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श्रीराम का भरत के प्रति वात्सल्य और आदर्श राज्य-धर्म का उपदेश

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🌿श्रीराम का भरत के प्रति वात्सल्य और आदर्श राज्य-धर्म का उपदेश

यह प्रसंग केवल श्रीराम और भरत के मिलन का वर्णन नहीं है। इसमें भाई के प्रति प्रेम, पिता के प्रति चिंता, प्रजा के प्रति जिम्मेदारी, योग्य मंत्रियों का चुनाव, गुप्त नीति, सेना, न्याय और आदर्श राजा के कर्तव्यों की अत्यंत गहरी शिक्षा मिलती है।
श्रीराम भरत को देखकर पहले भावुक होते हैं, फिर उन्हें एक-एक करके राज्य और धर्म से जुड़े प्रश्न पूछते हैं।

🌸 भरत की दीन अवस्था और श्रीराम का वात्सल्य

जटा बाँधे हुए, वृक्षों की छाल के वस्त्र पहने और हाथ जोड़कर भरत भूमि पर पड़े थे। उनका रूप देखकर ऐसा लगता था मानो प्रलय के समय स्वयं सूर्यदेव ही अपनी दिव्य आभा खोकर धरती पर आ गिरे हों। जो भरत कभी राजकुमार के वैभव में रहते थे, आज तपस्वी के समान दिखाई दे रहे थे।

श्रीराम ने उन्हें देखा तो कुछ क्षणों के लिए पहचानना भी कठिन हो गया। भरत का चेहरा दुःख से मुरझाया हुआ था और शरीर अत्यंत दुर्बल हो चुका था। इतने समय बाद अपने छोटे भाई को ऐसी अवस्था में देखकर श्रीराम का हृदय भर आया।

उन्होंने आगे बढ़कर भरत को अपने हाथों से उठाया। बड़े स्नेह से उनका मस्तक सूँघा और उन्हें हृदय से लगा लिया। फिर भरत को अपनी गोद में बैठाकर प्रेमपूर्वक उनकी कुशल पूछने लगे। यह दृश्य बताता है कि श्रीराम के लिए राज-पाट से कहीं अधिक महत्वपूर्ण भाई का प्रेम था।

🌿 पिता के विषय में श्रीराम की चिंता

श्रीराम ने सबसे पहले भरत से पिता महाराज दशरथ के बारे में पूछा। उनके मन में यही विचार था कि भरत स्वयं वन में तभी आ सकते हैं जब कोई बहुत बड़ी बात हुई हो।

वे सोचते हैं—यदि पिता जीवित और स्वस्थ हैं, तो भरत वन में क्यों आए हैं? क्योंकि पिता के जीवित रहते भरत का इस प्रकार वन में आना स्वाभाविक नहीं था।

इस प्रश्न में श्रीराम की पिता के प्रति गहरी श्रद्धा और भरत के प्रति चिंता दोनों दिखाई देती हैं।

🌿 भरत के दुर्बल शरीर को देखकर व्याकुलता

श्रीराम भरत को देखकर अनुभव करते हैं कि लंबे समय बाद मिलने वाला उनका भाई बहुत कमजोर हो गया है। वे मन ही मन सोचते हैं कि राजकुमार भरत ऐसी तपस्वी जैसी अवस्था में क्यों पहुँच गए?

श्रीराम का प्रश्न केवल औपचारिक नहीं था। वे वास्तव में भरत के दुःख का कारण जानना चाहते थे। उनके मन में आशंका थी कि कहीं अयोध्या में कोई बड़ा अनर्थ तो नहीं हो गया।

💔 महाराज दशरथ के लिए आशंका

श्रीराम अचानक भयभीत होकर पूछते हैं—क्या महाराज दशरथ अभी जीवित हैं?

