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सगरवंश की महागाथा: तप, वरदान और भाग्य का आरम्भ
जब महर्षि विश्वामित्र ने अपनी मधुर और गम्भीर वाणी में दूसरी कथा कहना आरम्भ किया, तो श्रीराम अत्यन्त ध्यान से सुनने लगे। उनके शब्दों में केवल घटनाएँ ही नहीं, बल्कि समय की धड़कन और भाग्य का संकेत भी था।
उन्होंने कहा—हे राम! बहुत समय पहले अयोध्या नगरी में राजा सगर नाम के एक प्रतापी और धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। वे न्यायप्रिय, सत्यनिष्ठ और प्रजावत्सल थे। उनके राज्य में सब कुछ था—समृद्धि, वैभव, सम्मान—किन्तु उनके हृदय में एक गहरी पीड़ा थी। उनके कोई संतान नहीं थी। राजमहल की विशालता उन्हें सूनी लगती, क्योंकि वहाँ बाल-हास्य की ध्वनि नहीं गूँजती थी। पुत्र-प्राप्ति की उत्कट इच्छा उनके मन को हर क्षण व्याकुल रखती थी।
राजा की दो रानियाँ थीं। बड़ी रानी थीं विदर्भराज की पुत्री केशिनी—धर्मपरायण, सत्यवादिनी और अत्यन्त सौम्य स्वभाव की। उनका चरित्र निर्मल चन्द्रमा की भाँति उज्ज्वल था। दूसरी रानी थीं सुमति—महान् कुल में उत्पन्न, महर्षि कश्यप के वंश से सम्बन्धित और गरुड़ की बहन। वे भी तेजस्विनी और पतिव्रता थीं। दोनों रानियाँ राजा के दुःख को समझती थीं और स्वयं भी संतान-प्राप्ति के लिए आतुर थीं।
अन्ततः राजा सगर ने निश्चय किया कि वे केवल इच्छा से नहीं, बल्कि तप और साधना से भगवान को प्रसन्न करेंगे। वे दोनों रानियों को साथ लेकर हिमालय की ओर प्रस्थान कर गये। वहाँ भृगुप्रस्रवण नामक पवित्र शिखर पर उन्होंने कठोर तपस्या आरम्भ की। हिमालय की शीतल वायु, ऊँचे-ऊँचे शिखर और एकांत वातावरण में वे सौ वर्षों तक अटल संकल्प के साथ तप करते रहे। यह केवल संतान की कामना नहीं थी, यह एक वंश की मर्यादा और भविष्य की रक्षा का प्रयास था।
उनकी दीर्घ तपस्या से प्रसन्न होकर महान् तपस्वी महर्षि भृगु प्रकट हुए। उनका तेज ऐसा था मानो अग्नि स्वयं देह धारण कर सामने खड़ी हो। उन्होंने राजा सगर को आशीर्वाद दिया—हे निष्पाप नरेश! तुम्हें अनेक पुत्र प्राप्त होंगे। तुम्हारा नाम इस संसार में अमिट कीर्ति के साथ स्मरण किया जाएगा।
फिर उन्होंने एक अद्भुत वरदान सुनाया—तुम्हारी एक पत्नी एक ही पुत्र को जन्म देगी, जो तुम्हारे वंश को आगे बढ़ाएगा। दूसरी पत्नी साठ हजार पुत्रों की माता बनेगी। यह सुनते ही दोनों रानियों के हृदय में आश्चर्य और उत्सुकता की लहर दौड़ गई। उन्होंने विनम्रता से हाथ जोड़कर पूछा—हे ब्रह्मन्! कृपया स्पष्ट करें कि किसे कौन-सा वर प्राप्त होगा?
महर्षि भृगु ने प्रेमपूर्वक कहा—देवियो! तुम स्वयं अपनी इच्छा प्रकट करो। क्या तुममें से कोई एक ऐसा पुत्र चाहती है जो वंश को स्थिरता से आगे बढ़ाए, या कोई अनेक बलवान और यशस्वी पुत्रों की माता बनना चाहेगी?
