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श्रीराम-वियोग में शोकमग्न अयोध्या और भरत का करुण प्रवेश

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श्रीराम-वियोग में शोकमग्न अयोध्या और भरत का करुण प्रवेश

श्रीराम के वनवास और महाराज दशरथ के देहावसान के बाद अयोध्या की स्थिति ऐसी हो गई थी, मानो उसके प्राण ही उससे छीन लिए गए हों। उसी समय महायशस्वी भरत अपने भाई श्रीराम को वापस लाने की आशा और अपने पिता के निधन का दुःख हृदय में लिए अयोध्या की ओर लौट रहे थे।

भरत का रथ धीरे-धीरे अयोध्या की सीमा में प्रवेश करने लगा। रथ के पहियों की गति के साथ सुमन्त्र के द्वारा हाँके जा रहे घोड़े आगे बढ़ रहे थे और रथ से निकलने वाली गंभीर ध्वनि वातावरण में गूँज रही थी। लेकिन भरत के मन में अजीब-सी बेचैनी थी। उन्हें कुछ भी वैसा दिखाई नहीं दे रहा था, जैसा वे अपनी अयोध्या के बारे में जानते थे।

जिस अयोध्या की गलियों में दिन-रात जीवन की चहल-पहल रहती थी, जहाँ घरों के द्वार खुले रहते थे और जहाँ लोगों के हँसने-बोलने, गाने-बजाने तथा आने-जाने की ध्वनियाँ सुनाई देती थीं, वही अयोध्या उस समय अंधकार और निस्तब्धता में डूबी हुई थी। घरों के किवाड़ बंद थे। गलियों में सन्नाटा पसरा था। इधर-उधर केवल बिलाव और उल्लू जैसे निशाचर जीव दिखाई दे रहे थे। पूरी नगरी कृष्णपक्ष की उस काली रात जैसी लग रही थी, जिसमें चन्द्रमा और तारों का प्रकाश भी दिखाई नहीं देता।

भरत ने चारों ओर देखा तो उनका हृदय और अधिक काँप उठा। उन्हें लगा जैसे अयोध्या केवल एक नगर नहीं, बल्कि किसी गहरे दुःख से पीड़ित जीव हो।

कभी यही अयोध्या अपने वैभव और प्रकाश से ऐसी चमकती थी, जैसे चन्द्रमा की प्रिय पत्नी रोहिणी अपने पति के साथ आकाश में शोभायमान होती है। परंतु जिस प्रकार राहु के ग्रास में आकर रोहिणी अकेली और असहाय दिखाई देने लगती है, उसी प्रकार महाराज दशरथ के देहावसान और श्रीराम के वन चले जाने से अयोध्या का सारा वैभव जैसे छिन गया था। राजमहल, बाजार, सड़कें और भवन सब कुछ वहीं था, पर उनमें जीवन की चमक नहीं थी।

अयोध्या की दशा देखकर ऐसा लगता था मानो कोई पर्वतीय नदी तपती धूप में अपना जल खोकर कृश और मलिन हो गई हो। कभी जिसके किनारों पर पक्षियों का कलरव सुनाई देता था, वहाँ अब कोई चहचहाहट नहीं थी। जैसे गर्मी से व्याकुल पक्षी उड़कर दूर चले जाएँ और मछलियाँ तथा जलचर गहरे पानी में छिप जाएँ, वैसे ही अयोध्या के आनंद और उत्साह के सभी चिह्न कहीं अदृश्य हो गए थे।

भरत के लिए यह दृश्य अत्यंत पीड़ादायक था। उनके मन में बार-बार यही प्रश्न उठ रहा था—मेरी प्रिय अयोध्या को आखिर यह क्या हो गया?