उन्हें आशंका होती है कि कहीं पिता उनके वियोग और दुःख को सह न सके हों। यदि ऐसा हुआ है, तो शायद इसी कारण भरत स्वयं वन में आए हैं।

यहाँ श्रीराम का पुत्र-हृदय सामने आता है। वनवास के कठिन जीवन में रहते हुए भी उनके मन में सबसे पहले अपने पिता की कुशलता का विचार आता है।

🌿 भरत के राज्य और कर्तव्य की चिंता

श्रीराम भरत से पूछते हैं कि क्या उनका राज्य सुरक्षित है। वे यह भी जानना चाहते हैं कि भरत अपने पिता की सेवा ठीक प्रकार से कर रहे हैं या नहीं।

श्रीराम के लिए राजा होना केवल सिंहासन पर बैठना नहीं था। राजा का पहला धर्म था—परिवार, गुरु, राज्य और प्रजा के प्रति अपने कर्तव्य को निभाना।

🌺 महाराज दशरथ के धर्ममय जीवन की चिंता

श्रीराम याद करते हैं कि महाराज दशरथ धर्मपरायण और सत्यप्रतिज्ञ राजा थे। उन्होंने राजसूय और अश्वमेध जैसे महान यज्ञ किए थे।

इसलिए श्रीराम पूछते हैं कि ऐसे महान राजा कुशल तो हैं न?

यह प्रश्न दिखाता है कि श्रीराम अपने पिता को केवल पिता के रूप में नहीं, बल्कि धर्मनिष्ठ आदर्श राजा के रूप में भी सम्मान करते थे।

🌸 गुरु वसिष्ठ के प्रति सम्मान

अब श्रीराम भरत से गुरु वसिष्ठ की कुशल पूछते हैं।

वसिष्ठजी इक्ष्वाकु वंश के आचार्य थे। वे विद्वान, ब्रह्मज्ञानी और अत्यंत तेजस्वी थे। श्रीराम चाहते हैं कि भरत उनका उचित सम्मान करते हों और उनके मार्गदर्शन का पालन करते हों।

इससे शिक्षा मिलती है कि राजा कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसे योग्य गुरु और विद्वानों का सम्मान करना चाहिए।

🌺 तीनों माताओं की कुशल

श्रीराम एक-एक करके माता कौसल्या, माता सुमित्रा और माता कैकेयी के बारे में पूछते हैं।

यहाँ एक विशेष भाव दिखाई देता है। कैकेयी के कारण ही श्रीराम को वनवास मिला था, फिर भी श्रीराम के मन में उनके प्रति कटुता नहीं है। वे भरत से यह भी पूछते हैं कि कैकेयी माता प्रसन्न तो हैं न?

यह श्रीराम के अद्भुत क्षमाभाव और निर्मल हृदय को दिखाता है।

🌿 पुरोहितों का सम्मान

श्रीराम पूछते हैं कि क्या भरत अपने पुरोहितों का पूरा सम्मान करते हैं।

पुरोहित केवल धार्मिक कर्मकांड कराने वाले व्यक्ति नहीं थे। वे राजा को धर्म और उचित-अनुचित का मार्ग बताते थे।

इसलिए राजा को ऐसे विद्वानों का आदर करना चाहिए जो उसे धर्म के मार्ग पर बनाए रखें।

🔥 अग्निहोत्र और धार्मिक कर्तव्य

श्रीराम पूछते हैं कि क्या अग्निहोत्र के लिए नियुक्त विद्वान ब्राह्मण समय पर अपना कार्य करते हैं और भरत को धार्मिक कर्मों के उचित समय की जानकारी देते हैं।

इसका अर्थ है कि राज्य का संचालन केवल धन और शक्ति से नहीं होता। धर्म और आध्यात्मिक कर्तव्यों का पालन भी आवश्यक है।

🌼 देवता, पितर, गुरु और वृद्धों का सम्मान

श्रीराम भरत को याद दिलाते हैं कि राजा को देवताओं, पितरों, सेवकों, गुरुजनों, वृद्धों, वैद्यों और ब्राह्मणों का सम्मान करना चाहिए।

यहाँ श्रीराम एक बहुत सुंदर बात सिखाते हैं—जिस व्यक्ति को समाज से सम्मान और सहायता मिलती है, उसे समाज के विभिन्न वर्गों का भी सम्मान करना चाहिए।

🏹 आचार्य सुधन्वा का सम्मान

श्रीराम पूछते हैं कि क्या भरत युद्धकला और राजनीति के विद्वान आचार्य सुधन्वा का सम्मान करते हैं।

