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सिद्धाश्रम की पावन गाथा और वामनावतार का रहस्य

 

अपरिमित प्रभावशाली भगवान् श्रीराम के गंभीर और जिज्ञासापूर्ण वचन सुनकर महातेजस्वी महर्षि विश्वामित्र का मुखमंडल प्रसन्नता से दमक उठा। उन्होंने स्नेहपूर्ण स्वर में कहना आरम्भ किया—

 

“महाबाहु राम! यह भूमि साधारण नहीं है। अति प्राचीन काल में देवताओं द्वारा वंदित भगवान् विष्णु ने यहाँ अनेकों वर्षों तक, सौ युगों तक कठोर तपस्या की थी। यह वही स्थान है जहाँ उन्होंने वामन अवतार धारण करने से पूर्व निवास किया था। उसी तपस्या की सिद्धि के कारण यह स्थान ‘सिद्धाश्रम’ के नाम से विख्यात हुआ।”

 

ऋषि के शब्दों में श्रद्धा की गहराई थी। वे आगे बोले—उसी समय जब भगवान तप में लीन थे, विरोचन का पुत्र असुरराज राजा बलि अत्यंत पराक्रमी बन चुका था। उसने इन्द्र और मरुद्गणों सहित समस्त देवताओं को पराजित कर त्रिलोकी पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। उसका यश तीनों लोकों में गूँज रहा था।

 

बलि ने एक महान् यज्ञ का आयोजन किया। वह दानी, सत्यनिष्ठ और वचन का पालन करने वाला था। यज्ञ के समय जो भी याचक उसके द्वार पर आता—चाहे वह गौ माँगे, भूमि माँगे या स्वर्ण—राजा बलि बिना संकोच सब कुछ अर्पित कर देता। उसकी उदारता की चर्चा चारों दिशाओं में फैल गई थी।

 

किन्तु पराजित देवताओं के हृदय में वेदना थी। वे इस आश्रम में आए और भगवान विष्णु से विनती करने लगे—“हे सर्वव्यापी प्रभो! बलि का यज्ञ पूर्ण होने से पहले हमें अपना कार्य सिद्ध करना होगा। आप अपनी योगमाया से वामन रूप धारण कर उस यज्ञ में जाएँ और देवताओं का कल्याण करें।”

 

इसी बीच अग्नि के समान तेजस्वी महर्षि कश्यप अपनी धर्मपत्नी अदिति के साथ वहाँ पहुँचे। वे एक सहस्र दिव्य वर्षों तक चले महान् व्रत को पूर्ण कर चुके थे। उनका तेज वातावरण को आलोकित कर रहा था। उन्होंने भावविभोर होकर भगवान मधुसूदन की स्तुति की—“हे प्रभो! आप तप का स्वरूप हैं, ज्ञान के स्रोत हैं। मैं आपकी शरण में आया हूँ। मैं समस्त जगत् को आपके ही शरीर में स्थित देखता हूँ।”

 

भगवान विष्णु उनके प्रेम और भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने वर माँगने को कहा। तब कश्यप ने विनम्रता से निवेदन किया—“हे वरदायक प्रभो! आप अदिति के गर्भ से हमारे पुत्र रूप में अवतरित हों। देवताओं की रक्षा करें, इन्द्र के छोटे भाई बनकर उनकी सहायता करें।”

 

भक्त की करुण पुकार सुनकर भगवान ने वर स्वीकार किया। समय आने पर वे अदिति के गर्भ से प्रकट हुए और दिव्य बालक के रूप में वामन अवतार धारण किया। वह बटुक रूप में तेज से दमक रहे थे, पर भीतर अनंत ब्रह्माण्ड की शक्ति समाई थी।

 

वामन देव यज्ञशाला में पहुँचे जहाँ राजा बलि यज्ञ में तल्लीन थे। उस लघु ब्राह्मण बालक का तेज देखकर सभी चकित रह गए। बलि ने विनम्रता से पूछा—“हे ब्राह्मण कुमार! आप क्या चाहते हैं?” वामन ने मधुर स्वर में केवल तीन पग भूमि माँगी।

 

गुरु शुक्राचार्य ने चेताया, परन्तु सत्यव्रती बलि अपने वचन से पीछे न हटे। उन्होंने तीन पग भूमि दान में दे दी। तभी वह छोटा-सा बालक विराट रूप में परिवर्तित हो गया। एक पग में पृथ्वी, दूसरे में आकाश नाप लिया। तीसरे पग के लिए स्थान न बचा। तब बलि ने अपना मस्तक झुका दिया। भगवान ने उसे पाताल लोक का अधिपति बनाकर उसका सम्मान भी सुरक्षित रखा और इन्द्र को पुनः स्वर्ग का राज्य लौटा दिया।

 

विश्वामित्र ने राम की ओर प्रेम से देखते हुए कहा—“इसी कारण यह स्थान सिद्धाश्रम कहलाता है। यहाँ का वातावरण दुःख और शोक का नाश करता है। भगवान वामन के प्रति मेरी भक्ति के कारण मैं भी इस पावन भूमि में निवास करता हूँ।”

 

फिर उनका स्वर गंभीर हो उठा—“किन्तु मेरे यज्ञ में विघ्न डालने वाले राक्षस यहीं आते हैं। पुरुषसिंह राम! तुम्हें यहाँ उन दुराचारियों का वध करना है।”

 

इतना कहकर वे श्रीराम और लक्ष्मण का हाथ पकड़कर आश्रम में ले गए। उस समय दोनों राजकुमारों की शोभा ऐसी थी मानो पुनर्वसु नक्षत्रों के बीच स्थित निर्मल चन्द्रमा दमक रहा हो।

 

सिद्धाश्रम के तपस्वी विश्वामित्र को देखकर आनंद से भर उठे। उन्होंने ऋषि और दोनों राजकुमारों का आदरपूर्वक स्वागत किया। वातावरण श्रद्धा और प्रेम से ओतप्रोत था।

 

कुछ विश्राम के बाद श्रीराम और लक्ष्मण हाथ जोड़कर बोले—“गुरुदेव! आप आज ही यज्ञ की दीक्षा लें। यह सिद्धाश्रम अपने नाम के अनुरूप सिद्ध हो और राक्षसों का वध अवश्य सफल हो।”

 

विश्वामित्र ने संयमपूर्वक यज्ञ की दीक्षा ग्रहण की। राम और लक्ष्मण ने पूरी सावधानी से रात्रि व्यतीत की। प्रातःकाल उठकर उन्होंने स्नान किया, संध्या-वंदन किया और श्रद्धापूर्वक गायत्री मंत्र का जप किया। अग्निहोत्र सम्पन्न कर वे गुरु के चरणों में प्रणाम कर स्थिर भाव से खड़े रहे।

 

उनके हृदय में केवल एक संकल्प था—धर्म की रक्षा और गुरु की आज्ञा का पालन। सिद्धाश्रम की पावन भूमि पर एक नई लीला आरम्भ होने जा रही थी, जहाँ बालक रूप में प्रतीत होने वाले राजकुमार आने वाले समय में अधर्म के अंधकार को चीरने वाले थे।

 

इस प्रकार वह आश्रम केवल तपोभूमि ही नहीं, बल्कि धर्म, भक्ति और साहस की अमर गाथा का साक्षी बन गया।