती है, वह तामस बुद्धि कहलाती है। ऐसी बुद्धि व्यक्ति को वास्तविकता के विपरीत निर्णय लेने के लिए प्रेरित करती है।

 

धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥३३॥

भावार्थ :

हे पार्थ! जिस अडिग धारणशक्ति से व्यक्ति योग और आत्मसंयम के अभ्यास द्वारा अपने मन, प्राण तथा इंद्रियों को नियंत्रित रखता है और उन्हें उचित मार्ग पर लगाए रखता है, वह सात्त्विक धैर्य है।

 

यया तु धर्मकामार्थान्धत्या धारयतेऽर्जुन।
प्रसङ्‍गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥३४॥

भावार्थ :

हे अर्जुन! जिस धारणशक्ति के सहारे व्यक्ति फल की इच्छा और आसक्ति के कारण धर्म, धन तथा इच्छित सुखों को पाने में लगा रहता है, वह राजस धैर्य कहलाता है। इसमें दृढ़ता तो होती है, लेकिन वह मुख्यतः इच्छाओं की पूर्ति से जुड़ी रहती है।

 

यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥३५॥

भावार्थ :

हे पार्थ! जिस धारणशक्ति के कारण व्यक्ति निद्रा, भय, शोक, निराशा और प्रमाद को छोड़ नहीं पाता, वह तामस धैर्य कहलाती है। यह उसे सक्रिय और विवेकपूर्ण जीवन की ओर बढ़ने से रोकती है।

 

5. सुख के तीन स्वरूप

 

सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥३६॥

यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्‌।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्‌॥३७॥

भावार्थ :

हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकार के सुख को समझो। जिस सुख को प्राप्त करने के लिए शुरुआत में अभ्यास, अनुशासन और परिश्रम करना पड़ता है, लेकिन समय के साथ उससे गहरी शांति और संतोष मिलता है, वह सात्त्विक सुख है। आरंभ में कठिन लगने पर भी उसका अंतिम परिणाम अमृत के समान कल्याणकारी होता है।

 

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्‌।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्‌॥३८॥

भावार्थ :

जो सुख इंद्रियों और बाहरी विषयों के संपर्क से मिलता है, वह शुरुआत में बहुत आकर्षक और आनंददायक लगता है, लेकिन बाद में दुख, असंतोष या परेशानी का कारण बन सकता है। ऐसे सुख को राजस सुख कहा गया है।

 

यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्‌॥३९॥

भावार्थ :

जो सुख आरंभ से लेकर उसके परिणाम तक व्यक्ति को अज्ञान और मोह में रखता है तथा निद्रा, आलस्य और लापरवाही से उत्पन्न होता है, वह तामस सुख कहलाता है। ऐसा सुख व्यक्ति की उन्नति और कर्तव्यपालन में बाधा डालता है।

 

न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिःस्यात्त्रिभिर्गुणैः॥४०॥

भावार्थ :

पृथ्वी पर, स्वर्ग में या देवताओं के बीच ऐसा कोई भी प्राणी या अस्तित्व नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणों से पूरी तरह मुक्त हो। ये गुण प्रकृति के विभिन्न रूपों में अपना प्रभाव दिखाते हैं।

 

6. स्वभाव के अनुसार कर्तव्य और कर्म

 

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥४१॥

भावार्थ :

हे अर्जुन! इस श्लोक में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के पारंपरिक कर्तव्यों का वर्णन उनके स्वभाव और गुणों के आधार पर किया गया है। आगे भगवान इन वर्गों से जुड़े कर्तव्यों की विशेषताएँ बताते हैं।

 

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्‌॥४२॥

भावार्थ :

मन को शांत रखना, इंद्रियों पर नियंत्रण रखना, संयम और तप का पालन करना, शुद्धता बनाए रखना, क्षमा करना, सरल व्यवहार करना, ज्ञान प्राप्त करना तथा ईश्वर और शास्त्रों में श्रद्धा रखना—ये ब्राह्मण के पारंपरिक स्वाभाविक कर्म बताए गए हैं।

 

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्‌।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्‌॥४३॥

भावार्थ :

वीरता, तेज, धैर्य, कुशलता, कठिन परिस्थितियों का सामना करना, दान देना और नेतृत्व की जिम्मेदारी निभाना—ये क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्तव्य बताए गए हैं।

 

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्‌।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्‌॥४४॥

भावार्थ :

खेती करना, पशुओं की देखभाल करना और व्यापार करना वैश्य के पारंपरिक कर्म बताए गए हैं। इसी प्रकार सेवा और सहयोग से जुड़े कार्य शूद्र के स्वाभाविक कर्म के रूप में वर्णित हैं।

 

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥४५॥

भावार्थ :

