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अध्याय 3
कर्मयोग
अनासक्त भाव से कर्तव्य-कर्म का मार्ग
ज्ञानयोग और कर्मयोग के संदर्भ में नियत कर्म का महत्व
अर्जुन उवाच
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥१॥
भावार्थ :
अर्जुन ने पूछा—हे जनार्दन! यदि आपकी दृष्टि में कर्म की अपेक्षा ज्ञान का मार्ग अधिक श्रेष्ठ है, तो फिर आप मुझे इस कठिन और भयंकर कर्म में प्रवृत्त होने के लिए क्यों कह रहे हैं? मेरे लिए दोनों बातों में सामंजस्य स्पष्ट नहीं हो रहा है।
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्॥२॥
भावार्थ :
अर्जुन कहते हैं—आपकी बातें मुझे ऐसी मिली-जुली प्रतीत हो रही हैं कि मेरी बुद्धि और अधिक भ्रमित हो रही है। इसलिए कृपया निश्चित रूप से एक ऐसा मार्ग बताइए जिसे अपनाकर मैं अपने वास्तविक कल्याण को प्राप्त कर सकूँ।
श्रीभगवानुवाच
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्॥३॥
भावार्थ :
श्रीभगवान कहते हैं—हे निष्पाप अर्जुन! इस संसार में साधना के दो प्रमुख मार्ग पहले ही बताए गए हैं। आत्मतत्त्व को समझकर उसमें स्थित होने का मार्ग ज्ञानयोग है, जबकि फल की इच्छा और आसक्ति छोड़कर अपने कर्तव्य को परमात्मा को समर्पित भाव से करना कर्मयोग है।
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥४॥
भावार्थ :
केवल कर्मों को आरम्भ न करने से मनुष्य कर्मों से परे अवस्था को प्राप्त नहीं कर सकता। उसी प्रकार केवल बाहरी रूप से कर्मों का त्याग कर देना भी आत्मिक सिद्धि प्राप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥५॥
भावार्थ :
कोई भी मनुष्य एक क्षण के लिए भी पूरी तरह कर्मरहित नहीं रह सकता। प्रकृति से प्राप्त गुण मनुष्य को निरंतर किसी न किसी प्रकार की क्रिया करने के लिए प्रेरित करते रहते हैं।
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥६॥
भावार्थ :
जो व्यक्ति बाहर से अपनी कर्मेन्द्रियों को रोक लेता है, लेकिन मन ही मन इन्द्रियों के विषयों के बारे में सोचता रहता है, उसका यह संयम वास्तविक नहीं है। ऐसा आचरण केवल दिखावा माना जाता है।
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥७॥
भावार्थ :
इसके विपरीत, हे अर्जुन! जो व्यक्ति अपने मन के द्वारा इन्द्रियों को नियंत्रित करता है और कर्मेन्द्रियों से बिना आसक्ति के अपने कर्तव्य करता है, वही वास्तव में श्रेष्ठ कर्मयोगी है।
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥८॥
भावार्थ :
इसलिए तुम अपने लिए निर्धारित कर्तव्य-कर्म करते रहो। कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है, क्योंकि बिना कर्म किए शरीर का सामान्य जीवन-निर्वाह भी संभव नहीं हो सकता।
यज्ञभाव से कर्म करने की आवश्यकता
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचरः॥९॥
भावार्थ :
हे कौन्तेय! जब कर्म केवल अपने स्वार्थ और भोग के लिए किया जाता है, तब वह मनुष्य को कर्मों के बंधन में डाल देता है। इसलिए अपने कर्मों को यज्ञ अर्थात् उच्च और निःस्वार्थ उद्देश्य के लिए समर्पित करते हुए, आसक्ति छोड़कर अपना कर्तव्य करो।
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥१०॥
भावार्थ :
सृष्टि के आरम्भ में प्रजापति ने प्रजा और यज्ञ की व्यवस्था साथ-साथ करते हुए कहा कि तुम इस यज्ञभाव से जीवन में उन्नति करो। यह व्यवस्था तुम्हारी उचित आवश्यकताओं की पूर्ति और समृद्धि का साधन बनेगी।
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥११॥
भावार्थ :
तुम यज्ञ और निःस्वार्थ कर्म के द्वारा देवशक्तियों का पोषण करो और वे शक्तियाँ तुम्हारे जीवन को सहारा दें। इस प्रकार परस्पर सहयोग और पोषण की भावना से कार्य करते हुए तुम परम कल्याण को प्राप्त कर सकते हो।
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥१२॥
भावार्थ :
यज्ञभाव से प्रसन्न और समर्थ हुई देवशक्तियाँ मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं। लेकिन जो व्यक्ति प्राप्त वस्तुओं को दूसरों के साथ बाँटे बिना केवल स्वयं के सुख के लिए उपयोग करता है, वह कृतज्ञ और सहभागी होने के बजाय स्वार्थी माना जाता है।
