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श्रृंगवेरपुर की जागरण-रात्रि — निषादराज और लक्ष्मण की करुण संवाद-रात्रि

श्रृंगवेरपुर की जागरण-रात्रि — निषादराज और लक्ष्मण की करुण संवाद-रात्रि

 

गंगा के पावन तट पर रात्रि उतर चुकी थी। वन की नीरवता चारों ओर फैल गई थी। आकाश में असंख्य तारे टिमटिमा रहे थे, मानो वे भी इस अद्भुत दृश्य के साक्षी बनना चाहते हों। धरती पर कुश और तिनकों की साधारण शय्या बिछी थी, जिस पर जगत के पालनहार श्रीराम और जनकनंदिनी सीता विश्राम कर रहे थे।

किन्तु उस रात्रि सबकी आँखों में नींद नहीं थी।

श्रीराम के चरणों का सेवक लक्ष्मण हाथ में धनुष लिए प्रहरी की भाँति खड़े थे। उनकी दृष्टि चारों ओर घूम रही थी, पर उनका मन कहीं और भटक रहा था। उनके भीतर एक तूफान उमड़ रहा था—भाई के प्रति प्रेम का, पिता की चिंता का और अयोध्या के भविष्य का।

निषादराज गुह कुछ देर तक लक्ष्मण को देखते रहे। उनके हृदय में करुणा उमड़ पड़ी। उन्होंने सोचा—“जिस राजकुमार ने जीवनभर सुखों में समय बिताया, वह आज अपने बड़े भाई की सेवा में रातभर जाग रहा है।”

प्रेम और सम्मान से भरे हुए गुह धीरे-धीरे लक्ष्मण के समीप आए। उन्होंने अत्यंत विनम्रता से कहा—

“राजकुमार! आपके लिए आरामदायक शय्या तैयार है। कृपया कुछ समय विश्राम कर लीजिए। आपके शरीर को भी आराम की आवश्यकता है।”

गुह के स्वर में केवल आग्रह नहीं था, उसमें वात्सल्य भी था। वे आगे बोले—

“हम वनवासी लोग कष्टों के अभ्यस्त हैं। कठोर भूमि, जंगल की रातें और जागरण हमारे जीवन का भाग हैं। परंतु आप तो राजमहलों में पले-बढ़े हैं। यह कठोर जीवन आपके लिए नहीं है। आप निश्चिंत होकर सो जाइए। मैं और मेरे साथी पूरी रात जागकर श्रीराम और सीताजी की रक्षा करेंगे।”

यह कहते-कहते गुह का हृदय और भी द्रवित हो उठा।

उन्होंने अपने दोनों हाथ जोड़कर कहा—

“मैं सत्य की शपथ लेकर कहता हूँ कि इस पृथ्वी पर श्रीराम से बढ़कर मुझे कोई प्रिय नहीं है। मेरे लिए वे केवल अयोध्या के राजकुमार नहीं हैं, वे मेरे जीवन का आधार हैं।”

गुह की आँखों में श्रद्धा चमक उठी।

“मुझे जो यश मिला है, जो सम्मान मिला है, जो धर्म और सुख प्राप्त हुए हैं, वे सब श्रीराम की कृपा से ही हैं। मेरा जीवन उन्हीं के अनुग्रह से धन्य हुआ है।”

फिर उनका स्वर दृढ़ हो गया।

“जब तक मेरे शरीर में प्राण हैं, तब तक मैं अपने बंधु-बांधवों के साथ धनुष लेकर श्रीराम और सीताजी की रक्षा करूँगा। यदि कोई शत्रु इस वन में आने का साहस करेगा तो पहले उसे हमसे सामना करना होगा।”

गुह को अपने प्रदेश पर पूर्ण विश्वास था।

“इस वन का प्रत्येक वृक्ष, प्रत्येक पगडंडी और प्रत्येक मार्ग मुझे ज्ञात है। यहाँ कोई भी शत्रु हमसे छिप नहीं सकता। यदि कोई विशाल सेना भी आ जाए, तो हम उसे पराजित कर सकते हैं।”

