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श्रीवामनावतार

देवताओं और दैत्यों के बीच भीषण संघर्ष हुआ था। भगवान् की कृपा से देवताओं को विजय मिली और इन्द्र पुनः स्वर्ग के सिंहासन पर बैठे। स्वर्ग में उत्सव छा गया, वीणाएँ बजने लगीं, गन्धर्व गाने लगे, अप्सराएँ नृत्य करने लगीं।
परन्तु धीरे-धीरे विजय का गर्व देवताओं के हृदय में घर करने लगा। उन्होंने सोचा — “यह विजय हमारी शक्ति से हुई है।” और इसी अहंकार ने भगवान् की स्मृति को ढक लिया। वे विषयभोग में डूब गये।


विजय मिली तो भूल गये, जिसने दी थी जीत,
गर्व की आँधी ने ढक दिया, भक्ति का मधुर संगीत।
जब भगवान् से टूट गया, मन का पावन नाता,
तभी पतन का द्वार खुला, छिन गया सब त्राता।

दैत्यों की तैयारी

उधर पराजित दैत्य शांत होकर अपनी शक्ति बढ़ाने लगे। वे गुरु शुक्राचार्य और भृगुवंशी ब्राह्मणों की सेवा में लग गये। सेवा से प्रसन्न होकर भृगुवंशी ब्राह्मणों ने दैत्यराज बलि से विश्वजित् यज्ञ कराया।

यज्ञ में अग्निदेव प्रकट हुए और दिव्य रथ, घोड़े और आशीर्वाद दिया।

शुक्राचार्य ने दिव्य शंख दिया।

प्रह्लाद ने दिव्य माला दी।

भृगुवंशी ब्राह्मणों ने यज्ञ का पुण्य और आध्यात्मिक शक्ति दी।

विश्वजित् यज्ञ से बलि को अजेय तेज और ऐश्वर्य प्राप्त हुआ।


यज्ञ जला तो अग्नि से, रथ और अश्व निकल आये,
शंख दिया गुरुदेव ने, प्रह्लाद माला लाये।
भृगुवंशी ब्राह्मणों की, कृपा हुई अपार,
बलि बने तब दानवीर, विजयी और बलशाली नर-नार।

 

इस प्रकार बलि की शक्ति बढ़ती गई। वे सेना सहित अमरावती पहुँचे और स्वर्ग को घेर लिया। देवगुरु बृहस्पति ने इन्द्र से कहा — “समय अनुकूल नहीं है, स्वर्ग छोड़ दो।”
इन्द्र और देवता छिप गये। बलि स्वर्ग के स्वामी बन गये।

उन्होंने सौ अश्वमेध यज्ञ किये और उदारता से राज्य चलाने लगे।

 

अदिति का दुःख

देवताओं का राज्य छिन गया। माता अदिति का हृदय रो उठा।
वे पति कश्यप के पास गईं। कश्यप ने पयोव्रत करने का उपदेश दिया। अदिति ने अत्यंत श्रद्धा से व्रत किया।

भगवान् प्रकट हुए और बोले —
“ब्राह्मण और ईश्वर बलि के अनुकूल हैं। इसलिए वे जीते नहीं जा सकते। मैं अपने अंश से तुम्हारा पुत्र बनकर तुम्हारी सन्तान की रक्षा करूँगा।”

यह सुनकर अदिति की आँखों में आशा के आँसू आ गये।

माता की आँखों में भरे, करुणा के दो बूँद,
भगवान् ने तब दे दिया, आशा का अमृत-छूँद।
जहाँ पुकार सच्ची हुई, वहाँ स्वयं हरि आये,
भक्तों की पीड़ा देखकर, पुत्र रूप धर धाये।

 

भाद्रपद शुक्ल द्वादशी का वह पावन दिन था। मध्याह्नकाल में अभिजित् मुहूर्त उपस्थित हुआ—चारों ओर अलौकिक शांति छा गई, मानो प्रकृति स्वयं किसी दिव्य घटना की प्रतीक्षा कर रही हो। उसी मंगलमय क्षण में भगवान् विष्णु महर्षि कश्यप के अंश से माता अदिति के गर्भ से प्रकट हुए। उनके प्रकट होते ही वातावरण दिव्य प्रकाश से भर उठा, दिशाएँ सुगन्धित हो उठीं, और देवताओं के हृदय हर्ष से पुलकित हो गये।