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥१३॥
भावार्थ :
जो लोग पहले अपने कर्म और प्राप्त अन्न को यज्ञभाव से समर्पित करके फिर उसका उपयोग करते हैं, वे पवित्र जीवन की ओर बढ़ते हैं। इसके विपरीत, जो केवल अपने निजी स्वार्थ और शरीर-पोषण के लिए ही सब कुछ करते हैं, उनका जीवन स्वार्थ के बंधन में पड़ जाता है।
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥१४॥
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥१५॥
भावार्थ :
सभी प्राणियों का जीवन अन्न पर निर्भर है और अन्न वर्षा से प्राप्त होता है। वर्षा यज्ञ से तथा यज्ञ उचित कर्मों से उत्पन्न होता है। उचित कर्मों का आधार वेद हैं और वेद उस अविनाशी परम सत्य से जुड़े हैं। इस प्रकार सृष्टि की पूरी व्यवस्था एक-दूसरे से जुड़ी हुई है और यज्ञभाव में सर्वव्यापी परम सत्य परमात्मा की उपस्थिति मानी गई है।
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥१६॥
भावार्थ :
हे पार्थ! जो व्यक्ति इस प्रकार चलने वाली सृष्टि-व्यवस्था और अपने कर्तव्य के चक्र में सहयोग नहीं देता तथा केवल इन्द्रियों के सुख में लगा रहता है, उसका जीवन अपने वास्तविक उद्देश्य से भटक जाता है।
ज्ञानी पुरुष और लोककल्याण के लिए कर्म
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥१७॥
भावार्थ :
जो मनुष्य बाहरी वस्तुओं पर निर्भर रहने के बजाय अपने आत्मस्वरूप में ही आनंद और संतोष अनुभव करता है, उसके लिए व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति हेतु कोई कर्म शेष नहीं रहता।
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥१८॥
भावार्थ :
ऐसे आत्मतृप्त व्यक्ति के लिए कर्म करने से कोई निजी लाभ प्राप्त करना शेष नहीं रहता और कर्म न करने से भी उसका कोई स्वार्थ सिद्ध नहीं होता। उसका किसी प्राणी के साथ स्वार्थपूर्ण संबंध नहीं रहता।
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥१९॥
भावार्थ :
इसलिए मनुष्य को अपने कर्तव्य-कर्म निरंतर करते रहना चाहिए, लेकिन उनके परिणामों से आसक्त नहीं होना चाहिए। इस प्रकार निष्काम भाव से कर्म करते हुए मनुष्य परम अवस्था को प्राप्त कर सकता है।
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि॥२०॥
भावार्थ :
राजा जनक जैसे ज्ञानी पुरुषों ने भी अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए सिद्धि प्राप्त की थी। इसलिए केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समाज की व्यवस्था और कल्याण को ध्यान में रखकर भी तुम्हें कर्म करते रहना चाहिए।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥२१॥
भावार्थ :
समाज के श्रेष्ठ और आदर्श व्यक्तियों का आचरण दूसरों को प्रभावित करता है। लोग उनके द्वारा स्थापित उदाहरण और व्यवहार को देखकर उसी दिशा में चलने लगते हैं। इसलिए आदर्श व्यक्ति का प्रत्येक कर्म महत्वपूर्ण होता है।
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥२२॥
भावार्थ :
हे पार्थ! तीनों लोकों में मेरे लिए ऐसा कोई व्यक्तिगत कर्तव्य नहीं है जिसे पूरा करना बाकी हो और न ही ऐसी कोई वस्तु है जिसे मुझे प्राप्त करना हो। फिर भी मैं निरंतर कर्म करता रहता हूँ।
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥२३॥
भावार्थ :
हे पार्थ! यदि मैं स्वयं सावधानी और निरंतरता के साथ कर्म करना छोड़ दूँ, तो लोग भी मेरे आचरण का अनुसरण करते हुए कर्म से विमुख हो सकते हैं। इसलिए मेरा कर्म करना भी एक आदर्श स्थापित करता है।
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः॥२४॥
भावार्थ :
यदि मैं कर्म करना छोड़ दूँ, तो समाज की व्यवस्था बिगड़ सकती है और लोग अपने कर्तव्यों से विमुख हो सकते हैं। इससे सामाजिक असंतुलन उत्पन्न होगा और प्रजा के जीवन पर भी उसका बुरा प्रभाव पड़ेगा।
ज्ञानी और अज्ञानी के कर्म में अंतर तथा आसक्ति से मुक्ति
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम्॥२५॥
भावार्थ :
