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सुमन्त्र की वापसी और दशरथ का शोक-सागर

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सुमन्त्र की वापसी और दशरथ का शोक-सागर

अयोध्या की ओर लौटता हुआ वह रथ आज वैसा नहीं था, जैसा कभी विजय, उत्सव या मंगल संदेश लेकर लौटता था। उस दिन रथ के पहियों की गति धीमी थी, मानो वे भी आगे बढ़ना नहीं चाहते हों। सारथि सुमन्त्र के हृदय पर ऐसा बोझ था, जिसे शब्दों में व्यक्त करना असंभव था।

जब उन्होंने गंगा तट पर श्रीराम, सीता और लक्ष्मण को वन की ओर जाते देखा था, तब वे देर तक स्तब्ध खड़े रहे। विदा लेते समय उन्होंने दोनों राजकुमारों के सामने हाथ जोड़कर प्रणाम किया था। उनके नेत्र आँसुओं से भरे थे और कंठ रुंध गया था। श्रीराम के चरणों से दूर होने का विचार ही उनके लिए असहनीय था।

रथ पर बैठकर जब वे लौटने लगे, तो एक अद्भुत दृश्य दिखाई दिया। वे घोड़े, जो सदैव उत्साह और वेग से दौड़ते थे, आज बार-बार पीछे मुड़कर देख रहे थे। उनकी आँखों से गर्म आँसू बह रहे थे। उनके कदम भारी हो गए थे, मानो वे भी अपने प्रिय स्वामी से बिछुड़ना नहीं चाहते हों।

सुमन्त्र के मन में एक आशा अब भी जीवित थी। वे कई दिनों तक निषादराज गुह के साथ वहीं ठहरे रहे। उन्हें लगता था कि शायद श्रीराम उन्हें फिर बुला लें, शायद कोई संदेश आ जाए, शायद यह वियोग समाप्त हो जाए। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। अंततः भारी मन से उन्हें अयोध्या लौटना पड़ा।

रास्ते भर उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ, मानो सम्पूर्ण प्रकृति राम-वियोग में शोकमग्न हो गई हो। वृक्षों की हरियाली मुरझा गई थी। फूल, कोपलें और कलियाँ अपनी चमक खो चुकी थीं। नदियों का जल भी मानो तप्त हो उठा था। सरोवरों का शीतल जल गर्म लगने लगा था। वनों और उपवनों के पत्ते सूख गए थे।

पक्षियों का कलरव मौन हो गया था। वन के पशु भोजन की खोज में भी नहीं निकलते थे। अजगर और सर्प अपने स्थान पर निष्प्राण-से पड़े रहते। ऐसा लगता था, जैसे पूरे वन का जीवन ही रुक गया हो।

कमलों से भरे सरोवर अब उदास दिखाई देते थे। उनके पत्ते गलने लगे थे, पुष्प मुरझा गए थे। मछलियाँ और जल-पक्षी भी निस्तेज हो चुके थे। जल और भूमि पर खिलने वाले फूलों की सुगंध फीकी पड़ गई थी। फलों में पहले जैसी मिठास और सौंदर्य नहीं रहा था।

जब सुमन्त्र अयोध्या के समीप पहुँचे, तो उनका हृदय और अधिक व्याकुल हो उठा। कभी हँसी और उल्लास से भरे रहने वाले उद्यान सूने पड़े थे। पक्षियों का संगीत गायब था। बगीचों की शोभा मानो कहीं खो गई थी।

नगर में प्रवेश करते समय किसी ने उनका स्वागत नहीं किया। कोई प्रसन्नता नहीं थी, कोई उत्साह नहीं था। लोग दूर से रथ को देखते और जब उन्हें पता चलता कि श्रीराम उसमें नहीं हैं, तो उनकी आँखों से आँसू बहने लगते। वे गहरी साँसें भरते और निराश होकर सिर झुका लेते।

महलों की अट्टालिकाओं पर खड़ी स्त्रियाँ आशा भरी निगाहों से रथ को देख रही थीं। उन्हें विश्वास था कि शायद उनके प्रिय राम लौट आए होंगे। परंतु जैसे ही उन्होंने रथ को खाली देखा, उनका हृदय टूट गया। वे विलाप करने लगीं।

उनकी आँखों का काजल आँसुओं में बह चुका था। वे एक-दूसरे को देखतीं, लेकिन शब्द उनके साथ छोड़ चुके थे। उनकी पीड़ा इतनी गहरी थी कि उसे व्यक्त करने के लिए भाषा भी अपर्याप्त लगती थी।

सुमन्त्र ने देखा कि अयोध्या में कोई भेद नहीं रह गया था। मित्र, शत्रु और तटस्थ—सभी समान रूप से दुःखी थे। किसी के शोक में कोई अंतर नहीं था।