एक राजा के लिए केवल तलवार चलाना पर्याप्त नहीं था। उसे युद्धनीति, अस्त्र-शस्त्र और राजनीति का ज्ञान रखने वाले योग्य आचार्यों से सीखना चाहिए।

👑 योग्य मंत्रियों का चुनाव

श्रीराम अब शासन के सबसे महत्वपूर्ण विषय पर आते हैं।

वे पूछते हैं कि क्या भरत ने अपने समान योग्य, शूरवीर, शास्त्रज्ञ, संयमी, कुलीन और बुद्धिमान लोगों को ही मंत्री बनाया है।

अर्थात राजा को अपने आसपास केवल अपनी प्रशंसा करने वाले लोगों को नहीं रखना चाहिए। उसे ऐसे लोगों को चुनना चाहिए जो योग्य भी हों और सत्य बोलने का साहस भी रखते हों।

🤫 गुप्त मंत्रणा ही विजय का आधार

श्रीराम कहते हैं कि अच्छी सलाह राजा की विजय का मूल कारण है। लेकिन सलाह तभी सफल होती है जब योग्य मंत्री उसे गुप्त रखें।

राज्य की महत्वपूर्ण योजनाएँ यदि समय से पहले शत्रु को पता चल जाएँ, तो राजा की सारी मेहनत व्यर्थ हो सकती है।

इसलिए बुद्धिमत्ता के साथ गोपनीयता भी शासन का महत्वपूर्ण अंग है।

🌙 समय का सही उपयोग

श्रीराम भरत से पूछते हैं कि क्या वे समय पर सोते और जागते हैं तथा रात के शांत समय में राज्य के महत्वपूर्ण कार्यों पर विचार करते हैं।

इसका भाव यह है कि राजा को अपने समय का मूल्य समझना चाहिए। उसे आलस्य और असावधानी में समय नष्ट नहीं करना चाहिए।

🤫 गुप्त बात कितने लोगों को बतानी चाहिए?

श्रीराम बहुत गहरी नीति बताते हैं—गुप्त बात जितने अधिक लोगों तक पहुँचेगी, उसके बाहर जाने की संभावना उतनी ही बढ़ेगी।

इसलिए न तो राजा को हर बात अकेले ही सोचनी चाहिए और न ही बहुत सारे लोगों के बीच गुप्त योजना बनानी चाहिए। योग्य और विश्वासपात्र व्यक्ति के साथ उचित विचार-विमर्श करना चाहिए।

यहाँ श्रीराम संतुलित सलाह और गोपनीयता दोनों का महत्व समझाते हैं।

⚡ छोटे साधन से बड़ा परिणाम

श्रीराम कहते हैं कि यदि कोई कार्य कम साधन से बहुत बड़ा लाभ दे सकता है, तो उसका निर्णय करने के बाद उसे शीघ्र शुरू कर देना चाहिए।

अर्थात अवसर मिलने पर अनावश्यक देरी नहीं करनी चाहिए।

सही समय पर लिया गया निर्णय ही सफलता को जन्म देता है।

🛡️ शत्रु को पहले से योजना का पता न चले

श्रीराम पूछते हैं कि क्या भरत की योजनाएँ पूरी होने के बाद ही दूसरे राजाओं को पता चलती हैं।

राज्य की महत्वपूर्ण योजनाएँ यदि पहले ही शत्रु को पता चल जाएँ तो शत्रु तैयारी कर सकता है।

इसलिए राजा को अपनी भावी योजनाओं की गोपनीयता बनाए रखनी चाहिए।

🧠 विचारों की सुरक्षा

श्रीराम पूछते हैं कि क्या भरत की योजनाओं को उनके मंत्री या दूसरे लोग बिना बताए ही अनुमान लगाकर समझ लेते हैं।

साथ ही वे यह भी संकेत करते हैं कि राजा को अपने शत्रुओं की योजनाओं की जानकारी भी रखनी चाहिए।

अर्थात राजा को अपने रहस्य छिपाने और दूसरों की योजनाओं को समझने, दोनों में कुशल होना चाहिए।