हे भारत! अज्ञानी लोग जिस प्रकार अपने कर्मों में फल की आसक्ति के साथ लगे रहते हैं, उसी प्रकार ज्ञानी व्यक्ति भी कर्म करे, लेकिन उसके भीतर व्यक्तिगत आसक्ति न हो। उसका उद्देश्य लोककल्याण और समाज की व्यवस्था बनाए रखना होना चाहिए।
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङि्गनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्॥२६॥
भावार्थ :
ज्ञानी व्यक्ति को कर्मों में आसक्त सामान्य लोगों के मन में अचानक भ्रम या कर्म के प्रति अविश्वास उत्पन्न नहीं करना चाहिए। उसे स्वयं उचित कर्म करते हुए दूसरों को भी अपने कर्तव्यों के प्रति प्रेरित करना चाहिए।
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥२७॥
भावार्थ :
वास्तव में प्रकृति के गुणों के प्रभाव से ही विभिन्न कर्म संपन्न होते हैं, लेकिन अहंकार से भ्रमित व्यक्ति स्वयं को उन सभी कर्मों का एकमात्र कर्ता मान लेता है।
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते।॥२८॥
भावार्थ :
हे महाबाहो! जो व्यक्ति प्रकृति, उसके गुणों और उनसे उत्पन्न होने वाले कर्मों के वास्तविक स्वरूप को समझता है, वह यह जानता है कि प्रकृति के गुण ही अपने-अपने क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। इसलिए वह उनसे अनावश्यक आसक्ति नहीं रखता।
प्रकृतेर्गुणसम्मूढ़ाः सज्जन्ते गुणकर्मसु।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्॥२९॥
भावार्थ :
प्रकृति के गुणों से प्रभावित होकर अज्ञानजन कर्मों और उनके परिणामों में आसक्त रहते हैं। जो ज्ञानी इस सत्य को पूरी तरह समझ चुका है, उसे ऐसे लोगों को अचानक उनके कर्मों से विचलित नहीं करना चाहिए।
मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥३०॥
भावार्थ :
अपने मन को परमात्मा में स्थिर करके अपने सभी कर्म उन्हें समर्पित करो। फल की अपेक्षा और ‘यह मेरा है’ वाली भावना छोड़कर, चिंता और मानसिक द्वंद्व से मुक्त होकर अपना कर्तव्य निभाओ।अर्थात् हे अर्जुन! युद्ध करो।
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः॥३१॥
भावार्थ :
जो मनुष्य श्रद्धा के साथ, दोष खोजने की प्रवृत्ति से मुक्त होकर इस उपदेश का निरंतर पालन करते हैं, वे कर्मों के बंधन से धीरे-धीरे मुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ते हैं।
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥३२॥
भावार्थ :
इसके विपरीत, जो लोग इस शिक्षण में दोष देखते हुए इसे स्वीकार नहीं करते और इसका पालन नहीं करते, वे अपने वास्तविक कल्याण के मार्ग से भटक जाते हैं और ज्ञान के विषय में भ्रमित रहते हैं।
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥३३॥
भावार्थ :
हर प्राणी अपने स्वभाव और प्रकृति के अनुरूप व्यवहार करता है। यहाँ तक कि ज्ञान प्राप्त व्यक्ति भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही कार्य करता है। केवल बाहरी दबाव से किसी की स्वाभाविक प्रवृत्तियों को पूरी तरह बदल देना संभव नहीं है।
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥३४॥
भावार्थ :
प्रत्येक इन्द्रिय के विषय के प्रति मन में आकर्षण और अरुचि दोनों उत्पन्न हो सकते हैं। मनुष्य को इनके प्रभाव में बहने से बचना चाहिए, क्योंकि अत्यधिक राग और द्वेष दोनों ही उसके आत्मिक विकास के मार्ग में बाधा बन सकते हैं।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥३५॥
भावार्थ :
दूसरे के कर्तव्य को बहुत अच्छी तरह निभाने की अपेक्षा अपने स्वभाव और उत्तरदायित्व के अनुरूप अपना कर्तव्य करना अधिक उचित है, भले ही उसमें कुछ कमियाँ क्यों न हों। अपने कर्तव्य पर दृढ़ रहना अधिक सुरक्षित मार्ग है; दूसरे के कर्तव्य को अपनाना संकटपूर्ण हो सकता है।
काम और क्रोध को ज्ञान के मार्ग की बाधा समझकर उनसे विजय पाने का उपाय
अर्जुन उवाच
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥३६॥
भावार्थ :
अर्जुन ने पूछा—हे कृष्ण! मनुष्य स्वयं ऐसा करना न चाहता हुआ भी किस शक्ति के प्रभाव में आकर गलत कर्म करने लगता है? ऐसा कौन-सा कारण है जो उसे मानो बलपूर्वक अनुचित कार्य करने के लिए प्रेरित करता है?