गुह के इन प्रेमपूर्ण शब्दों को सुनकर लक्ष्मण का हृदय कृतज्ञता से भर गया।

उन्होंने स्नेह से कहा—

“निषादराज! आपका प्रेम और आपकी निष्ठा हमारे लिए अमूल्य है। जब आप जैसे धर्मनिष्ठ और समर्पित मित्र हमारे साथ हैं, तब हमें किसी प्रकार का भय नहीं हो सकता।”

किन्तु यह कहते ही लक्ष्मण की दृष्टि उस ओर चली गई जहाँ श्रीराम और सीता धरती पर सो रहे थे।

उनकी आँखें भर आईं।

“पर बताइए, जब अयोध्या के युवराज, मेरे प्रभु श्रीराम, अपनी पत्नी के साथ इस कठोर भूमि पर शयन कर रहे हैं, तब मैं नरम शय्या पर कैसे सो सकता हूँ? जब वे वनवासी बनकर कष्ट सह रहे हैं, तब मैं स्वादिष्ट भोजन कैसे ग्रहण करूँ? जब उनका जीवन तपस्या बन गया है, तब मेरे लिए किसी भी सुख का भोग करना कैसे संभव है?”

लक्ष्मण का हृदय वेदना से भर उठा।

उन्होंने सोते हुए श्रीराम को देखा और कहा—

“वे श्रीराम, जिनके पराक्रम का सामना देवता और असुर भी नहीं कर सकते, आज तिनकों की शय्या पर निश्चिंत होकर सो रहे हैं। संसार उनकी शक्ति को जानता है, पर आज संसार उनके त्याग को नहीं देख रहा।”

इसके बाद लक्ष्मण की स्मृतियाँ अयोध्या की ओर दौड़ पड़ीं।

उन्हें महाराज दशरथ याद आए।

उनकी आँखों के सामने वह दृश्य उभर आया जब वर्षों की तपस्या, यज्ञ और प्रार्थनाओं के बाद राजा दशरथ को श्रीराम जैसे पुत्र प्राप्त हुए थे।

गले में रुद्ध स्वर लेकर लक्ष्मण बोले—

“पिताश्री ने कितनी साधनाएँ की थीं। कितने यज्ञ किए थे। कितनी प्रार्थनाएँ की थीं। तब कहीं जाकर उन्हें श्रीराम जैसे गुणवान पुत्र प्राप्त हुए थे।”

उन्होंने गहरी साँस ली।

“अब वही श्रीराम उनसे दूर वन में हैं। मैं नहीं जानता कि यह वियोग मेरे पिता कैसे सह पाएँगे। मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि उनका जीवन अब अधिक समय तक नहीं टिक सकेगा।”

रात्रि और अधिक गहरी हो गई।

लक्ष्मण की चिंता अब अयोध्या के राजमहल तक पहुँच गई।

उन्होंने कल्पना की—

कौसल्या विलाप कर रही होंगी।

राजमहल की स्त्रियाँ रो-रोकर थक गई होंगी।

हर ओर करुण पुकार गूँज रही होगी।

शायद अब आँसू भी सूख चुके होंगे।

महल के प्रांगण, जहाँ कभी उत्सवों का संगीत गूँजता था, अब शोक की निस्तब्धता में डूबे होंगे।

लक्ष्मण का स्वर काँप उठा।

“मैं नहीं जानता कि माता कौसल्या, पिता दशरथ और मेरी माता सुमित्रा आज की रात जीवित भी रह पाएँगे या नहीं।”

माता सुमित्रा का स्मरण आते ही उनका हृदय और व्याकुल हो गया।

“संभव है कि माता सुमित्रा शत्रुघ्न के सहारे जीवित रह जाएँ। पर यदि माता कौसल्या श्रीराम के वियोग में टूट गईं, तो वह हमारे लिए असहनीय दुःख होगा।”

फिर लक्ष्मण को अयोध्या का वैभव याद आया।

वह अयोध्या जहाँ हर गली में आनंद था।

जहाँ प्रत्येक नागरिक के हृदय में श्रीराम बसते थे।

जहाँ धर्म और प्रेम का राज्य था।

उन्होंने दुःखी होकर कहा—

“जिस अयोध्या की आत्मा श्रीराम हैं, वह उनके बिना कैसे जीवित रह सकती है? यदि पिता दशरथ का भी निधन हो गया, तो वह नगरी शोक के भार से टूट जाएगी।”

लक्ष्मण का मन बार-बार पिता की ओर लौट रहा था।

“जो पिता अपने प्राणों से अधिक प्रेम श्रीराम से करते हैं, वे उन्हें देखे बिना कैसे जीवित रहेंगे? उनके प्राण शरीर में कैसे टिकेंगे?”

