Best Historical and Knowledgeable Content here... Know More.

  • +91 8005792734

    Contact Us

  • amita2903.aa@gmail.com

    Support Email

  • Jhunjhunu, Rajasthan

    Address

सात रातों की व्याकुल यात्रा — भरत का अयोध्या लौटना

(71A)

सात रातों की व्याकुल यात्रा — भरत का अयोध्या लौटना

राजगृह से विदा लेने का वह क्षण अत्यन्त गंभीर था। भरत के मन में एक अनजानी बेचैनी घर कर चुकी थी। उन्हें बार-बार वही भयावह स्वप्न याद आ रहा था, जिसने उनके हृदय को अशान्त कर दिया था। वे नहीं जानते थे कि अयोध्या में क्या घटित हो चुका है, परन्तु उनका मन किसी अदृश्य संकट की आहट सुन रहा था। इसलिए उन्होंने तनिक भी विलम्ब न किया। रथ तैयार हुआ, सेना संगठित हुई और पराक्रमी भरत पूर्व दिशा की ओर तीव्र गति से निकल पड़े।

मार्ग में सबसे पहले सुदामा नदी मिली। उसकी शांत लहरें मानो यात्रियों का स्वागत कर रही थीं, किन्तु भरत की आँखें उस सौन्दर्य को देख ही नहीं पा रही थीं। उनका मन केवल अयोध्या की ओर भाग रहा था। नदी पार कर वे आगे बढ़े और शीघ्र ही विशाल ह्रादिनी नदी के तट पर पहुँचे। उसका विस्तृत पाट दूर-दूर तक फैला था। बड़ी कठिनाई से उसे पार करने के बाद वे पश्चिम की ओर बहने वाली महान शतद्रु नदी तक पहुँचे। उसके तीव्र प्रवाह ने सैनिकों की परीक्षा ली, परन्तु किसी के मन में रुकने का विचार नहीं आया। सभी जानते थे कि उनके स्वामी के हृदय में कैसी व्याकुलता है।

आगे ऐलधान नामक ग्राम आया। वहाँ की नदी पार कर यात्रा और भी कठिन हो गई। वे अपरपर्वत प्रदेश में पहुँचे, जहाँ शिला नाम की अद्भुत नदी बहती थी। लोगों का विश्वास था कि उसके जल में पड़ी वस्तुएँ पत्थर जैसी कठोर हो जाती हैं। सैनिक उस विचित्र नदी को कौतूहल से देखते रहे, पर भरत की दृष्टि उस पर भी नहीं ठहरी। उनका मन केवल अयोध्या की ओर दौड़ रहा था।

इसके बाद वे शल्यकर्षण प्रदेश पहुँचे। यह स्थान अपनी दुर्लभ औषधियों के लिए प्रसिद्ध था, जिनसे शरीर में धँसे काँटे भी सरलता से निकाल दिए जाते थे। मानो प्रकृति स्वयं यहाँ पीड़ा हरने का उपाय लेकर बैठी हो। परन्तु भरत के हृदय में जो अदृश्य काँटा चुभा हुआ था, उसे निकालने की औषधि संसार में कहीं नहीं थी।

यात्रा आगे बढ़ी। उन्होंने शिलावहा नदी के निर्मल जल का दर्शन किया। उसकी प्रबल धारा विशाल चट्टानों तक को बहा ले जाती थी। भरत ने क्षणभर उसके प्रवाह को देखा और मन-ही-मन सोचा—“यदि यह नदी पर्वतों को बहा सकती है, तो क्या मेरे हृदय में उठ रही आशंकाओं को भी बहा सकती है?” किन्तु उत्तर मौन था। वे फिर आगे बढ़ चले।

ऊँचे-ऊँचे पर्वतों को पार करते हुए वे चैत्ररथ वन पहुँचे। वृक्षों पर नवपल्लव लहराते थे, रंग-बिरंगे पुष्प सुगन्ध बिखेर रहे थे, पक्षियों का मधुर कलरव वातावरण को आनन्दमय बना रहा था। सामान्य समय होता तो भरत इस अद्भुत वन की शोभा देखकर प्रसन्न हो उठते, किन्तु उस दिन उनके लिए यह सब जैसे अस्तित्वहीन था। उनका मन हर क्षण यही पूछ रहा था—“अयोध्या में सब कुशल तो है?”

वन पार कर वे उस स्थान पर पहुँचे जहाँ पश्चिम की ओर बहने वाली सरस्वती और गंगा की एक धारा का संगम था। दोनों पवित्र नदियों को प्रणाम कर वे आगे बढ़े। वीरमत्स्य देश की उत्तरी सीमा को पार करते हुए वे भारुण्डवन में पहुँचे। यह वन अत्यन्त विशाल और घना था। ऊँचे वृक्षों की छाया में सूर्य का प्रकाश भी भूमि तक कठिनाई से पहुँच पाता था। सैनिकों के रथों की ध्वनि उस निस्तब्ध वन में दूर-दूर तक गूँज रही थी।

कुछ दूरी पर कुलिङ्गा नदी मिली। पर्वतों के बीच से निकलती उसकी प्रचण्ड धारा चट्टानों से टकराकर गर्जना कर रही थी। उसके कलकल नाद में मानो प्रकृति का अद्भुत संगीत था। बड़ी सावधानी से उसे पार कर सब लोग यमुना के तट पर पहुँचे।

