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ज्ञान की श्रेष्ठता और प्रकृति-पुरुष के संयोग से सृष्टि की उत्पत्ति
श्रीभगवानुवाच
परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्।
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः॥१॥
भावार्थ :
श्रीभगवान कहते हैं—हे अर्जुन! मैं तुम्हें एक बार फिर उस सर्वोच्च ज्ञान का वर्णन करूँगा, जो सभी ज्ञानों में श्रेष्ठ है। इस ज्ञान को समझकर अनेक मुनियों ने संसार के बंधनों से ऊपर उठकर परम सिद्धि प्राप्त की है।
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥२॥
भावार्थ :
इस ज्ञान को अपने जीवन में धारण करके जो मनुष्य परमात्मा के स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं, वे सृष्टि के आरंभ में पुनः जन्म नहीं लेते और प्रलय के समय भी किसी प्रकार के भय या दुख से विचलित नहीं होते।
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्।
सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥३॥
भावार्थ :
हे भरतवंशी! मेरी आठ तत्त्वों से बनी जड़ प्रकृति—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार—संपूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति का आधार है। मैं उसमें चेतन रूपी बीज स्थापित करता हूँ और इसी जड़ प्रकृति तथा चेतन तत्व के संयोग से सभी जीवों की उत्पत्ति होती है।
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥४॥
भावार्थ :
हे कुन्तीपुत्र! संसार की सभी योनियों में जितने भी जीव अलग-अलग शरीर धारण करके जन्म लेते हैं, उनकी उत्पत्ति का आधार प्रकृति है। मैं उस चेतन बीज को प्रदान करने वाला पिता हूँ, जिसके कारण जीवों का अस्तित्व संभव होता है।
प्रकृति से उत्पन्न तीन गुण और उनका प्रभाव
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥५॥
भावार्थ :
हे महाबाहु अर्जुन! सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं। ये गुण अविनाशी आत्मा को शरीर के साथ जोड़कर उसे संसार के अनुभवों और कर्मों के बंधन में बाँधते हैं।
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ॥६॥
भावार्थ :
हे निष्पाप अर्जुन! सत्त्वगुण स्वभाव से निर्मल और प्रकाश देने वाला है। यह मनुष्य को शुद्धता, सुख और ज्ञान की ओर ले जाता है, लेकिन सुख तथा ज्ञान के प्रति लगाव उत्पन्न होने पर वही लगाव बंधन का कारण बन जाता है।
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्॥७॥
भावार्थ :
हे कुन्तीपुत्र! रजोगुण का संबंध इच्छा, आकर्षण और तृष्णा से है। इसके प्रभाव में मनुष्य अधिक पाने की इच्छा करता है और अपने कर्मों तथा उनके परिणामों से आसक्त होकर संसार के बंधन में फँसता जाता है।
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत॥८॥
भावार्थ :
हे भरतवंशी! तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न होता है और जीव के विवेक को ढक देता है। इसके प्रभाव से मनुष्य आलस्य, प्रमाद, अत्यधिक निद्रा और मोह में फँसकर अपने उचित कर्तव्यों से दूर होने लगता है।
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत॥९॥
भावार्थ :
हे अर्जुन! सत्त्वगुण मनुष्य को सुख और शांति के प्रति आकर्षित करता है। रजोगुण उसे लगातार कर्म और फल की इच्छा में लगाए रखता है, जबकि तमोगुण उसके विवेक और ज्ञान को ढककर उसे प्रमाद की ओर ले जाता है।
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा॥१०॥
भावार्थ :
हे भरतवंशी! जब रज और तम की प्रधानता कम होती है, तब सत्त्वगुण प्रभावी हो जाता है। जब सत्त्व और तम घटते हैं, तब रजोगुण बढ़ता है और जब सत्त्व तथा रज दब जाते हैं, तब तमोगुण की प्रधानता हो जाती है।
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत॥११॥
भावार्थ :
जब शरीर की सभी इंद्रियों और उनके माध्यमों में स्पष्टता, जागरूकता और ज्ञान का प्रकाश दिखाई देने लगे, तब समझना चाहिए कि व्यक्ति के भीतर सत्त्वगुण की विशेष वृद्धि हुई है।
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ॥१२॥
भावार्थ :
हे भरतश्रेष्ठ! जब रजोगुण बढ़ता है, तब मनुष्य के भीतर लोभ, अधिक से अधिक पाने की इच्छा और लगातार कर्म करते रहने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। मन अशांत रहता है और सांसारिक वस्तुओं के प्रति उसकी इच्छाएँ तीव्र होती जाती हैं।
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन॥१३॥
भावार्थ :
हे कुरुनन्दन! जब तमोगुण बढ़ता है, तब मनुष्य के भीतर विवेक का प्रकाश कम होने लगता है। कर्तव्य से विमुखता, आलस्य, प्रमाद और मोह बढ़ जाते हैं तथा वह उचित-अनुचित का सही निर्णय करने में असमर्थ होने लगता है।
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्।
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते॥१४॥
भावार्थ :