 

किन्तु यह दिव्यता अधिक समय तक छिपी न रही—कश्यप और अदिति के देखते-देखते ही उसी दिव्य स्वरूप ने तुरंत एक मनोहर वामन ब्रह्मचारी का रूप धारण कर लिया। वह दृश्य अत्यन्त अद्भुत था। जैसे कोई कुशल नट क्षणभर में अपना भेष बदल ले, वैसे ही सर्वव्यापक भगवान् ने स्वयं को एक छोटे, तेजस्वी, विनम्र ब्रह्मचारी के रूप में प्रकट कर दिया। उनका शरीर बालक के समान छोटा था, परन्तु मुखमण्डल पर अलौकिक तेज झलक रहा था। नेत्रों में करुणा, ललाट पर दिव्य प्रभा और चाल में गंभीर शांति थी।

 

भगवान् को वामन ब्रह्मचारी के रूप में देखकर महर्षियों के हृदय आनन्द से भर उठे। वे समझ गये कि यह कोई साधारण बालक नहीं, स्वयं धर्म की रक्षा के लिये अवतरित परमात्मा हैं। सभी ऋषियों ने आदरपूर्वक महर्षि कश्यप को आगे किया और विधिपूर्वक भगवान् के जातकर्म आदि संस्कार सम्पन्न कराये। उस समय आश्रम में वेद-मन्त्रों की गूंज उठी, वातावरण पवित्र हो गया, और देवताओं ने अदृश्य रूप से पुष्पवृष्टि की।

 

जब उपनयन-संस्कार का शुभ अवसर आया, तब यह दृश्य और भी अद्भुत बन गया। स्वयं सूर्यदेव प्रकट हुए और उन्होंने भगवान् को गायत्री-मन्त्र का उपदेश दिया, मानो ज्ञान का प्रकाश स्वयं ज्ञानस्वरूप को अर्पित कर रहा हो। देवगुरु बृहस्पति ने आदरपूर्वक यज्ञोपवीत पहनाया—यह ज्ञान और ब्रह्मचर्य का प्रतीक था। महर्षि कश्यप ने मेखला प्रदान की, जो संयम और तप का संकेत थी।

 

पृथ्वी माता ने विनम्र भाव से कृष्णमृग का चर्म अर्पित किया, जिससे ब्रह्मचर्य की सरलता झलकती थी। वनस्पतियों के स्वामी चन्द्रमा ने दण्ड दिया—मानो शीतलता और मर्यादा का आधार स्वयं उनके हाथों में सौंप दिया गया हो। माता अदिति ने प्रेम से कौपीन और उत्तरीय वस्त्र प्रदान किये; उस क्षण उनके नेत्रों में मातृस्नेह उमड़ पड़ा। आकाश के अभिमानी देवता ने छत्र अर्पित किया, जैसे स्वयं आकाश उनकी सेवा में झुक गया हो।

 

ब्रह्माजी ने कमण्डलु दिया—वैराग्य और तपस्या का प्रतीक। सप्तर्षियों ने कुश समर्पित किये, जिससे यज्ञ और साधना की पवित्रता प्रकट होती थी। विद्या की अधिष्ठात्री सरस्वती ने रुद्राक्ष की माला पहनाई, मानो ज्ञान और जप की शक्ति उनके कण्ठ में विराजमान हो गई। धनाध्यक्ष कुबेर ने भिक्षापात्र अर्पित किया, और साक्षात् जगन्माता अन्नपूर्णा ने उसमें भिक्षा रखी—यह दर्शाने के लिये कि सम्पूर्ण जगत का पालन करने वाला भी ब्रह्मचारी रूप में भिक्षा ग्रहण करता है।

 