श्रीभगवानुवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥३७॥
भावार्थ :
श्रीभगवान कहते हैं—इच्छाओं की तीव्रता से उत्पन्न होने वाला काम ही आगे चलकर क्रोध का रूप ले सकता है। यह कभी पूरी तरह संतुष्ट नहीं होता और मनुष्य को अनुचित कर्मों की ओर ले जा सकता है। इसलिए इसे अपने आंतरिक जीवन का प्रमुख शत्रु समझो।
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्॥३८॥
भावार्थ :
जिस प्रकार धुआँ अग्नि की चमक को ढक देता है, मैल दर्पण की स्पष्टता को छिपा देता है और गर्भ एक आवरण से ढका रहता है, उसी प्रकार तीव्र इच्छाएँ मनुष्य के ज्ञान और विवेक को ढक देती हैं।
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥३९॥
भावार्थ :
हे कौन्तेय! इच्छाओं का यह रूप ऐसा है जो कभी पूरी तरह संतुष्ट नहीं होता। यह ज्ञान के मार्ग में निरंतर बाधा डालता है और मनुष्य के विवेक को इस प्रकार ढक देता है कि सही और गलत को समझना कठिन हो सकता है।
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥४०॥
भावार्थ :
इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इस इच्छा-शक्ति के प्रमुख आधार माने गए हैं। इनके माध्यम से इच्छा मनुष्य के विवेक को ढककर उसे भ्रमित कर सकती है और उसके निर्णयों को प्रभावित कर सकती है।
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥४१॥
भावार्थ :
इसलिए हे अर्जुन! सबसे पहले अपनी इन्द्रियों को संयमित करो। जो इच्छा मनुष्य के ज्ञान और अनुभवजन्य विवेक को नष्ट करती है, उस पर नियंत्रण पाने का प्रयास करो।
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥४२॥
भावार्थ :
इन्द्रियाँ स्थूल शरीर से अधिक सूक्ष्म और प्रभावशाली मानी गई हैं। उनसे भी ऊपर मन है, मन से अधिक शक्तिशाली बुद्धि है और बुद्धि से भी परे आत्मा का स्वरूप है।
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥४३॥
भावार्थ :
हे महाबाहो! जब तुम यह समझ लेते हो कि आत्मा बुद्धि से भी श्रेष्ठ है, तब अपने विवेक की सहायता से मन को संयमित करो। इस प्रकार अपने भीतर उठने वाली अनियंत्रित इच्छाओं पर विजय प्राप्त करने का प्रयास करो और अपने ज्ञान तथा विवेक को दृढ़ बनाए रखो।
अध्याय का सार
भावार्थ :
इस अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि मनुष्य कर्म से पूरी तरह बच नहीं सकता। इसलिए कर्म का त्याग करने के बजाय उसे अपने निर्धारित कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, लेकिन उनके फल के प्रति आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। यज्ञभाव से किया गया निःस्वार्थ कर्म व्यक्ति को कर्मबंधन से मुक्त होने की दिशा में ले जाता है।
ज्ञानी व्यक्ति स्वयं कर्म करते हुए समाज के लिए आदर्श स्थापित करता है। वह प्रकृति के गुणों को समझकर ‘मैं ही सब कुछ करने वाला हूँ’ जैसी अहंकारपूर्ण भावना से बचता है। साथ ही, मनुष्य को अपने स्वभाव और उत्तरदायित्व के अनुरूप कर्तव्य का पालन करना चाहिए।
अध्याय के अंतिम भाग में श्रीकृष्ण काम और क्रोध को ज्ञान तथा विवेक को ढकने वाली शक्तियों के रूप में समझाते हैं। इन्द्रियों को संयमित करके, मन को नियंत्रित करके और बुद्धि को आत्मतत्त्व के अनुरूप स्थिर करके मनुष्य इन आंतरिक बाधाओं पर विजय पाने का प्रयास कर सकता है।