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श्रीहंस अवतार

श्रीहंस अवतार — अद्वैत का दिव्य संदेश

 

ब्रह्मलोक का वातावरण शांत, निर्मल और ज्ञान की अलौकिक ज्योति से आलोकित था। वहाँ चारों ओर वेदों की ध्वनि, ध्यानमग्न ऋषियों की गंभीर मुद्रा और सृष्टि के रहस्यों पर होने वाला चिंतन निरंतर प्रवाहित हो रहा था। उसी समय सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार — ये सनकादिक परमर्षि अपने पिता श्रीब्रह्माजी के समीप पहुँचे। उनके मुख पर जिज्ञासा थी, परन्तु भीतर कहीं एक सूक्ष्म संशय भी था, जो ज्ञान की पूर्णता को रोक रहा था।

 

विनम्र भाव से उन्होंने पूछा—

 

“पिताजी! चित्त गुणों अर्थात् विषयोंमें घुसा ही रहता है और गुण भी चित्तकी एक-एक वृत्तिमें प्रविष्ट रहते ही हैं अर्थात् चित्त और गुण आपसमें मिले-जुले ही रहते हैं। ऐसी स्थितिमें जो पुरुष इस संसार-सागरसे पार होकर मुक्तिपद प्राप्त करना चाहता है, वह इन दोनोंको एक-दूसरेसे कैसे अलग कर सकता है?”

 

यह प्रश्न साधारण नहीं था। यह मुक्तिपथ का प्रश्न था, आत्मा और माया के सम्बन्ध का प्रश्न था। ब्रह्माजी, जो सृष्टि के आदिकर्ता, देवशिरोमणि और स्वयम्भू हैं, उन्होंने इस प्रश्न को सुना। वे कुछ क्षण मौन रहे। उनके दिव्य मुख पर गंभीरता छा गई।

 

यद्यपि वे सब प्राणियों के जन्मदाता हैं, परंतु कर्म-प्रवण बुद्धि होने से वे इस प्रश्न का समुचित समाधान न कर सके। तब उनके हृदय में एक ही उपाय सूझा— भगवान् का स्मरण। उन्होंने भक्ति-भाव से आँखें मूँद लीं और मन से परमात्मा का चिंतन करने लगे।

 

उस क्षण ब्रह्मलोक का वातावरण और भी गंभीर हो गया।

मानो समय भी ठहर गया हो।

ज्ञान भी प्रतीक्षा कर रहा था उत्तर की।

 

शांत नभ में विचारों की लहरें थम-सी गईं,

ब्रह्मा के मन में प्रार्थना की ध्वनि जम-सी गई।

जब जिज्ञासा ने भक्ति का रूप धारण किया,

तब करुणा बनकर दिव्य उत्तर प्रकट हुआ।

 

तभी एक अद्भुत दृश्य प्रकट हुआ। दिव्य प्रकाश से युक्त, अत्यंत श्वेत और शांत स्वरूप वाला एक हंस वहाँ प्रकट हुआ। वह कोई साधारण हंस नहीं था — वह स्वयं भगवान् थे। उनकी उपस्थिति से ब्रह्मलोक में आनंद की तरंगें फैल गईं। श्रीसनकादिक और ब्रह्माजी ने उन्हें प्रणाम किया।

 

सनकादिकों ने विनम्रता से पूछा — “आप कौन हैं?”

 

तब भगवान् बोले—

 

“ब्राह्मणो! यदि परमार्थरूप वस्तु नानात्वसे सर्वथा रहित है, तब आत्माके सम्बन्धमें आप लोगोंका ऐसा प्रश्न कैसे युक्तिसंगत हो सकता है? देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी आदि सभी शरीर पंचभूतात्मक होनेके कारण अभिन्न ही हैं और परमार्थसे भी अभिन्न हैं। ऐसी स्थितिमें ‘आप कौन हैं?’ आप लोगोंका यह प्रश्न ही केवल वाणीका व्यवहार है। विचारपूर्वक नहीं है अतः निरर्थक है।”

 

भगवान् का स्वर अत्यंत मधुर था, परंतु उसमें अद्वैत का गहन सत्य समाहित था। वे आगे बोले—

 

“मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे जो कुछ भी ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ। मुझसे भिन्न और कुछ नहीं है। यह सिद्धान्त आप लोग तत्त्व-विचारके द्वारा समझ लीजिये।”

 

सनकादिक ध्यानपूर्वक सुन रहे थे। उनके मन का संशय धीरे-धीरे मिटने लगा। भगवान् ने आगे कहा—

 

“पुत्रो! यह चित्त चिन्तन करते-करते विषयाकार हो जाता है और विषय चित्तमें प्रविष्ट हो जाते हैं, यह बात सत्य है तथापि विषय और चित्त—ये दोनों ही मेरे स्वरूपभूत जीवके देह हैं—उपाधि हैं। अर्थात् आत्माका चित्त और विषयके साथ कोई सम्बन्ध ही नहीं है।”

 

भगवान् का प्रत्येक शब्द आत्मज्ञान की दीपशिखा था। उन्होंने मुक्तिपथ का स्पष्ट मार्ग बताया—

 

“इसलिये बार-बार विषयोंका सेवन करते रहनेसे जो चित्त विषयोंमें आसक्त हो गया है और विषय भी चित्तमें प्रविष्ट हो गये हैं, इन दोनोंको अपने वास्तविक रूपसे अभिन्न मुझ परमात्माका साक्षात्कार करके त्याग देना चाहिये।”

 

यह सुनते ही सनकादिकों के हृदय में अद्वैत का प्रकाश फैल गया। अब उन्हें समझ आ गया कि आत्मा विषयों से परे है, चित्त से परे है, केवल साक्षी है।

