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अर्जुन की विश्वरूप-दर्शन की प्रार्थना
अर्जुन उवाच
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम्।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम॥१॥
भावार्थ :
अर्जुन कहते हैं—हे प्रभु! आपने मुझ पर कृपा करके आत्मज्ञान से संबंधित जो अत्यंत गूढ़ उपदेश दिया, उससे मेरे मन का अज्ञान और भ्रम दूर हो गया है। अब मुझे आपके वास्तविक स्वरूप को समझने की इच्छा हो रही है।
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्॥२॥
भावार्थ :
हे कमलनयन! मैंने आपसे संसार के प्राणियों की उत्पत्ति और उनके विनाश का रहस्य विस्तार से सुना है। साथ ही आपकी अनंत और अविनाशी महिमा के बारे में भी जाना है।
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम॥३॥
भावार्थ :
हे परमेश्वर! आपने अपने विषय में जो कुछ बताया है, मैं उसे सत्य मानता हूँ। फिर भी, हे पुरुषोत्तम! मैं आपके उस दिव्य ऐश्वर्यपूर्ण स्वरूप को अपनी आँखों से देखना चाहता हूँ, जिसमें आपकी असीम शक्ति और महिमा प्रकट होती है।
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्॥४॥
भावार्थ :
हे प्रभु! यदि आपको लगता है कि मैं आपके उस दिव्य स्वरूप को देखने में समर्थ हूँ, तो हे योगेश्वर! कृपा करके मुझे अपना वह अविनाशी स्वरूप दिखाइए।
भगवान द्वारा विश्वरूप के दर्शन की तैयारी
श्रीभगवानुवाच
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च॥५॥
भावार्थ :
श्रीभगवान कहते हैं—हे पार्थ! अब तुम मेरे असंख्य दिव्य रूपों को देखो। मेरे इन रूपों में अनेक प्रकार के आकार, स्वरूप और रंग दिखाई देंगे।
पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत॥६॥
भावार्थ :
हे भरतवंशी अर्जुन! मेरे भीतर तुम बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, दोनों अश्विनीकुमार और मरुद्गणों को देखो। इनके अतिरिक्त भी ऐसे अनेक अद्भुत दृश्य देखो, जिन्हें तुमने पहले कभी नहीं देखा है।
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि॥७॥
भावार्थ :
हे गुडाकेश! अब तुम मेरे इस शरीर में एक ही स्थान पर पूरे चराचर संसार को देख सकते हो। इसके अतिरिक्त तुम्हारे मन में जो कुछ भी देखने की इच्छा है, वह भी मेरे इसी स्वरूप में देख लो।
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्॥८॥
भावार्थ :
लेकिन तुम मुझे इन साधारण आँखों से नहीं देख सकते। इसलिए मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि प्रदान करता हूँ। इस दिव्य दृष्टि से तुम मेरी अद्भुत ईश्वरीय शक्ति और विराट स्वरूप को देख सकोगे।
संजय द्वारा धृतराष्ट्र को विश्वरूप का वर्णन
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः।
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्॥९॥
भावार्थ :
संजय कहते हैं—हे राजन्! इस प्रकार अर्जुन से कहने के बाद योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य योगशक्ति से उन्हें अपना अत्यंत अद्भुत और ऐश्वर्य से परिपूर्ण विराट स्वरूप दिखाया।
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्॥१०॥
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्।
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्॥११॥
भावार्थ :
अर्जुन ने भगवान के उस विराट स्वरूप में अनगिनत मुख और नेत्र देखे। वह रूप असंख्य अद्भुत दृश्यों से भरा था। उसमें अनेक दिव्य आभूषण और विभिन्न प्रकार के दिव्य अस्त्र-शस्त्र दिखाई दे रहे थे। भगवान दिव्य मालाओं और वस्त्रों से सुशोभित थे तथा उनके शरीर से दिव्य सुगंध फैल रही थी। उनका स्वरूप सभी आश्चर्यों का केंद्र, अनंत और चारों दिशाओं में व्याप्त था।
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः॥१२॥
भावार्थ :
यदि आकाश में एक साथ हजार सूर्य उदित हो जाएँ और उनसे जितना प्रकाश उत्पन्न हो, शायद वह प्रकाश भी उस महान विराट स्वरूप की दिव्य चमक के समान न हो।
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा॥१३॥
भावार्थ :
उस समय अर्जुन ने देवों के देव भगवान श्रीकृष्ण के विराट शरीर में पूरे संसार को एक ही स्थान पर स्थित देखा। संसार अनेक रूपों और भागों में दिखाई दे रहा था, फिर भी वह सब भगवान के भीतर ही समाया हुआ था।
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत॥१४॥
भावार्थ :
उस अद्भुत दृश्य को देखकर अर्जुन अत्यंत आश्चर्यचकित हो गए और उनके शरीर में रोमांच छा गया। उन्होंने श्रद्धापूर्वक सिर झुकाकर भगवान को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे।
अर्जुन द्वारा विश्वरूप के अद्भुत स्वरूप का वर्णन और स्तुति
अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे
सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान्।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ
मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्॥१५॥
भावार्थ :
अर्जुन कहते हैं—हे देव! आपके विराट शरीर में मुझे सभी देवता, विभिन्न प्रकार के प्राणियों के समूह, कमलासन पर विराजमान ब्रह्माजी, महादेव, सभी ऋषि और दिव्य सर्प दिखाई दे रहे हैं।
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं-
पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं-
पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप॥१६॥
भावार्थ :
हे विश्वेश्वर! मैं आपको अनगिनत भुजाओं, उदरों, मुखों और नेत्रों से युक्त तथा हर दिशा में अनंत रूपों में देख रहा हूँ। आपके इस विराट स्वरूप का न आदि दिखाई देता है, न मध्य और न ही अंत।
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च
तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता-द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्॥१७॥
भावार्थ :
मैं आपको मुकुट धारण किए हुए, गदा और चक्र धारण करने वाले तथा चारों ओर से दिव्य प्रकाश फैलाते हुए देख रहा हूँ। आपका तेज प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के समान अत्यंत प्रखर है और आपका स्वरूप मानवीय दृष्टि से परे है।
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता
सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे॥१८॥
भावार्थ :
मेरे मत में आप ही वह परम अविनाशी सत्य हैं, जिसे जानना सबसे आवश्यक है। आप ही समस्त संसार का सर्वोच्च आधार हैं, सनातन धर्म के रक्षक हैं और शाश्वत पुरुष हैं।
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य
मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं-
स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्॥१९॥
भावार्थ :
मैं आपको आदि, मध्य और अंत से रहित, अनंत शक्ति वाले और असंख्य भुजाओं से युक्त देख रहा हूँ। सूर्य और चंद्रमा आपके नेत्रों के समान हैं, आपके मुख अग्नि की तरह प्रज्वलित हैं और आपका तेज पूरे संसार को प्रकाशित तथा प्रभावित कर रहा है।
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि
व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं
लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्॥२०॥
भावार्थ :
हे महात्मन्! आकाश और पृथ्वी के बीच का पूरा क्षेत्र तथा सभी दिशाएँ आपके विराट स्वरूप से भरी हुई हैं। आपके इस अद्भुत और अत्यंत प्रभावशाली रूप को देखकर तीनों लोकों के प्राणी भय और व्याकुलता से भर गए हैं।
अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति
केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घा:
स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः॥२१॥
भावार्थ :
देवताओं के अनेक समूह आपके विराट स्वरूप में प्रवेश कर रहे हैं। कुछ भय से हाथ जोड़कर आपकी स्तुति कर रहे हैं, जबकि महर्षि और सिद्धों के समुदाय आपके कल्याणकारी स्वरूप की प्रशंसा करते हुए उत्तम स्तोत्रों से आपका गुणगान कर रहे हैं।
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या-
विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा-
वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे॥२२॥
भावार्थ :
ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, आठ वसु, साध्यगण, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, पितर, गंधर्व, यक्ष, असुर और सिद्धों के समूह—सभी आपके विराट रूप को आश्चर्य से देख रहे हैं।
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं-
महाबाहो बहुबाहूरूपादम्।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं-
दृष्टवा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्॥२३॥
भावार्थ :
हे महाबाहो! आपके विशाल स्वरूप में असंख्य मुख, नेत्र, भुजाएँ, जंघाएँ, पैर और उदर दिखाई दे रहे हैं। अनेक भयंकर दाँतों से युक्त इस विकराल रूप को देखकर संसार के प्राणी भयभीत हैं और मैं भी अत्यंत व्याकुल हो रहा हूँ।
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं-
व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्।
दृष्टवा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा
धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो॥२४॥
भावार्थ :
हे विष्णु! आपका विराट स्वरूप आकाश तक फैला हुआ, अत्यंत प्रकाशमान और अनेक रंगों से युक्त है। आपके विशाल नेत्र और खुले हुए मुख देखकर मेरा अंतःकरण भय से कांप रहा है और मुझे न धैर्य मिल रहा है, न मन की शांति।
