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🌸 एक घड़ा, एक वचन और अनंत मोक्ष की कथा
(बालकृष्ण और कुम्हार की दिव्य लीला)
यह कथा है भगवान श्रीकृष्ण के बाल्यकाल की—उस काल की, जब नंदलाल अपने बाल-सुलभ स्वभाव से पूरे ब्रज को आनंद और शरारत से भर देते थे।
कभी मटकी फोड़ना,
कभी माखन चुराना,
तो कभी ग्वाल-बालों के साथ नई-नई लीलाएँ रचना—
ऐसा शायद ही कोई दिन जाता था जब माता यशोदा के पास कान्हा की कोई शिकायत न आती हो। एक दिन तो शिकायतों की सीमा ही पार हो गई। माता यशोदा क्रोध में आकर छड़ी हाथ में लेकर नटखट कान्हा के पीछे दौड़ पड़ीं।
कृष्ण भयभीत नहीं थे, पर माँ का प्रेम और क्रोध—दोनों को भली-भाँति जानते थे। भागते-भागते वे एक कुम्हार के घर जा पहुँचे।
उस समय कुम्हार अपने चाक पर मिट्टी का घड़ा बना रहा था। जैसे ही उसकी दृष्टि श्यामसुंदर पर पड़ी, उसका हृदय आनंद से भर गया। वह पहचान गया—यह कोई साधारण बालक नहीं, साक्षात् नारायण हैं।
कान्हा ने भोलेपन से कहा— “कुम्हार जी! मेरी मैया बहुत नाराज़ हैं। छड़ी लेकर मुझे ढूँढ रही हैं। थोड़ी देर के लिए मुझे कहीं छुपा लीजिए।”
कुम्हार का हृदय द्रवित हो गया। उसने तुरंत एक बड़े मिट्टी के घड़े के नीचे भगवान को छुपा दिया।
कुछ ही क्षणों में माता यशोदा वहाँ आ पहुँचीं— “अरे कुम्हार! क्या तूने मेरे कान्हा को देखा है?”
कुम्हार ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया— “नहीं मैया, मैंने तो नहीं देखा।”
यह संवाद भगवान श्रीकृष्ण भीतर बैठे-बैठे सुन रहे थे।
जब माता यशोदा वहाँ से चली गईं, तब कान्हा बोले— “अब तो मैया चली गई हैं, मुझे बाहर निकालो।”
पर अब कथा ने एक नया मोड़ लिया।
कुम्हार बोला— “प्रभु! पहले मुझे वचन दीजिए कि आप मुझे चौरासी लाख योनियों के बंधन से मुक्त कर देंगे।”
कृष्ण मुस्कुराए— “ठीक है, मैं वचन देता हूँ।”
कुम्हार का साहस बढ़ा— “केवल मुझे नहीं प्रभु, मेरे पूरे परिवार को भी मोक्ष दीजिए।”
कान्हा ने फिर हँसकर कहा— “तथास्तु!”
अब कुम्हार ने विनती की— “प्रभु, जिस मिट्टी से यह घड़ा बना है, उसे ढोने वाले मेरे बैलों को भी मुक्त कर दीजिए।”
भगवान श्रीकृष्ण कुम्हार के प्राणी-प्रेम से अत्यंत प्रसन्न हुए और बैलों को भी मोक्ष का वचन दे दिया।
पर कथा अभी समाप्त नहीं हुई थी।
कुम्हार बोला— “हे प्रभु! एक अंतिम प्रार्थना है— जो भी जीव हम दोनों के इस संवाद को सुने, उसे भी आप जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त कर दें।”
अब तो स्वयं भगवान का हृदय भर आया।
उन्होंने कहा— “तथास्तु! तुम्हारी सभी इच्छाएँ पूर्ण हों।”
तब कुम्हार ने घड़ा हटाया। बालकृष्ण बाहर आए। कुम्हार ने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया, उनके चरण धोए, चरणामृत पिया और पूरे घर में उसका छिड़काव किया। अंत में वह श्रीकृष्ण को गले लगाकर इतना रोया, इतना रोया कि प्रेम में लीन होकर उन्हीं में विलीन हो गया।
🌼 भावार्थ / व्याख्या:
यह कथा सिखाती है कि
भगवान तर्क से नहीं, प्रेम से मिलते हैं।
कुम्हार ने न शास्त्र पढ़े थे, न तप किया था—
उसके पास केवल निष्कपट प्रेम और करुणा थी।
भगवान श्रीकृष्ण को बाँधने वाली वस्तु कोई रस्सी नहीं, भक्त का प्रेम है।
🌺 नीति / संदेश (Moral):
निष्काम प्रेम सबसे बड़ा साधन है।
जो दूसरों के कल्याण की कामना करता है, वही भगवान को प्रिय होता है।
ईश्वर केवल मनुष्य ही नहीं, समस्त जीवों के उद्धारकर्ता हैं।
जहाँ प्रेम होता है, वहाँ मोक्ष स्वयं चलकर आता है।
🌸 ।। जय श्री कृष्ण ।। 🌸