📚 एक विद्वान हजार मूर्खों से श्रेष्ठ

श्रीराम कहते हैं कि हजारों मूर्ख लोगों की तुलना में एक योग्य विद्वान अधिक उपयोगी हो सकता है।

कठिन समय में संख्या नहीं, बल्कि बुद्धि और योग्यता काम आती है।

यह आज के जीवन में भी बहुत महत्वपूर्ण शिक्षा है—किसी टीम में बहुत सारे लोग होने से अधिक जरूरी है कि उसमें सही ज्ञान और समझ रखने वाले लोग हों।

🌿 मूर्खों की बड़ी संख्या भी लाभ नहीं देती

यदि राजा हजारों या दस हजार मूर्ख लोगों को अपने पास रख ले, फिर भी आवश्यकता के समय वे उसकी उचित सहायता नहीं कर पाएँगे।

इससे श्रीराम यह स्पष्ट करते हैं कि योग्यता संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है।

💎 एक योग्य मंत्री का महत्व

यदि एक मंत्री बुद्धिमान, वीर, चतुर और नीतिज्ञ हो, तो वह राजा के लिए बहुत बड़ा लाभ ला सकता है।

एक सही सलाह कभी-कभी राजा को बड़ी विपत्ति से बचा सकती है और राज्य को बहुत बड़ी सफलता दिला सकती है।

इसलिए राजा को अपने आसपास गुणी और बुद्धिमान लोगों को रखना चाहिए।

⚖️ सही व्यक्ति को सही काम

श्रीराम पूछते हैं कि क्या भरत ने योग्य लोगों को बड़े पद, मध्यम योग्यता वालों को मध्यम कार्य और सामान्य योग्यता वालों को छोटे कार्य दिए हैं।

यह बहुत सुंदर प्रशासनिक सिद्धांत है—

जिस व्यक्ति में जितनी योग्यता हो, उसे उसी के अनुसार जिम्मेदारी मिलनी चाहिए।

🤝 ईमानदार अधिकारियों की नियुक्ति

श्रीराम कहते हैं कि महत्वपूर्ण पदों पर ऐसे लोगों को रखना चाहिए जो रिश्वत न लेते हों, ईमानदार हों, लंबे समय से अपने काम को जानते हों और चरित्र से शुद्ध हों।

क्योंकि यदि अधिकारी भ्रष्ट हों, तो राज्य की व्यवस्था धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है।

⚖️ प्रजा पर अत्यधिक कठोरता नहीं

श्रीराम भरत से पूछते हैं कि क्या उनकी कठोर नीतियों के कारण प्रजा उनके मंत्रियों से नाराज़ तो नहीं है।

राजा का उद्देश्य प्रजा को डराना नहीं, बल्कि उसकी रक्षा और कल्याण करना है।

💰 अत्यधिक कर लेना

श्रीराम आगे समझाते हैं कि यदि राजा प्रजा से बहुत अधिक कर वसूल करेगा, तो प्रजा उससे दूर हो जाएगी और उसका सम्मान कम हो सकता है।

इसका भाव है कि शासन में न्याय और संतुलन आवश्यक है। राजा को राज्य के लिए धन चाहिए, लेकिन प्रजा पर इतना बोझ नहीं डालना चाहिए कि वह दुखी हो जाए।

⚔️ राज्य के लिए खतरा बनने वाले व्यक्ति

श्रीराम सावधान करते हैं कि जो व्यक्ति नीति-कौशल जानता हो, शूरवीर हो, राजा के विश्वासपात्र सेवकों को अपने पक्ष में करने की कोशिश करता हो और स्वयं राज्य पर अधिकार करना चाहता हो, वह बहुत खतरनाक है।

यदि राजा ऐसे व्यक्ति के खतरे को पहचानकर समय पर रोकता नहीं है, तो भविष्य में वही व्यक्ति राजा के लिए बड़ा संकट बन सकता है।

🛡️ योग्य सेनापति

श्रीराम पूछते हैं कि क्या भरत ने ऐसा सेनापति चुना है जो वीर, धैर्यवान, बुद्धिमान, पवित्र, कुलीन और युद्धकला में कुशल हो।

