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श्रीसनकादि अवतार

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श्रीसनकादि अवतार — बालरूप में प्रकट हुआ सनातन ज्ञान और वैराग्य का दिव्य प्रकाश

जब सृष्टि का प्रारम्भ हुआ, तब चारों ओर केवल सृजन की तैयारी थी। सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी के सामने एक महान उत्तरदायित्व था—असंख्य लोकों, प्राणियों और जीवन की रचना करना। परन्तु वे जानते थे कि केवल सृष्टि बना देना ही पर्याप्त नहीं है; यदि जीवों को आत्मज्ञान का मार्ग न मिले, तो वे जन्म-मृत्यु और मोह-माया के अंतहीन चक्र में भटकते रहेंगे।

इसी गहन विचार से प्रेरित होकर ब्रह्माजी ने परमात्मा की आराधना करते हुए कठोर तपस्या आरम्भ की। उनका तप इतना अखण्ड, निर्मल और निष्काम था कि स्वयं भगवान श्रीविष्णु उस तप से प्रसन्न हो गए।

भगवान ने विचार किया—“यदि संसार में केवल सृष्टि होगी और आत्मज्ञान नहीं होगा, तो जीव अपने वास्तविक स्वरूप को कभी नहीं पहचान पाएँगे।” इसलिए उन्होंने ज्ञान, वैराग्य और ब्रह्मचर्य की स्थापना के लिए एक अद्भुत अवतार धारण किया।

भगवान श्रीविष्णु चार दिव्य बालकों—सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार—के रूप में प्रकट हुए। इन्हें सामूहिक रूप से श्रीसनकादि ऋषि कहा जाता है। यही भगवान विष्णु का चौबीसवाँ अवतार माना जाता है।

यद्यपि वे सृष्टि के आदि काल में उत्पन्न हुए थे, फिर भी उनका स्वरूप सदा पाँच वर्ष के बालकों जैसा ही रहा। उनके शरीर पर वृद्धावस्था का कोई प्रभाव कभी नहीं पड़ा। उनका बालरूप केवल आयु का संकेत नहीं था, बल्कि पूर्ण निर्मलता, निष्कपटता और मायारहित चेतना का प्रतीक था। वे संसार के किसी भी आकर्षण, भोग या अहंकार से अछूते रहे।

उनका मन प्रत्येक क्षण परमब्रह्म में लीन रहता था। वे स्वयं ब्रह्मस्वरूप का अनुभव कर चुके जीवन्मुक्त महापुरुष थे। उनके हृदय में न किसी वस्तु की इच्छा थी, न किसी पद की कामना, न किसी सम्मान का आकर्षण। उनके लिए सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में केवल भगवान का सत्य ही वास्तविक था।

भगवान ने इस अवतार के माध्यम से उस आत्मज्ञान का पुनः उपदेश किया जो पिछले कल्प के अंत में लुप्त हो गया था। अनेक ऋषियों ने उनके चरणों में बैठकर आत्मा, ब्रह्म और मोक्ष का दिव्य ज्ञान प्राप्त किया। आगे चलकर उन्होंने महान राजा पृथु को भी धर्म, वैराग्य और भगवान की भक्ति का उपदेश देकर उनके जीवन को धन्य बना दिया।

जब ब्रह्माजी ने इन चारों कुमारों को उत्पन्न किया, तब उन्होंने प्रेमपूर्वक आदेश दिया—“जाओ, प्रजा की वृद्धि करो और सृष्टि का विस्तार करो।”

किन्तु सनकादि कुमारों ने अत्यन्त विनम्रता से उत्तर दिया—

“हे पितामह! हमारा जीवन संसार के विस्तार के लिए नहीं, बल्कि जीवों को संसार के बन्धनों से मुक्त कराने के लिए है। यदि हम भी मोह-माया में उलझ जाएँगे, तो वैराग्य और आत्मज्ञान का मार्ग कौन दिखाएगा? हमारा कर्तव्य भगवान के चरणों में स्थित रहकर समस्त जीवों को मोक्ष का पथ बताना है।”

उनके इस उत्तर में न अहंकार था, न अवज्ञा—केवल सत्य, करुणा और वैराग्य की मधुर सुगन्ध थी। ब्रह्माजी उनके उत्तर को सुनकर मौन हो गए। उन्हें अनुभव हुआ कि ये साधारण बालक नहीं, स्वयं भगवान की दिव्य विभूतियाँ हैं।

इसके बाद चारों कुमार वनों, आश्रमों और तीर्थों में विचरण करने लगे। जहाँ भी कोई सत्य का जिज्ञासु मिलता, वे उसे आत्मज्ञान का अमृत पिलाते। वे सदा अखण्ड ब्रह्मचारी रहे। उनका ब्रह्मचर्य केवल शरीर का संयम नहीं था, बल्कि मन, बुद्धि और इन्द्रियों की पूर्ण पवित्रता का दिव्य आदर्श था।

उनके तप, ज्ञान और वैराग्य से तीनों लोकों का कल्याण होता रहा। वे यह संदेश देते रहे कि मनुष्य का वास्तविक सुख संसार की वस्तुओं में नहीं, बल्कि अपने आत्मस्वरूप और भगवान की भक्ति में है।

श्रीसनकादि अवतार हमें सिखाता है कि सच्चा ज्ञान वही है जो मनुष्य को अहंकार, मोह और इच्छाओं से मुक्त कर भगवान की ओर ले जाए। संसार में रहते हुए भी यदि मन भगवान में स्थिर हो जाए, तो वही जीवन सफल हो जाता है।