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श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय- 4), ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय:- 4)

 अथ चतुर्थोऽध्यायः

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 ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

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अध्याय ४ — ज्ञान, कर्म और दिव्य अवतार का रहस्य

योग-परम्परा और भगवान् के दिव्य जन्म-कर्म का रहस्य

श्रीभगवानुवाच

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्‌।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्‌॥१॥

भावार्थ :
श्रीभगवान् कहते हैं कि उन्होंने इस सनातन और अविनाशी योग का ज्ञान सबसे पहले सूर्यदेव को दिया। सूर्यदेव ने इसे अपने पुत्र वैवस्वत मनु को और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु को बताया। इस प्रकार यह ज्ञान गुरु-शिष्य और पारिवारिक परम्परा के माध्यम से आगे बढ़ता रहा।

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥२॥

भावार्थ :
हे अर्जुन! यह योग प्राचीन काल में परम्परा के द्वारा राजर्षियों तक पहुँचा और उन्होंने इसे समझकर अपने जीवन में अपनाया। लेकिन बहुत लम्बे समय के बीत जाने पर यह ज्ञान धीरे-धीरे संसार में दुर्लभ और लगभग लुप्त हो गया।

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्‌॥३॥

भावार्थ :
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि वही प्राचीन और महान् योग आज वे उसे फिर से बता रहे हैं। इसका कारण यह है कि अर्जुन भगवान् के भक्त होने के साथ-साथ उनके प्रिय मित्र भी हैं। इसलिए भगवान् उसे इस अत्यन्त गहन और श्रेष्ठ आध्यात्मिक ज्ञान को समझने का अधिकारी मानते हैं।

अर्जुन उवाच

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥४॥

भावार्थ :
अर्जुन के मन में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि आपका जन्म तो अभी हुआ है, जबकि सूर्यदेव का अस्तित्व बहुत प्राचीन माना जाता है। इसलिए वह पूछता है कि वह कैसे समझे कि आपने ही सृष्टि के आरम्भ में सूर्यदेव को यह योग बताया था।

श्रीभगवानुवाच

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥५॥

भावार्थ :
भगवान् बताते हैं कि उनके और अर्जुन के अनेक जन्म बीत चुके हैं। उन सभी जन्मों की स्मृति भगवान् को है, लेकिन अर्जुन उन्हें याद नहीं रख सकता। इससे भगवान् और सामान्य जीव के ज्ञान में अंतर स्पष्ट होता है।

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्‌।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥६॥

भावार्थ :
भगवान् बताते हैं कि वे जन्म और नाश से परे, अविनाशी तथा समस्त प्राणियों के स्वामी हैं। फिर भी अपनी दिव्य शक्ति और योगमाया के द्वारा वे अपनी इच्छा से संसार में प्रकट होते हैं। उनका प्रकट होना सामान्य जीवों की तरह कर्मों के बन्धन के कारण नहीं होता।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌॥७॥

भावार्थ :
हे भारत! जब संसार में धर्म का पालन कमजोर पड़ने लगता है और अधर्म का प्रभाव बढ़ने लगता है, तब भगवान् स्वयं को प्रकट करते हैं। उनका अवतरण धर्म की रक्षा और संसार में संतुलन स्थापित करने के लिए होता है।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥८॥

भावार्थ :
भगवान् कहते हैं कि वे सज्जन और धर्मनिष्ठ लोगों की रक्षा, अधर्मपूर्ण आचरण करने वालों के विनाश तथा धर्म की पुनः स्थापना के लिए युग-युग में प्रकट होते हैं। इस प्रकार उनका अवतार लोककल्याण और धर्म-संरक्षण से जुड़ा हुआ है।

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्तवा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥९॥

भावार्थ :
हे अर्जुन! जो व्यक्ति भगवान् के जन्म और कर्मों की वास्तविक दिव्यता को समझ लेता है, वह जानता है कि भगवान् संसार में सामान्य जीव की तरह कर्मों के बन्धन से विवश होकर नहीं आते। ऐसी सच्ची समझ रखने वाला व्यक्ति शरीर छोड़ने के बाद पुनः जन्म-मरण के चक्र में नहीं पड़ता, बल्कि भगवान् को प्राप्त होता है।

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥१०॥

भावार्थ :
अनेक भक्त अपने भीतर के राग, भय और क्रोध को दूर करके भगवान् की शरण में स्थित हुए। उन्होंने ज्ञानरूपी तप के द्वारा अपने अंतःकरण को शुद्ध किया और अंततः भगवान् के स्वरूप को प्राप्त किया। इससे स्पष्ट होता है कि भक्ति के साथ आत्मशुद्धि और ज्ञान भी आवश्यक हैं।

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्‌।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥११॥

