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श्रीरामावतार की कथा
जब जब होइ धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी॥
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥
तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥
जब-जब संसार में धर्म की हानि होती है, जब अधर्मी और अभिमानी असुर अत्याचार बढ़ाते हैं, जब अन्याय इतना बढ़ जाता है कि उसका वर्णन भी कठिन हो जाता है, जब ब्राह्मण, गौ, देवता और पृथ्वी तक पीड़ित होकर कराह उठते हैं—तब करुणा के सागर भगवान स्वयं विविध रूप धारण करके सज्जनों के दुःख दूर करने के लिए अवतरित होते हैं।
असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु।
जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु॥
अर्थात् वे असुरों का विनाश करते हैं, देवताओं की रक्षा करते हैं और वेद-धर्म की मर्यादा को स्थापित करते हैं। इसी दिव्य उद्देश्य से भगवान श्रीराम का अवतार हुआ—उनका यश जगत में फैलाने और धर्म की स्थापना करने के लिए।
अपनी इसी प्रतिज्ञा के अनुसार अकारण करुणा से भरे, भक्तवत्सल भगवान श्रीरामचन्द्रजी चार रूप धारण करके अयोध्या के महाराज दशरथ के घर अवतरित हुए। चैत्र शुक्ल नवमी के पावन दिन, रामनवमी को—महारानी कौशल्या की कुक्षि से श्रीराम, कैकेयी से भरत, और सुमित्रा से लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न प्रकट हुए। उस समय अयोध्या में जैसे आनंद का सागर उमड़ पड़ा—देवता पुष्पवृष्टि करने लगे, आकाश में मंगल ध्वनि गूँज उठी, और नगर में हर्ष का वातावरण छा गया।
समय बीतने पर चारों राजकुमारों के जातकर्म, नामकरण, चूड़ाकरण और यज्ञोपवीत जैसे संस्कार बड़े हर्षोल्लास से सम्पन्न हुए। श्रीराम किशोर अवस्था में प्रवेश करते हैं और—
’जेहि बिधि सुखी होहिं पुर लोगा। करहिं कृपानिधि सोइ संजोगा।
आयसु मागि करहिं पुर काजा। देखि चरित हरषइ मन राजा॥’
अर्थात् वे जिस प्रकार से नगरवासियों को सुख मिले, वही कार्य करते थे। वे सदैव पिता की आज्ञा लेकर ही काम करते और उनके सुंदर चरित्र को देखकर राजा दशरथ का मन प्रसन्न हो उठता।
इसी आनंदमय वातावरण में एक दिन महर्षि विश्वामित्र अयोध्या पहुँचे। उन्होंने अपने यज्ञ की रक्षा के लिए श्रीराम और लक्ष्मण को माँगा। राजा दशरथ पहले तो विचलित हुए, लेकिन गुरु वशिष्ठ के समझाने पर उन्होंने दोनों राजकुमारों को भेज दिया। श्रीराम और लक्ष्मण ने ताड़का, मारीच, सुबाहु जैसे भयंकर राक्षसों का सहज ही वध कर दिया और यज्ञ निर्विघ्न पूर्ण हुआ।
इसके बाद वे जनकपुर पहुँचे जहाँ सीता स्वयंवर था। वहाँ विशाल शिव-धनुष रखा था, जिसे त्रैलोक्य के वीर भी हिला न सके थे। श्रीराम ने उसे ऐसे तोड़ा जैसे मतवाला हाथी कमलनाल को तोड़ देता है। यह समाचार अयोध्या भेजा गया और महाराज दशरथ बारात लेकर पहुँचे। वहाँ चारों भाइयों का विवाह हुआ—राम-सीता, भरत-माण्डवी, लक्ष्मण-ऊर्मिला और शत्रुघ्न-श्रुतकीर्ति।
