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श्री हरि अवतार – गजेन्द्र मोक्ष की मार्मिक कथा

संकट में पुकार और श्रीहरि की करुणा — गजेन्द्र मोक्ष की मार्मिक कथा

 

 

क्षीरसागर की शांत, दिव्य और अलौकिक लहरों के मध्य एक अद्भुत पर्वत स्थित था—त्रिकूटाचल। यह कोई साधारण पर्वत नहीं था; उसकी ऊँचाई मानो आकाश को स्पर्श करती थी और उसकी विशालता चारों दिशाओं में फैली हुई थी। उसकी तलहटी में वरुणदेव का रमणीय उद्यान “ऋतुराज” था, जहाँ सदा वसन्त-सा वातावरण रहता था। विविध रंगों के पुष्प, मधुर गान करते पक्षी, मंद-मंद बहती सुगंधित वायु और कमलों से भरा विशाल सरोवर—यह स्थान स्वर्ग से भी बढ़कर प्रतीत होता था।

 

उसी पर्वत के घने जंगल में एक विशाल गजराज रहता था—गजेन्द्र। वह हाथियों का राजा था—बलवान, गर्वीला और अत्यन्त प्रभावशाली। उसके साथ अनेक हथिनियाँ और हाथियों का बड़ा झुंड रहता था। जब वह चलता, तो धरती काँप उठती; जब वह चिंघाड़ता, तो वन के पशु भय से छिप जाते।

 

एक दिन प्रचण्ड धूप से वन तप रहा था। गजेन्द्र अपने समूह के साथ वन में विचरते-विचरते अत्यन्त प्यासा हो गया। उसके शरीर से मदधारा बह रही थी, आँखों में उन्माद था और कदम भारी हो रहे थे। तभी दूर से कमलों की सुगंध लिए मंद वायु उसके पास पहुँची। उस सुगंध ने मानो उसे पुकारा—“इधर आओ… यहाँ शीतल जल है।”

 

गजेन्द्र उस सुगंध के पीछे-पीछे चलता हुआ उस विशाल सरोवर तक पहुँचा। सरोवर का जल स्वच्छ, ठंडा और कमलों से भरा हुआ था। वह प्रसन्न होकर उसमें उतर गया। उसने पहले जल पिया, फिर स्नान किया, फिर अपनी हथिनियों पर जल छिड़कने लगा। कुछ ही देर में वह परिवार सहित जल में क्रीड़ा करने लगा। उसकी चिंघाड़ से वन गूँज उठा—यह सुख और उन्माद का क्षण था।

 

किन्तु नियति मौन खड़ी देख रही थी।

 

अचानक जल के भीतर से एक भयंकर ग्राह (मगरमच्छ) बिजली की गति से उछला और उसने गजेन्द्र का पैर पकड़ लिया। एक क्षण में आनंद का वातावरण भय में बदल गया। गजेन्द्र ने पूरी शक्ति से पैर छुड़ाने का प्रयास किया। उसकी चिंघाड़ दर्द और क्रोध से भर उठी। हथिनियाँ घबराकर उसे खींचने लगीं। हाथियों का झुंड मिलकर उसे बाहर निकालने का प्रयास करने लगा।

 

परन्तु ग्राह जल का निवासी था—जल में उसका बल बढ़ता जा रहा था, और गजेन्द्र का बल क्षीण होता जा रहा था।

 

कभी गजेन्द्र ग्राह को बाहर खींच लाता, तो कभी ग्राह उसे भीतर खींच ले जाता। संघर्ष चलता रहा—दिन, महीने, वर्ष… यहाँ तक कि हजार वर्ष बीत गये। धीरे-धीरे गजेन्द्र की शक्ति क्षीण हो गयी। शरीर दुर्बल हो गया। आँखों की चमक बुझने लगी। हथिनियाँ भी थककर किनारे खड़ी करुण स्वर में चिंघाड़ने लगीं।

 

उस समय गजेन्द्र के भीतर का गर्व टूट गया। उसे समझ आ गया—

“मेरी शक्ति व्यर्थ है… मेरा परिवार असमर्थ है… अब कोई नहीं बचा सकता।”

 

उसका हृदय करुणा से भर उठा। उसने भीतर से पुकारा—

 

जब टूटे सब सहारे, जब शक्ति भी हार जाए,

तब एक नाम शेष रहे — जो जग को पार लगाए।

 

गजेन्द्र ने बड़ी कठिनाई से अपनी सूँड़ बढ़ाई और सरोवर से एक कमल तोड़ा। काँपती हुई सूँड़ से उसने आकाश की ओर उठाकर पुकारा—

 

“नारायण! जगद्गुरो! भगवन्! मैं आपकी शरण में हूँ… मेरी रक्षा कीजिए!”