मनुष्य अपने स्वभाव के अनुरूप कर्तव्य को ईमानदारी और समर्पण से निभाकर जीवन में श्रेष्ठ सिद्धि प्राप्त कर सकता है। अब भगवान बताते हैं कि अपने कर्म के माध्यम से इस सिद्धि तक कैसे पहुँचा जा सकता है।

 

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्‌।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥४६॥

भावार्थ :

जिस परमेश्वर से सभी प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जो संपूर्ण संसार में व्याप्त है, उसकी पूजा मनुष्य अपने कर्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन करके भी कर सकता है। अपने कर्मों को ईश्वर के प्रति समर्पित करने से वह जीवन में परम सिद्धि प्राप्त कर सकता है।

 

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्‌॥४७॥

भावार्थ :

दूसरों के कर्तव्य को बहुत अच्छी तरह निभाने की अपेक्षा अपने स्वभाव के अनुरूप कर्तव्य को ईमानदारी से निभाना अधिक उचित है, भले ही उसमें कुछ कमियाँ हों। अपने निर्धारित कर्तव्य का सही भावना से पालन करने वाला व्यक्ति अनुचित कर्मों से बचा रहता है।

 

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्‌।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥४८॥

भावार्थ :

हे अर्जुन! अपने स्वभाव के अनुरूप कर्तव्य में कुछ कमियाँ दिखाई देने पर भी उसे छोड़ना नहीं चाहिए। जिस प्रकार अग्नि के साथ धुआँ भी होता है, उसी प्रकार संसार में प्रत्येक कार्य में कुछ न कुछ कठिनाई या कमी हो सकती है।

 

7. ज्ञान, वैराग्य और ब्रह्मप्राप्ति का मार्ग

 

असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति॥४९॥

भावार्थ :

जो व्यक्ति सभी परिस्थितियों में आसक्ति से मुक्त रहता है, अपने मन पर नियंत्रण रखता है और सांसारिक इच्छाओं से ऊपर उठ जाता है, वह संन्यास अर्थात् आसक्तिरहित जीवन के माध्यम से कर्मबंधन से मुक्त होने की परम सिद्धि प्राप्त करता है।

 

सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥५०॥

भावार्थ :

हे कुन्तीपुत्र! अब मुझसे संक्षेप में समझो कि कर्मबंधन से मुक्ति की सिद्धि प्राप्त करने वाला व्यक्ति किस प्रकार ब्रह्म को प्राप्त करता है। यह ज्ञान की सर्वोच्च अवस्था तक पहुँचने का मार्ग है।


बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥५१॥

भावार्थ :

जो व्यक्ति शुद्ध बुद्धि से युक्त होता है, धैर्यपूर्वक अपने मन को नियंत्रित करता है तथा शब्द, स्पर्श आदि विषयों की आसक्ति से दूर रहता है, वह राग और द्वेष को त्यागकर आत्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ता है।

 

विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥५२॥

भावार्थ :

ऐसा साधक एकांत और शांत वातावरण में रहना पसंद करता है, संतुलित भोजन करता है तथा अपने शरीर, वाणी और मन को संयमित रखता है। वह नियमित रूप से ध्यान का अभ्यास करता है और वैराग्य को अपने जीवन का आधार बनाता है।

 

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्‌।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥५३॥

भावार्थ :

जो व्यक्ति अहंकार, शक्ति का अनुचित अभिमान, घमंड, कामना, क्रोध और संग्रह की आसक्ति को छोड़ देता है तथा ममता से मुक्त होकर शांत जीवन जीता है, वह ब्रह्मभाव को प्राप्त करने के योग्य बन जाता है।

 

ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्‌॥५४॥

भावार्थ :

ब्रह्मभाव में स्थित व्यक्ति का मन प्रसन्न और शांत रहता है। वह बीती हुई बातों के लिए शोक नहीं करता और न ही अनावश्यक इच्छाओं के पीछे भागता है। सभी प्राणियों के प्रति समान दृष्टि रखने वाला ऐसा साधक भगवान की परम भक्ति प्राप्त करता है।

 

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्‌॥५५॥

भावार्थ :

भगवान कहते हैं कि सच्ची भक्ति के माध्यम से ही मनुष्य उनके वास्तविक स्वरूप और महिमा को जान सकता है। जब वह परमात्मा को तत्त्व से समझ लेता है, तब वह उनके साथ आध्यात्मिक एकत्व की अवस्था प्राप्त कर लेता है।

 

8. भगवान को समर्पित कर्मयोग

 

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्‌॥५६॥

भावार्थ :