भावार्थ :
हे अर्जुन! मनुष्य भगवान् को जिस भावना और जिस प्रकार से अपनाता है, भगवान् भी उसी के अनुरूप उसका मार्गदर्शन और प्रत्युत्तर करते हैं। सभी मनुष्य किसी न किसी रूप में परमात्मा की ओर जाने वाले मार्ग का ही अनुसरण करते हैं।

काङ्‍क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा॥१२॥

भावार्थ :
जो लोग अपने कर्मों का शीघ्र फल प्राप्त करना चाहते हैं, वे विभिन्न देवताओं की उपासना करते हैं। मनुष्यलोक में कर्मों से मिलने वाले सांसारिक परिणाम अपेक्षाकृत जल्दी प्राप्त हो सकते हैं। इसलिए लोग अपनी इच्छित सिद्धि के अनुसार उपासना का मार्ग चुनते हैं।

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्‌॥१३॥

भावार्थ :
भगवान् बताते हैं कि समाज में चार वर्णों की व्यवस्था लोगों के गुण और उनके कर्मों के आधार पर बनाई गई। यद्यपि इस व्यवस्था की रचना भगवान् द्वारा कही गई है, फिर भी वे स्वयं उससे कर्मफल के रूप में बँधे हुए नहीं हैं। इसलिए उन्हें अविनाशी और वास्तविक अर्थ में अकर्ता समझना चाहिए।

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥१४॥

भावार्थ :
भगवान् कहते हैं कि वे कर्मों के फल की इच्छा नहीं रखते, इसलिए कर्म उन्हें बाँध नहीं सकते। इस प्रकार जो व्यक्ति भगवान को तत्त्व से जानकर—इस सत्य को समझकर कर्म करता है और कर्मफल के प्रति आसक्ति नहीं रखता, वह भी कर्मों के बन्धन में नहीं फँसता।

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्‌॥१५॥

भावार्थ :
पूर्वकाल में मुक्ति की इच्छा रखने वाले महापुरुष भी कर्म के इस रहस्य को समझकर अपने कर्तव्य करते रहे हैं। इसलिए अर्जुन को भी उसी भावना से अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए और कर्म से पीछे नहीं हटना चाहिए।

कर्म, विकर्म और अकर्म का गहन रहस्य

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्‌॥१६॥

भावार्थ :
भगवान् कहते हैं कि कर्म क्या है और अकर्म क्या है—इस विषय में बड़े-बड़े विद्वान भी कभी-कभी भ्रमित हो जाते हैं। इसलिए वे अर्जुन को कर्म का वास्तविक रहस्य समझाएँगे, जिसे जान लेने पर मनुष्य कर्मजनित बन्धनों से मुक्त हो सकता है।

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥१७॥

भावार्थ :
मनुष्य को केवल कर्म करना ही नहीं, बल्कि कर्म, विकर्म और अकर्म—तीनों के स्वरूप को समझना चाहिए। कर्म का परिणाम और उसकी वास्तविक गति बहुत सूक्ष्म एवं गहरी है, इसलिए केवल बाहरी रूप देखकर कर्म का निर्णय नहीं किया जा सकता।

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्‌॥१८॥

भावार्थ :
जो व्यक्ति कर्म करते हुए भी उसके पीछे आसक्ति और अहंकार का अभाव देख पाता है तथा बाहरी रूप से निष्क्रिय दिखाई देने वाली अवस्था में भी भीतर चल रहे कर्म को समझता है, वही वास्तविक विवेक वाला है। ऐसा व्यक्ति कर्म करते हुए भी योग में स्थित रहता है।

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः॥१९॥

भावार्थ :
जिस व्यक्ति के कर्म व्यक्तिगत इच्छाओं और स्वार्थपूर्ण संकल्पों से प्रेरित नहीं होते तथा जिसका कर्म ज्ञान की अग्नि से शुद्ध हो चुका है, उसे ज्ञानी पुरुष पण्डित कहते हैं। उसके कार्य कर्तव्य और विवेक पर आधारित होते हैं, व्यक्तिगत लालसा पर नहीं।

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः॥२०॥

भावार्थ :
जो व्यक्ति कर्म करते हुए उसके परिणाम से चिपका नहीं रहता, अपने भीतर संतुष्ट रहता है और सांसारिक वस्तुओं पर अपनी पूर्ण निर्भरता नहीं रखता, वह कर्म करता हुआ भी कर्मबंधन से मुक्त रहता है। उसकी कर्मशीलता के पीछे फल की लालसा नहीं होती।

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्‌॥२१॥

भावार्थ :
जिसने अपने मन और इन्द्रियों को संयमित कर लिया है तथा अनावश्यक संग्रह और भोग की इच्छा छोड़ दी है, वह केवल शरीर के निर्वाह के लिए आवश्यक कर्म करता है। ऐसी आसक्तिरहित कर्मशीलता उसे पाप और कर्मबंधन से बचाती है।

यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥२२॥

भावार्थ :
जो व्यक्ति परिस्थितियों के अनुसार सहज रूप से प्राप्त होने वाली वस्तुओं में संतुष्ट रहता है, दूसरों से ईर्ष्या नहीं करता और सुख-दुःख जैसे द्वन्द्वों से ऊपर उठ चुका है, वह सफलता और असफलता दोनों में समान भाव रखता है। इसलिए कर्म करने पर भी वह उसके बन्धन में नहीं पड़ता।

गतसङ्‍गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥२३॥

भावार्थ :
जिस व्यक्ति की आसक्ति समाप्त हो चुकी है, जो अहंकार और ममता से मुक्त है तथा जिसका मन निरन्तर परमात्मज्ञान में स्थित है, उसके कर्म बन्धन उत्पन्न नहीं करते। जब कर्म समर्पण और यज्ञभाव से किए जाते हैं, तो वे अंततः कर्मबंधन को समाप्त करने वाले बन जाते हैं।

विभिन्न प्रकार के यज्ञ और उनके आध्यात्मिक अर्थ

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौब्रह्मणा हुतम्‌।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥२४॥

भावार्थ :
जिस साधक के लिए यज्ञ में अर्पित की जाने वाली वस्तु, हवन की सामग्री, अग्नि, आहुति देने वाला और स्वयं यज्ञ की क्रिया—सबमें ब्रह्म का ही दर्शन है, वह ब्रह्म में स्थित हो जाता है। उसकी साधना का अंतिम लक्ष्य भी ब्रह्म की प्राप्ति ही होता है।

दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते।
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति॥२५॥

भावार्थ :
कुछ योगी देवताओं की उपासना को यज्ञ के रूप में करते हैं। अन्य साधक अपने ज्ञान और आत्मचिन्तन के द्वारा स्वयं को ब्रह्म में समर्पित करते हैं। दोनों प्रकार की साधनाओं का उद्देश्य अपने अहंकार और सीमित दृष्टि से ऊपर उठना है।

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥२६॥

भावार्थ :
कुछ साधक अपनी इन्द्रियों को संयमित करने को ही यज्ञ मानते हैं। दूसरे साधक इन्द्रियों के सामने आने वाले विषयों को विवेकपूर्वक स्वीकार करते हुए उन पर नियंत्रण रखना सीखते हैं। इस प्रकार इन्द्रिय-संयम भी साधना का एक रूप बन जाता है।

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥२७॥

भावार्थ :
कुछ योगी अपनी इन्द्रियों की सभी क्रियाओं और प्राणों से संबंधित क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित आत्मसंयम की अग्नि में समर्पित करते हैं। उनका उद्देश्य मन और शरीर की सभी गतिविधियों को परमात्मचिन्तन और आत्मसंयम के अधीन करना होता है।

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः॥२८॥

भावार्थ :
कुछ साधक धन या वस्तुओं का दान करके यज्ञ करते हैं, कुछ तपस्या को यज्ञ मानते हैं और कुछ योग का अभ्यास करते हैं। अनेक साधक स्वाध्याय तथा ज्ञान की साधना को यज्ञ के रूप में अपनाते हैं। इस प्रकार साधना के अनेक मार्ग हो सकते हैं, पर उनका उद्देश्य आत्मशुद्धि है।

अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥२९॥
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥३०॥

भावार्थ :
कुछ योगी प्राण और अपान वायु के नियमन द्वारा प्राणायाम की साधना करते हैं। कुछ नियमित आहार और श्वास-संयम के द्वारा शरीर तथा प्राणों को संतुलित करते हैं। इन सभी साधकों का उद्देश्य अपने भीतर के दोषों को दूर करके आत्मसंयम और शुद्धि प्राप्त करना है।

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्‌।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥३१॥

भावार्थ :
जो व्यक्ति यज्ञ और समर्पण की भावना से जीवन जीता है तथा यज्ञ के बाद प्राप्त वस्तु को प्रसादभाव से ग्रहण करता है, वह धीरे-धीरे परमात्मा की ओर बढ़ता है। इसके विपरीत जो व्यक्ति त्याग, सेवा और समर्पण की भावना से रहित है, उसके जीवन में सच्ची शान्ति प्राप्त करना कठिन हो जाता है, फिर परलोक तो उन्हें सुख देने वाला हो ही नहीं सकता।

एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥३२॥

भावार्थ :
वेदों में अनेक प्रकार के यज्ञों का वर्णन किया गया है। इन सभी को मन, इन्द्रियों, शरीर और कर्मों से जुड़ी विभिन्न साधनाओं के रूप में समझना चाहिए। इनके वास्तविक उद्देश्य को समझकर उनका पालन करने से मनुष्य कर्मबंधन से मुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ता है।