यह सुनकर केशिनी ने शांत स्वर में एक ही पुत्र का वर माँगा—ऐसा पुत्र जो वंश का दीपक बने और मर्यादा को आगे बढ़ाए। उनके निर्णय में गम्भीरता और दूरदर्शिता थी। दूसरी ओर सुमति ने उत्साहपूर्वक साठ हजार पराक्रमी और यशस्वी पुत्रों का वर स्वीकार किया। उनके मन में वैभव और विस्तार की आकांक्षा थी।
वरदान पाकर राजा सगर और उनकी रानियाँ अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने महर्षि की परिक्रमा की, उनके चरणों में प्रणाम किया और कृतज्ञ हृदय से अयोध्या लौट आये। समय बीतता गया और वह शुभ घड़ी आई जब केशिनी ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। उसका नाम रखा गया—असमञ्ज। राजा का हृदय हर्ष से भर उठा; वर्षों की तपस्या का फल उन्हें मिल गया था।
कुछ समय बाद सुमति के गर्भ से एक विचित्र गर्भपिण्ड उत्पन्न हुआ, जो तूँबी के आकार का था। जब उसे खोला गया, तो उसमें से साठ हजार बालक प्रकट हुए। यह दृश्य अद्भुत और अलौकिक था। उन सभी बालकों को घी से भरे घड़ों में सुरक्षित रखकर धायों ने उनका पालन-पोषण किया। धीरे-धीरे वे बड़े हुए, युवावस्था को प्राप्त हुए और उनके रूप-तेज से समूचा राजमहल आलोकित हो उठा।
किन्तु भाग्य का खेल विचित्र होता है। राजा सगर का ज्येष्ठ पुत्र असमञ्ज बड़ा होकर विचित्र स्वभाव का हो गया। वह नगर के बालकों को पकड़कर सरयू नदी में फेंक देता और जब वे डूबने लगते, तो निर्दय होकर हँसता। प्रजा भयभीत और व्यथित हो उठी। पिता का हृदय टूट गया—जिस पुत्र के लिए उन्होंने तप किया था, वही प्रजाहित के विरुद्ध आचरण कर रहा था।
अन्ततः धर्म को सर्वोपरि मानते हुए राजा सगर ने कठोर निर्णय लिया। उन्होंने अपने ही पुत्र को नगर से निकाल दिया। यह निर्णय एक पिता के लिए अत्यन्त पीड़ादायक था, परन्तु एक राजा के लिए आवश्यक।
असमञ्ज का एक पुत्र था—अंशुमान। वह अपने पिता के विपरीत अत्यन्त वीर, विनम्र और मधुरभाषी था। उसके व्यवहार से सब प्रसन्न रहते। मानो प्रकृति ने असमञ्ज की कठोरता के बाद अंशुमान के रूप में मधुरता का उपहार दिया हो।
समय बीतने पर राजा सगर के मन में एक महान् संकल्प उदित हुआ—वे एक भव्य यज्ञ करेंगे। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि अपनी कीर्ति और धर्म की स्थापना का महत्त्वपूर्ण प्रयास था। उन्होंने अपने आचार्यों और वेदज्ञ ब्राह्मणों के साथ मिलकर यज्ञ की तैयारियाँ आरम्भ कर दीं। पूरे राज्य में उत्साह का वातावरण छा गया। वेद-मंत्रों की ध्वनि, यज्ञ की वेदियों की रचना और धर्म का उन्नत संकल्प—सब मिलकर एक नये अध्याय की भूमिका रच रहे थे।
इस प्रकार तप, वरदान, सुख-दुःख और संकल्प की यह कथा आगे चलकर एक महान् घटना का आधार बनने वाली थी—जिससे गंगावतरण जैसी अद्भुत लीला का मार्ग प्रशस्त होगा।