इस प्रकार देवताओं, ऋषियों और मातृशक्ति के प्रेम से भगवान् की ब्रह्मचर्य-दीक्षा पूर्ण हुई। वह दृश्य अद्भुत था—संसार के स्वामी एक विनम्र ब्रह्मचारी के रूप में खड़े थे।

 

उसी समय भगवान् ने सुना कि महायशस्वी राजा बलि, भृगुवंशी ब्राह्मणों के आदेशानुसार अत्यन्त वैभव और समस्त सामग्रियों के साथ अनेक अश्वमेध यज्ञ कर रहे हैं। यह सुनते ही भगवान् के हृदय में एक दिव्य संकल्प जाग उठा। धर्म की स्थापना और देवताओं के कल्याण के लिये वे तुरंत वहाँ जाने के लिये चल पड़े—छोटा-सा वामन रूप, हाथ में दण्ड, कंधे पर कमण्डलु, पर भीतर अनन्त ब्रह्माण्डों का स्वामी—और इसी शांत, गंभीर, दिव्य तेज के साथ वे राजा बलि के यज्ञ की ओर प्रस्थान कर गये।

 

भाद्रपद की मधुर द्वादशी, अभिजित् का पावन काल,

अदिति-गर्भ से प्रकट हुए, स्वयं विष्णु दयामय निहाल।

 

क्षण में बदला दिव्य स्वरूप, बन गए वामन ब्रह्मचारी,

छोटा तन, पर तेज अपार, लीला उनकी न्यारी-न्यारी।

 

सूर्य ने दी गायत्री ज्योति, बृहस्पति ने यज्ञोपवीत,

मेखला दी कश्यप मुनि ने, झलका तप का पावन गीत।

 

पृथ्वी लाई मृगचर्म विनीत, चन्द्र ने दण्ड थमाया,

माता अदिति ने वस्त्र दिए, स्नेह अश्रु से मन भर आया।

 

ब्रह्मा ने कमण्डलु अर्पित, सरस्वती ने माला दी,

कुबेर ने भिक्षापात्र दिया, अन्नपूर्णा ने भिक्षा दी।

 

ब्रह्मचारी बन विश्वनाथ, लीला की यह अद्भुत शान,

भिक्षुक बनकर चल पड़े फिर, लेने बलि का तीन पग दान।

 

राजा बलि नर्मदा नदी के उत्तर तट पर स्थित भृगुकच्छ नामक पवित्र क्षेत्र में भृगुवंशी ब्राह्मणों के आदेशानुसार एक महान अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे थे। वहाँ का दृश्य अत्यन्त भव्य था। विशाल यज्ञमण्डप सुसज्जित था, वेदमन्त्रों की गंभीर ध्वनि आकाश में गूँज रही थी, अग्निकुण्डों से उठती सुगन्धित धूम-रेखाएँ वातावरण को पवित्र बना रही थीं। चारों ओर ऋषि-मुनि विराजमान थे, देवताओं के लिये हवि अर्पित हो रही थी, और राजा बलि विनम्र भाव से यज्ञकार्य में तत्पर थे। उनकी उदारता और यश की चर्चा दूर-दूर तक फैल चुकी थी।

 

उसी समय, जैसे कोई शांत प्रभात की किरण धीरे-धीरे फैलती है, वैसे ही वामन भगवान् हाथ में छत्र, दण्ड और जल से भरा कमण्डलु लिये यज्ञमण्डप की ओर बढ़े। उनका स्वरूप अत्यन्त मोहक था—कमर में मूँज की मेखला बँधी थी, कंधे पर मृगचर्म सुशोभित था, गले में यज्ञोपवीत चमक रहा था, सिर पर जटाएँ थीं, और मुख पर अद्भुत तेज झलक रहा था। छोटे-से ब्रह्मचारी का यह दिव्य रूप देखते ही यज्ञमण्डप में बैठे सभी लोग चकित रह गये। ऐसा लगा मानो स्वयं तप, तेज और विनय एक साथ चलकर आये हों।

 