जो व्यक्ति भगवान पर भरोसा रखकर अपने सभी कर्तव्यों का पालन करता है, वह उनकी कृपा से शाश्वत और अविनाशी परमपद प्राप्त कर सकता है। इसके लिए संसार के कार्यों को छोड़ना आवश्यक नहीं, बल्कि उन्हें समर्पण की भावना से करना महत्वपूर्ण है।

 

चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्परः।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥५७॥

भावार्थ :

भगवान अर्जुन से कहते हैं कि अपने सभी कर्म मन से मुझे समर्पित करो, मुझे ही अपना परम लक्ष्य मानो और समबुद्धि के योग का सहारा लो। अपने चित्त को निरंतर मुझमें लगाए रखकर अपने कर्तव्यों का पालन करो।

 

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्‍कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥५८॥

भावार्थ :

यदि तुम अपना मन मुझमें स्थिर रखोगे, तो मेरी कृपा से सभी कठिनाइयों को पार कर सकोगे। लेकिन यदि अहंकार के कारण मेरी सीख को स्वीकार नहीं करोगे, तो अपने आध्यात्मिक लक्ष्य से भटक सकते हो।

 

यदहङ्‍कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥५९॥

भावार्थ :

भगवान कहते हैं कि अहंकार के कारण तुम यह सोच रहे हो कि युद्ध नहीं करोगे, लेकिन तुम्हारा यह निर्णय स्थिर नहीं रह पाएगा। तुम्हारा स्वभाव और तुम्हारे कर्तव्य तुम्हें अंततः उसी दिशा में कार्य करने के लिए प्रेरित करेंगे।

 

स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्‌॥६०॥

भावार्थ :

हे अर्जुन! तुम्हारा स्वभाव और उससे जुड़े कर्तव्य तुम्हें प्रभावित करते हैं। जिस कार्य को तुम अभी मोह के कारण नहीं करना चाहते, परिस्थितियों और अपने स्वभाव के प्रभाव से अंततः वही कार्य करने के लिए प्रवृत्त हो सकते हो।

 

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽजुर्न तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया॥६१॥

भावार्थ :

भगवान प्रत्येक प्राणी के हृदय में स्थित अंतर्यामी हैं। वे अपनी माया के माध्यम से जीवों को उनके कर्मों और प्रकृति के अनुसार संसार में गतिशील रखते हैं। यह श्लोक मनुष्य को परमात्मा की व्यापक उपस्थिति और उसके मार्गदर्शन का बोध कराता है।

 

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्‌॥६२॥

भावार्थ :

हे अर्जुन! तुम पूरे मन और श्रद्धा से उसी परमेश्वर की शरण में जाओ। उनकी कृपा से तुम्हें परम शांति प्राप्त होगी और तुम उस शाश्वत परमधाम तक पहुँच सकोगे, जो आध्यात्मिक जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है।

 

9. विचार करके निर्णय लेने की स्वतंत्रता

 

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्‍गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥६३॥

भावार्थ :

भगवान कहते हैं कि उन्होंने अर्जुन को अत्यंत गूढ़ ज्ञान समझा दिया है। अब अर्जुन को चाहिए कि वह इस ज्ञान पर पूरी तरह विचार करे, उसके अर्थ को समझे और फिर अपनी समझ के अनुसार निर्णय ले।

 

सर्वगुह्यतमं भूतः शृणु मे परमं वचः।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्‌॥६४॥

भावार्थ :

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि अर्जुन उन्हें अत्यंत प्रिय है, इसलिए वे उसे फिर से अपना सबसे गूढ़ और कल्याणकारी संदेश सुनाना चाहते हैं। इस संदेश का उद्देश्य अर्जुन का वास्तविक हित करना और उसे परमात्मा की ओर मार्गदर्शन देना है।

 

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥६५॥

भावार्थ :

भगवान अर्जुन से कहते हैं कि अपना मन मुझमें लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी आराधना करो और मुझे प्रणाम करो। इस प्रकार प्रेम, श्रद्धा और समर्पण के साथ जीवन जीने पर तुम मुझे ही प्राप्त करोगे। भगवान यह आश्वासन देते हैं क्योंकि अर्जुन उन्हें अत्यंत प्रिय है।

 

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥६६॥

भावार्थ :

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि सभी प्रकार के सहारों और अहंकारपूर्ण धारणाओं को छोड़कर मेरी ही अनन्य शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें पापों और उनके बंधनों से मुक्त कर दूँगा, इसलिए किसी प्रकार का शोक या भय मत करो।

 

10. गीता के ज्ञान का महत्व और उसके श्रवण का फल

 

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥६७॥

भावार्थ :

भगवान कहते हैं कि इस गूढ़ ज्ञान को ऐसे व्यक्ति के सामने नहीं रखना चाहिए, जिसमें तप, भक्ति और सुनने की सच्ची इच्छा का अभाव हो। इसी प्रकार जो भगवान के प्रति द्वेष या दोषदृष्टि रखता है, उसे भी यह उपदेश नहीं देना चाहिए।