यहाँ पहली बार भरत ने सेना को विश्राम देने का आदेश दिया। लम्बी यात्रा से घोड़े अत्यन्त थक चुके थे। उन्हें नदी में स्नान कराया गया। उनके शरीर पर शीतल जल डाला गया, छाया में बाँधा गया और ताज़ी घास खिलाई गई। सैनिकों ने भी जल पिया और थोड़ी देर विश्राम किया। स्वयं भरत ने भी स्नान किया, जल ग्रहण किया और आगे की यात्रा के लिए आवश्यक जल साथ रख लिया। किन्तु विश्राम के उन क्षणों में भी उनकी आँखों में चैन नहीं था। वे बार-बार पूर्व दिशा की ओर देखते, मानो अयोध्या उन्हें पुकार रही हो।

शुभ मन्त्रों के उच्चारण के साथ यात्रा पुनः आरम्भ हुई। विशाल वन सामने था, जहाँ मनुष्यों का आना-जाना बहुत कम होता था। किन्तु भरत का रथ वायु के समान तीव्र गति से उस निर्जन वन को पार करता चला गया। पीछे सेना धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।

कुछ समय बाद वे अंशुधान ग्राम के समीप पहुँचे। वहाँ उनके सामने भागीरथी गंगा अपने विशाल स्वरूप में बह रही थी। उसकी प्रबल धारा को देखकर भरत ने समझ लिया कि उसे पार करने में विलम्ब होगा। इसलिए वे तत्काल प्रसिद्ध प्राग्वट नगर पहुँचे, जहाँ से सुरक्षित रूप से गंगा पार की जा सकती थी।

गंगा पार कर वे कुटिकोष्टिका नदी के तट पर पहुँचे। सेना सहित उसे भी पार किया और धर्मवर्धन ग्राम पहुँचे। वहाँ से आगे तोरण ग्राम के दक्षिण भाग से निकलते हुए जम्बूप्रस्थ पहुँचे और फिर वरूथ नामक रमणीय ग्राम में रात्रि विश्राम किया।

प्रातःकाल होते ही यात्रा फिर आरम्भ हो गई। उगते सूर्य की लालिमा धरती पर बिखर रही थी। मार्ग में वे उज्जिहाना नगरी के प्रसिद्ध उद्यान में पहुँचे, जहाँ असंख्य कदम्ब वृक्ष सुगन्धित पुष्पों से लदे हुए थे। वातावरण अत्यन्त मनोहर था।

यहीं भरत ने एक महत्त्वपूर्ण निर्णय लिया। उन्होंने अपने रथ में सबसे तेज़ दौड़ने वाले घोड़ों को जोतने का आदेश दिया और सेना से कहा कि वह धीरे-धीरे पीछे आती रहे। अब वे एक क्षण भी प्रतीक्षा नहीं करना चाहते थे। उनका हृदय अधीर हो उठा था। वे मानो समय से स्पर्धा कर रहे थे।

वे तीव्र वेग से आगे बढ़ते हुए सर्वतीर्थ ग्राम पहुँचे और वहाँ एक रात बिताई। अगले दिन उत्तानिका नदी तथा अन्य अनेक नदियों को पार करते हुए वे हस्तिपृष्ठक ग्राम पहुँचे। फिर कुटिका नदी पार की, लोहित्य ग्राम पहुँचे और वहाँ से कपीवती नदी को भी लाँघ गए। यात्रा अब और भी कठिन होती जा रही थी, किन्तु भरत के कदम नहीं रुके।

आगे एकसाल नगर के निकट उन्होंने स्थाणुमती नदी पार की। विनत ग्राम के समीप गोमती नदी भी पीछे छूट गई। अन्ततः वे कलिङ्गनगर के समीप स्थित विशाल सालवन में पहुँचे।

अब तक घोड़े अत्यन्त थक चुके थे। उनकी साँसें तेज़ चल रही थीं। भरत ने उन्हें थोड़ी देर विश्राम कराया, उनके शरीर पर हाथ फेरकर स्नेह दिया, फिर रात होते ही पुनः यात्रा आरम्भ कर दी। चन्द्रमा की शीतल चाँदनी में रथ निरन्तर आगे बढ़ता रहा। किसी को नींद नहीं थी। सभी जानते थे कि उनके स्वामी के मन में कैसी पीड़ा है।

रात्रि बीतने लगी। पूर्व दिशा में हल्की लालिमा फैलने लगी। जैसे ही अरुणोदय हुआ, दूर क्षितिज पर एक परिचित नगर की धुँधली आकृति दिखाई देने लगी।

वह थी—मनु द्वारा बसाई गई पवित्र अयोध्या।

सात रातों तक निरन्तर यात्रा करने के बाद आठवें दिन भरत की आँखों ने अपनी प्रिय जन्मभूमि का दर्शन किया।

किन्तु उस क्षण उनके हृदय में वह उल्लास नहीं उमड़ा, जो अपने घर लौटने पर सामान्यतः उमड़ता है। अयोध्या दूर से ही अस्वाभाविक रूप से निस्तब्ध दिखाई दे रही थी। न उत्सव का स्वर, न वाद्यों की ध्वनि, न नगर की चहल-पहल।

भरत के हृदय की धड़कन अचानक तेज़ हो गई।

उन्हें लगा—जिस अनिष्ट की आशंका उन्हें राजगृह से निकलते समय सताने लगी थी, शायद अब उसका सामना करने का समय आ पहुँचा है।