राजा बलि ने जैसे ही उन्हें देखा, वे तत्काल अपने आसन से उठ खड़े हुए। उनके हृदय में श्रद्धा उमड़ पड़ी। उन्होंने मधुर वाणी से उनका स्वागत किया, विनम्रतापूर्वक उनके चरण पखारे और उस चरणामृत को अपने मस्तक पर धारण किया। यह देखकर उपस्थित ऋषि-मुनि बलि की विनम्रता और धर्मनिष्ठा की प्रशंसा करने लगे।

 

फिर राजा बलि हाथ जोड़कर बोले—“ब्राह्मणकुमार! आपके तेज को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि आप किसी विशेष उद्देश्य से यहाँ आये हैं। आप जो कुछ भी चाहते हों, निसंकोच मुझसे माँग लीजिये। मेरे लिये सबसे बड़ा सौभाग्य होगा कि मैं आपकी इच्छा पूरी कर सकूँ।”

 

वामन भगवान् मुस्कुराए। उन्होंने प्रसन्न होकर राजा बलि की प्रशंसा की और कहा—“राजन्! आपने जो कहा, वह आपकी धर्मनिष्ठा और आपके महान कुल की परम्परा के अनुरूप है।” फिर उन्होंने बलि के पूर्वजों का यशोगान आरम्भ किया—उन्होंने पिता विरोचन की उदारता का वर्णन किया, पितामह प्रह्लाद की अटल भक्ति का स्मरण कराया, और प्रपितामह हिरण्यकशिपु तथा हिरण्याक्ष के अद्भुत पराक्रम का उल्लेख किया। यह सुनकर यज्ञमण्डप में बैठे सभी लोग बलि के महान वंश की महिमा से प्रभावित हो उठे।

 

इसके बाद भगवान् ने शांत स्वर में कहा—“राजन्! मैं आपसे केवल अपने पगों से नापी हुई तीन डग भूमि चाहता हूँ।”

 

यह सुनकर राजा बलि हँस पड़े। उन्हें लगा कि इतना छोटा ब्रह्मचारी इतनी छोटी-सी वस्तु क्यों माँग रहा है। उन्होंने हँसते हुए कहा—

“जथा दरिद्र बिबुधतरु पाई, बहु संपति मागत सकुचाई।”

अर्थात् जैसे कोई दरिद्र कल्पवृक्ष पाकर भी अधिक माँगने में संकोच करे, वैसे ही आप कम माँग रहे हैं।

 

भगवान् ने शांत स्वर में उत्तर दिया—“मैं कम इसलिये नहीं माँग रहा कि मैं दरिद्र हूँ, बल्कि इसलिए कि मैं सन्तोष को ही सबसे बड़ा धन मानता हूँ।” और उन्होंने कहा—

 

गो धन गज धन बाजि धन और रतन धन खान,

जब आवै सन्तोष धन, सब धन धूरि समान॥

 

राजा बलि ने फिर मुस्कराते हुए कहा—“यदि तीन पग ही लेना है, तो मेरे दैत्यों के पगों से लीजिये। देखिये, इनके पाँव एक-एक योजन के हैं।”

 

परन्तु भगवान् भी अपने संकल्प में अटल थे। उन्होंने कहा—“नहीं, मैं तो अपने ही पाँव से नापूँगा। मनुष्य को उतना ही संग्रह करना चाहिए जितनी आवश्यकता हो। जो ब्राह्मण स्वयंप्राप्त वस्तु से सन्तोष कर लेता है, उसके तेज की वृद्धि होती है; अधिक संग्रह करने से पतन हो जाता है।”

 

इतने में गुरु शुक्राचार्य ने स्थिति को समझ लिया। उन्होंने बलि को अलग ले जाकर सावधान किया—“राजन्! यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं, स्वयं विष्णु हैं। ये तुम्हारा सब कुछ लेने आये हैं। वचन देने से पहले सोचो। अपनी जीविका बचाने के लिये असत्य बोलना भी दोष नहीं माना जाता।”

 

किन्तु महात्मा बलि के हृदय में सत्य और दान की भावना अटल थी। उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा—“मैं एक बार देने का वचन दे चुका हूँ। अब उसे अस्वीकार करना मेरे लिये अधर्म होगा। चाहे राज्य चला जाये, चाहे सब कुछ नष्ट हो जाये—मैं असत्य नहीं बोलूँगा।”