उन्होंने राजा दशरथ के सामने हाथ जोड़कर कहा, “महाराज, अयोध्या का सारा हर्ष समाप्त हो गया है। घोड़े, हाथी, पशु-पक्षी—सब शोक में डूबे हैं। पूरी नगरी आर्तनाद से भर गई है। लोगों की लंबी साँसें ही अब इस नगर की धड़कन बन गई हैं। यह अयोध्या मुझे पुत्र-वियोग से व्याकुल माता कौसल्या के समान आनंदहीन और निर्जीव प्रतीत होती है।”

सुमन्त्र के शब्द सुनते ही राजा दशरथ का हृदय मानो चीर गया। उनकी आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगी। टूटे हुए स्वर में उन्होंने कहा, “मैंने कितना बड़ा अपराध किया है! मैं कैकेयी के मोह में इतना अंधा हो गया कि अपने मंत्रियों, मित्रों और विद्वानों से भी सलाह नहीं ली। केवल एक स्त्री की इच्छा पूरी करने के लिए मैंने अपने कुल का सर्वनाश कर दिया।”

उनके स्वर में पश्चात्ताप की ज्वाला थी।

“यह विपत्ति अवश्य ही हमारे वंश के विनाश के लिए आई है। सुमन्त्र, यदि मैंने कभी तुम्हारा कोई उपकार किया हो, तो मुझे तुरंत मेरे राम के पास ले चलो। मेरे प्राण उनके दर्शन के लिए तड़प रहे हैं।”

वे कुछ क्षण रुके, फिर व्याकुल होकर बोले, “यदि अभी भी मेरी आज्ञा इस राज्य में चलती है, तो मेरे आदेश से जाओ और राम को वापस ले आओ। मैं उनके बिना एक पल भी जीवित नहीं रह सकता।”

फिर उनका धैर्य टूट गया।

“यदि वे बहुत दूर जा चुके हैं, तो मुझे ही रथ पर बैठाकर उनके पास ले चलो। मैं अपने श्वेत दाँतों वाले, विशाल भुजाओं वाले, धनुषधारी राम को देखना चाहता हूँ। यदि सीता और लक्ष्मण के साथ उनका दर्शन हो जाए, तो शायद मैं जीवित रह सकूँ।”

उनकी आँखें शून्य में कुछ खोज रही थीं।

“यदि मैं अपने लाल कमल जैसे नेत्रों वाले राम को नहीं देख पाया, तो निश्चित ही मृत्यु मुझे अपने साथ ले जाएगी। इससे बड़ा दुःख और क्या हो सकता है कि जीवन के अंतिम क्षणों में भी मैं अपने पुत्र को नहीं देख पा रहा हूँ?”

फिर वे करुण स्वर में पुकार उठे, “हा राम! हा लक्ष्मण! हा जनकनंदिनी सीते! तुम्हें क्या पता कि मैं किस प्रकार अनाथ की भाँति तड़प-तड़पकर प्राण त्याग रहा हूँ!”

दुःख की तीव्रता से उनका शरीर काँपने लगा। वे कौसल्या की ओर देखकर बोले, “देवि, मैं शोक के ऐसे अथाह समुद्र में डूब गया हूँ, जिसे पार करना मेरे लिए असंभव है।”

उन्होंने अपने दुःख को शब्दों में बाँधने का प्रयास किया।

“राम का वियोग उस समुद्र का प्रचंड वेग है। सीता का बिछोह उसका दूसरा किनारा है। मेरी लंबी साँसें उसकी लहरें हैं। आँसुओं की धारा उसका गंदला जल है। मेरा विलाप उसकी गर्जना है। बिखरे हुए केश उस पर तैरने वाली जलकुंभी हैं। मंथरा के कुटिल वचन उसके भयानक मगरमच्छ हैं। कैकेयी उस समुद्र की प्रचंड अग्नि है। उसके माँगे हुए दो वरदान उसके दो तट हैं और राम का वनवास उस समुद्र का असीम विस्तार है।”

उनकी वाणी टूटने लगी।

“मैं लक्ष्मण सहित राम को देखना चाहता हूँ, पर उन्हें देख नहीं पा रहा हूँ। यह अवश्य ही मेरे किसी बड़े पाप का फल है।”

इतना कहते-कहते उनका शरीर शिथिल पड़ गया। वे मूर्च्छित होकर शय्या पर गिर पड़े।

राजा दशरथ के करुण विलाप और उनकी यह अवस्था देखकर माता कौसल्या का भय और बढ़ गया। उन्हें लगने लगा कि राम का वियोग अब केवल अयोध्या का नहीं, बल्कि उनके पति के प्राणों का भी शत्रु बन चुका है।

उस रात अयोध्या का राजमहल दीपों से नहीं, आँसुओं से जगमगा रहा था। हर कक्ष में सिसकियाँ थीं, हर हृदय में पीड़ा थी, और हर अधर पर केवल एक ही नाम था—राम।