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श्री ऋषभ अवतार

(17)

अद्वितीय प्रभु का वचन और ऋषभदेव का दिव्य त्याग

 

राजा नाभि का महल भले ही वैभव और सुख-संपदा से भरा हुआ था, पर उनके हृदय में एक गहरी रिक्तता थी—संतान का अभाव। रात के सन्नाटे में जब महल की रोशनी धीमी पड़ जाती, तब उनके मन की व्याकुलता और भी स्पष्ट हो उठती। रानी मेरुदेवी भी उसी पीड़ा को अपने भीतर समेटे, मौन में ईश्वर से प्रार्थना करती थीं।

एक दिन दोनों ने निश्चय किया—अब केवल प्रयास नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण होगा। उन्होंने समस्त मन, वचन और कर्म से भगवान् यज्ञपुरुष का यज्ञ आरंभ किया। यज्ञ की अग्नि में आहुतियाँ डालते समय उनकी आँखों में केवल एक ही आकांक्षा थी—“हमें आपके समान पुत्र प्राप्त हो।”

उनकी यह निर्मल भक्ति व्यर्थ कैसे जाती?

अचानक यज्ञमंडल दिव्य प्रकाश से भर उठा। स्वयं भगवान् यज्ञपुरुष वहाँ प्रकट हुए। चारों ओर एक अद्भुत शांति और तेज छा गया। सभी उपस्थित जन, ऋषि-मुनि और राजा-रानी, श्रद्धा से सिर झुकाकर प्रभु की आराधना करने लगे।

ऋषियों ने folded hands के साथ प्रभु से प्रार्थना की—

“हमारे यजमान ये राजर्षि नाभि सन्तानको ही परम पुरुषार्थ मानकर आपके ही समान पुत्र पानेके लिये आपकी आराधना कर रहे हैं। आप इनके मनोरथको पूर्ण करें।”

भगवान् मुस्कुराए, पर उनके शब्दों में एक गहन सत्य झलक रहा था—

“मुनियो! मेरे समान तो मैं ही हूँ; क्योंकि मैं अद्वितीय हूँ। तो भी ब्राह्मणोंका वचन मिथ्या नहीं होना चाहिये, द्विजकुल मेरा ही तो मुख है। इसलिये मैं स्वयं ही अपनी अंशकलासे आग्नीध्रनन्दन नाभिके यहाँ आकर अवतार लूँगा; क्योंकि अपने-समान मुझे कोई और दिखायी नहीं देता।”

यह कहकर प्रभु अन्तर्धान हो गए, पर उनके वचन आकाश में गूँजते रहे—एक वचन, जो स्वयं भगवान् ने दिया था।

समय बीता, और वह शुभ घड़ी आई। रानी मेरुदेवी के गर्भ से एक दिव्य बालक का जन्म हुआ। उसका शरीर अलौकिक था—उसके अंगों पर भगवान् विष्णु के वज्र, अंकुश आदि चिन्ह स्पष्ट दिखाई देते थे। जैसे स्वयं धर्म ने मूर्त रूप ले लिया हो।

राजा नाभि ने प्रेम और गर्व से उस बालक का नाम रखा—ऋषभ (श्रेष्ठतम)।

ऋषभदेव बड़े होने लगे, और उनके गुणों की महिमा दूर-दूर तक फैलने लगी। वे केवल एक राजकुमार नहीं थे—वे हर प्राणी के प्रिय बन चुके थे। उनके व्यवहार में करुणा, न्याय और दिव्यता का अद्भुत संगम था।

जब राजा नाभि ने देखा कि उनका पुत्र राज्य संचालन के योग्य हो गया है, तब उन्होंने उसे राजगद्दी सौंप दी। वह क्षण भावनाओं से भरा था—एक पिता का गर्व, और साथ ही संसार से विरक्ति की शुरुआत।

