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समुद्र-मन्थन की दिव्य और रोमांचक कथा — भगवान कच्छप (कमठ) अवतार
एक समय तीनों लोकों में बड़ी विचित्र घटना घटी। देवताओं का वैभव, उनकी शक्ति और उनका तेज धीरे-धीरे समाप्त होने लगा। इसका कारण था महान ऋषि दुर्वासा का क्रोधपूर्ण शाप।
एक बार ऋषि दुर्वासा ने दिव्य पुष्पमाला इन्द्र को दी थी। परन्तु इन्द्र ने उसे उचित सम्मान नहीं दिया। इससे क्रोधित होकर दुर्वासा ने शाप दे दिया—
“इन्द्र! तुम्हारा ऐश्वर्य और लक्ष्मी तुम्हें छोड़ देगी।”
उस शाप का परिणाम भयंकर हुआ।
देवताओं की शक्ति क्षीण हो गयी। स्वर्ग का वैभव नष्ट होने लगा। असुरों ने आक्रमण कर दिया और देवताओं को पराजय का भय सताने लगा।
इन्द्र अत्यन्त चिंतित होकर अन्य देवताओं के साथ ब्रह्मा के पास पहुँचे।
इन्द्र ने व्याकुल स्वर में कहा—
इन्द्र बोले
“हे प्रजापति! हम सब बहुत संकट में हैं। दुर्वासा के शाप से हमारा तेज नष्ट हो गया है। असुर हमें पराजित कर देंगे। कृपा करके हमारा उद्धार कीजिये।”
ब्रह्माजी ने कुछ क्षण ध्यान किया और बोले—
ब्रह्मा बोले
“हे देवताओं! इस संकट से केवल एक ही शक्ति तुम्हारी रक्षा कर सकती है—वह हैं श्रीहरि। चलो, हम सब उनके धाम चलकर उनसे सहायता माँगें।”
सब देवता ब्रह्माजी के साथ भगवान विष्णु के धाम पहुँचे। वहाँ उन्होंने अत्यन्त भक्ति से भगवान की स्तुति की।
कुछ ही क्षणों में दिव्य प्रकाश से सम्पूर्ण आकाश भर गया। भगवान विष्णु प्रकट हुए। उनके दर्शन से देवताओं के मन में आशा की किरण जाग उठी।
भगवान मुस्कुराते हुए बोले—
भगवान विष्णु बोले
“हे देवताओं! तुम्हारी दुर्दशा मुझे ज्ञात है। इसका उपाय भी है।
तुम दैत्यों से सन्धि कर लो और सब मिलकर क्षीरसागर का मन्थन करो।
मन्दराचल पर्वत को मथानी और वासुकी नाग को रस्सी बनाओ।
मन्थन से पहले भयंकर विष निकलेगा—उससे मत डरना।
फिर अनेक अद्भुत रत्न निकलेंगे—उनका लोभ मत करना।
अन्त में अमृत निकलेगा। मैं ऐसी युक्ति करूँगा कि अमृत तुम्हें ही प्राप्त होगा।”
देवताओं ने भगवान की आज्ञा स्वीकार कर ली।
दैत्यों से सन्धि
देवता दैत्यों के राजा बली के पास गये।
इन्द्र ने विनम्रता से कहा—
इन्द्र बोले
“हे बलिराज! हम सब मिलकर समुद्र का मन्थन करें। उसमें से अमृत निकलेगा, जिससे हम सब अमर हो जायेंगे।”
अमृत का नाम सुनते ही दैत्यों की आँखें चमक उठीं।
बलि बोला
“ठीक है इन्द्र! हम यह कार्य साथ-साथ करेंगे।”
मन्दराचल पर्वत की कठिन यात्रा
अब देवता और दैत्य मिलकर विशाल मन्दराचल पर्वत को उखाड़कर समुद्र की ओर ले चले।
परन्तु वह पर्वत इतना भारी था कि चलते-चलते सब थक गये। कई देवता और दैत्य उसके नीचे दबने लगे।
तभी भगवान विष्णु प्रकट हुए। उन्होंने सहज भाव से पर्वत को उठा लिया और अपने वाहन गरुड़ पर रख दिया।
गरुड़ आकाश में उड़ते हुए मन्दराचल को क्षीरसागर के तट तक ले गये।
यह देखकर देवता और दैत्य विस्मित रह गये।
जहाँ संकट से सब हार जाएँ,
वहाँ भगवान स्वयं सहारा बन जाएँ।
समुद्र मन्थन आरम्भ
अब वासुकी नाग को रस्सी बनाया गया।
देवता उसकी पूँछ की ओर और दैत्य उसके मुख की ओर खड़े हो गये।
मन्थन शुरू हुआ।
परन्तु अचानक एक बड़ी समस्या आ गयी।
मन्दराचल पर्वत नीचे आधार न होने के कारण धीरे-धीरे समुद्र में डूबने लगा।
यह देखकर सब घबरा गये।
देवता बोले—
देवताओं ने कहा
“अब क्या होगा? हमारा सारा प्रयास व्यर्थ हो गया!”