जब सत्त्वगुण की प्रधानता के समय किसी देहधारी की मृत्यु होती है, तब उसके श्रेष्ठ और सात्त्विक कर्मों के अनुरूप उसे निर्मल एवं उच्च लोकों की प्राप्ति होती है।
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥१५॥
भावार्थ :
यदि रजोगुण की प्रधानता के समय मृत्यु होती है, तो जीव कर्म और फल की आसक्ति रखने वाले मनुष्यों के बीच जन्म प्राप्त करता है। तमोगुण की प्रधानता में मृत्यु होने पर वह अज्ञान से युक्त निम्न योनियों में जन्म लेता है।
कर्मण:सुकृतस्याहु: सात्त्विकं निर्मलं फलम्।
रजसस्तु फलं दु:खमज्ञानं तमस: फलम्॥१६॥
भावार्थ :
सात्त्विक भाव से किए गए कर्म मनुष्य को शुद्धता, सुख और ज्ञान प्रदान करते हैं। रजोगुण से प्रेरित कर्मों का परिणाम प्रायः दुःख और अशांति होता है, जबकि तमोगुण से किए गए कर्म अज्ञान को और अधिक बढ़ाते हैं।
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च॥१७॥
भावार्थ :
सत्त्वगुण के बढ़ने से मनुष्य में वास्तविक ज्ञान और विवेक विकसित होता है। रजोगुण से लोभ और अधिक पाने की इच्छा उत्पन्न होती है, जबकि तमोगुण से प्रमाद, मोह और अज्ञान बढ़ते हैं।
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥१८॥
भावार्थ :
सत्त्वगुण में स्थित मनुष्य उच्च और श्रेष्ठ अवस्थाओं की ओर बढ़ता है। रजोगुणी व्यक्ति सांसारिक जीवन और कर्मों में ही उलझा रहता है, जबकि तमोगुण में रहने वाला व्यक्ति अज्ञान के कारण निम्न अवस्थाओं की ओर जाता है।
गुणों से ऊपर उठने का मार्ग और गुणातीत मनुष्य के लक्षण
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति॥१९॥
भावार्थ :
जब मनुष्य यह समझ लेता है कि प्रकृति के तीनों गुण ही संसार में होने वाली गतिविधियों के पीछे कार्य कर रहे हैं और आत्मा केवल उनका साक्षी है, तब वह इन गुणों से ऊपर उठकर परमात्मा के वास्तविक स्वरूप को जानने लगता है।
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥२०॥
भावार्थ :
जब जीव शरीर और प्रकृति से जुड़े तीनों गुणों को पार कर लेता है, तब वह जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और उनसे उत्पन्न दुखों के बंधन से मुक्त हो जाता है और परम शांति तथा अमृतस्वरूप आनंद को प्राप्त करता है।
अर्जुन उवाच
कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो।
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते॥२१॥
भावार्थ :
अर्जुन ने पूछा—हे प्रभु! जो मनुष्य प्रकृति के तीनों गुणों से ऊपर उठ चुका है, उसे किन लक्षणों से पहचाना जा सकता है? उसका व्यवहार कैसा होता है और वह इन तीनों गुणों से किस प्रकार मुक्त होता है?
श्रीभगवानुवाच
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति॥२२॥
भावार्थ :
श्रीभगवान कहते हैं—हे अर्जुन! जो व्यक्ति सत्त्व से उत्पन्न ज्ञान और स्पष्टता, रजोगुण से उत्पन्न कर्मशीलता तथा तमोगुण से उत्पन्न मोह को उनके आने पर न तो घृणा करता है और न उनके समाप्त होने पर उन्हें पाने की इच्छा करता है, वही गुणों से ऊपर उठने की अवस्था में होता है।
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥२३॥
भावार्थ :
जो मनुष्य साक्षी के समान शांत और तटस्थ रहता है तथा तीनों गुणों के प्रभाव से विचलित नहीं होता, वह समझता है कि प्रकृति के गुण ही अपने-अपने कार्य कर रहे हैं। इसलिए वह भीतर से स्थिर रहता है।
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥२४॥
भावार्थ :
जो व्यक्ति सुख और दुःख दोनों को समान भाव से स्वीकार करता है, अपने आत्मस्वरूप में स्थिर रहता है और मिट्टी, पत्थर तथा सोने को समान दृष्टि से देखता है, वह गुणातीत कहलाने योग्य है। उसके लिए प्रिय-अप्रिय तथा निंदा-प्रशंसा भी समान हो जाते हैं।
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते॥२५॥
भावार्थ :
जो मान और अपमान में समान रहता है, मित्र और शत्रु दोनों के प्रति समभाव रखता है तथा कर्म करते हुए भी अपने भीतर कर्तापन का अहंकार नहीं रखता, वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है।
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥२६॥
भावार्थ :
जो मनुष्य बिना किसी स्वार्थ या विचलन के निरंतर प्रेम और श्रद्धा से परमात्मा की भक्ति करता है, वह धीरे-धीरे प्रकृति के तीनों गुणों से ऊपर उठ जाता है और ब्रह्मस्वरूप को प्राप्त करने के योग्य बन जाता है।
परम ब्रह्म का शाश्वत आधार
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥२७॥
भावार्थ :
श्रीभगवान कहते हैं कि अविनाशी ब्रह्म, अमृतस्वरूप अवस्था, शाश्वत धर्म और परम, अखंड आनंद—इन सभी का मूल एवं अंतिम आश्रय स्वयं परमात्मा ही हैं। उसी परम सत्य में स्थित होकर जीव को स्थायी शांति और आनंद की प्राप्ति होती है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥१४॥
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