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥३३॥

भावार्थ :
हे अर्जुन! केवल वस्तुओं या धन से किए जाने वाले यज्ञ की तुलना में ज्ञान का यज्ञ अधिक गहरा है, क्योंकि ज्ञान मनुष्य को कर्म के वास्तविक उद्देश्य को समझाता है। अंततः सभी कर्मों का सही अर्थ और उनका परिपूर्ण परिणाम ज्ञान में ही जाकर समाहित होता है।

ज्ञान की श्रेष्ठता और अर्जुन को कर्मयोग अपनाने का संदेश

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥३४॥

भावार्थ :
सच्चे ज्ञान को प्राप्त करने के लिए ऐसे ज्ञानी और तत्त्वदर्शी गुरु के पास जाना चाहिए जो उस सत्य को स्वयं समझ चुके हों। विनम्रता, सेवा और जिज्ञासा के साथ किए गए उचित प्रश्नों से उनसे ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। केवल प्रश्न करना ही नहीं, बल्कि सीखने की विनम्र भावना भी आवश्यक है।

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥३५॥

भावार्थ :
हे अर्जुन! जब तुम्हें वास्तविक ज्ञान प्राप्त हो जाएगा, तब तुम्हारा मोह और भ्रम दूर हो जाएगा। उस ज्ञान से तुम सभी प्राणियों में एक ही आत्मतत्त्व को देख सकोगे और अंततः उस आत्मतत्त्व को परमात्मा में भी अनुभव करोगे।

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥३६॥

भावार्थ :
यदि कोई व्यक्ति अपने अतीत में बहुत गलत कर्म कर चुका हो, तब भी ज्ञान उसके जीवन को बदलने का मार्ग प्रदान कर सकता है। जैसे नाव मनुष्य को विशाल जलराशि के पार ले जाती है, वैसे ही सच्चा ज्ञान उसे अपने दोषों और कर्मजनित बन्धनों से ऊपर उठने में सहायता करता है।

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥३७॥

भावार्थ :
हे अर्जुन! जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि ईंधन को जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार आत्मज्ञान मनुष्य के कर्मों से उत्पन्न अज्ञान और बन्धन को समाप्त करने की शक्ति रखता है। ज्ञान जीवन को सही दृष्टि प्रदान करता है और कर्मों के वास्तविक स्वरूप को समझने में सहायता करता है।

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥३८॥

भावार्थ :
इस संसार में ज्ञान के समान मन को शुद्ध करने वाला कोई साधन नहीं है। जो व्यक्ति निरन्तर योग और साधना के मार्ग पर चलता है, उसका अंतःकरण धीरे-धीरे निर्मल होता है और समय के साथ वह उस ज्ञान को अपने भीतर अनुभव करने लगता है।

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्धवा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥३९॥

भावार्थ :
जिस व्यक्ति में श्रद्धा है, जो अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित है और जिसने अपनी इन्द्रियों को संयमित किया है, वह ज्ञान प्राप्त कर सकता है। ज्ञान प्राप्त होने पर उसके भीतर का भ्रम और अशान्ति कम होती है और वह शीघ्र ही गहरी आन्तरिक शान्ति की ओर बढ़ता है।

अज्ञश्चश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥४०॥

भावार्थ :
जो व्यक्ति विवेक का प्रयोग नहीं करता, किसी सत्य को समझने के लिए श्रद्धापूर्वक प्रयास नहीं करता और निरन्तर संदेह में ही उलझा रहता है, वह अपने आध्यात्मिक मार्ग से भटक जाता है। ऐसा संशयग्रस्त मनुष्य न वर्तमान जीवन में स्थिर सुख पा पाता है और न ही आध्यात्मिक उन्नति कर पाता है।

योगसन्न्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम्‌।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय॥४१॥

भावार्थ :
हे धनञ्जय! जिसने अपने कर्मों को योग की भावना से परमात्मा को समर्पित कर दिया है और ज्ञान के द्वारा अपने संशयों को दूर कर लिया है, वह कर्मों से बँधता नहीं। आत्मसंयमी और विवेकशील व्यक्ति कर्म करते हुए भी उनके बन्धन से ऊपर रह सकता है।

तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥४२॥

भावार्थ :
इसलिए हे अर्जुन! अपने हृदय में स्थित अज्ञान से उत्पन्न संशय को विवेक और ज्ञान के द्वारा समाप्त कर दो। अपने कर्तव्य से पीछे हटने के बजाय समत्वभाव से कर्मयोग को अपनाओ और अपने कर्तव्य के लिए दृढ़ होकर खड़े हो जाओ।

 

 

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानकर्मसन्न्यासयोगो नाम चतुर्थोऽध्यायः॥४॥

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