सेनापति केवल बलवान होना पर्याप्त नहीं है। उसमें बुद्धि, धैर्य, अनुशासन और नेतृत्व भी होना चाहिए।

⚔️ योद्धाओं की परीक्षा

राज्य के प्रमुख योद्धाओं का केवल नाम देखकर भरोसा नहीं करना चाहिए। उनकी वास्तविक क्षमता और युद्धकौशल की परीक्षा भी होनी चाहिए।

साथ ही जो वीर राज्य की रक्षा करते हैं, उनका उचित सम्मान भी होना चाहिए।

💰 सैनिकों को समय पर वेतन

श्रीराम पूछते हैं कि क्या सैनिकों को उनका वेतन और भत्ता समय पर दिया जाता है।

यह छोटी बात नहीं है। सैनिक अपने प्राणों की परवाह किए बिना राज्य की रक्षा करते हैं। इसलिए उनके साथ न्याय करना राजा का कर्तव्य है।

⏳ वेतन में देरी का परिणाम

श्रीराम चेतावनी देते हैं कि यदि सैनिकों को समय पर वेतन नहीं मिलेगा, तो उनके मन में अपने स्वामी के प्रति क्रोध उत्पन्न हो सकता है।

इसलिए किसी भी राज्य में कर्मचारियों और सैनिकों को उनका उचित अधिकार समय पर देना आवश्यक है।

❤️ अधिकारियों का राजा के प्रति विश्वास

श्रीराम पूछते हैं कि क्या प्रमुख अधिकारी राजा से प्रेम और विश्वास रखते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर राज्य के लिए अपना सर्वस्व देने को तैयार रहते हैं।

यहाँ श्रीराम केवल डर के आधार पर शासन करने के बजाय विश्वास और सम्मान पर आधारित नेतृत्व की बात करते हैं।

🕊️ योग्य राजदूत

श्रीराम भरत से उनके राजदूत के बारे में पूछते हैं।

राजदूत को बुद्धिमान, कुशल, प्रतिभाशाली और विवेकशील होना चाहिए। उसे वही बात दूसरे राजा तक पहुँचानी चाहिए जो उसे बताने के लिए कहा गया है।

अर्थात राजदूत में बुद्धि, वाणी पर नियंत्रण और परिस्थिति की समझ होना जरूरी है।

👁️ गुप्तचरों की व्यवस्था

श्रीराम पूछते हैं कि क्या भरत अपने राज्य और शत्रु के राज्य की गतिविधियों की जानकारी विश्वसनीय गुप्तचरों से प्राप्त करते रहते हैं।

राजा को यह जानना आवश्यक है कि उसके राज्य में क्या हो रहा है और शत्रु क्या योजना बना रहा है।

यहाँ गुप्तचर व्यवस्था का उद्देश्य है—राज्य की सुरक्षा और समय रहते खतरे को पहचानना।

⚠️ निष्कासित शत्रुओं को कमजोर न समझना

श्रीराम चेतावनी देते हैं कि जिन शत्रुओं को राज्य से बाहर कर दिया गया है, उन्हें कमजोर समझकर भूल नहीं जाना चाहिए।

कभी-कभी छोटा दिखाई देने वाला खतरा भविष्य में बड़ा संकट बन सकता है।

इसलिए राजा को हमेशा सावधान और जागरूक रहना चाहिए।

🙏 धर्म और विद्या से दूर करने वाली संगति से बचना

अंत में श्रीराम भरत को ऐसी संगति से बचने की सलाह देते हैं जो धर्म और सत्य से दूर ले जाए।

वे ऐसे लोगों के बारे में चेतावनी देते हैं जो धर्म के मूल सिद्धांतों को न मानते हुए केवल तर्क-वितर्क में उलझते हैं और स्वयं को बहुत विद्वान समझते हैं।

श्रीराम का उद्देश्य किसी व्यक्ति का अपमान करना नहीं, बल्कि भरत को यह समझाना है कि राजा को ऐसी संगति चुननी चाहिए जो उसे सत्य, धर्म और विवेक के मार्ग पर बनाए रखे।

 

प्रश्न–उत्तर

 

प्रश्न 1. श्रीराम ने भरत को किस अवस्था में देखा?