 

जब शुक्राचार्य ने देखा कि बलि अपने निर्णय से नहीं हट रहे, तो उन्होंने क्रोधित होकर उन्हें राज्यभ्रष्ट होने का शाप दे दिया। फिर भी महात्मा बलि विचलित नहीं हुए। उनका चेहरा शांत था, मन दृढ़ था, और हृदय में दान की महिमा चमक रही थी।

 

उन्होंने विधिपूर्वक जल अपने हाथ में लिया, संकल्प किया और दृढ़ निश्चय के साथ वामन भगवान् को तीन पग पृथ्वी देने का वचन दे दिया। उस क्षण यज्ञमण्डप में एक अद्भुत गंभीरता छा गई—एक ओर छोटा-सा ब्रह्मचारी खड़ा था, और दूसरी ओर सत्यव्रती दानी राजा बलि—और इतिहास का एक महान क्षण साकार हो रहा था।

 

यज्ञभूमि में गूँज रहा था, वेदमंत्रों का पावन गान,

दानी बलि के द्वार खड़े थे, लेकर वामन तीन पग दान।

 

छोटा सा ब्रह्मचारी रूप, पर तेज अनन्त अपार,

माँग रहे थे तीन ही डग, छिपा हुआ था जग विस्तार।

 

हँसकर बोले दानी बलि — “माँगो जितना चाहे मन”,

वामन बोले — “सन्तोषी को, तीन पग ही पर्याप्त धन।”

 

सत्यव्रती बलि अटल रहे, गुरु का भी न माना भय,

दान-धर्म पर अडिग खड़े थे, चाहे छिन जाये सब कुछ नय।

 

जल लेकर संकल्प किया, गूँज उठी यज्ञशाला महान,

एक ओर थे सत्य के रक्षक, एक ओर स्वयं भगवान्। ✨

संकल्प होते ही अद्भुत चमत्कार घटित हुआ। छोटा-सा वामन ब्रह्मचारी रूप क्षणभर में बढ़ने लगा। उनका शरीर आकाश को छूने लगा, चरण पृथ्वी पर स्थिर रहे और सिर ब्रह्माण्ड के पार पहुँच गया। देखते-ही-देखते वह बालक विराट विश्वरूप बन गया। उनके नेत्रों में सूर्य और चन्द्रमा का तेज झलकने लगा, श्वासों में वायु का वेग था, भुजाओं ने दिशाओं को घेर लिया और उनके शरीर में सम्पूर्ण चराचर जगत् दिखाई देने लगा।

 

दैत्यगण यह अद्भुत रूप देखकर भय से काँप उठे। जिसको वे छोटा ब्राह्मण समझ रहे थे, वही सम्पूर्ण सृष्टि का स्वामी बनकर सामने खड़ा था। भगवान् ने एक ही पग में पृथ्वी को नाप लिया—राजा बलि का सम्पूर्ण राज्य, पर्वत, समुद्र, वन, नगर सब उसी एक चरण में समा गये। फिर दूसरा पग ऊपर उठा—वह स्वर्गलोक को लाँघता हुआ महर्लोक, जनलोक, तपलोक से भी ऊपर सत्यलोक तक पहुँच गया।

 

जब भगवान् का चरण सत्यलोक तक पहुँचा, तब ब्रह्माजी स्वयं विस्मित होकर खड़े हो गये। उन्होंने श्रद्धा से उस दिव्य चरण का अर्घ्य-पाद्य से पूजन किया और कमण्डलु के जल से चरणों का प्रक्षालन किया। वही चरणामृत जब ब्रह्मलोक से बहा, तो वह दिव्य धारा बनकर गंगाजी के रूप में प्रकट हुई—जिसने आगे चलकर तीनों लोकों को पवित्र किया।

 

इधर दैत्य सेनापतियों को जब ज्ञात हुआ कि यह ब्राह्मण वास्तव में देवताओं का सहायक है, तो वे क्रोध से भर उठे। उन्होंने अस्त्र-शस्त्र उठाकर भगवान् पर आक्रमण करना चाहा, परन्तु भगवत्पार्षदों ने उन्हें तुरंत रोक दिया और खदेड़ दिया। राजा बलि ने भी अपने सैनिकों को समझाया—“यह समय युद्ध का नहीं, वचन निभाने का है।”