तभी भगवान विष्णु मुस्कुराए और बोले—
भगवान बोले
“लगता है हमने एक भूल कर दी है। किसी भी कार्य के आरम्भ में गणेश की पूजा करनी चाहिए। हम सबने यह मर्यादा भुला दी है।”
सबने तुरंत गणेशजी की पूजा की।
भगवान का अद्भुत कच्छप अवतार
उसी समय भगवान ने एक अद्भुत लीला की।
उन्होंने एक विशाल कच्छप (कछुए) का रूप धारण किया।
उनका शरीर इतना बड़ा था कि उसकी पीठ एक लाख योजन चौड़ी थी।
वे समुद्र के भीतर गये और अपनी विशाल पीठ पर मन्दराचल पर्वत को उठा लिया।
अब पर्वत स्थिर हो गया।
भगवान एक साथ कई रूपों में लीला कर रहे थे—
देवता और दैत्य फिर उत्साह से मन्थन करने लगे।
हलाहल विष का प्रकट होना
लम्बे समय तक मन्थन चलता रहा।
अचानक समुद्र से भयंकर हलाहल कालकूट विष निकला।
उस विष की ज्वाला से तीनों लोक जलने लगे।
देवता और दैत्य भयभीत हो गये।
सबने पुकारा—
“हाय! अब तो सृष्टि नष्ट हो जाएगी!”
तब करुणामय शिव प्रकट हुए।
उन्होंने विष को अपने हाथों में लिया और बिना झिझक उसे पी लिया।
विष उनके कंठ में रुक गया और उनका कंठ नीला हो गया। तभी से वे नीलकंठ कहलाये।
दूसरों की रक्षा के लिये जो विष पी जाए,
वही सच्चा महादेव कहलाए।
चौदह रत्नों का प्रकट होना
इसके बाद समुद्र से एक-एक करके अद्भुत रत्न निकलने लगे—
सब देवता और दैत्य आश्चर्य से यह अद्भुत दृश्य देख रहे थे।
अमृत कलश और मोहिनी लीला
अन्त में समुद्र से धन्वंतरि प्रकट हुए। उनके हाथ में अमृत से भरा कलश था।
अमृत देखते ही दैत्यों ने झपटकर कलश छीन लिया।
देवता उदास हो गये।
तभी भगवान ने अद्भुत रूप धारण किया—
वह था मोहक स्त्री रूप मोहिनी।
मोहिनी इतनी सुन्दर थी कि दैत्य उसे देखते ही मोहित हो गये।
मोहिनी बोली
“तुम लोग झगड़ा मत करो। मैं सबको बराबर अमृत बाँट दूँगी।”
दैत्य मान गये।
मोहिनी ने चतुराई से देवताओं को अमृत पिला दिया।
राहु की चाल
देवताओं की पंक्ति में एक दैत्य राहु भी देवता का भेष बनाकर बैठ गया।
जैसे ही उसे अमृत मिलने वाला था, सूर्य और चन्द्रमा ने पहचान लिया।
उन्होंने तुरंत भगवान को संकेत दिया।
क्षण भर में भगवान ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट दिया।
परन्तु अमृत की एक बूंद उसके मुँह में पहुँच चुकी थी, इसलिए उसका सिर अमर हो गया और ग्रह बन गया।
तभी से राहु सूर्य और चन्द्रमा से बदला लेने के लिये समय-समय पर उन्हें ग्रसने की कोशिश करता है, जिसे ग्रहण कहते हैं।
देवताओं की विजय
अब देवताओं ने अमृत पी लिया था।
उनकी शक्ति लौट आई।
इसके बाद देवताओं और दैत्यों में युद्ध हुआ और इस बार देवताओं की विजय हुई।
जहाँ भगवान का साथ होता है,
वहाँ असम्भव भी सम्भव हो जाता है।
जो उनका आश्रय ले लेता है,
उसका हर संकट मिट जाता है।