 

उसकी पुकार करुण थी, हृदय से निकली थी, पूर्ण समर्पण से भरी थी।

 

कहते हैं—

भक्ति की आर्त पुकार जहाँ सच्चे मन से उठती है,

वहाँ दूरी, दिशा, समय—सब सीमाएँ टूटती हैं।

 

जैसे ही यह पुकार निकली, भगवान श्रीहरि ने उसे सुन लिया। वे तत्काल गरुड़ पर आरूढ़ होकर क्षीरसागर से चल पड़े। उनकी गति इतनी तीव्र थी कि देवता भी विस्मित रह गये। कुछ ही क्षणों में वे उस सरोवर के ऊपर प्रकट हो गये।

 

भगवान ने आते ही गजेन्द्र को देखा—दुर्बल, पीड़ित, परन्तु समर्पित। उन्होंने बिना विलम्ब किए सुदर्शन चक्र चलाया। चक्र ने ग्राह का मुँह चीर दिया। उसी क्षण गजेन्द्र मुक्त हो गया।

 

भगवान ने उसे स्पर्श किया—और जैसे ही भगवान का दिव्य स्पर्श हुआ, गजेन्द्र का अज्ञान समाप्त हो गया। उसका हाथी शरीर छूट गया और वह दिव्य चतुर्भुज स्वरूप में प्रकट हुआ। उसे सारूप्य मुक्ति प्राप्त हुई। उसका चेहरा प्रसन्न था—अब न भय था, न पीड़ा।

 

गजेन्द्र ने कृतज्ञतापूर्वक विनत होकर भगवान की स्तुति की—

 

जो संकट में याद करे, वह हरि दौड़े आते हैं,

भक्त की एक पुकार पर, बंधन सारे काटे जाते हैं।

 

भगवान श्रीहरि ने उसे अपना पार्षद बना लिया और अपने धाम ले गये। सरोवर पुनः शांत हो गया—पर उस दिन संसार को एक अमर संदेश मिल गया—

 

जब अहंकार टूटता है, तब भक्ति जन्म लेती है।

जब सब सहारे छूट जाते हैं, तब श्रीहरि मिलते हैं।

 

*Quiz*

प्रश्न 1. गजेन्द्र को ग्राह ने कहाँ पकड़ा था?
A. समुद्र किनारे
B. गंगा तट पर
C. त्रिकूट पर्वत के सरोवर में
D. मंदाकिनी नदी में

प्रश्न 2. त्रिकूट पर्वत किस स्थान पर स्थित बताया गया है?
A. हिमालय पर
B. क्षीरसागर में
C. मेरु पर्वत पर
D. विन्ध्याचल में

प्रश्न 3. त्रिकूट पर्वत की ऊँचाई कितनी बताई गई है?
A. पाँच हजार योजन
B. बीस हजार योजन
C. एक हजार योजन
D. दस हजार योजन

प्रश्न 4. त्रिकूट पर्वत की तराई में किसका उद्यान था?
A. वरुण का
B. इन्द्र का
C. यम का
D. कुबेर का

प्रश्न 5. गजेन्द्र सरोवर में क्यों पहुँचा था?
A. शिकार करने के लिए
B. विश्राम करने के लिए
C. युद्ध करने के लिए
D. जल पीने और स्नान करने के लिए

प्रश्न 6. ग्राह ने गजेन्द्र का कौन-सा अंग पकड़ा?
A. कान
B. सूँड़
C. पैर
D. दाँत

प्रश्न 7. गजेन्द्र और ग्राह का संघर्ष कितने समय तक चला?
A. एक हजार वर्ष
B. दस हजार वर्ष
C. पाँच सौ वर्ष
D. सौ वर्ष

प्रश्न 8. संकट में पड़कर गजेन्द्र ने किसकी शरण ली?
A. शिव
B. इन्द्र
C. ब्रह्मा
D. नारायण

प्रश्न 9. भगवान ने ग्राह का वध किससे किया?
A. धनुष-बाण से
B. तलवार से
C. गदा से
D. चक्र से

प्रश्न 10. भगवान के स्पर्श से गजेन्द्र को क्या प्राप्त हुआ?
A. राजपद
B. सारूप्य मुक्ति
C. स्वर्गलोक
D. धन-सम्पत्ति