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि
दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि।
दिशो न जाने न लभे च शर्म
प्रसीद देवेश जगन्निवास॥२५॥
भावार्थ :
हे देवेश, हे जगन्निवास! आपके विकराल दाँतों वाले और प्रलयकाल की अग्नि के समान भयंकर मुख देखकर मैं इतना भयभीत हूँ कि मुझे दिशाओं का भी ज्ञान नहीं रह गया है। कृपा करके मुझ पर प्रसन्न हों।
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः
सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ
सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः॥२६॥
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति
दंष्ट्राकरालानि भयानकानि।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु
सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः॥२७॥
भावार्थ :
धृतराष्ट्र के सभी पुत्र, उनके साथ अनेक राजा, भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण और हमारे पक्ष के प्रमुख योद्धा भी आपके भयंकर मुखों की ओर तेजी से बढ़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। कुछ आपके दाँतों के बीच फँसे हुए दिखाई दे रहे हैं। यह दृश्य युद्ध में होने वाले विनाश का भयावह संकेत दे रहा है।
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः
समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति।
तथा तवामी नरलोकवीरा-
विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति॥२८॥
भावार्थ :
जिस प्रकार अनेक नदियों की धाराएँ स्वाभाविक रूप से समुद्र की ओर बहती हुई उसी में समा जाती हैं, उसी प्रकार संसार के ये महान योद्धा भी तेजी से आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश करते हुए दिखाई दे रहे हैं।
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा-
विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः।
तथैव नाशाय विशन्ति लोका-
स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः॥२९॥
भावार्थ :
जिस प्रकार पतंगे जलती हुई अग्नि की ओर आकर्षित होकर तेजी से उसकी ओर बढ़ते हैं और उसमें नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार ये सभी योद्धा भी मानो अपने विनाश की ओर बढ़ते हुए आपके मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ता-
ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं-
भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो॥३०॥
भावार्थ :
हे विष्णु! आपके प्रज्वलित मुख समस्त लोकों को अपनी ओर खींचते हुए मानो उन्हें निगल रहे हैं। आपके प्रचंड तेज से पूरा संसार भर गया है और आपकी तीव्र आभा सबको अत्यंत प्रभावित कर रही है।
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो-
नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं-
न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्॥३१॥
भावार्थ :
हे देवश्रेष्ठ! आपके इस उग्र और भयंकर स्वरूप को देखकर मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि आप कौन हैं और आपकी यह लीला किस उद्देश्य से हो रही है। इसलिए मैं आपको प्रणाम करके आपसे आपके वास्तविक स्वरूप और उद्देश्य को जानना चाहता हूँ। कृपा करके मुझे बताइए।
भगवान द्वारा कालस्वरूप का उद्घाटन और अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरणा
श्रीभगवानुवाच
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो-
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥३२॥
भावार्थ :
श्रीभगवान कहते हैं—मैं इस समय संसार के परिवर्तन और विनाश का कारण बनने वाला काल हूँ। युद्धभूमि में उपस्थित इन योद्धाओं का अंत निश्चित है। तुम्हारे युद्ध करने या न करने से उनके निर्धारित परिणाम में कोई परिवर्तन नहीं होगा।
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व
जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥३३॥
भावार्थ :
इसलिए अर्जुन, अपने कर्तव्य से पीछे मत हटो और उठकर युद्ध करो। विजय प्राप्त करके यश और समृद्ध राज्य प्राप्त करो। इन योद्धाओं का अंत पहले ही निश्चित हो चुका है; तुम्हें केवल उस कार्य में माध्यम बनना है।
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च
कर्णं तथान्यानपि योधवीरान्।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा
युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्॥३४॥
भावार्थ :
द्रोणाचार्य, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण और अन्य महान योद्धाओं का भी अंत निश्चित है। इसलिए भय या शोक मत करो। अपने कर्तव्य का पालन करते हुए युद्ध करो; तुम्हें अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त होगी।