उत्तर: भरत जटा और चीर-वस्त्र धारण किए, हाथ जोड़कर पृथ्वी पर पड़े थे। उनका शरीर दुर्बल और मुख अत्यंत उदास था।

 

प्रश्न 2. भरत को देखकर श्रीराम की क्या प्रतिक्रिया हुई?

उत्तर: श्रीराम ने भरत को पहचानकर अपने हाथों से उठाया, उनका मस्तक सूँघा, हृदय से लगाया और प्रेमपूर्वक अपनी गोद में बैठाया।

 

प्रश्न 3. श्रीराम ने सबसे पहले भरत से किसके विषय में पूछा?

उत्तर: श्रीराम ने सबसे पहले महाराज दशरथ की कुशल पूछी और जानना चाहा कि वे जीवित तथा स्वस्थ हैं या नहीं।

 

प्रश्न 4. श्रीराम ने भरत की दुर्बलता देखकर क्या सोचा?

उत्तर: श्रीराम ने देखा कि भरत बहुत दुर्बल हो गए हैं और उन्हें आश्चर्य हुआ कि ऐसी अवस्था में वे वन क्यों आए हैं।

 

प्रश्न 5. श्रीराम ने माता कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी के बारे में क्या पूछा?

उत्तर: श्रीराम ने पूछा कि क्या माता कौसल्या सुखी हैं, सुमित्रा प्रसन्न हैं और कैकेयी भी आनंदपूर्वक रह रही हैं।

 

प्रश्न 6. श्रीराम ने गुरु वसिष्ठ के बारे में भरत से क्या पूछा?

उत्तर: श्रीराम ने पूछा कि क्या भरत विद्वान, ब्रह्मवेत्ता और इक्ष्वाकुकुल के आचार्य महातेजस्वी वसिष्ठजी का उचित सम्मान करते हैं।

 

प्रश्न 7. आदर्श राजा को किन लोगों का सम्मान करना चाहिए?

उत्तर: आदर्श राजा को देवताओं, पितरों, भृत्यों, गुरुजनों, वृद्धों, वैद्यों और ब्राह्मणों का सदैव सम्मान करना चाहिए।

 

प्रश्न 8. श्रीराम के अनुसार राजा को कैसे मंत्री चुनने चाहिए?

उत्तर: राजा को शूरवीर, शास्त्रज्ञ, जितेन्द्रिय, कुलीन, बुद्धिमान और योग्य व्यक्तियों को ही अपना मंत्री नियुक्त करना चाहिए।

 

प्रश्न 9. अच्छी मन्त्रणा को सफल बनाने के लिए क्या आवश्यक है?

उत्तर: अच्छी मन्त्रणा राजा की विजय का आधार है और उसकी सफलता के लिए योग्य मंत्रियों द्वारा उसे पूरी तरह गुप्त रखना आवश्यक है।

 

प्रश्न 10. श्रीराम ने गुप्त मन्त्रणा के संबंध में क्या समझाया?

उत्तर: गुप्त बात कम लोगों तक सीमित रहनी चाहिए, क्योंकि अधिक लोगों को बताने पर उसके शत्रुओं तक पहुँचने की संभावना बढ़ जाती है।

 

प्रश्न 11. श्रीराम ने समय के सदुपयोग के बारे में क्या कहा?

उत्तर: राजा को समय पर सोना और जागना चाहिए तथा रात के अंतिम पहर में राज्य की महत्वपूर्ण योजनाओं और कार्यों पर विचार करना चाहिए।

 

प्रश्न 12. छोटे साधन और बड़े परिणाम वाले कार्य के बारे में श्रीराम ने क्या कहा?

उत्तर: ऐसे कार्य का निश्चय हो जाने पर राजा को उसे शीघ्र प्रारम्भ करना चाहिए और अनावश्यक विलम्ब नहीं करना चाहिए।

 

प्रश्न 13. श्रीराम ने विद्वान व्यक्ति को मूर्खों से श्रेष्ठ क्यों बताया?