वह अयोध्या, जो कभी धूमरहित सुनहरी अग्निशिखा की तरह उज्ज्वल रहती थी, अब ऐसी बुझी हुई प्रतीत होती थी, जैसे किसी यज्ञ की अग्नि पर बार-बार दुग्ध चढ़ाकर उसकी ज्वाला शांत कर दी गई हो। उसकी चमक, उसकी ऊर्जा और उसका उत्साह सब समाप्त हो चुका था।

नगरी की दशा किसी ऐसी सेना जैसी थी, जो भयंकर युद्ध में पराजित होकर बिखर गई हो। जिसके योद्धा मारे जा चुके हों, कवच टूटकर धरती पर गिर गए हों, हाथी-घोड़े और रथ अस्त-व्यस्त हो गए हों तथा ध्वजाएँ टूटकर गिर गई हों। अयोध्या भी उसी प्रकार अपने महान राजा और प्रिय राजकुमार से विहीन होकर मानो पराजित खड़ी थी।

कभी जिस नगर में लोगों की आवाजों का समुद्र उमड़ता रहता था, वहाँ अब गहरा मौन था। भरत को लगा जैसे तेज हवा के कारण समुद्र की ऊँची-ऊँची लहरें अचानक हवा रुक जाने पर शांत होकर निस्तेज हो जाती हैं। उसी प्रकार उत्सवों और उल्लास से भरी अयोध्या अब निःशब्द हो गई थी।

यह मौन केवल सड़कों पर नहीं था। यज्ञशालाएँ भी सूनी थीं। जहाँ कभी श्रेष्ठ याजकों के मंत्रोच्चारण से वातावरण पवित्र और गम्भीर हो जाता था, वहाँ अब कोई मंत्रध्वनि सुनाई नहीं देती थी। यज्ञ समाप्त होने के बाद जिस प्रकार वेदी यज्ञ-सामग्री और याजकों से रहित होकर शांत हो जाती है, उसी प्रकार पूरी अयोध्या अपने उत्सवों और धार्मिक चहल-पहल से खाली दिखाई दे रही थी।

अयोध्या की पीड़ा इतनी गहरी थी कि उसकी तुलना एक ऐसी गाय से की गई है, जो अपने प्रिय साँड़ से मिलने के लिए उत्सुक हो, लेकिन अचानक उससे अलग कर दी जाए। वह हरी घास तक खाना छोड़कर दुःखी होकर गोशाला में बँधी खड़ी रहे। ठीक उसी प्रकार श्रीराम से अलग होकर अयोध्या का हृदय तड़प रहा था।

श्रीराम के बिना अयोध्या ऐसी लग रही थी, जैसे अत्यंत सुंदर मोतियों की माला हो, लेकिन उसके बीच जड़ी हुई बहुमूल्य और चमकदार मणियाँ निकाल ली गई हों। माला तो बची हो, पर उसकी असली शोभा समाप्त हो गई हो। अयोध्या में भवन थे, सड़कें थीं, बाजार थे और लोग भी थे, लेकिन उसकी आत्मा जैसे श्रीराम के साथ वन चली गई थी।

भरत को लगा कि अयोध्या मानो आकाश से गिरा हुआ वह तारा है, जिसकी पुण्य की शक्ति समाप्त हो गई हो और जिसकी चमक पृथ्वी पर गिरते ही फीकी पड़ गई हो। कभी विस्तृत प्रभा से जगमगाने वाला यह नगर अब अपनी ही चमक खो चुका था।

एक और दृश्य उनके मन को झकझोर देने वाला था। कभी अयोध्या ऐसी सुंदर लता की तरह थी, जो फूलों से लदी रहती थी और जिसके चारों ओर मधुमक्खियाँ गुनगुनाती रहती थीं। लेकिन जैसे किसी हरी-भरी वनलता को अचानक दावानल अपनी चपेट में ले ले और वह मुरझाकर अपनी सारी सुंदरता खो दे, वैसे ही श्रीराम के वियोग की अग्नि ने अयोध्या के उल्लास को जला दिया था।