 

भगवान् के संकेत पर गरुड़ ने वरुणपाश से राजा बलि को बाँध दिया। सब कुछ छिन जाने पर भी बलि के मुख पर कोई दुःख नहीं था। तब भगवान् ने कहा—“दो पग में मैंने सब कुछ ले लिया, अब तीसरे पग के लिये स्थान नहीं बचा। तुम्हारी प्रतिज्ञा पूरी नहीं हुई, अतः तुम्हें दण्ड मिलेगा।”

 

इतना तिरस्कार सुनकर भी बलि का धैर्य अडिग रहा। उन्होंने विनम्रता से कहा—“प्रभो! मैं एक बात पूछूँ—धन बड़ा है या धनी?”

भगवान् ने उत्तर दिया—“धन धनी के अधीन होता है, इसलिए धनी ही बड़ा है।”

 

बलि ने शांत स्वर में कहा—“प्रभो! मेरा धन तो आपने ले लिया। अब एक पग शेष है—वह मेरे सिर पर रख दीजिये। मैं अपने आप को ही अर्पित करता हूँ।”

 

यह कहते हुए राजा बलि ने अपना सिर झुका दिया। वह क्षण अत्यन्त मार्मिक था—दानवीर बलि अपने सब कुछ खोकर भी विजयी थे, क्योंकि उन्होंने स्वयं को भगवान् को समर्पित कर दिया था।

 

भगवान् का हृदय द्रवित हो उठा। वे प्रसन्न होकर ब्रह्माजी से बोले—“मैं जिस पर विशेष कृपा करता हूँ, उसका धन छीन लेता हूँ। मैंने इसका राज्य लिया, इसे बाँध दिया, इसके गुरु ने शाप दिया, सबने साथ छोड़ दिया—फिर भी इसने सत्य नहीं छोड़ा। मैंने छल से माँगा, पर इसने धर्म नहीं छोड़ा। यह सच्चा दानी और सत्यव्रती है।”

 

भगवान् ने राजा बलि को सुतल लोक में निवास का अधिकार दिया—जो स्वर्ग से भी अधिक सुखद था। इतना ही नहीं, उन्होंने स्वयं उसके द्वारपाल बनने का वचन दिया। इस प्रकार दानी बलि सब कुछ देकर भी भगवान् को पा गये।

 

इन्द्र को पुनः स्वर्ग का राज्य मिला, अदिति की कामना पूर्ण हुई, और भगवान् वामन उपेन्द्र रूप में देवताओं के साथ जगत् का पालन करने लगे।

 

तीन पग माँगे थे जिसने, तीनों लोक समा गये,

छोटे से उस वामन में, अनन्त विश्व दिखा गये।

 

पहला पग धरती पर रखा, दूसरा नभ पार,

तीसरे को स्थान न पाया, झुक गया बलि का सिर अपार।

 

सब कुछ देकर भी बलि जी, हार कर भी जीत गये,

दान दिया जब स्वयं को, तब भगवान् के मीत बने।

 

छिन गया राज्य, छिन गया धन, बँध गये वरुण के पाश,

पर सत्यव्रती अटल रहे, न डिगा उनका विश्वास।

 

समापन ✨

 

जहाँ दान में अहंकार नहीं, वहाँ भगवान् स्वयं आते हैं।

जहाँ सत्य के लिए सब कुछ त्याग दिया जाये, वहाँ हार भी विजय बन जाती है।

राजा बलि ने तीन पग भूमि नहीं दी—उन्होंने अपना सब कुछ अर्पित कर दिया।

और भगवान् ने भी सब कुछ लौटा दिया—अपना सान्निध्य, अपना संरक्षण, अपना प्रेम।

 

इसीलिए यह कथा सिखाती है—

धन देकर दानी बनना सरल है,

पर स्वयं को समर्पित कर देना ही सच्चा दान है।