भयभीत अर्जुन की स्तुति और सौम्य रूप देखने की प्रार्थना
सञ्जय उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य
कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं-
सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य॥३५॥
भावार्थ :
संजय कहते हैं—भगवान श्रीकृष्ण के ये वचन सुनकर मुकुटधारी अर्जुन भय से कांपने लगे। हाथ जोड़कर और बार-बार प्रणाम करके वे अत्यंत भावुक तथा भयभीत स्वर में भगवान से बोलने लगे।
अर्जुन उवाच
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या
जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति
सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घा:॥३६॥
भावार्थ :
हे हृषीकेश! आपके नाम, गुण और महिमा का स्मरण करके संसार का आनंदित होना उचित ही है। आपके प्रभाव से भयभीत होकर राक्षसी प्रवृत्ति वाले प्राणी दूर भाग रहे हैं और सिद्धों के सभी समूह श्रद्धापूर्वक आपको प्रणाम कर रहे हैं।
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्
गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे।
अनन्त देवेश जगन्निवास
त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्॥३७॥
भावार्थ :
हे महात्मन्! जब आप ब्रह्मा के भी आदि कारण और सबसे महान हैं, तो आपको कौन प्रणाम नहीं करेगा? हे अनंत, देवेश और जगत के आधार! आप उस अविनाशी परम सत्य के स्वरूप हैं, जो दृश्य, अदृश्य और उन दोनों से परे है।
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण-
स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम
त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥३८॥
भावार्थ :
आप ही आदि देव और सनातन पुरुष हैं। आप पूरे विश्व के सर्वोच्च आश्रय हैं। आप ही सबको जानने वाले, ज्ञान के वास्तविक विषय और परम धाम हैं। हे अनंत स्वरूप! यह पूरा संसार आपसे ही व्याप्त है।
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्क:
प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः
पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥३९॥
भावार्थ :
आपमें ही वायु, यम, अग्नि, वरुण, चंद्रमा, प्रजापति और ब्रह्मा आदि सभी शक्तियों का स्वरूप दिखाई देता है। हे प्रभु! आपको बार-बार और असंख्य बार मेरा प्रणाम है।
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते
नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं
सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥४०॥
भावार्थ :
हे सर्वस्वरूप प्रभु! आपको आगे से, पीछे से और चारों ओर से मेरा प्रणाम है। आपकी शक्ति और पराक्रम की कोई सीमा नहीं है। आपने संपूर्ण संसार को अपने भीतर समाहित कर रखा है, इसलिए आप ही सब कुछ हैं।
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं-
हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदं-
मया प्रमादात्प्रणयेन वापि॥४१॥
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि
विहारशय्यासनभोजनेषु।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं
तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्॥४२॥
भावार्थ :
हे अच्युत! आपके वास्तविक ऐश्वर्य को न समझ पाने के कारण मैंने आपको अपना मित्र मानकर कभी प्रेमवश या असावधानी से ‘हे कृष्ण’, ‘हे यादव’ या ‘हे सखा’ कहकर संबोधित किया होगा। साथ बैठते, घूमते, विश्राम करते या भोजन करते समय यदि मैंने मजाक में आपका कोई अनादर किया हो, अकेले या अन्य मित्रों के सामने, तो मैं उन सभी अपराधों के लिए आपसे क्षमा माँगता हूँ।
पितासि लोकस्य चराचरस्य
त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो-
लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव॥४३॥
भावार्थ :
आप पूरे चराचर संसार के पिता हैं और सबसे महान गुरु तथा पूजनीय हैं। हे अनुपम प्रभाव वाले प्रभु! तीनों लोकों में आपके समान कोई दूसरा नहीं है, इसलिए आपसे श्रेष्ठ किसी के होने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती।
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं
प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः
प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्॥४४॥
भावार्थ :
इसलिए हे पूजनीय प्रभु! मैं अपना शरीर आपके चरणों में समर्पित करके आपको प्रणाम करता हूँ और आपकी कृपा चाहता हूँ। जैसे पिता अपने पुत्र की, मित्र अपने मित्र की और प्रिय व्यक्ति अपने प्रिय की भूलों को क्षमा करता है, वैसे ही आप भी मेरी भूलों को क्षमा करें।
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा
भयेन च प्रव्यथितं मनो मे।
तदेव मे दर्शय देवरूपं-
प्रसीद देवेश जगन्निवास॥४५॥
भावार्थ :