समय बीतने पर वृद्धावस्था का आभास पाकर राजा दशरथ ने श्रीराम को युवराज बनाने का निश्चय किया। परंतु मंथरा के बहकावे में आकर रानी कैकेयी ने दो वर माँग लिए—राम का वनवास और भरत का राज्याभिषेक। पिता की आज्ञा को धर्म मानकर श्रीराम बिना किसी दुःख के वन जाने को तैयार हो गए। सीता और लक्ष्मण भी प्रेमवश उनके साथ चल पड़े। अयोध्यावासी रोते हुए उन्हें विदा करने लगे।
गंगा तट पर निषादराज गुह से मिलकर उन्होंने सुमंत्र को वापस भेजा। फिर वे अनेक नदियाँ पार करते हुए ऋषि भरद्वाज और वाल्मीकि से मिले और चित्रकूट में पर्णकुटी बनाकर रहने लगे।
उधर पुत्र-वियोग में राजा दशरथ का स्वर्गवास हो गया। भरत जब लौटे तो उन्होंने राज्य स्वीकार नहीं किया और वन जाकर श्रीराम से राज्य लेने की प्रार्थना की। लेकिन श्रीराम ने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए राज्य नहीं लिया। उन्होंने अपनी खड़ाऊँ देकर भरत को लौटा दिया। भरत नंदिग्राम में रहकर उन्हीं खड़ाऊँ को सिंहासन पर रखकर राज्य चलाने लगे।
इसके बाद श्रीराम दण्डकारण्य गए। वहाँ उन्होंने विराध का वध किया, शरभंग, सुतीक्ष्ण और अगस्त्य मुनि से मिले और राक्षसों के विनाश का वचन दिया।
इसी वन में सूर्पणखा आई। लक्ष्मण ने उसके नाक-कान काट दिए। उसके उकसाने पर खर-दूषण सहित चौदह हजार राक्षस आए जिन्हें श्रीराम ने मार डाला।
प्रतिशोध में रावण ने मारीच की सहायता से सीता का हरण कर लिया। जटायु ने रोकने का प्रयास किया पर घायल हो गए। जटायु से ही श्रीराम को समाचार मिला। उन्होंने जटायु का अंतिम संस्कार किया और सीता की खोज में आगे बढ़े।
कबंध का वध करके वे शबरी के आश्रम पहुँचे। शबरी ने प्रेम से सेवा की। फिर हनुमान से मिलकर सुग्रीव से मित्रता हुई। बाली का वध कर सुग्रीव को राज्य दिया।
हनुमान समुद्र लाँघकर लंका पहुँचे, अशोक वाटिका में सीता को देखा, अंगूठी देकर संदेश दिया, लंका जलाई और लौट आए।
श्रीराम ने समुद्र पर नल-नील से सेतु बनवाया। लंका पहुँचकर रावण का वध किया और सीता को वापस प्राप्त किया। सीता ने अग्नि परीक्षा दी और निष्कलंक सिद्ध हुईं।
विभीषण को लंका का राजा बनाकर श्रीराम पुष्पक विमान से अयोध्या लौटे। भरत से मिलन हुआ और श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ।
‘अमित रूप प्रगटे तेहि काला। जथा जोग मिले सबहिं कृपाला॥’
राज्याभिषेक के साथ ही त्रैलोक्य आनंदित हो उठा। श्रीराम ने आदर्श रामराज्य स्थापित किया—जहाँ कोई दुःखी नहीं था, सब धर्म में स्थित थे, और प्रजा तापत्रय से मुक्त थी। आज भी रामराज्य को आदर्श शासन माना जाता है।
भगवान श्रीराम का अवतार भगवान विष्णु के 24 अवतारों में से एक महान और मर्यादा-स्थापक अवतार है।
यह अवतार केवल राक्षस-विनाश के लिए नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा, सत्य, करुणा, त्याग, आदर्श पुत्र, आदर्श पति, आदर्श भाई और आदर्श राजा का उदाहरण स्थापित करने के लिए हुआ था।