उत्तर: एक विद्वान कठिन परिस्थितियों में महान सहायता कर सकता है, जबकि हजारों मूर्ख लोग भी आवश्यकता के समय उपयोगी सिद्ध नहीं होते।

 

प्रश्न 14. योग्य मंत्री राजा के लिए किस प्रकार लाभदायक हो सकता है?

उत्तर: मेधावी, वीर, चतुर और नीतिज्ञ मंत्री अपनी बुद्धि और योग्यता से राजा को बड़ी संपत्ति तथा सफलता प्राप्त करा सकता है।

 

प्रश्न 15. श्रीराम के अनुसार किस व्यक्ति को कौन-सा कार्य देना चाहिए?

उत्तर: योग्य व्यक्तियों को प्रधान कार्य, मध्यम योग्यता वालों को मध्यम कार्य और छोटी योग्यता वालों को छोटे कार्य देने चाहिए।

 

प्रश्न 16. महत्वपूर्ण पदों पर किस प्रकार के अमात्यों की नियुक्ति करनी चाहिए?

उत्तर: महत्वपूर्ण पदों पर ईमानदार, अनुभवी, निष्कलंक, पवित्र और योग्य अमात्यों को नियुक्त करना चाहिए, जो रिश्वत न लेते हों।

 

प्रश्न 17. अत्यधिक कर लेने से प्रजा पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर: अत्यधिक कर से प्रजा परेशान और असंतुष्ट हो जाती है तथा राजा और उसके अधिकारियों के प्रति उसका सम्मान कम हो सकता है।

 

प्रश्न 18. श्रीराम ने खतरनाक व्यक्ति के बारे में भरत को क्या चेतावनी दी?

उत्तर: जो व्यक्ति राज्य हथियाना चाहता हो और राजा के विश्वासपात्र लोगों को अपने पक्ष में करने में कुशल हो, वह अत्यंत खतरनाक होता है।

 

प्रश्न 19. आदर्श सेनापति में कौन-कौन से गुण होने चाहिए?

उत्तर: आदर्श सेनापति शूरवीर, धैर्यवान, बुद्धिमान, पवित्र, कुलीन, संतुष्ट और युद्धकर्म में दक्ष होना चाहिए।

 

प्रश्न 20. सैनिकों को समय पर वेतन देना क्यों आवश्यक है?

उत्तर: समय पर वेतन न मिलने से सैनिक अपने स्वामी से नाराज़ हो सकते हैं, जिससे राज्य में गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है।

 

प्रश्न 21. एक योग्य राजदूत में कौन-से गुण होने चाहिए?

उत्तर: राजदूत विद्वान, कुशल, प्रतिभाशाली, विवेकशील और ऐसा होना चाहिए जो राजा के संदेश को ठीक उसी प्रकार प्रस्तुत करे।

 

प्रश्न 22. श्रीराम ने गुप्तचरों की व्यवस्था के बारे में क्या कहा?

उत्तर: राजा को अपने और शत्रु पक्ष की महत्वपूर्ण गतिविधियों की जानकारी विश्वसनीय गुप्तचरों द्वारा नियमित रूप से प्राप्त करते रहना चाहिए।

 

प्रश्न 23. निष्कासित शत्रुओं के संबंध में श्रीराम ने क्या सावधानी बताई?

उत्तर: राज्य से निकाले गए शत्रुओं को कभी कमजोर समझकर उपेक्षित नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे लौटकर भविष्य में बड़ा संकट उत्पन्न कर सकते हैं।

 

प्रश्न 24. श्रीराम ने अनुचित संगति से बचने की सलाह क्यों दी?

उत्तर: ऐसी संगति मनुष्य की बुद्धि को धर्म और सत्य से दूर कर सकती है तथा उसे गलत विचारों और भ्रम में डाल सकती है।

 

प्रश्न 25. इस पूरे प्रसंग से श्रीराम के व्यक्तित्व की कौन-सी विशेषताएँ दिखाई देती हैं?

उत्तर: इस प्रसंग से श्रीराम का भ्रातृप्रेम, करुणा, धर्मनिष्ठा, दूरदर्शिता, न्यायप्रियता, प्रशासनिक बुद्धिमत्ता और प्रजा के प्रति जिम्मेदारी स्पष्ट होती है।