आपका ऐसा अद्भुत रूप देखकर मुझे अत्यंत आश्चर्य और आनंद हो रहा है, लेकिन इसकी विशालता और उग्रता से मेरा मन भयभीत भी हो गया है। इसलिए हे देवेश, हे जगन्निवास! कृपा करके मुझे अपना शांत और परिचित दिव्य रूप फिर से दिखाइए।
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त-
मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन
सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते॥४६॥
भावार्थ :
हे विश्वरूप और सहस्रबाहु प्रभु! अब मैं आपको मुकुट धारण किए हुए तथा हाथों में गदा और चक्र लिए हुए चतुर्भुज रूप में देखना चाहता हूँ। कृपा करके उसी शांत और दिव्य रूप में मेरे सामने प्रकट हों।
भगवान द्वारा विश्वरूप की महिमा और सौम्य रूप का पुनः दर्शन
श्रीभगवानुवाच
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं-
रूपं परं दर्शितमात्मयोगात्।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं-
यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्॥४७॥
भावार्थ :
श्रीभगवान कहते हैं—हे अर्जुन! तुम पर प्रसन्न होकर मैंने अपनी योगशक्ति के द्वारा तुम्हें यह अत्यंत दिव्य, प्रकाशमय, अनंत और आदि विराट स्वरूप दिखाया है। तुम्हारे अतिरिक्त इसे पहले किसी ने इस प्रकार नहीं देखा।
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै-
र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः।
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके
द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर॥४८॥
भावार्थ :
हे कुरुश्रेष्ठ! मनुष्यलोक में मेरे इस विराट स्वरूप का दर्शन केवल वेदों का अध्ययन करने, यज्ञ करने, दान देने, धार्मिक कर्म करने या कठोर तपस्या करने मात्र से संभव नहीं है। ऐसा दर्शन अत्यंत विशेष और दुर्लभ है।
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो-
दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम्।
व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं-
तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य॥४९॥
भावार्थ :
मेरे इस भयंकर विराट रूप को देखकर तुम्हें भयभीत या भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं है। अपने मन से भय दूर करो और प्रसन्न हो जाओ। अब तुम मेरे उस शांत चतुर्भुज स्वरूप का पुनः दर्शन करो।
सञ्जय उवाच
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा
स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः।
आश्वासयामास च भीतमेनं
भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा॥५०॥
भावार्थ :
संजय कहते हैं—भगवान वासुदेव ने अर्जुन से ऐसा कहकर अपना चतुर्भुज रूप फिर प्रकट किया। इसके बाद उन्होंने अपना शांत स्वरूप धारण करके भय से व्याकुल अर्जुन को सांत्वना दी और उसका मन स्थिर किया।
अर्जुन की शांति और अनन्य भक्ति की महिमा
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन।
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः॥५१॥
भावार्थ :
अर्जुन कहते हैं—हे जनार्दन! आपके इस शांत और परिचित मनुष्यरूप को देखकर अब मेरे मन का भय दूर हो गया है। मैं फिर से सामान्य और स्थिर मानसिक अवस्था में लौट आया हूँ।
श्रीभगवानुवाच
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः॥५२॥
भावार्थ :
श्रीभगवान कहते हैं—तुमने अभी जिस मेरे चतुर्भुज रूप का दर्शन किया है, वह अत्यंत दुर्लभ है। देवता भी इस दिव्य स्वरूप को देखने की इच्छा निरंतर रखते हैं।
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया।
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्ट्वानसि मां यथा॥५३॥
भावार्थ :
जिस प्रकार तुमने अभी मुझे देखा है, उस स्वरूप का दर्शन केवल वेदों के अध्ययन, तपस्या, दान या यज्ञ आदि कर्मों के द्वारा सहज रूप से प्राप्त नहीं किया जा सकता।
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥५४॥
भावार्थ :
हे अर्जुन! अनन्य और एकाग्र भक्ति के द्वारा ही मुझे इस स्वरूप में वास्तविक रूप से जाना, देखा और प्राप्त किया जा सकता है। सच्ची भक्ति भगवान से गहरा आध्यात्मिक संबंध स्थापित करने का मार्ग है।
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥५५॥
भावार्थ :
हे पाण्डव! जो व्यक्ति अपने सभी कर्तव्यों को भगवान को समर्पित भाव से करता है, उन्हें ही अपना सर्वोच्च लक्ष्य मानता है, उनकी भक्ति में लगा रहता है, सांसारिक आसक्ति से दूर रहता है और किसी भी प्राणी के प्रति शत्रुता नहीं रखता—वह अंततः भगवान को प्राप्त होता है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकादशोऽध्यायः॥११॥
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