 

जब आत्मा का दीपक भीतर जल जाता है,

तो माया का अंधकार स्वयं ही ढल जाता है।

विषय और चित्त का बंधन टूट जाता है,

जब ‘मैं’ का भाव परम में लीन हो जाता है।

 

भगवान् ने इस प्रकार सनकादि मुनियों के संशय मिटा दिए। उनके हृदय आनंद से भर गए। उन्होंने अत्यंत श्रद्धा से भगवान् की पूजा और वंदना की। ब्रह्माजी भी भाव-विभोर होकर उस दिव्य स्वरूप को निहारते रहे।

 

फिर उसी क्षण — जिस प्रकार वे अचानक प्रकट हुए थे — उसी प्रकार भगवान् हंस रूप में सबके सामने ही अदृश्य हो गए और अपने धाम को चले गए।

 

ब्रह्मलोक पुनः शांत हो गया, पर अब वहाँ ज्ञान की नई ज्योति जल चुकी थी।

 

हंस बनकर आए थे जो, ज्ञान का सागर दे गए,

अद्वैत का अमृत देकर संशय सारे ले गए।

न शब्द रहा, न रूप रहा, न कोई भेद बचा,

बस एक परम सत्य रहा — “सब मैं हूँ” यह कह गए।

 

 

अपनी समझ परखें

उपर्युक्त कथा के आधार पर निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों में सही उत्तर चुनिए—

प्रश्न 1. सनकादिक परमर्षियों ने श्रीब्रह्माजी से मुख्यतः किस विषय में प्रश्न किया?
A. सृष्टि की रचना का रहस्य
B. चित्त और गुणों को अलग करने का उपाय
C. देवताओं की उत्पत्ति का कारण
D. योग-साधना की विधि

प्रश्न 2. श्रीब्रह्माजी सनकादिकों के प्रश्न का उत्तर तुरंत क्यों न दे सके?
A. उन्हें प्रश्न स्पष्ट नहीं समझ आया
B. वे समाधि में लीन हो गये थे
C. कर्म-प्रवण बुद्धि होने से समाधान न कर सके
D. सनकादिकों ने प्रश्न बदल दिया

प्रश्न 3. भगवान् ने किस रूप में प्रकट होकर सनकादिकों के प्रश्न का समाधान किया?
A. नारायण रूप में
B. हंस रूप में
C. ब्राह्मण रूप में
D. योगी रूप में

प्रश्न 4. भगवान् ने ‘आप कौन हैं?’ प्रश्न को निरर्थक क्यों बताया?
A. क्योंकि प्रश्न अनुचित समय पर पूछा गया था
B. क्योंकि पूछनेवाले ज्ञानी नहीं थे
C. क्योंकि परमार्थरूप वस्तु नानात्व से रहित है
D. क्योंकि भगवान् ने उत्तर देना उचित नहीं समझा

प्रश्न 5. भगवान् के अनुसार देवता, मनुष्य और पशु-पक्षी अभिन्न क्यों हैं?
A. क्योंकि सभी एक ही धर्म का पालन करते हैं
B. क्योंकि सभी पंचभूतात्मक शरीर वाले हैं
C. क्योंकि सभी एक ही लोक में रहते हैं
D. क्योंकि सभी समान कर्म करते हैं

प्रश्न 6. भगवान् के कथनानुसार मन, वाणी और इन्द्रियों से जो कुछ ग्रहण किया जाता है, वह क्या है?
A. मायिक आभास
B. केवल विषय
C. परमात्मा से भिन्न तत्व
D. वही भगवान् का स्वरूप

प्रश्न 7. भगवान् ने चित्त और विषयों के सम्बन्ध को किस रूप में बताया?
A. आत्मा के वास्तविक अंग
B. जीव के स्वरूप का कारण
C. आत्मा से असम्बद्ध उपाधि
D. सृष्टि का मूल कारण

प्रश्न 8. विषयों में आसक्त चित्त को त्यागने का उपाय भगवान् ने क्या बताया?
A. कठोर तपस्या करना
B. विषयों का पूर्ण नाश करना
C. परमात्मा का साक्षात्कार करना
D. इन्द्रियों को बलपूर्वक रोकना

प्रश्न 9. भगवान् ने सनकादिकों के संशय दूर करने के बाद क्या किया?
A. उन्हें ज्ञान देकर वहीं ब्रह्मलोक में ठहर गये
B. ब्रह्माजी को सृष्टि का नया आदेश दिया
C. पूजित होकर उनके सामने ही अदृश्य होकर अपने धाम को चले गये
D. हंस रूप त्यागकर अन्य रूप धारण किया

प्रश्न 10. चित्त विषयाकार कैसे हो जाता है?
A. इन्द्रियों के नष्ट होने से
B. बार-बार विषयों का चिन्तन करने से
C. ज्ञान प्राप्त होने से
D. कर्म त्याग देने से

 

*Answer Sheet*

    1.    B — चित्त और गुणों को अलग करने का उपाय
    2.    C — कर्म-प्रवण बुद्धि होने से समाधान न कर सके
    3.    B — हंस रूप में
    4.    C — क्योंकि परमार्थरूप वस्तु नानात्व से रहित है
    5.    B — क्योंकि सभी पंचभूतात्मक शरीर वाले हैं
    6.    D — वही भगवान् का स्वरूप
    7.    C — आत्मा से असम्बद्ध उपाधि
    8.    C — परमात्मा का साक्षात्कार करना
    9.    C — पूजित होकर उनके सामने ही अदृश्य होकर अपने धाम को चले गये
    10.    B — बार-बार विषयों का चिन्तन करने से