राजा नाभि और रानी मेरुदेवी, दोनों बदरिकाश्रम की ओर चल पड़े—जहाँ उन्होंने शेष जीवन भगवान् की भक्ति में बिताया और अंततः उसी में लीन हो गए।

अब राज्य की बागडोर ऋषभदेव के हाथों में थी।

वे सर्वधर्मज्ञ होते हुए भी, विनम्रता से ब्राह्मणों द्वारा बताई गई विधियों का पालन करते थे। वे अपनी प्रजा को पुत्रवत् प्रेम देते, उनकी हर आवश्यकता का ध्यान रखते।

एक बार देवराज इन्द्र को ईर्ष्या हुई। उन्होंने ऋषभदेव के राज्य में वर्षा रोक दी। चारों ओर सूखा फैल गया। प्रजा चिंतित हो उठी।

पर ऋषभदेव शांत रहे।

उन्होंने अपनी योगमाया का सहारा लिया—और देखते ही देखते उनके राज्य अजनाभखण्ड में घनघोर वर्षा होने लगी। सूखी धरती फिर से हरी-भरी हो गई। यह केवल चमत्कार नहीं था, यह एक संदेश था—सच्चा राजा वही है जो अपनी प्रजा के लिए स्वयं प्रकृति को भी झुका दे।

गृहस्थ धर्म की मर्यादा स्थापित करने के लिए उन्होंने इन्द्र की पुत्री जयन्ती से विवाह किया। उनसे उनके सौ पुत्र हुए, जो उनके समान ही गुणवान थे।

उनमें सबसे बड़े थे—भरत। वे अत्यंत भक्त और योग्य थे।

समय आया, जब ऋषभदेव ने निर्णय लिया—अब संसारिक दायित्वों से आगे बढ़ना है।

उन्होंने भरत को राजगद्दी सौंप दी और स्वयं विरक्ति का मार्ग अपनाया। वे अब राजा नहीं, एक परमहंस बन चुके थे—जो भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की शिक्षा देते हुए संसार में विचरण करते थे।

उनका रूप भी बदल गया—दिगम्बर, पूर्णतः मुक्त, जैसे उन्हें अब किसी बंधन की आवश्यकता ही नहीं।

वे निरंतर परमानंद में रहते, संसार की सीमाओं से परे।

और फिर एक दिन…

कुटकाचल के घने वनों में भयंकर दावाग्नि भड़क उठी। लपटें आकाश को छू रही थीं।

पर ऋषभदेव स्थिर थे।

उनके चेहरे पर कोई भय नहीं, केवल शांति थी—जैसे वे उसी अग्नि में अपने अस्तित्व को समर्पित करने आए हों।

धीरे-धीरे, वे उन लाल-लाल लपटों में विलीन हो गए…

न कोई शोर, न कोई संघर्ष—बस एक दिव्य मिलन।


 

तप की अग्नि में जला, एक निर्मल सा अरमान था,
नाभि के सूने आँगन में, बस प्रभु का ही ध्यान था।
जब उतरे यज्ञ में स्वयं, अद्वितीय वह प्रकाश बन,
धरती पर जन्मे ऋषभ, सत्य और विश्वास बन।

 

राज्य मिला तो प्रेम दिया, प्रजा को अपने प्राण सा,
हर हृदय में बसते थे, जैसे कोई भगवान सा।
इन्द्र की ईर्ष्या भी जब, सूखा बनकर छा गई,
योगमाया की वर्षा से, फिर हरियाली आ गई।

 

त्याग की राह पकड़ ली, जब समय ने पुकार किया,
भरत को देकर राजपाट, जग से मन को पार किया।
दिगम्बर बन घूमे वो, माया से बिल्कुल दूर थे,
हर श्वास में परम शांति, हर क्षण में भरपूर थे।

 

और अंत में अग्नि में भी, मुस्काकर जो खो गया,
वह कोई साधारण नहीं—स्वयं में ही वो हो गया।