यह सोचते-सोचते लक्ष्मण का कंठ भर आया।

“यदि पिता नहीं रहे, तो माता कौसल्या भी जीवित नहीं रह पाएँगी। और यदि कौसल्या माता चली गईं, तो मेरी माता सुमित्रा भी उस दुःख को सहन नहीं कर पाएँगी।”

अब लक्ष्मण को दशरथ का वह अधूरा स्वप्न याद आया—

श्रीराम का राज्याभिषेक।

उन्होंने दुःख से कहा—

“पिताजी का जीवनभर का सबसे बड़ा मनोरथ था कि वे श्रीराम को सिंहासन पर बैठा हुआ देखें। अब वह इच्छा अधूरी रह गई है। मुझे भय है कि वे ‘मेरा सब कुछ नष्ट हो गया’ कहते हुए प्राण त्याग देंगे।”

इन शब्दों के साथ लक्ष्मण की आँखों से अश्रुधारा बह निकली।

फिर उनके मन में एक और पीड़ा उठी—

“जो लोग उस समय उपस्थित होंगे और मेरे पिता के अंतिम संस्कार का कर्तव्य निभाएँगे, वे हमसे अधिक भाग्यशाली होंगे; क्योंकि हम तो अपने पिता के अंतिम दर्शन से भी वंचित रह जाएँगे।”

इसके बाद लक्ष्मण की स्मृतियों में अयोध्या का संपूर्ण वैभव जीवित हो उठा—

चौड़े राजमार्ग…

भव्य राजमहल…

देवमंदिर…

उद्यान…

फूलों की वाटिकाएँ…

रथों और हाथियों की चहल-पहल…

वाद्यों की मधुर ध्वनियाँ…

उत्सवों की रौनक…

और आनंद से भरी प्रजा…

उन्होंने आह भरते हुए कहा—

“जो लोग उस अयोध्या में विचरेंगे, वे वास्तव में भाग्यशाली होंगे।”

फिर उनके मन में एक प्रश्न बार-बार उठने लगा—

“क्या हमारे लौटने तक पिताश्री जीवित रहेंगे?”

“क्या चौदह वर्षों के बाद हम उन्हें फिर देख पाएँगे?”

“क्या वनवास समाप्त होने पर हम सब सकुशल अयोध्या लौट सकेंगे?”

“क्या एक दिन फिर अयोध्या के द्वार श्रीराम का स्वागत करेंगे?”

इन प्रश्नों का उत्तर किसी के पास नहीं था।

रात्रि बीतती रही।

गंगा बहती रही।

तारे चमकते रहे।

पर लक्ष्मण की आँखों में नींद नहीं आई।

वे पूरी रात अपने भाई की रक्षा करते रहे और अयोध्या की चिंता में जलते रहे।

उनके शब्द सुनकर निषादराज गुह का हृदय भी फट पड़ा।

जो गुह अभी तक साहस की बातें कर रहे थे, वे अब स्वयं आँसुओं में डूब गए।

उनकी आँखों से अश्रु अविरल बहने लगे।

वे ऐसे रो रहे थे जैसे कोई विशाल गजराज तीव्र ज्वर से पीड़ित होकर कराह रहा हो।

उस रात्रि गंगा तट पर केवल दो व्यक्ति नहीं जाग रहे थे—

एक जाग रहा था अपने प्रभु के प्रेम में,

और दूसरा जाग रहा था अपने मित्र के दुःख में।

वह रात्रि केवल वनवास की एक रात नहीं थी; वह प्रेम, त्याग, मित्रता, भक्ति और विरह की ऐसी अमर रात्रि थी, जिसकी करुणा आज भी रामकथा के प्रत्येक श्रोता के हृदय को भिगो देती है।