बाजारों में भी वही उदासी दिखाई दे रही थी। व्यापारी अपने काम में मन नहीं लगा पा रहे थे। वे शोक के कारण इतने व्याकुल थे कि उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या करें। दुकानें बहुत कम खुली थीं। जिन बाजारों में कभी ग्राहकों की भीड़ रहती थी, वहाँ अब वीरानी थी।

पूरी नगरी ऐसे आकाश जैसी लगती थी, जिसे घने बादलों ने ढक लिया हो। चन्द्रमा और तारों का कहीं पता न हो और चारों ओर केवल अंधकार दिखाई दे।

सड़कों की भी पहले जैसी सफाई नहीं होती थी। जगह-जगह कूड़े-करकट के ढेर दिखाई देते थे। ऐसा लगता था मानो कोई मधुशाला उजड़ गई हो—जहाँ कभी लोगों का जमघट लगा रहता था, पर अब टूटी हुई प्यालियाँ इधर-उधर पड़ी हों और पीने वाले भी वहाँ न रहे हों। अयोध्या के उत्सव समाप्त हो चुके थे और उसकी चहल-पहल भी समाप्त हो गई थी।

कहीं-कहीं नगर की दशा टूटे हुए पौंसले जैसी दिखाई देती थी। जिसके खंभे टूट गए हों, चबूतरा बिखर गया हो, भूमि धँस गई हो, पानी समाप्त हो गया हो और जलपात्र टूटकर चारों ओर पड़े हों। यह केवल बाहरी उजाड़पन नहीं था; इसके पीछे पूरे नगर की आंतरिक पीड़ा छिपी हुई थी।

अयोध्या की तुलना उस धनुष की प्रत्यञ्चा से भी की गई, जो कभी पूरी शक्ति के साथ धनुष के दोनों सिरों को जोड़ती थी, लेकिन किसी शक्तिशाली योद्धा के बाण से कटकर धरती पर गिर गई हो। जिस प्रकार प्रत्यञ्चा के टूट जाने पर धनुष अपनी शक्ति खो देता है, उसी प्रकार श्रीराम और महाराज दशरथ से वंचित होकर अयोध्या भी अपनी शक्ति और गरिमा खो चुकी थी।

उसकी दशा युद्धभूमि में गिर पड़ी उस घोड़ी जैसी थी, जिस पर कोई कुशल योद्धा सवार रहा हो, लेकिन अचानक शत्रुओं ने उसे गिरा दिया हो। अयोध्या का भी ऐसा ही हाल था। उसके महान संचालक महाराज दशरथ अब संसार में नहीं थे और उसके प्रिय युवराज श्रीराम वन को जा चुके थे।

इन सब दृश्यों को देखते हुए भरत का हृदय भीतर से टूटता जा रहा था। वह रथ पर बैठे थे, लेकिन उनकी आँखें अयोध्या की हर गली, हर भवन और हर मार्ग में अपने प्रिय भाई श्रीराम को खोज रही थीं।

उन्होंने भारी और दुःखी स्वर में सारथि सुमन्त्र से कहा, “सुमन्त्र! यह मेरी वही अयोध्या है? कहाँ गया वह संगीत, वह आनंद और वह उत्सव, जिसकी गंभीर ध्वनि दूर तक सुनाई देती थी? आज चारों ओर इतना सन्नाटा क्यों है?”

भरत को याद आया कि कभी अयोध्या की गलियों में मधु की सुगंध, खिले हुए फूलों की खुशबू तथा चन्दन और अगुरु की पवित्र सुगंध फैली रहती थी। आज उन सुगंधों का कहीं नामोनिशान नहीं था।

उन्होंने आगे देखा और उनके मन में और भी पीड़ा उठी। पहले अच्छे-अच्छे रथों और सवारियों की आवाजें सुनाई देती थीं। घोड़ों की हिनहिनाहट, हाथियों की गर्जना और रथों की घर्घराहट से नगर जीवंत रहता था। आज उन सबका स्थान नीरवता ने ले लिया था।