 

य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥६८॥

भावार्थ :

जो व्यक्ति भगवान के प्रति गहरी भक्ति रखते हुए गीता के इस परम रहस्यपूर्ण ज्ञान को अन्य भक्तों तक पहुँचाता है, वह भगवान को प्रिय होता है और अंततः उन्हें प्राप्त करता है। ज्ञान का प्रसार भी भक्ति और सेवा का एक महत्वपूर्ण रूप है।

 

न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥६९॥

भावार्थ :

भगवान कहते हैं कि गीता के इस ज्ञान को भक्तों तक पहुँचाने वाले व्यक्ति से बढ़कर उनका प्रिय कार्य करने वाला कोई नहीं है। उनके अनुसार, ऐसा व्यक्ति संसार में उन्हें अत्यंत प्रिय होता है।

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः॥७०॥

भावार्थ :

जो व्यक्ति भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के इस पवित्र संवाद का अध्ययन करता है, वह ज्ञान के माध्यम से भगवान की आराधना करता है। गीता को समझना और उसके संदेश पर मनन करना भी एक प्रकार का ज्ञानयज्ञ है।

 

श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्‌॥७१॥

भावार्थ :

जो व्यक्ति श्रद्धा और खुले मन से गीता के उपदेश को सुनता है तथा उसमें दोष खोजने की भावना नहीं रखता, उसे भी इसका शुभ फल प्राप्त होता है। ऐसा श्रवण उसके जीवन को सदाचार और आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में प्रेरित करता है।

 

11. अर्जुन का मोह दूर होना और संजय का निष्कर्ष

 

कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय॥७२॥

भावार्थ :

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से पूछते हैं—हे पार्थ! क्या तुमने मेरी बातों को एकाग्र मन से सुना और समझा है? हे धनंजय! क्या तुम्हारे अज्ञान से उत्पन्न भ्रम और मोह अब दूर हो गए हैं?

 

अर्जुन उवाच

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वप्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥७३॥

भावार्थ :

अर्जुन ने कहा—हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह दूर हो गया है और मुझे अपने कर्तव्य का बोध फिर से प्राप्त हो गया है। अब मेरे सभी संदेह समाप्त हो गए हैं। मैं स्थिर बुद्धि से आपके उपदेश के अनुसार कार्य करूँगा।

 

सञ्जय उवाच

इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्‌॥७४॥

भावार्थ :

संजय ने कहा—इस प्रकार मैंने भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण और महात्मा अर्जुन के बीच हुए इस अद्भुत संवाद को सुना। यह ज्ञान से परिपूर्ण संवाद इतना प्रभावशाली था कि इसे सुनकर मेरे मन में भी गहरा आश्चर्य और भावनात्मक उत्साह उत्पन्न हुआ।

 

व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्‍गुह्यमहं परम्‌।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्‌॥७५॥

भावार्थ :

संजय कहते हैं कि महर्षि व्यास की कृपा से उन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई, जिसके कारण वे भगवान श्रीकृष्ण के मुख से निकले इस परम गोपनीय योगज्ञान को प्रत्यक्ष सुन सके। यह उनके लिए अत्यंत दुर्लभ और अद्भुत अनुभव था।

 

राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्‌।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः॥७६॥

भावार्थ :

हे राजन्! भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के इस पवित्र तथा अद्भुत संवाद को बार-बार याद करके मुझे बारंबार आनंद और प्रसन्नता प्राप्त होती है। इस ज्ञान का स्मरण मेरे मन में उत्साह और श्रद्धा उत्पन्न करता है।

 

तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः।
विस्मयो मे महान्‌ राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः॥७७॥

भावार्थ :

हे राजन्! भगवान श्रीहरि के उस अत्यंत अद्भुत स्वरूप का बार-बार स्मरण करने पर मेरे मन में महान आश्चर्य उत्पन्न होता है। उस दिव्य अनुभव को याद करके मैं बार-बार आनंदित हो उठता हूँ।

 

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥७८॥

भावार्थ :

संजय कहते हैं कि जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुष धारण करने वाले अर्जुन हैं, वहाँ समृद्धि, विजय, उन्नति और अटल धर्मनीति का निवास होता है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि जहाँ दिव्य मार्गदर्शन और कर्तव्यनिष्ठ कर्म का मेल होता है, वहाँ कल्याण और सफलता की संभावना प्रबल होती है।

 

 

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसन्न्यासयोगो नामाष्टादशोऽध्यायः॥18॥
 
🙏जय श्री कृष्णा 🙏
 
गीता समाप्त
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