भरत ने समझ लिया कि इस मौन के पीछे केवल एक कारण है—श्रीराम का वियोग।

उन्होंने दुःख से कहा, “भैया श्रीराम के चले जाने से अयोध्या के युवाओं का उत्साह समाप्त हो गया है। वे अब चन्दन और अगुरु का लेप नहीं करते, सुंदर वनमालाएँ नहीं पहनते और फूलों से सजे हुए होकर उत्सवों में घूमने के लिए बाहर नहीं निकलते। मानो उनका आनंद भी राम के साथ ही वन चला गया हो।”

भरत की आँखों में आँसू आ गए। उन्हें लग रहा था कि जिस अयोध्या में कभी हर अवसर उत्सव बन जाता था, वहाँ अब कोई उत्सव मनाने की इच्छा भी नहीं बची।

उन्होंने भारी मन से कहा, “राम के वियोग में डूबे इस नगर की सारी शोभा मेरे भाई के साथ ही चली गई है।”

उनका हृदय श्रीराम को देखने के लिए तड़प उठा। उन्होंने कल्पना की—कब मेरे राम वापस आएँगे? कब उनके चरण अयोध्या की धरती पर पड़ेंगे? कब उनके आगमन से यह उदास नगरी फिर से खिल उठेगी? जैसे ग्रीष्म की तपती धरती पर अचानक बादल आकर शीतलता और आनंद भर देते हैं, वैसे ही राम के लौटने पर अयोध्या के प्रत्येक हृदय में फिर से प्रसन्नता उमड़ पड़ेगी।

भरत ने सड़कों की ओर देखा। कभी इन विशाल मार्गों पर सुंदर वस्त्र पहने, प्रसन्नचित्त युवक हँसते-बोलते हुए घूमते थे। आज वही सड़कें खाली थीं। कहीं कोई उत्साह नहीं था। ऐसा लगता था जैसे पूरी अयोध्या अपने प्रिय राम की प्रतीक्षा में साँस रोककर बैठी हो।

भरत की आँखें नम थीं और हृदय में राम की स्मृतियाँ उमड़ रही थीं। वह स्वयं को समझाने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन हर दृश्य उन्हें राम के वियोग का स्मरण करा रहा था।

अंततः रथ राजमहल के निकट पहुँचा। भरत ने उस राजमहल की ओर देखा, जहाँ कभी महाराज दशरथ का तेज और राजसी गरिमा दिखाई देती थी। अब वही महल उन्हें सिंह से रहित गुफा जैसा लगा। सिंह के बिना गुफा चाहे कितनी ही विशाल क्यों न हो, उसमें भय और वीरानी ही दिखाई देती है। उसी प्रकार पिता दशरथ के बिना राजमहल भरत को सूना और असहाय लग रहा था।

भरत महल के भीतर पहुँचे तो वहाँ की दशा देखकर उनका हृदय और भी व्याकुल हो गया। जैसे सूर्य के अस्त हो जाने पर दिन अपनी सारी शोभा खो देता है और चारों ओर अंधकार छा जाता है, वैसे ही महाराज दशरथ के न रहने से अंतःपुर का तेज समाप्त हो गया था।

महल में न पहले जैसी सजावट थी, न चहल-पहल, न मधुर संगीत और न ही प्रसन्न मुख दिखाई देते थे। चारों ओर शोक का वातावरण था। जिन स्थानों पर कभी आनंद और वैभव का निवास था, वहाँ अब दुःख का साया मंडरा रहा था।

भरत धैर्यवान थे, लेकिन उस दिन उनके धैर्य की सीमा भी टूट गई। उन्होंने अपने सामने पिता के विहीन महल को देखा और मन ही मन श्रीराम को पुकार उठे। उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

उनके सामने एक ही सत्य स्पष्ट था—अयोध्या की आत्मा श्रीराम के साथ वन चली गई थी और पिता दशरथ के जाने से उसका आधार भी टूट चुका था।

भरत के हृदय में अपने भाई के प्रति प्रेम, पिता के निधन का दुःख और अयोध्या की दयनीय स्थिति देखकर उत्पन्न करुणा एक साथ उमड़ पड़ी। वह जानते थे कि अब इस उजड़ी हुई अयोध्या में फिर से प्रकाश तभी लौट सकता है, जब श्रीराम वापस आएँगे।

इस प्रकार भरत के लिए अयोध्या में प्रवेश केवल अपने नगर में लौटना नहीं था। वह उनके जीवन का ऐसा क्षण था, जब उन्होंने अपनी आँखों से देखा कि एक प्रिय राजा और एक प्रिय पुत्र के वियोग से पूरा राज्य किस प्रकार अपना आनंद, वैभव और प्राण खो सकता है।


 

प्रश्न–उत्तर

 

प्रश्न 1. भरत जब अयोध्या पहुँचे तो नगर की क्या स्थिति थी?

उत्तर: अयोध्या अंधकार और सन्नाटे में डूबी थी। घरों के द्वार बंद थे, बाजार सूने थे और नगर की चहल-पहल पूरी तरह समाप्त हो गई थी।

 

प्रश्न 2. अयोध्या की तुलना कृष्णपक्ष की काली रात से क्यों की गई है?

उत्तर: अयोध्या में प्रकाश, उत्सव और चहल-पहल नहीं थी। चारों ओर अंधकार और नीरवता छाई थी, इसलिए उसकी तुलना कृष्णपक्ष की काली रात से की गई।

 

प्रश्न 3. श्रीराम के वनवास के बाद अयोध्या की शोभा क्यों समाप्त हो गई थी?

उत्तर: श्रीराम अयोध्या के प्राण और लोगों के प्रिय थे। उनके वनवास से नगर के लोग शोकग्रस्त हो गए और उत्सव, संगीत तथा आनंद समाप्त हो गए।

 

प्रश्न 4. अयोध्या की तुलना पर्वतीय नदी से किस प्रकार की गई है?

उत्तर: अयोध्या कृश और उदास दिखाई दे रही थी, जैसे गर्मी से तपकर जल कम और गंदला हो चुकी पर्वतीय नदी अपनी शोभा खो देती है।

 

प्रश्न 5. अयोध्या की तुलना युद्ध में पराजित सेना से क्यों की गई?

उत्तर: अयोध्या अपने राजा और युवराज से विहीन थी। उसकी चहल-पहल और व्यवस्था नष्ट हो गई थी, इसलिए वह पराजित और बिखरी सेना जैसी लगती थी।

 

प्रश्न 6. अयोध्या की तुलना बुझी हुई अग्निशिखा से क्यों की गई है?

उत्तर: पहले अयोध्या सुनहरी अग्निशिखा की तरह चमकती थी, लेकिन श्रीराम के वनवास के बाद उसका वैभव और प्रकाश समाप्त होकर बुझा हुआ दिखाई दिया।

 

प्रश्न 7. अयोध्या की तुलना अपने प्रिय साँड़ से बिछुड़ी गाय से क्यों की गई?

उत्तर: जैसे प्रिय से अलग हुई गाय दुखी होकर घास खाना छोड़ देती है, वैसे ही श्रीराम से बिछुड़कर अयोध्या आंतरिक वेदना से पीड़ित थी।

 

प्रश्न 8. श्रीराम के बिना अयोध्या की तुलना मोतियों की माला से क्यों की गई?

उत्तर: श्रीराम अयोध्या की शोभा के बहुमूल्य रत्न थे। उनके चले जाने पर नगर ऐसा लग रहा था, जैसे मणियों से रहित सुंदर मोतियों की माला।

 

प्रश्न 9. अयोध्या के बाजारों की क्या दशा थी?

उत्तर: व्यापारी शोक से व्याकुल और किंकर्तव्यविमूढ़ थे। बाजार और दुकानें बहुत कम खुलती थीं तथा व्यापारिक गतिविधियाँ लगभग समाप्त हो चुकी थीं।

 

प्रश्न 10. अयोध्या की सड़कों की स्थिति कैसी हो गई थी?

उत्तर: सड़कों की नियमित सफाई नहीं हो रही थी। जगह-जगह कूड़े-करकट के ढेर पड़े थे और नगर की स्वच्छता तथा सुंदरता पहले जैसी नहीं रही थी।

 

प्रश्न 11. अयोध्या की तुलना उजड़ी हुई मधुशाला से क्यों की गई?

उत्तर: नगर की चहल-पहल समाप्त हो गई थी। जैसे उजड़ी मधुशाला में टूटी प्यालियाँ और गंदगी रह जाती हैं, वैसे ही अयोध्या भी सुनसान दिखाई देती थी।

 

प्रश्न 12. भरत ने सुमन्त्र से अयोध्या के विषय में क्या कहा?

उत्तर: भरत ने कहा कि अयोध्या में पहले जैसा संगीत, वाद्यध्वनि, घोड़ों की हिनहिनाहट, हाथियों की गर्जना और रथों की घर्घराहट सुनाई नहीं देती।

 

प्रश्न 13. अयोध्या में सुगंधित वातावरण क्यों समाप्त हो गया था?

उत्तर: श्रीराम के वियोग से लोग अत्यंत शोकग्रस्त थे। वे चन्दन, अगुरु और फूलों का प्रयोग तथा उत्सवों में भाग लेना छोड़ चुके थे।

 

प्रश्न 14. श्रीराम के वनवास का अयोध्या के युवाओं पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर: युवा अत्यंत संतप्त हो गए थे। उन्होंने सजना-सँवरना, चन्दन और अगुरु लगाना, फूलों की मालाएँ पहनना तथा आनंदपूर्वक घूमना छोड़ दिया था।

 

प्रश्न 15. भरत को क्यों लगा कि अयोध्या की सारी शोभा श्रीराम के साथ चली गई?

उत्तर: श्रीराम के जाने के बाद उत्सव, संगीत, सुगंध, आनंद और लोगों का उत्साह समाप्त हो गया था। इसलिए भरत को अयोध्या श्रीहीन दिखाई दी।

 

प्रश्न 16. भरत श्रीराम के लौटने की कल्पना किस प्रकार करते हैं?

उत्तर: भरत चाहते थे कि श्रीराम शीघ्र लौटें और ग्रीष्म में आए बादल की तरह अपने आगमन से अयोध्यावासियों के हृदयों में आनंद भर दें।

 

प्रश्न 17. भरत को राजमहल सिंह से रहित गुफा के समान क्यों लगा?

उत्तर: महाराज दशरथ के देहावसान के कारण राजमहल अपने स्वामी और रक्षक से विहीन हो गया था। इसलिए भरत को वह सिंहविहीन गुफा जैसा लगा।

 

प्रश्न 18. अंतःपुर की दशा देखकर भरत की क्या प्रतिक्रिया हुई?

उत्तर: अंतःपुर को शोक, वीरानी और सजावटरहित देखकर भरत अत्यंत दुःखी हुए। धैर्यवान होने पर भी उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

 

प्रश्न 19. अयोध्या के दुःख का मुख्य कारण क्या था?

उत्तर: अयोध्या का मुख्य दुःख श्रीराम का वनवास और महाराज दशरथ का देहावसान था। दोनों के वियोग ने नगर का आनंद और वैभव समाप्त कर दिया।

 

प्रश्न 20. इस प्रसंग में भरत के चरित्र की कौन-सी विशेषता दिखाई देती है?

उत्तर: इस प्रसंग में भरत का श्रीराम के प्रति गहरा प्रेम, अयोध्या के प्रति संवेदना, पिता के प्रति श्रद्धा और दुःख में भी धैर्य दिखाई देता है।